बुधवार, 12 जुलाई 2023

जांभाणी साहित्य अकादमी के 11 वें स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

 


वह समाज ही अपने आप में धन्य हैं जिसका साहित्य समृद्धशाली हो । 

इस कड़ी में हम भी स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं कि हमारे समाज के पास समृद्ध साहित्य और शोध है ।

जांभाणी साहित्य पर्यावरण और मानवीयता का अनूठा उदाहरण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश करता है।

गुरु जांभोजी की वाणी और उनके शिष्यों की साहित्यिक धरोहर को संजोकर रखने के उद्देश्य से तथा उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए समाज के विद्वजनों और भामाशाहों ने 'जांभाणी साहित्य अकादमी' की स्थापना 11 साल पहले की थी ।

 आज इस जांभाणी साहित्य अकादमी ने अपनी पहचान न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना परचम लहराया है। 

इस अकादमी ने 11 वर्षों में निरन्तर नवीनतम उदाहरण पेश किए हैं उसके लिए अकादमी के तमाम सदस्यों और अध्यक्षों को श्रेय जाता है।

21 वीं सदी में भारतीय ज्ञान -परम्परा और सांस्कृतिक धरोहर को बचाएं रखने की अनूठी पहल में भी जांभाणी साहित्य अकादमी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

जांभाणी साहित्य अकादमी राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों में स्कूली बच्चों को संस्कारवान के लिए संस्कार शिविरों का आयोजन कर रही हैं इसके अलावा प्रतिभा सम्मान और ज्ञान परीक्षा तथा अनेक प्रकार की गतिविधियां करवा रही हैं जो वाकई क़ाबिल_ए_तारीफ है।

देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करके नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं और आने वाले समय में भी अनेकानेक योजनाओं के साथ यह आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध है।

इस अकादमी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से इतने शानदार कार्यक्रम किए हैं और आने वाले समय में तो नयी रणनीतियों के साथ भारतभर में अन्य साहित्यिक अकादमियों के साथ जुड़कर आगे बढ़ने के लिए संकल्पबद्ध है।

मैं इस सोशल मीडिया पटल से जुड़े लोगों से भी निवेदन करना चाहूंगी कि जांभाणी साहित्य अकादमी से जुड़ें और भारतीय ज्ञान -परम्परा और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से हमारे जांभाणी साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने में भी सहयोग करें। 

आज पुनः हम आप सभी को जांभाणी साहित्य अकादमी के 11 वें स्थापना दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं! #डॉ_मिलन_बिश्नोई 

#जय_गुरुदेव_जम्भेश्वर 

#JambhaniSahityaakademi

शुक्रवार, 26 मई 2023

शिखर पर बेटियां - आचार्य ऋषभदेव शर्मा

शिखर पर बेटियाँ #डेलीहिंदीमिलाप @Janadesh TODAY
 संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में इस वर्ष 4 महिला प्रत्याशियों ने प्रथम 4 स्थानों पर कब्ज़ा जमा कर सचमुच इतिहास रच दिया है। इन्होंने इससे पहले का 3 स्थान का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जाती है और इन चारों बेटियों ने शिखर पर पहुँच कर कड़ी मेहनत और समर्पण का प्रमाण दिया है। शीर्ष रैंक पाने वाली इशिता किशोर, गरिमा लोहिया, उमा हरति एन. और स्मृति मिश्रा की यह उपलब्धि निजी हो सकती है, लेकिन यह भारतीय समाज की भी सार्वजनिक उपलब्धि है कि उसकी बेटियाँ हर क्षेत्र में नित्य नूतन कीर्तिमान रच रही हैं।
 इस बार के परिणाम इसलिए और भी महत्वपूर्ण हैं कि घोषित परिणामों में 34 प्रतिशत स्थान महिलाओं को मिले हैं। कुल 933 स्थानों में से महिला उम्मीदवार 320 स्थानों पर सफल रही हैं। देश को अपनी इन सभी बेटियों पर नाज़ होना चाहिए। इनकी सफलता भारत में महिलाओं के लिए प्रगति का संकेत है। इससे पता चलता है कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में पुरुषों की तरह ही सक्षम हैं, यहाँ तक कि सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी भी। यह भी एक संकेत है कि समाज नेतृत्व की भूमिका में महिलाओं को अधिक स्वीकार कर रहा है। लेकिन इस सच से भी मुँह नहीं चुराया जा सकता कि भारत की कुल कार्यरत आबादी में महिलाओं का अनुपात आज भी 17 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इसका मतलब है कि अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है
। याद रहे कि किसी भी समाज के समग्र विकास की खरी कसौटी उस समाज में महिलाओं की हैसियत ही होती है अर्थात समाज उनका सम्मान किस तरह और किस रूप में करता है! खेद के साथ कहना पड़ता है कि भले ही देश के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर भारत की बेटियाँ तरह तरह से यह साबित कर चुकी/रही हैं कि स्त्री शक्ति सचमुच सर्वसमर्थ है, फिर भी यह महादेश अभी तक उन्हें उनके हिस्से का पूरा सम्मान देने में कोताही बरतता है, भेदभाव करता है। पुरुष-वर्चस्व की ग्रंथि अभी तक भी हमारे समाज को इस तरह जकड़े हुए है कि बेटियों की सारी उपलब्धियाँ उसके सामने निष्प्रभावी हो जाती हैं। यह कोई रहस्य नहीं है कि भारत में आज भी महिलाओं को जीवन के कई क्षेत्रों में लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, समान कार्य करने के लिए उन्हें अक्सर पुरुषों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है, और निर्णय लेने वाले पदों पर उनका प्रतिनिधित्व कम होता है। 
ऐसे में यूपीएससी में इन महिलाओं की रिकॉर्ड सफलता इस बात की याद दिलाती है कि हमें लैंगिक समानता के लिए लड़ाई जारी रखनी होगी। हमें एक ऐसा समाज बनाने की जरूरत है जहाँ महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर मिलें और जहाँ उनके साथ भेदभाव न हो। इन बेटियों की उपलब्धियाँ भारत की सभी बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। इनकी सफलता अन्य महिलाओं को भी अपने सपने पूरे करने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे पता चलता है कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं और कभी हार नहीं मानते हैं तो कुछ भी संभव है। इससे एक अधिक सशक्त और उत्पादक समाज बन सकता है। इस उपलब्धि का भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ना चाहिए। इससे हम लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने और अधिक समान समाज बनाने की दिशा में प्रेरित हो सकते हैं। 
असल में इन महिला प्रत्याशियों की सफलता भारत के विकास का एक सकारात्मक चरण है। यह भविष्य के लिए प्रगति और आशा का संकेत है। अंततः यह भी कि जिस देश में स्वर्ण पदक लाने वाली विश्वविजेता महिला एथलीटों तक को यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता हो और न्याय के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता हो, जिस समाज में परिवार और सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने में अधिकांश महिलाओं का कोई स्थान न हो, वहाँ प्रशासन के क्षेत्र में इन बेटियों की उपलब्धियों का गहरा अर्थ है - व्यवहारपरक भी; और प्रतीकात्मक भी। इनकी सफलता भविष्य के लिए उम्मीद की निशानी भी है। इससे कम से कम इतना तो पता चलता ही है कि भारत में चीज़ें बदल रही हैं, और महिलाएँ धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से अधिक अधिकार और अवसर प्राप्त कर रही हैं। 000

सोमवार, 10 अप्रैल 2023

पर्यावरण प्रेमी अध्यक्ष देवेन्द्र बिश्नोई की संकल्प यात्रा:सामाजिक एकता और अखंडता में विश्वास -डॉ. मिलन बिश्नोई

 नोट- लेख का कॉपी पेस्ट करने से बचें ।


 पर्यावरण प्रेमी अध्यक्ष देवेन्द्र बिश्नोई की संकल्प यात्रा:सामाजिक एकता और अखंडता में विश्वास 

भारत की प्रसिद्ध संकल्प यात्राएँ

भारतीय सनातन धर्म, इतिहास और राजनीति में पदयात्राओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । ऐतिहासिक परिदृश्य में यदि पद यात्राओं को देखा जाए तो सत्ता पलटने में कारगार सिद्ध हुई है । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की औपनिवेशिक सत्ता का तख्त़ पलटने में गांधी जी दांडी मार्च का अहम योगदान माना जाता है । इस आंदोलन के माध्यम महात्मा गांधी ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का परिचय कराया । 1930 को लॉर्ड इरविन को पत्र में लिखते हैं-राजनीतिक दृष्टि से हमारी स्थिति गुलामों से अच्छी नहीं है, हमारी संस्कृति की जड़ ही खोखली कर दी गई है। हमारा हथियार छीनकर हमारा सारा पौरुष अपहरण कर लिया है । इस प्रकार गाँधीजी का कार्यक्रम 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी मार्च प्रारंभ हुआ । ठीक साढ़े छः बजे अपने 79 अनुयायियों के साथ आश्रम छोड़ा और मार्च यात्रा आरंभ करते हैं। दांडी तक की 241 मील की दूरी उन्होंने  24 दिन तक की पूरी की ।इस दौरान गांधी जी जहां-जहां विश्राम किया वहां जनसमुदाय को संबोधित करते थे । अतः इस दांडी यात्रा से गांधीजी ने अंग्रेजों की जड़े हिला दी थी ।

 हमारे भारतीय इतिहास में राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक संकल्प यात्राएं की गई है । इन यात्राओं में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक सुधार हेतु संकल्प लिए जाते हैं । 1982 में एनटी रामाराव की चैतन्य रथम यात्रा, 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा, 2004 वाईएस राजशेखर रेड्डी की पैदलयात्रा, 2017 में जगनमोहन रेड्डी की प्रजा संकल्प यात्रा और 2023  में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा ये सभी चर्चित यात्राएं मानी जाती है ।

बिश्नोई समाज में संकल्प यात्रा

मेरे खून का एक-एक कतरा युवाओं के लिए हैं- अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी बुड़िया

हाल ही में अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवेन्द्र बुड़िया ने समाज को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए संकल्प यात्रा की शुरुआत की है । वे 30 मार्च 2023 को अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा से एक नोटिस जारी करते हुए लिखते हैंमैं इस सर्वजनाय कल्याण भावना के संकल्प में पवित्र धाम जाम्भा पीठ के दर्शन यात्रा पर निकल रहा हूँ । ताकि हम समाज के युवाओं में एक संदेश दे सके कि तीर्थ धाम, परमार्थ यात्रा आदर्श जीवन का दिव्य रूप है । इसी संकल्प में मैं सुबह मथानिया बाईपास रेलवे क्रॉसिंग माणकलाव जोधपुर से पैदल यात्रा शुरू करके जाम्भालाव धाम तक यात्रा करूंगा। अर्थात् वे दूसरे दिन चलो जाम्भाधाम के नारे के साथ अपने सहयोगी श्रीमान पतराम बिश्नोई, कल्पेश बिश्नोई और कुछ युवाओं के साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं ।

संकल्प यात्रा और परिणाम

इस यात्रा के माध्यम से कई परिणाम सकारात्मक दिखाई दे रहे हैं । जिसमें खासकर युवा पीढ़ी और बड़े -बुजुर्गों का अपार प्रेम । जो अकल्पनीय, अविश्वसनीय, अदृश्यवान था । यात्रा में अपार प्रेम मिलने का कारण यह भी है कि अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी ने बारम्बार समाजोत्थान के लिए सदैव सराहनीय प्रयास किए है । वे पहले अध्यक्ष होंगे जिनके हर कदम में समाज का साहित्य, संस्कार, शिक्षा को वैश्विक परिदृश्य में पहचान दिलाने की कोशिश नज़र आती है । हमारे पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज को शिक्षा, साहित्य, वाणिज्य, व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में शीर्षस्थ स्थानों नैरन्तर्य प्रयासरत होने के कारण ही जनता उनके साथ नजर आती है।  समाज की युवा टोली और बड़े-बुजुर्ग देवेंद्र जी की पैदल संकल्प यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे । सूरज ढ़लने के साथ-साथ संध्या के समय उनकी तबीयत खराब हो जाती है । तब ऐसा मन में संशय जरूर हुआ कि यात्रा कहीं अधूरी नहीं रह जाएगी ? डॉक्टरों ने भी उन्हें संकल्प यात्रा करने की अनुमति नहीं दी किंतु उन्होंने अपनी हठधर्मिता के आगे किसी की नहीं सुनी । शायद ईश्वरीय ताकत ही थी कि राजस्थान की इस धुप और गर्मी में वे निरन्तर अपने बिश्नोई बंधुओं के साथ संकल्प सिद्धि की ओर चलते रहे । इस यात्रा में प्रतिदिन युवाओं और बुजुर्गों तथा महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली । संभवतः संकल्प यात्रा की शुरूआत से पहले तो अध्यक्ष साहब को भी विश्वास नहीं हुआ होगा कि जनता उनसे इतना अपार और अथाह प्रेम करती है । किंतु रास्ते में गुरु महाराज जम्भेश्वर के भजनों के साथ नाचते-झूमते युवा और बुजुर्ग उन्हें अहसास ही करवा रहे थे कि हमें आप जैसे अध्यक्ष ही पसंद है । लेकिन जितना हमने सोशल मीडिया के माध्यम से इस यात्रा के दौरान अध्यक्ष को देखा तो उनमें कोई वैर-विरोध और आक्रोश की भावना दिखायी नहीं दी । वे अपनी धीरता और गंभीरता के साथ संगी-साथियों के साथ सकारात्मक भाव और गुरु महाराज के विश्वास पर आगे बढ़ रहे थे । अर्थात् कह सकते है यह संकल्प यात्रा उम्मीदों और विश्वासों, दृढ़ संकल्पों और समाज के प्रति ईमानदारी और निष्ठावान बने रहने की थी । यानि यह यात्रा युवा पीढ़ी के विश्वास और उम्मीद और प्रगतिशीलता की प्रतीक के रूप में साबित हुई है । यात्रा के आरम्भ में जम्भसार मीडिया के बीराराम जी ने श्री देवेन्द्र जी से सवाल किया गया था- इस यात्रा को करने के पीछे कौनसे संकल्प छुपे हैं ? तब देवेंद्रजी बताते है कि यह यात्रा सामाजिक एकता और नशे की प्रवृत्ति से समाज को मुक्त रखने तथा समाज के प्रति कल्याण की भावना तथा साधु-संतों के चरणों में जाने और सोशलमीडिया पर फैलाई गई अफवाह को दूर करने की यात्रा है । उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय आधुनिकता की करवट ले रहा है,अभी रूढ़िवादिता के पथ पर आगे बढ़ना असंभव है ।

संकल्प यात्रा के दौरान सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष

सकारात्मक परिणाम और सामाजिक बदलाव लाने के दृष्टिकोण से ही संकल्प यात्रा शुरुआत की जाती है । लोकतांत्रिक देश में किसी के प्रति स्वतंत्र विचार रखने की आजादी भी है । इस आजादी को बरकरार रखते हुए या कहें बौद्धिक कुशाग्रता से इन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया । वहां सकारात्मक और नकारात्मक कमेंट के लिए स्वीकार्यता थी । यदि उन कमेंट्स के माध्यम से लेखा-जोखा किया जाए तो अधिकांश जनता ने अध्यक्ष की समाज के प्रति लग्न और उनके द्वारा किए जाने वाले समस्त सहयोग और कार्यों को सराहनीय माना है । जनता सदैव उनके साथ रहने का वादा भी करती दिखाई दी । यह विश्वास केवल और केवल उनके द्वारा अपनी सच्ची निष्ठा और ईमानदारी और सेवाभाव के कारण इन्हें प्राप्त हुआ । वहीं उन्होंने संत समाज के आक्रोश और शंका को मीडिया के माध्यम से स्पष्ट भी किया था कि उन्होंने कहा कि संतो के लिए कभी निम्नस्तर के शब्द इस्तेमाल नहीं किया । फिर भी कहा आटा खानी जबान से कुछ शब्द ऐसे निकले तो माफी मांगने में कोई हर्ज नहीं है इस विनम्र व्यववहार में उदारता और सौम्यता तथा सम्मान के भाव स्पष्ट दिखायी देता हैं ।

तीन दिन तो जगह-जगह से यात्रा में लोग जुड़े ही थे । किंतु चौथे दिन की संध्या में संपूर्ण राजस्थान सहित अन्य प्रांतों के भारी संख्या में बिश्नोई समाज को लोग स्व-इच्छा से अध्यक्ष का समर्थन करने आए वह सबसे अधिक रोचक था । संध्या के समय बिश्नोई समाज के सम्मानित और परम पूज्य भागीरथ दासजी आचार्य स्वयं उन्हें आशीर्वाद देते हुए जाम्भा में उनका स्वागत कर रहे थे वहीं जनता को सबसे अधिक भरोसा दिलाने वाला क्षण था । आदरणीय महंत भगवानदास, आचार्य कृपाचार्य, संत राजूराम महाराज इत्यादि संतगण उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे और रात्रि जागरण करने के साथ  समाज को एकता के सूत्र में बनाएं रखने का संदेश भी दिया । आचार्य भागीरथ दास जी ने श्री देवेंद्र जी के व्यक्तित्व की सराहना भी मीडिया के सामने की । यह संतो का संदेश और आशीर्वाद इस यात्रा की सफलता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था । अतः समाज के समस्त लोगों को आचार्य भागीरथदास के कथनों से प्रेरणा लेनी चाहिए ।

 वहीं हमने संतों को सदैव अपना आदर्श और सर्वोपरि माना है । यदि संत सामाजिक मंच पर अभद्रता के साथ असभ्य भाषा इस्तेमाल करें तो वास्तव में पढ़ा-लिखा और सजग व्यक्ति शायद ही कोई आने वाले समय में ऐसे संत-महात्मा पर भरोसा करेगा । संतो को गुरु परम्परा और हमारी सनातनी संस्कृति में कहीं ऐसी वाणी का इस्तेमाल करने इजाजत नहीं देती है । क्या  संत लालदास जी समाज में आदर्श बनने के लिए कहीं सनातनी मर्यादा को पार नहीं कर रहे थे ? वे गर्मजोशी भाषण के माध्यम से ईर्ष्या भाव प्रकट कर रहे थे । जनता सोशल मीडिया के माध्यम से उनके भाषण का विरोध भी कर रही थी । उनके भाषण से ही उनकी अज्ञानता और संस्कारविहिन धारणा दिखायी दे रही थी। एक तरफ विश्नोई धर्म और नियम तथा कानून कायदों की बात कर रहे थे वहीं फूहड़ भाषा में तुच्छ(नावटियां) शब्दों का बार-बार प्रयोग भी कर रहे थे। जब वे अपना भाषण दे रहे थे तब श्री फगलू राम जी गलत शब्दों का प्रयोग करने से भी रोक भी रहे थे । जब संत लालदास गुरु जम्भेश्वर के 29 नियमों की बात कर रहे है तब वे क्यों भूल जाते हैं? गुरुदेव जम्भेश्वर महाराज ने उनके अनुयायियों को अपनी वाणी का संयमित और सहज ढ़ग से प्रयोग करने का उपदेश दिया है।

अध्यक्ष श्री देवेंद्र बुङिया की चार दिवसीय यात्रा शांति, अहिंसा और प्रेम व विश्वास की यात्रा थी। उनकी यात्रा में कहीं रोष प्रकट करते हुए कोई नहीं दिखायी दिया । मीडिया उनसे तरह-तरह के सवाल पूछ रही थी तब उनके संबोधन में केवल शिक्षा और सामाजिक विकास के बारे में ही सुनने को मिल रहा था । दिन भर की थकान के पश्चात रात्रि विश्राम और जागरण में आम गायक और गायणों के द्वारा जागरण करवाना समाजहितैषी कार्य था । आजकल ग्रामीण इलाकों में जागरण और चल्लू-पाहल के कार्य में काफी उदासीनता दिखाई देने लगी है । अमीर लोग जागरण में बड़े-बड़े साधु और गायक कलाकारों को आमंत्रित करते हैं किंतु पहले प्रत्येक गांव-ढ़ाणी में गायणे चल्लु-पाहल करते थे । आज भी समाज को पुनः स्मरण करने की आवश्यकता भी महसूस हुई है।

यात्रा के दौरान सवाल अंतरजातीय विवाह से संबंधित भी किया गया था ।उन्होंने बताया अंतरजातीय विवाह स्वीकार्य नहीं है तो एक सिस्टम के तहत् वे अपनी राय रख सकते थे । सोशल मीडिया का सहारा लेने की बजाय चार बड़े लोग उनसे सीधे बात कर सकते थे । किंतु व्यापक स्तर पर देखा जाए तो आज 21 वीं सदी का दौर चल रहा है । हमें व्यापक दृष्टिकोण से भी सोचने की आवश्यकता है । आज केवल बिश्नोई ही नहीं बल्कि अन्य समाज के माता-पिता भी अंतरजातीय विवाह को स्वीकृती प्रदान नहीं करते किंतु कुछ शहरी युवा पीढ़ी इन सब बातों को मान रही है? क्योंकि जो अच्छी स्कूल और शिक्षण संस्थानों या विदेशी शिक्षण संस्थानों, हॉस्टलों पले-बढ़े और पढ़े है उन्होंने वहाँ कभी जातिवाद का माहौल नहीं देखा । वैसे देखा जाए तो उस माहौल में जातिवाद का विरोध करना सिखाया जाता है। केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में सर्वप्रथम हमारे संविधान को ध्यान में रखते हुए पढ़ाया जाता है । ऐसे परिवेश में रहते हुए वहां जाति से अधिक राष्ट्रीयता की भावना जागृत करना सिखाया जाता है । दूसरा मुख्य कारण यह भी है कि हमारे प्रांत और जाति के लोग सहपाठी भी न के बराबर होते हैं ।वहां इंसान अपनी प्रतिभा और शिक्षा के बल पर आगे बढ़ रहा है । और जब वह पढ़ाई करके अपना करियर बना लेता है तब अपनी पसंद की शादी करने की सोचता है । ऐसा परिणाम हाल ही में हमें देखने को मिला है । यह कटु सत्य है कि आज कल मां-बाप का ठोर अपनी संतान पर चलता नहीं है । चाहे समाज विरोध करें या कोई और ...मैंने स्वयं समाज के ऐसे माँ-बाप को देखा जिन्होंने अपने बेटे के अंतरजातीय विवाह का विरोध भी किया उनके बेटों ने लौटकर भी माँ-बाप का मुँह तक नहीं देखा ।

 आज संवैधानिक दृष्टि से भी जातिवाद के आधार पर भेदभाव कानूनी अपराध माना जाता है। वहीं यदि हमारे बिश्नोई समाज के पंथ निर्माण की अवधारणा देखी जाए तो गुरुदेव ने समस्त जातियों का आदर किया है । जब हम जांभाणी साहित्य पढ़ते हैं तब भी उसमें जातिवाद का भेदभाव तो कहीं दिखाई नहीं देता । किंतु सच्चाई यह भी है कि हम जातिवाद का पुरजोर समर्थन भी कर रहे हैं । मुझे आज भी याद है हमारी स्कूलों में भील-मेघवाल के छात्रों को मटके में से पानी नहीं पीने दिया जाता था तो ऐसे सामाजिक भेदभाव हमें शैक्षणिक स्तर पर खत्म करने की आवश्यकता है। आज जब हम मानवाधिकार और वन्यजीव रक्षा की बात करते हैं तो मानवीय जाति का भेदभाव करना कहाँ उचित होगा ? हमने विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी करके सफलता प्राप्त की है तो ऐसे सामाजिक भेदभावों के खिलाफ भी हमें आवाज उठाने की आवश्यकता है ।

बिश्नोई का अर्थ यह तो कतई नहीं है कि केवल बिश्नोई समाज में पैदा होने से ही बिश्नोई होगा । जो कुछ लोग व्याभिचार,नशा,चोरी और अपराध की प्रवृत्तियों में लिप्त है क्या उन्हें समाज बिश्नोई कहना चाहिए ? संत-महात्मा और समाज के बड़े लोगों के ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता है । और यदि कोई गुरु जम्भेश्वर महाराज की शिक्षा और संस्कार से प्रभावित होकर वह गुरुदेव का अनुयायी बनना चाहें तो उनका हमें सदैव आदर करना चाहिए । यदि समाज के लोग असमर्थता प्रकट करते है तो मुझे नहीं लगता ऐसा करने से हम समाज का उद्धार कर रहे हैं । एक तरफ केंद्र सरकार हिंदूओं के लिए घर वापसी के रास्ते खोल रही है । राजस्थान सरकार अंतरजातीय विवाह के लिए 10 लाख की योजना चला रही है । ऐसे माहौल में यदि हम अत्यधिक कट्टर होते जाएं और जातिवाद का समर्थन करते रहेंगे तो सामाजिक और राजनैतिक दोनों दृष्टिकोण से नुकसानदेही होगा । आज समाज को शिक्षा, राजनीति, व्यापार, कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, सिनेमा, उद्योग धंधों के प्रति सोचने और युवाओं को अधिक से अधिक बिश्नोई समाज की संवेदना और पर्यावरण प्रेम की शिक्षाओं के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की आवश्यकता है । तुच्छ राजनीति और आपसी स्वार्थ भाव से समाज को गुमराह करने की बजाय समाज को संगठित होकर समाज में नशा प्रवृत्ति और चोरी-डकैती जैसी प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ने की आवश्यकता है । समाज को विकसित और सुदृढ़ कैसे बनाएं इस विषय पर संत-महात्माओं और प्रबुद्ध समाज सेवकों को सोचने की आवश्यकता है ।

सामाजिक मंचों पर बोलने वाले संत-महात्माओं और समाज सेवकों को आज पूरा देश सोशल मीडिया के माध्यम से सुनता है और देखता भी है । यदि वे आक्रोशित, अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहें हैं जो निंदनीय है ।

आजकल अमर्यादित भाषा और अमर्यादित शब्द चयन को लेकर संसद भी कई बार कारवाई  हुई हैं । हाल ही में राहुल गांधी के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों का परिणाम उन्हें भोगना ही पड़ा । नेता और संत समाज के सर्वोच्च सत्ता में विराजमान होते है यदि वे ही अपने प्रवचनों में ईर्ष्या भाव की आग उगलेगें तो हम सामान्य इंसान से क्या उम्मीद रखेंगे ?

एक तरफ अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष का विरोध भी केवल तथाकथित शब्द के प्रयोग को लेकर ही हुआ था । तो फिर इन्हें किसने सर्वाधिकार दिया? ऐसे भाषणबाजी से केवल आपसी राजनीति और स्वार्थपरक भावना ही दिखायी देती है ।

संकल्प यात्रा और अध्यक्ष से प्रेरणा

श्री देवेंद्र जी एक ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े और अत्यधिक पढ़े-लिखे भी नहीं है । दूध की डेयरी चलाने से लेकर ट्रक चलाने के काम किया। और आज बहुत बड़े उद्यमी के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है और वर्तमान में अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा अध्यक्ष है । वे अपने भाषण में बार-बार कहते हैं कि जैसे मेरी किस्मत ने पलटी मारी वैसी शायद हर किसी की किस्मत नहीं चमक सकती इसलिए शिक्षा के प्रति अधिक ध्यान दें । वे अपने आप को सौभाग्यशाली मानते है कि उन्हें समाज के बड़े लोगों का आशीर्वाद सदैव मिला । आज अपने अध्यक्ष पद पर स्थापित होने का श्रेय सदैव चौ. बिश्नोई रतन कुलदीप जी को देते हैं । अर्थात् उनकी समाज के प्रति और जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाने में सहयोग किया उनके अहसान को कभी नहीं भूलें । यह उनकी विनम्रता और कर्त्तव्य निष्ठता तथा ईमानदारी ही संकल्प यात्रा की सफलता का कारण  बनी है। वे शिक्षा को लेकर और समाज के संस्कार को लेकर अधिक सजग है ।

हमारे अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष को समाज को पहली बार प्रत्येक युवा,बड़े-बुजुर्ग सम्मान भाव से देखते हैं । अध्यक्ष पद पर आने के पश्चात उन्होंने अनेक सराहनीय काम किए हैं जिनमें दुबई में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शिखर सम्मेलन की परिकल्पना शायद ही कोई अध्यक्ष कर पाया हो । हमारे समाज में युवा तो देश-विदेशों में काम-काज और रोजगार के लिए अवश्य ही गये है और जाएंगे भी । किंतु साढ़े-पाँच सौ लोगों को एक साथ दुबई में समाज को एकता के सूत्र में बांधकर सम्मेलन में आमंत्रित करने कोई साहस कर पाया होगा?  हमारे बिश्नोई समाज के बड़े-बुजुर्गों और महिलाओं को एक साथ विदेश यात्रा करवाने का सफल काम किया । और यह जानकर बड़ा गर्व होगा कि बिश्नोई समाज का ही नहीं बल्कि भारत की तरफ से पहला पर्यावरण शिखर सम्मेलन जिसमें किसान,संत-महात्मा, साहित्यकार, अभिनेता, शोधार्थी, प्रोफेसर,दुकानदार, व्यवसायी, उद्योगपति,व्यापारी,शिक्षक, पटवारी, राजनेता,आईपीएस. वकील, पुलिस यानि सभी को एकता के सूत्र में बाँधकर बिश्नोई समाज और भारत का प्रतिनिधित्व विश्वस्तर पर करने का सफल प्रयास हिम्मत और साहस केवल देवेंद्र बुड़िया अपने संरक्षक चौ. बिश्नोई रत्न श्री कुलदीप जी के साथ मिलकर पाएँ हैं । उन्होंने अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा, जाम्भाणी साहित्य अकादमी बीकानेर, गुरु जम्भेश्वर पर्यावरण शोधपीठ जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय को साथ लेकर चलने का काम किया है इसे समाज ने सराहनीय माना । स्पष्ट है ऐसा रणनीतिपूर्वक कार्यक्रम कभी भारत सरकार भी नहीं कर पायी किंतु प्रत्येक बिश्नोई से जुड़ने का प्रयास देवेंद्र जी ने लाइव आकर किया  तथा समाज को मानसिक रूप से तैयार किया इसलिए समाज स्वयं के खर्च से उनके साथ चलने को तैयार हो गई।

बिश्नोई समाज में अध्यक्ष तो कई बनें होगें किंतु आज तक ऐसा अकल्पनीय काम कोई नहीं कर पाया है । देवेंद्र जी से प्रेरणा युवावर्ग को लेने की आवश्यकता है । आज राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा तथा व्यवसाय के हर क्षेत्र में युवा अपनी अस्मिता प्राप्त कर चुके है किंतु उनकी तरह समाज को साथ लेकर एक-दूसरे के सहयोगी बनने और सार्वजनिक मंचों पर राजनेताओं तथा उग्योगपतियों से बिश्नोई युवा वर्ग के लिए नौकरी, व्यवसाय तथा रोजगार के लिए किसी आह्वान करना व निवेदन करने का काम बहुत कम लोग कर पाएँ है। वे जहाँ भी जाते है अपने माँ अमृता देवी और गुरु देव जम्भेश्वर की नियमावली सुनाकर सामने वालों को बिश्नोई समाज की परिभाषा देते हैं यह हमें उनसे सिखने की आवश्यकता है । उन्होंने अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के संरक्षक चौ. कुलदीप जी बिश्नोई के मार्गदर्शन में सराहनीय कार्य किया है इसलिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति उन्हें मान-सम्मान दे रहें है । जैसा कि हम सब जानते है गुरुदेव जम्भेश्वर भगवान ने बिश्नोई पंथ की स्थापना की है और उनकी शिक्षा का प्रचार-प्रसार और बिश्नोई समाज का मान-सम्मान स्वर्गीय चौ. भजनलाल जी बिश्नोई किया  । उनके लक्ष्य कदमों पर चलते हुए अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी ने मात्र कुछ महिनों में बिश्नोई समाज को आगे बढ़ाने के लिए अनेकानेक प्रयास किए जो सदैव स्मरणीय रहेंगे । आज भी वे बिश्नोई समाज को आरक्षण दिलाने के लिए प्रयासरत है । धर्मशालाओं का निर्माण, मंदिरों का सौन्दर्यकरण करवाना, सड़क निर्माण, गुरु जम्भेश्वर भगवान के नाम पर पशु चिकित्सा और युनिवर्सिटी के लिए सरकार से माँग पूरी करवाने का काम इन्होंने करवाया । मध्यप्रदेश में शहीद अमृतादेवी उद्यान बनाने की माँग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से करना इत्यादि ।

अतः निष्कर्ष में कहें तो उनकी धड़कन और सांसों  में बिश्नोई समाज और समाजोत्थान के अपार स्वप्न, उत्साह और उमंग है । उन्होंने तन-मन और धन से स्वयं को समाज में समर्पित किया है, इसमें कोई दोहराय नहीं है । उनमें कभी पद और पैसों का लालच भाव देखने को नहीं मिला । ऐसा अध्यक्ष समाज को आजादी के अमृतमहोत्सव बड़े नसीबों से मिला है ।

अखिल भारतीय बिश्नोई  महासभा के अध्यक्ष देवेंद्र जी बुड़िया के स्मरणीय कथन-

1.     समाज, भगवान और साधुओं से कोई बड़ा नहीं है उनके आगे जो झुकता है वही सदैव प्रोग्रेस करता है।

2.     लोकसभा में हमारी एक भी सीट नहीं है हमें संगठित होने की आवश्यकता है । अभी बिश्नोई समाज संगठित होकर चुनाव लड़ना होगा । तब हम राजनैतिक स्तर पर आगे बढ़ेगें और हमारा राष्ट्रीय नेता बना सकते हैं।

3.     जब तक नीति बनाने वाला हमारे समाज का नहीं होगा तब तक हम पीछे रहेंगे । संगठित होने की अति आवश्यकता है तुच्छ राजनीति में पड़कर समाज को तोड़ने का काम नहीं करना है । समाज में किसी से भूल होती है तो चार बड़े लोग सीधे जाकर समझाना चाहिए ना कि सोशल मीडिया पर फालतू की राजनीति करें ।

4.     मैं युवा पीढ़ी के लिए हूँ मेरे खून का एक-एक कतरा बिश्नोई समाज और युवाओं के लिए है ।

5.     मेरा तन-मन और धन बिश्नोई समाज के लिए है और इन्हें लगना चाहिए हमारा अध्यक्ष कुछ काम कर रहा है ।

6.     अब हम अच्छा काम करेगें और लड़ेगें नहीं और भिड़ेगें नहीं ।

7.     समाज में मैं किसी से लड़ने में विश्वास नहीं  रखता हूँ । मेरे लिए समाज और समाज की सेवा सर्वोपरि है ।

8.     मेरी संकल्प यात्रा में आए और मुझसे जुड़े उनकी जगह मेरे दिल में हैं । मैं ऐसा कभी काम नहीं करूँगा जिसके कारण वे मेरे दिल से बाहर निकले ।

9.     यह समाज मेरे लिए सर्वोपरि है । यह संकल्प यात्रा मेरे संकल्पों की है मेरे लिए संत सदैव आदरणीय रहे हैं । मैं उनके लिए कभी निम्नस्तर के शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता और न ही करूँगा । इसलिए ईश्वर की शक्ति के वरदान से मैं एक -दम दौड़ते-दौड़ते इतनी पैदल यात्रा संपन्न कर पाया हूँ । मेरे साथ यूथ और समाज है उनके साथ मैं सदैव रहूँगा ।

10. मुझ जैसे देवलो को गुड़ा बिश्नोई का देवेंद्र बिश्नोई जिससे अध्यक्ष बनने का सौभाग्य मिला । जिसे समाज, संत और साधुजनों का आशीर्वाद से अपार प्रेम मिला मैं बहुत गुड महसूस करता हूँ । और उन विरोधियों का आभार है जिन्होंने मुझे यह संकल्प यात्रा तय करवाने का सौभाग्य दिया ।

11. समाज के आगे झूक जाऊँगा लेकिन समाज में गद्दारी को होने नहीं दूँगा ।

12. समाज के लिए सदैव संकल्पबद्ध हूँ । 

 लेखिका- डॉ. मिलन बिश्नोई (सहायक आचार्य) 

मोबाइल नंबर- 6380568643







मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

समय और थोड़ा अर्थतंत्र मजबूत हो तो यात्राएं कर लेनी चाहिए - डॉ मिलन बिश्नोई

 भारत में सीनियर सिटीजन के पास यदि समय और थोड़ा बहुत अर्थतंत्र मजबूत है तो उन्हें यात्राएं जरूर करनी चाहिए। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि युवाओं को यात्रा नहीं करनी...

 किंतु भारत के अधिकांश मध्यमवर्गीय वरिष्ठ धन जोड़ने और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए सातों जनम की सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराने में इतना व्यस्त हो गए थे... उन्होंने कभी स्वयं की इच्छाओं, ख्वाहिशों, सपनों और मनोरंजन के बारे में सोचा ही नहीं।

आज उन्होंने धन तो बेशक इकट्ठा कर लिया किंतु उनके पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे अपना स्वतंत्र जीवनयापन करें और अपनी संतान या संगी-साथियों को स्वतंत्र जीवनयापन करने दें। 

मुझे लगता है यात्राएं करने इंसान अलग-अलग संस्कृतियों में भी ढलना सीखता है वरना वह ले-देकर अपनी जाति,अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने धर्म वाले को ही ढूंढते है।

देखने में यह भी आता है कि अधिकांश शिक्षण संस्थानों और व्यवसायिक क्षेत्रों में भी सीनियर सहकर्मी कहीं न कहीं अपने साथियों का जाने-अनजाने में मानसिक शोषण करते हैं।

जब उनके साथ भिन्न संस्कृति का सहकर्मी आता है तो सबसे पहले उसके खान-पान के बारे में पूछा जाता है, फिर सरनेम, फिर धर्म रीति-रिवाज... ऐसे करते करते यदि उनके विचार उनसे भिन्न मिलते हैं तो कई प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं...कई बार उनके बारे में भला-बुरा कहा जाता है। क्योंकि जो लोग अपना शहर छोड़कर भी कभी बाहर गए नहीं तो वे अपने जैसे विचारों की ही अपेक्षा रखेंगे। उन्हें लगता सामने वाला भी हमारे जैसे क्यों नहीं है। उन्हें धीरे-धीरे लगता है कि यंगस्टर्स हमारी इज्जत नहीं करते... हमारे विचारों से सहमत नहीं हैं किंतु विचारों में मतभेद हो सकता है। लेकिन इज्ज़त और मान-सम्मान तो एक-दूसरे के व्यवहार पर निर्भर करता है। 

किंतु आज के युवा धन जोड़ने से अधिक वे अनेकानेक रास्तों, पगडंडियों, पहाड़ों, झरनों, नदी-नालों से लेकर समुद्र की गहराई और आसमान की ऊंचाई तक नापना पसंद करता है। 

आज की युवा पीढ़ी और वरिष्ठ पीढ़ी के सोच-विचार में बहुत अधिक भिन्नता दिखाई देती है। किंतु मैं फिर से कहूंगी कि बुढ़ापे में ही सही उन्हें आस-पास कई यात्राएं कर लेनी चाहिए।

रविवार, 2 अप्रैल 2023

मध्यकाल के प्रति विचार

 आज के प्रोफेसरों और शोधार्थियों को ठीक ढंग से मध्यकाल को पढ़ना और पढ़ाना नहीं आता है इसलिए कई बार सूर, तुलसी, रैदास, घनानंद,मीरा को पाठ्यक्रम से हटाने की बात करते हैं...यदि सही मायने में देखा जाए तो राष्ट्रीय एकता की दृष्टिकोण से जातिवाद/धर्मवाद का विरोध मध्यकाल में सबसे अधिक हुआ है। मध्यकाल के साहित्य में  सामाजिक सुधार, राजनैतिक सुधार, धार्मिक सुधार, पर्यावरण के प्रति चेतना और स्वस्थ प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई। वहीं वर्तमान साहित्य में अशोभनीय राजनीति और भौतिकवाद का पलड़ा भारी दिखाई देता है। - डॉ मिलन बिश्नोई 

बुधवार, 15 मार्च 2023

नाचो-नाचो : हाथी की सरगोशियाँ-आचार्य ऋषभदेव शर्मा

 


#डेलीहिंदीमिलाप

जी, हाँ! नाचना तो बनता है। आखिर भारतीय फिल्म 'आरआरआर' के गाने ‘नाटू नाटू’ ने और शॉर्ट फिल्म 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' ने ऑस्कर अवॉर्ड जीत कर भारतीय सिनेमा को ऐतिहासिक और गर्व का अवसर प्रदान किया है न!  कोई इसमें भारत का जलवा देख रहा हैं, तो किसी को दुनिया भर में भारतीयता का डंका बजता सुनाई पड़ रहा है। यह भारत की मौलिकता और आत्मीयता की वैश्विक स्वीकृति का जीता जागता प्रमाण है। इसलिए अगर सब तरफ उत्सव जैसी उमंग है, तो उचित ही है। 

असल में, अमेरिका के लॉस एंजलिस स्थित डोलबी थियेटर में संपन्न 95वें ऑस्कर अवॉर्ड  के ऐतिहासिक समारोह ने भारतीय सिने प्रेमियों को खुशी का दोहरा अवसर दिया है।  मूल रूप से तेलुगु में बनी फिल्म 'आरआरआर' के गाने ‘नाटू नाटू’ ने ‘ओरिजनल सॉन्ग’ कैटेगरी में आस्कर अवॉर्ड जीता है। सच कहा जाए तो  ऑस्कर अवॉर्ड के इस 95वें संस्करण में ‘नाटू नाटू’ के रूप में भारत ने दूसरा ऑस्कर जीता। इससे पहले भारत ने इतिहास रचते हुए 'भारतीय प्रोडक्शन' के लिए पहला ऑस्कर अवॉर्ड जीता। भारतीय फिल्म 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' ने 'शॉर्ट फिल्म डॉक्यूमेंट्री' कैटेगरी में ऑस्कर अवॉर्ड हासिल किया। कहना न होगा कि इन दोनों फिल्मों ने पूरे विश्व में देश का गौरव बढ़ाया है। इस खुशखबरी से  भारत और दुनिया भर में फैले भारतीय सिने प्रेमियों को तो गर्व का अवसर मिला ही है, अवॉर्ड जीतने के बाद फिल्म निर्माताओं की भी खुशी का ठिकाना नहीं है। खुशी का ठिकाना ऐसे भी बहुत से लोगों का भी नहीं है, जो सिनेमा के प्रति भले ही उदासीन रहते हों लेकिन देश को गौरव दिलाने वाली हर चीज़ उन्हें रोमांचित करती है।

ऑस्कर तो पहले भी भारतीयों को मिला है, लेकिन इस बार का ऑस्कर इसलिए विशेष और ऐतिहासिक है कि यह किसी 'भारतीय प्रोडक्शन' के लिए अब तक का पहला ऑस्कर है! जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई देते हुए कहा है, ‘नाटू नाटू’ की लोकप्रियता वैश्विक है। यही बात ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ के लिए भी सच है। इस प्रतिष्ठित सम्मान से समूचा भारत प्रफुल्लित और गौरवान्वित है। 

ये फिल्में भले ही तेलुगु और तमिल भाषा में बनी हों, लेकिन इनकी वैश्विक प्रतिष्ठा ने यह साबित कर दिया है कि कला के आवेग के सामने  भाषा, देश और काल की हदबंदियाँ ढह जाती हैं। सही कहा जा रहा है कि ‘नाटू नाटू’ एक वैश्विक घटना बन गया है और यह सबूत है कि एक अच्छी कहानी, साथ ही एक बेहतरीन गीत भाषा और सीमाओं को पार कर सकता है।

 अब ये कलाकृतियाँ समूची  मनुष्यता के  आनंद का हेतु हैं। लेकिन यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि भारत की इन सिने कलाकृतियों को सम्मानित करके ऑस्कर देने वाली अकादमी ने भी अपनी हदबंदियों को ढहाया है। इससे उसकी अपनी विश्वसनीयता बढ़ी है, जो पिछले कुछ वर्षों में सवालों और विवादों के घेरे में आ गई थी। अकादमी ने भारतीय और एशियाई लोगों के नामांकन बढ़ाकर एक बड़े दर्शक समूह को ऑस्कर से जोड़ने की कोशिश की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वर्षों में इसके और भी सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे तथा भारतीय सिने उद्योग की प्रतिष्ठा और बढ़ेगी।

अंततः एक बात और। सैन्य शक्तियों से दुनिया भर को हलकान करने की वैश्विक महाशक्तियों की गलाकाट स्पर्धा के इस युग में भारत अपने विश्वगुरुत्व की स्थापना जिस 'सौम्य शक्ति' (सॉफ्ट पॉवर) के बल पर कर सकता है, भारतीय सिनेमा की मौलिकता की यह पहचान उसका भी एक नमूना है। अहिंसा और योग ही नहीं, हमारी कलाएँ और फिल्में भी हमारी वह सॉफ्ट पॉवर है, जो कूटनीतियों के तुमुल कोलाहल कलह में विश्व-मानव के हृदय से हृदय की बात कर सकती है! 000

Definition of love


 यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसके लिए स्वस्थ आहार बनाएं और उसके साथ स्वस्थ समय व्यतीत करें। उनके जीवन के हर सुख-दुःख में मानसिक रूप से साथ जुड़े रहें ताकि प्रेम अधिक गहरा, प्रगाढ़ और रोमांचक बना रहे।- डॉ मिलन बिश्नोई 

If you love someone, make healthy diet for him and spend healthy time with him. Connect mentally with all the joys and sorrows of their life so that the love remains more intense and exciting. DrMilan Bishnoi 



सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

न लव न प्रीत : हिंसा का गीत-ऋषभदेव शर्मा


#डेलीहिंदीमिलाप

आखिर पंजाब के अजनाला की एक अदालत ने  अपहरण के मामले में खालिस्तान समर्थक कट्टरपंथी उपदेशक अमृतपाल सिंह के सहयोगी लवप्रीत सिंह उर्फ तूफान  को रिहा करने का आदेश सुना ही दिया!  इससे यह लगना स्वाभाविक है कि या तो मामले में सचमुच दम नहीं था, या पुलिस और सरकारी पक्ष ने ठीक से पैरवी नहीं की। याद रहे कि यह वही लवप्रीत सिंह है जिसे रिहा कराने के लिए इससे एक दिन पहले ही अमृतपाल सिंह  के हज़ारों समर्थकों ने  पुलिस थाने में हंगामा किया था और  बैरिकेड तोड़ डाले थे। उनके हाथों में तलवारें और बंदूकें थीं। उनके साथ संघर्ष के दौरान 6 पुलिसकर्मी घायल हो गये थे। इसके अलावा ‘वारिस पंजाब दे’ नामक संगठन के अध्यक्ष अमृतपाल सिंह ने अपने समर्थक लवप्रीत सिंह की रिहाई को लेकर  एक ‘चेतावनी’ भी जारी की थी। यानी यह हंगामा हंगामा नहीं,  बल्कि पूर्व निर्धारित हमला था! 

वैसे पंजाब के पुलिस महानिदेशक ने अजनाला में हुई इस हिंसक घटना को लेकर  यह भी कहा बताते हैं कि अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने 'पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब' को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया था और पुलिसकर्मियों पर कायरतापूर्ण तरीके से हमला किया था। दरअसल थाने में घुसने की कोशिश करने वाले अमृतपाल सिंह के आगे-आगे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पावन स्वरूप भी चल रहा था। इसे देख कर पुलिस वाले ठिठक गए, वरना उनकी पूरी तैयारी थी। उन्होंने भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन श्रीगुरु ग्रंथ साहिब की 'बेअदबी' न हो जाए, इसलिए पुलिस वाले रास्ते से किनारे होते गए। अमृतपाल ने थाने में ही लंगर शुरू करवाने की भी धमकी दी थी। अगर पुलिस के निष्क्रिय बने रहने की वजह यह धार्मिक ढाल थी, तो यह भी बेहद चिंतनीय है। क्या पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब को इस तरह ढाल बनाने को निंदनीय कृत्य नहीं कहा जाना चाहिए? धर्म के सहारे प्रशासन को पंगु बनाने का ऐसा दूसरा उदाहरण शायद ही मिले!

इसे सरकार का हिंसा और आतंक के आगे झुकना ही कहा जाएगा न कि इस हिंसक हमले के बाद दबाव में आई पंजाब पुलिस ने आरोपी को रिहा करने का ऐलान कर दिया और कोर्ट में लवप्रीत सिंह तूफान को केस से डिस्चार्ज करने की एप्लीकेशन दायर की, जिसके बाद कोर्ट से उसकी रिहाई के आदेश जारी हो गए! जिस तरह यह सब हुआ उससे यह अंदेशा होना भी सहज है कि कानून और व्यवस्था को कहीं हिंसा और आतंक ने बंधक तो नहीं बना लिया है! लेकिन सरकार ऐसा मानती नहीं दिखती। अचरज नहीं कि इस हिंसक घटना के बारे में मुंबई में एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा कि - 'आप लोगों के पास यहाँ गलत जानकारी है। पंजाब में कानून-व्यवस्था नियंत्रण में है। पंजाब पुलिस सक्षम है!' यहाँ यह सवाल स्वाभाविक है कि,  इस 'सक्षम' पुलिस और सरकार के मौन साक्षी भाव से कट्टरवादी अमृतपाल सिंह और उसके समर्थकों के हौसले नहीं बढ़ेंगे क्या? और कि, कहीं यह घटना पंजाब में एक और भिंडरावाले के उदय का संकेत तो नहीं है? 

कहना न होगा कि इस घटना से पंजाब में खालिस्तान समर्थक समूहों की बढ़ती ताकत का पता चलता है। पंजाब सरकार से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह इसे हल्के में नहीं लेगी और गंभीरता से इस कट्टरवादी उभार का समाधान खोजेगी। अन्यथा ये तत्व आने वाले समय में केवल पंजाब ही नहीं, बल्कि पूरे देश की शांति, सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा साबित हो सकते हैं। 000

मां को पत्र

 घर छोड़ने से पहले लिखा हुआ खत 


ए अम्मा! साँझ को टिरेन पकड़नी है! इस्टेसन दूर है, तो अभई निकल रहे हैं! बलउ के टेक्टर से चले जाएंगे! थोड़ी पहले निकल रहे हैं, जानते हैं न, की जब हम झोला टांगते है तुम्हरे सामने तो लगती हो रोने, फिर टिरेन में यात्रा और मुश्किल लगने लगती है। आलू की सब्ज़ी और 7 रोटी बना के बाँध लिए हैं, थोड़ा चना और गुड भी रखे हैं! बाहर नलके से पानी भर लेंगे! दवाई ला दिए हैं, रसोई वाले ताखा पर है, उठा लेना नहीं तो सिता जायेगी! और समय समय से खाना भी है! गोली सफ़ेद वाली, खाली पेट सुबह! बाकी की संतरी रंग और चौकोर वाली सुभे साम। तुम्हारा कपड़ा धो के पसार दिए हैं! शाम को जागना तो उठा लेना! बाबूजी सुबह किराया भाड़ा दे दिए थे, तो उसका टेंसन न लेना! उनको कह दिए थे की निकल जाएंगे दुपहर में! बाकी खाता में पइसा पड़ा है, काम चल जाएगा इस महीने। मोटकी रजाई घाम दिखा के बड़के बक्सा में, और तुम्हारे सारे सुइटर बाबूजी के सुइटर भी उसमें ही रखे हैं! शाल दुशाला सब साफ़ है! निकाल के ओढ़ पहिन लेना! तुम्हारी जूती मोची से सिलवाय लाये थे! वहीँ आँगन में पन्नी में लपेट के रखे हैं! खाना बनाना हो तभी उतारना! नहीं तो पहनी रखना। 10 किलो कोयला, 10 किलो शीशम की लकड़ी चीर ऊपर कमरे में रख दिए हैं! भगेलू को 5 10 रूपया दे के उतरवा लेना! तुम्हारे फोन में 200 रुपया का रिचार्ज करवा दिए हैं, जब मन करे फोन घुमा लेना! और रोना मत, खाना पीना समय से खाना! जल्दी नौकरी लेकर लौटेंगे। तुम्हारे जागने तक हम टिरेन में बइठ गए रहेंगे! तो ख़त पढ़ के एक आँसू मत रोना! पैर छुए हैं, आसिरबाद भेज देना! 


~ तुम्हारे बेटे/राजकुमार/लल्ला/करेजा का टुकड़ा!


लेखक -अक्षत आदित्य

रविवार, 26 फ़रवरी 2023

5 year Completed journey in Bangalore#ArvindVishnoi

 



What an incredible ride it has been. I relocated to Bangalore leaving behind Hyderabad, the only city where I spent more than 5 years. The city where I spent my teenage years, which transformed me from a carefree child to a responsible adult, the city where I understood and experienced the meaning of life, struggle, happiness, friendship, hard work, failure & success and the place where I eventually wanted to settle down in the long term.

Although, since my father served in Army, I have had experience of relocating after every few years leaving behind everything we build. However, this time it was different as I’ve entered into those impressionable years when you get emotionally attached to the place, relationships, home and much more. And leaving all these behind was unimaginable.

Therefore, I convinced myself that stay in Bangalore is temporary and I’ll return to Hyderabad at the earliest possible. With this thought in mind and with a heavy heart, here I was in a new city trying to make a temporary place for myself. Fast forward to today and I’m deeply in love with this place, people, cosmopolitan culture.

During initial days, my mind always used to wander off from the job I was doing. I wanted to explore other career opportunities; however I didn’t have the discipline and risk capability to change the industry and re-start from the scratch in other field. Moreover, over a period of time I started loving sales and account management roles, and thus continued in the same field.

When I finally settled my accommodation and career interest, I started getting a nagging feeling that I was missing something in my life. One day I just woke up early in the morning and ran from Domlur (my house) to Cubbon park, a distance of around 6K. That was the best feeling I had after a long time and there was no looking back since then.

After a month of practice, I registered for my first hill run half marathon in the outskirts of Bangalore where I secured 2nd place. Then came my first major challenging hill trail run in Coorg where I secured 4th place in 30K with ~2000 M elevation. It was this run which paved my entry into the mountain trail ultra running community. I met many professional and seasoned runners from all over India and other countries. Listening to their ultra run experiences and stories of grit, determination and passion gave goose bumps. This further fueled my passion to pursue ultra trail running. In last 4 years, I’ve successfully completed 10 professional mountain/ hill trail run’s across the country with distance ranging from 50K to 100K with elevation of 2000 to 4000 meters. In between, I also got the opportunity to travel to Hyderabad to successfully complete my 1st half-triathlon (1.8K Swim, 90K Cycle and 21K Run in 7:20 Hrs).

Bangalore is strategically located from where we can explore the entire south India. This gave me the opportunity to explore and experience places using different modes of transport – train, bus, drive especially bike rides. I travelled to beautiful hill stations such as Ooty, Coorg, Wayanad, Chickmangaluru, Munnar, Yercaud; amazing beaches in Kanyakumari, Pondicherry, Karaikal, Goa; Historical places with famous temples having intricate architecture located in Madurai, Thanjavur, Kumbakonam, Thiruvarur, and Hampi. The thrill of exploring new places especially hill stations on the bike ride trips, trekking have been my most memorable moments so far.

I feel gratitude to all the people, friends, family and colleague who have helped and supported me in this journey. With so many things from my bucket list yet to be ticked, I’m looking ahead for the exciting times.    

Thanks you!

Arvind Vishnoi

arvindkumarvishnoi@gmail.com

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

राजस्थान की बेटी डॉ. मिलन बिश्नोई ने 12 वें विश्व हिंदी सम्मेलन फ़िजी में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा की धरोहर:गुरु जांभोजी की सबदवाणी में पर्यावरण-चिंतन’ विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया

 डॉ. मिलन बिश्नोई को अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा, राजस्थान ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर 12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन,फ़िजी में भेजा गया । माननीय देवेन्द्र जी बुड़िया साहब ने प्रधान का कार्यकाल संभालने के पश्चात शिक्षा, समाज और संस्कृति तीनों को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने के लिए नित-नये प्रयास किए है । उन्होंने दुबई में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन करने के पश्चात भारत की प्रथम बिश्नोई बेटी डॉ. मिलन बिश्नोई को जांभाणी साहित्यिक प्रचार हेतु 12 वें विश्व हिंदी सम्मेलन महासभा की ओर से भेजा गया । बिश्नोई नारी शक्ति को विश्वस्तर पर पहुँचाने के लिए यह महासभा की ओर से सबसे बड़ा पहला कदम उठाया गया है । जो 21 वीं सदी में अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा अपने समाज की बेटियों के लिए सराहनीय योगदान दे रही हैं ।

12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन विदेश मंत्रालय भारत सरकार और फ़िजी सरकार के द्वारा प्रशान्त महासागर के फ़िजी के नांदी में14 से 17 फरवरी 2023 में आयोजित किया गया ।कार्यक्रम का शुभारंभ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, फिज़ी के राष्ट्रपति रातू विल्यम मैवलीली काटोनिवेरे ने किया ।  इसके गृहराज्य मंत्री श्री अजय कुमार मिश्र, राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन तथा फ़िजी के राष्ट्रपति, उपप्रधानमंत्री सहित लगभग तीस देशों के प्रतिनिधि मौजूद तथा  1000 हजार से अधिक प्रतिभागी उपस्थित रहे ।

इस सम्मेलन का मुख्य विषय- पारम्परिक ज्ञान से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस थी । इस थीम के अनुरूप डॉ. बिश्नोई ने भारतीय ज्ञान परम्परा की धरोहर : गुरु जांभोजी की सबदवाणी में पर्यावरण –चिंतन विषय पर शोध पेपर प्रस्तुत किया । इन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान परम्परा वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ सर्वेभवन्तु सुखीन् की बात करती है और इन पंक्तियों का चरितार्थ करने के लिए हमें मन और मस्तिष्क की आंतरिक यात्रा करने की आवश्यकता है । भारतीय संत परम्परा को यदि देखा जाए तो उन्होंने समूचे विश्व में मानवकल्याण को ध्यान में रखते हुए आंतरिक तत्व-चिंतन पर विशेष जोर दिया है । यदि उत्तर भारत की संत परम्परा में गुरु जांभोजी की सबदवाणी को पढ़ा समझा जाए ज्ञान परम्परा को उजागर करने वाला सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ग्रंथ है। क्योंकि जांभोजी की सबदवाणी केवल उपदेशात्मक नहीं है बल्कि समाज को मानव कल्याण, पर्यावरण संरक्षण तथा वन्यजीवों का संरक्षण और भाषा व संस्कृति संरक्षण करने का काम करती है । यदि आधुनिक संदर्भ में कृत्रिम मेधा के साथ तारतम्यता स्थापित करके देखा जाए तो गुरुदेव जांभोजी ने 550 साल पहले पर्यावरण की चिंता करते हुए 29 नियमों की स्थापना की थी । अर्थात् भारतीय परम्परा बड़ी सुंदर और सुलझी हुई तथा प्रगाढ़ है इसे संपूर्ण विश्व जानता है। हमारे यहां पेड़ों के लिए मां अमृतादेवी के दो बेटियों सहित  363 बिश्नोईयों ने बलिदान दिया गया है ।आज भी बिश्नोई समाज पर्यावरण के प्रति अत्यंत सजग है और आवश्यकता पड़ने पर अपना बलिदान करने से पीछे नहीं हटता । अंत में बिश्नोई ने यह भी कहा कि ज्ञान परम्परा के माध्यम से यदि आगे बढ़ने का प्रयास करें तो भाषा और संस्कृति का अस्तित्व बनाएं रखना अत्यंत आवश्यक है। भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम  न समझे क्योंकि भाषा राष्ट्र और संस्कृति का भी मार्ग प्रशस्त करती हैं । तो विश्व हिंदी सम्मेलनों में पहली बार ऐसा हुआ कि जिसमें ज्ञान-परम्परा के माध्यम से आधुनिकता की ओर बढ़ने सुअवसर दिया गया ।

इस 12 वें विश्व हिंदी सम्मेलन में डॉ. बिश्नोई के साथ उनके जीवसाथी श्री अरविंद कुमार विश्नोई ने जांभाणी साहित्य अकादमी ओर से फ़िजी की हिंदी बोर्ड की अध्यक्षा रोहिनी कुमार को साहित्य भेंट करके वहाँ के पाठ्यक्रम में भारतीय माँ अमृतादेवी की बलिदान गाथा को जोड़ने की इच्छा जाहिर की तब रोहिनी ने इसे लागू करने का भरोसा दिलाया । तथा भारत सरकार के गृहराज्य मंत्री श्री अजयकुमार मिश्र को भी जांभाणी साहित्य भेंट किया गया।

डॉ. मिलन बिश्नोई वर्तमान में कर्नाटक के खाजा बंदानवाज विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य के पद पर कार्यरत हैं ।  वे इससे पहले 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन,मॉरिशस में भी अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर चुकी थी । तो लगातार दूसरी बार विश्व हिंदी सम्मेलनों में भाग लेने वाली प्रथम बिश्नोई समाज की बेटी है । पारिवारिक दृष्टिकोण से अध्यापक की बेटी की शिक्षा प्रारम्भिक शिक्षा सरकारी स्कूल और स्नात्तक की शिक्षा दुरस्थ शिक्षा के माध्यम से हुई । शादी के पश्चात  मिलन बिश्नोई को देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला । आज मिलन बिश्नोई समाज की बेटी दक्षिण भारत के सुदूर प्रांत तमिलनाडु,तेलगांना व कर्नाटक में एक जानी-मानी साहित्कार व शोधार्थी और अध्येता के रूप में जानी जाती है । मिलन बिश्नोई ने विश्वस्तर पहुंचने का श्रेय उनके पिता श्री जगराम बिश्नोई, जीवनसाथी श्री अरविंद कुमार विश्नोई,ससुर लादूरामजी बिश्नोई और अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के प्रधान देवेन्द्र जी बुड़िया साहब को दिया हैं । उन्होंने बताया कि मुझ जैसी ग्रामीण प्रांत और जालोर की सबसे कम साक्षरता दर वाली बेटी यदि विश्वस्तर पर गुरुदेव जंभेश्वर व बिश्नोई संस्कृति का प्रचार करने जा सकती है तो मैं मानती हूँ कि आने वाले समय हमारी बहने बहुत आगे जाएगी ।

 

 

 

सोमवार, 30 जनवरी 2023

हिंदी उपन्यासों में किन्नरों की पारिवारिक उपेक्षा व रिश्तों की तड़प

                            



यह सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति में परिवार और रिश्तों का आपसी संबध अन्योन्याश्रित हैं । सनातन संस्कृति में पारिवारिक संस्कार इतने सदृढ़ और सहिष्णुत्ववादी है कि सुख-दुःख में परिवार के लोग ही एक-दूसरे के सहारा बनते हैं । इसके लिए देश और समाज को सदैव गौरवान्वित महसूस करवाया गया । भारतीय सांस्कृतिक  की विविधता में एकता से कौन अपरिचित है! भारतीय संस्कृति में अलग-अलग रीति-रिवाज और रिश्तों के परिवेश में शिक्षा तथा संस्कार को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों की पहचान का पाठ सातों पीढ़ियों तक पढ़ाया जाता है । यहाँ का परिवार एक विशाल वटवृक्ष की भाँति माना गया, जो परिवार के मुखिया तथा छोटे-बड़े सदस्यों से मिल-जुलकर बना होता है, जिसमें गुरु- शिष्य, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन, माता-पिता, पति-पत्नी, बहू-बेटा, पुत्र-पुत्री, पोता-पोती, बुआ-भतीज इत्यादि सम्मानीय रिश्ते हैं । यह रिश्ते अतिसंवेदनशील और एक-दूसरों के प्रति भावनात्मक गहरायों से बंधे हुए है , सुख-दुःख में एक दूसरे के लिए प्राण न्यौछावर कर देने वाले अनेक उदाहरण मिलते हैं । परिवार का कर्ता-धर्ता हमेशा मुख्य सदस्य होता है, इसलिए घर-परिवार और संतान के लालन-पालन, शादी, शिक्षा, विवाह जैसे निर्णय अक्सर लेने की जिम्मेदारी पिता ही लेते हैं ।

     वैसे शास्त्र और पौराणिक कथाओं और कहानियों में घर की लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती के रूप नारी को माना गया है । लेकिन वास्तविकता यह भी है कि 21 वीं सदी में बलात्कार, भ्रूण हत्याएँ, दहेज प्रताड़ना, पारिवारिक क्लेश में बहू को केरोसिन डालकर जलाने जैसी घरेलू हिंसा की घटनाओं से मुंह मोड़ भी नहीं सकते । उत्तर भारत के कुछ राज्यों में बहू बनाकर हर कोई ले आना चाहते हैं, लेकिन अपने घर में बेटी पैदा करके विदाई करने का सपना शायद ही कोई परिवार देख रहा होगा?  राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में भ्रूण हत्याएं अत्यधिक हो रही है, तथा वर्तमान समय में भी जोड़े निर्धारित करने का निर्णय खांप पंचायत ही तय करती है । बेटों के इंतजार में पांच-पांच बेटियां पैदा करने के पीछे का कारण पुत्र मोह ही है । भले ही दक्षिण भारत में दो बेटियों के जन्म के पश्चात परिवार नियोजन का रास्ता अपना लेते हैं, लेकिन दहेज प्रथा का प्रचलन उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में अधिक है । यहाँ बेटियों के पैदा होते ही पिता बेटी को दहेज देने के लिए हर समय सम्पत्ति जोड़ने में रहता हैं । सुशिक्षित करके उसे आत्मनिर्भर बनाने के बावजूद भी ससुराल पक्ष को मुँह माँगी रकम देनी पड़ती है। इसलिए भारतवर्ष में पितृसत्तात्मक सत्ता का दबदबा आज भी उतना ही शक्तिशाली है, केवल उसके कुछ मायनों में बदलाव अवश्य आया होगा । आज भी कई गरीब परिवारों की बेटियों की खरीददारी की जाती है, हजारों महिलाओं को घर में जलाया जाता है, शिक्षित महिलाओं को नौकरी छुड़वाकर भी घर में बिठाया जाता है । उनके आत्मसम्मान, इच्छाओं और आंकाक्षाओं को कभी किसी ने जानने की कोशिश नहीं की है । आधुनिकता के दौर में शिक्षा, संस्कृति और समाज में अवश्य ही बदलाव देखने को मिलते हैं । लेकिन इस बात को भी नकार नहीं सकते है कि किसी भी प्रांत में महिला की कोख, देह और उसकी आमदनी पर पुरुष हक जताए बिना उसे स्वीकर कर रहा हो ? भारत में पिता की सम्पति पर सौ प्रतिशत हक बेटों का ही रहता है, संविधान में भले ही बेटे-बेटियों को समान अधिकार की वरियता दी गई है, परंतु वास्तविकता यह है कि पिता के देहान्त के पश्चात चौथे-पांचवे दिन में परिजन उनकी बेटियों को अपने भाईयों के नाम सम्पति कर देने की सलाह देते हैं । खैर महिलाओं की कोई अपनी सम्पति होती ही कहाँ है? क्योंकि उन्हें जन्मजात पराया धन समझकर परायेपन का अहसास करवा दिया जाता है । महिलाएँ भी अपने आप को उसी ढ़ाँचे में धकेल देती है, वह स्वयं को इस अनुरूप में नहीं देखती तो आर्थिक और मानसिक रूप से सुदृढ़  अवश्य होती । वह अपनी देह, कोख को किसी की सम्पति नहीं बनने देती तो शायद अपनी संतान और अपने अधिकार का महत्त्व समझते हुए आगे बढ़ती । महिलाओं को जीविकोपार्जन के लिए पिता, पति, पुत्र के अधीन रहना पड़ता है । यह भी सत्य है कि एक महिला ही महिला को अधिकार दिलाने के पक्षधर नहीं है । जब पिता अपनी बेटी की परवरिश पर विशेष ध्यान देने लगे तब भी माँ अपने बेटे के लिए सोचेगी । जब बात शिक्षा और खर्च की आए तो माँ बेटी को सरकारी स्कूल तथा कला के क्षेत्र में भेजने के लिए सोचेगी और बेटे को विज्ञान तथा तकनीकि क्षेत्र में शिक्षा दिलाने का प्रयास करेगी । ससुराल में बहू को सास हमेशा दबाकर रखना चाहेगी, क्योंकि उसे अपने जमाने में खान-पान-रहन-सहन में स्वतंत्रता नहीं मिली तो वह बहू के ऊपर भी वैसी ही नियमावली थोंपने का प्रयास करेगी ।

वर्तमान समाज में सक्षम और आत्मनिर्भर माताएं अपने अलैंगिक संतान को स्वीकार कर रही हैं । वहीं गृहस्थ और अशिक्षित माताओं के पास अलैंगिक संतान को अपनाने का माध्यम नहीं है, वरना तृतीयलिंगी बच्चे अपनी माँ की ममता का आंचल छोड़कर सुदूर गंदी बस्तियों में अपना डेरा लगाएं रहने वाले गुरुओं के साथ जाने के लिए क्यों मजबूर होते? वे देह व्यापार की ओर कभी नहीं बढ़ते, अपनी स्कूल की शिक्षा व घर छोड़कर ऐसे ही नहीं भागते । यजमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किन्नर सस्ते वाला मेकअप करके, मुंह पर उस्तरा घिसकर,बिन बुलाये अनजान घर का मेहमान  बनना नहीं चाहते हैं ।

      अलैंगिक बच्चों को माता-पिता का दर्द देर-सबेर समझ आ ही जाता है । वे जानते है कि परिवार तथा रिश्तों की श्रृंखला में सामाजिक दृष्टिकोण से उनका कोई महत्त्व नहीं है । उपन्यास साहित्य में अधिकांश पात्रों को मजबूरी में अपना परिवार छोड़कर जीवनभर समाज के कटाक्ष भरे व्यंग्य, मानसिक पीड़ा, आर्थिक कष्ट और शोषण का शिकार होना ही किन्नरों की नीति बन गई है । परिवार में उनका रहना किसी के लिए मायने नहीं रखता है । अपनी संतान की अलैंगिकता सर्वप्रथम पिता के पुरुषत्व को ठेस पहुंचाती है । अधिकतर किन्नर पात्रों को घर में सबसे पहले पिता के द्वारा प्रताड़ित किया जाता है । लैंगिक विकृति वाली संतान के प्रति दादी का बड़ा क्रुर व्यवहार देखने को मिलता है, वह अपनी बहू को प्रसव के दौरान बच्चे के मौत की कहानी बनाकर माँ की कोख से बच्चे को अलग करके अपने पुत्र के साथ मिलकर किन्नरों के हाथ अपने पोते-पोती को सौंपने का काम करती है । कुछ परिवार में अगर पिता उसे स्वीकार भी कर ले तो वे उसकी परवरिश बेटे की तरह करना चाहते हैं । इस तरह की मानसिकता के पीछे दो कारण उभरकर आए हैं - एक तो पिता को भी पितृसत्तात्मक परिवेश मिला, दूसरा कारण यह है कि यदि समाज में किन्नर बच्चे की लैंगिकता को बेटी के रूप स्वीकार किया जाए तो शादी-ब्याह करवाना तथा  उसकी शारीरिक संरचना को छुपाना ना मुमकिन है ।

       यमदीप उपन्यास की पात्र नाज के पिता पद से मेजर है, माता-पिता बेटी की लैंगिकता को लेकर चिंतित भी है, किंतु माता-पिता ने नंदरानी पर कभी हाथ नहीं उठाया और न ही उसे घर से तिरस्कृत किया । वहीं मेजर साहब के बेटे यानि नंदरानी का भाई उसके साथ हमेशा बुरा बर्ताव करता रहा । कई बार कह चुका था कि इस हिजड़ा की वजह से घर में किसी की शादी नहीं होगी । अंत में नंदरानी घर छोड़कर महताब गुरु के आश्रम में आ जाती है । और कभी-कभी माँ-पापा से फोन पर चोरी छुपे बात कर लेती है । एक-दो बार पापा- मम्मी मिलने भी आए थे, लेकिन मेजर साहब अपनी नंदरानी को घर ले जाने की पहल नहीं कर पाए । वे अपने बेटे और समाज से भयभीत अवश्य थे, वे बस्ती में महताब गुरु से निवेदन करते हैं, कि साफ-सुधरी जगह में कमरा दिलवा दें ताकि वे लोग कभी-कभी मिलने आया करेंगे । महताब गुरु का मानना था कि हिजड़ों को कौन कमरा किराये देता है? और अकेले रहना नाजबीबी के लिए सुरक्षित भी नहीं है, परिवार में भले कोई इन्हें साथ रखना नहीं चाहते लेकिन कुछ मर्द अपनी हवस मिटाने के लिए अकेले किन्नर को देखते ही वे अपनी संपत्ति समझकर जबरदस्ती से यौन शोषण करने में देर नहीं लगाते हैं । खैर जब से नंदरानी ने घर छोड़ा तब से हिजड़ा समुदाय ही उसका परिवार बन गया । जन्मजात रिश्तों को भुलाना भी कहाँ आसान था, जिस घर में जन्म लिया उस परिवार की मर्यादा के लिए सब कुछ छोड़कर चली आई किन्नरों की दुनिया में, लेकिन उसके लिए माता-पिता के बिना सुख और चैन से रहना असंभव था ।

     नंदरानी उर्फ नाजबीबी को एक दिन माँ-पापा की याद वापस उस घर में जाने को मजबूर करती है । वहाँ जाने पर उसे भाभी के द्वारा तिरस्कृत व्यंग्य से पता चला उसकी माँ इस दुनिया में नहीं रही । नाज वहाँ से पागलों की तरह भागते हुए श्मशान में चली जाती है और जलती चिता में से माँ का एक दांत उठा लाती है । नाज के पिता उसे तब सीने से लगाते हुए उसकी माँ के चले जाने का अफसोस प्रकट करते हैं, तब उनका बेटा बड़ी बेरूखी से लोगों के सामने नाज को धिक्कारता है किअब तो तुम जितना भद्दा कर सकती थी हम लोगों का कर ही लिया । कृपा करके चली जाओ यहाँ से ।”1 इस बीच में पापा नंदन को रोकते हुए कहते अब कहाँ जाएगी? नंदन अचानक गुस्से में आकर अपने पिता का सम्मान करना भी भूल जाता है कि नंदन ने उनकी बांह पकड़ लगभग घसीटते हुए उत्तर दिया । जहां से आई है, वहीं जाएगी, और कहाँ ?’ ‘पर नदंन, उसे यहाँ से तो लेता चल ! तेरी छोटी बहन है । इतना कठोर कैसे बन रहा है ? भगवान ने उसके अत्याचार किया है, तू तो न कर ।”2 आलोच्य उपन्यास में पिता अपनी अलैंगिक संतान को स्वीकारने और उसे साथ ले चलने की बात जीवन के अंतिम पड़ाव में करते हैं । किन्तु तब भी पितृमोह से मुक्त होकर अपना नहीं सके। उनके बेटे ने अपने अंहकार तथा समाज की झूठी मर्यादा का चोला ओढ़े हुए वह पिता का अपमान करने में भी नहीं हिचकिचाता है, वहीं रिश्तों की अहमियत की कद्र करते हुए नाज अपने भाई से निवेदन करती है, कि वह पापा का अपमान न करें वह स्वयं यहाँ से चली जाएगी।

       नाज बीबी की तरह किन्नर समुदाय के अनेकानेक बच्चे होंगे जिन्हें माँ-बाप का प्यार तो मिलता है, लेकिन वे अपने बेटों और समाज के डर से साथ रखने में हिचकिचाते हैं । माँ-बाप के जीते जी वे भी चोरी-छिपे मिलने की कोशिश करते रहते हैं । वे लोग परिवार की जिम्मेदारियां चाहते हुए भी नहीं उठा सकते, फिर भी वे अपनी कमाई के कुछ पैसों से माँ-बाप के लिए उपहार खरीदकर देना चाहते हैं, लेकिन यह सब उनके सपने ही रह जाते हैं ।

          विभिन्न उपन्यासों के पात्रों में विनोद उर्फ विनीता, नंदरानी उर्फ नाजबीबी, सोना, संध्या, तारा, हर्षा, सिमरन, जुगनी उर्फ पायल,मोना, प्रीत, विनोद उर्फ बिन्नी, रमीला, संजय उर्फ संध्या, तारा, दयारानी, दीपक उर्फ दीपिका माई, नरेन्द्र उर्फ नाज आदि पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होते आए हैं । माता-पिता इन बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की कोशिश करते हैं, किंतु अपनी संतान की अलैंगिकता का डर हमेशा मन-मस्तिष्क में बना रहता है, वे इन बच्चों को घर से सिखाकर भेजते हैं कि उन्हें किस तरह स्कूल में चलना,फिरना,उठना-बैठना और रहना है । खैर एक दिन तो उनकी असलियत सबके सामने आ ही जाती है और वहां से उनका शोषण होना शुरू हो जाता है । स्कूल में शिक्षक भी उनके साथ दोगला व्यवहार करते हैं, ऐसे बच्चों को अपराध बोध में डाल दिया जाता है,वे धीरे-धीरे स्कूल तक जाना छोड़ देते हैं और घरवाले भी उन बच्चों को प्रताड़ित करते हैं । जबकि माता-पिता अपने बच्चों के हक की लड़ाई में आवाज नहीं उठाते हैं ।

      भारतीय माँ की ममता, प्यार, स्नेह, त्याग और समर्पण ही उसे एक अलग पहचान दिलाती है। लेकिन वह पुरुषसत्ता के आगे मजबूर है इसलिए अपने बच्चों के हित में कदम नहीं उठा पाती । कथाकार चित्रा मुद्गल अपने उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं. 203 – नाला सोपारा में किन्नर संतान के प्रति एक माँ की अभिव्यक्ति को बताने की कोशिश इस प्रकार करती हैं कि सच तो यह है दीकरा,बच्चों जैसा निष्कलुष मन कहाँ होता है माँ नाम की स्री के पास? दुनियादारी में बंटी हुई स्त्री ! टुकड़ा-टुकड़ा ।”3 विवेच्यानुसार लेखिका ने यहाँ एक साधारण औरत की स्थिति को बताया लेकिन समय बदल रहा है, माताओं को भी अपने अधिकारों की अहमियत समझने की आवश्यकता है । ऐसा भी नहीं हो कि अपने गर्भ में नौ महीना तक अपनी संतान के साथ मन-मस्तिष्क से जुड़कर हजारों सपने देखे हो और  बच्चे की अलैंगिकता के कारण समाज तथा परिवार के दबाव में आकर अपनी संतान  को स्वयं से दूर करके जीवन भर घुट-घुटकर रोते रहें । बिन्नी से माँ-बाप का बहुत लगाव था और वह पढ़ने-लिखने में अव्वल छात्र था, कई बार किन्नर उनके घर आकर उसके माता-पिता पर बिन्नी को सौंपने के लिए भी दबाव डालते रहे । वहीं बिन्नी का भाई अपनी माँ को कई बार कह चुका था कि कितने दिन छुपाकर रखेंगे । वह भी बिन्नी को लेकर काफी नाखुश था, तथा अंत में पिताजी चंपाबाई के हवाले बिन्नी को कर के समाज में दुर्घटना की अफवाह फैला देते हैं । माँ अपने बेटे को याद करते हुए आम औरत की तरह ही छुप-छुपकर पत्राचार के माध्यम से बात करती है, बिन्नी अपने माता-पिता और भाईयों के प्रति चिंता व्यक्त करते दिखाई देता है,उसे किन्नर समाज में रहना अच्छा भी नहीं लगता वह इस जिंदगी को नरक के समान समझता है । रिश्तों की तड़प उसे हर क्षण होती है उसे तीज-त्यौहार, अपने बचपन की दोस्त और माँ के हाथ का खाना, पिता के स्वास्थ्य की चिंता और उन्हें दवाईयां देने की याद हर समय विचलित करती है, लेकिन वह चाहकर भी उस दुनिया में लौट नहीं पाता क्योंकि वह समाज और परिवार का दिया हुआ दंड भोग रहा है ।

         समाज में कुछ लोग रूढ़िवादी परिपाटी पर चलते हैं, लेकिन अपनी संतान की हिफाजत के लिए कुछ माताएँ दुनिया की मान-मर्यादा की परवाह किए बिना अलिंगीय बच्चों के साथ खड़ी होती है । जैसा कि पारस ने बताया है कि  सजल, जिंदगी जांघों के बीच से शुरू तो होती है,परंतु वहीं खत्म नहीं होती । इसमें बहुत कुछ करने के लिए होता है । हमारा अर्जुन लोगों की धारणाएँ तोड़ेगा ; और ये तभी संभव है कि वह भीतर से बहुत परिपक्व और जीवटता वाला बने !”4 भुवनेश्वर उपाध्याय ने हॉफ मैन उपन्यास में माता-पिता का वह किरदार दिखाया जो समाज और रिश्तेदारों की परवाह न करते हुए भी अपने संतान के उज्जवल भविष्य के लिए कदम उठाया । सजल और पारस को डॉक्टर ने बच्चे के जन्म से पहले ही जानकारी दे दी थी, कि बच्चा अलैंगिकता के साथ पैदा होगा लेकिन उन्होंने तय किया था, बच्चा जैसा भी होगा वे उसकी अच्छी परवरिश करेंगे । इस उपन्यास में माता-पिता अपनी संतान की जिम्मेदारी उठाने के लिए सामाजिक चुनौतियों को स्वीकार कर रहे हैं ।

वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे माता-पिता भी हैं, जो अपनी अलैंगिक संतान का तिरस्कार और शोषण करते हैं । इस संदर्भ में हर्षा का मत है किमैं जुट गयी पैसा कमाने में । मेरी तबीयत खराब रहती । मैं दवा खाती । फिर काम पर जाती । खाँस-खाँसकर बुरा हाल था । बाबूजी की खुशी का इंतजाम होता रहा । मैं अंदर से खोखली होती गयी पर जब भी कमजोर होता, बाबूजी के चेहरे पर मुस्कान की कल्पना मेरी आँखों में चमक ला देती । उनकी यह मुस्कान एक दवा की तरह थी जो खोखले होते शरीर में नया जोश पैदा कर देती । 5 हर्षा जैसे बच्चों का घर में कोई इज्जत या मान-सम्मान नहीं होता है, उसे परिस्थितियाँ उम्र से पहले समझदार बना देती है । हर्षा की लैंगिकता ने उसका बचपन, माँ-बाप का प्यार और भाई का साथ छुड़वाकर किन्नर समुदाय में अपने जैसे लोगों के साथ रहने को मजबूर कर दिया लेकिन हर्षा के मन में कभी पिता के प्रति विद्रोही भाव नहीं आये । उसके पिताजी  अपने दूसरे बेटे अनमोल पर बहुत गर्व करते थे, उसका खूब लाड़-प्यार करते थे, हर्षा को बात-बात पर डांटते-फटकारते थे, इतना ही नहीं उसकी जान तक लेने को तैयार हो गये थे । जब पिता को अपनी जमीन के लिए आठ लाख रुपयों की जरूरत थी, तब इंजीनियर बेटा पैसों का जुगाड़ नही करता है, हर्षा से बनी हर्षिता ने अपना देह व्यापार करके और बधाई में मिली नेग राशि से पिताजी को कर्ज मुक्त करवाया । यहाँ स्पष्ट है कि समाज की दकियानुसी सोच से परे जाकर यदि माता-पिता अलैंगिक बच्चों को अपनाने की कोशिश करेंगे तो ये बच्चे भी सामान्य बच्चों से बढ़कर पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने में सफल हो सकते हैं ।

     प्रदीप सौरभ ने 2011 में तीसरी ताली में गौतम साहब अपनी अलैंगिक संतान को किन्नरों के हाथ सौंपने के बजाय जद्दोजहद कर सामान्य बेटा ही बनाए रखना चाहते हैं । इस संदर्भ में लेखक ने बताया हैं कि वह अजीब मानसिकता से गुजर रहा था । कई-कई हफ्ते घर के अन्दर बन्द रहता । उसे लगता कि उसके पिता उसे जबरिया लड़का बनाने पर तुले हैं । वह अपनी बहनों की तरह ही अपने को लड़की मानता था । उसे लड़कों के कपड़े पहनने में परहेज होने लगा ।6 लेकिन अपने बेटे की असलियत को गौतम साहब घर की चारदीवारी तक सीमित रखकर समाज से छिपाने की कोशिश कर रहे थे । इस घुटन भरी चारदीवारी में विनीत की देह में विनीता को जीने नहीं दे रही है । विनीत को कोई समझने वाला नहीं था और गौतम साहब के सामने भी कोई दूसरा रास्ता नहीं था ।

अर्थात् यहाँ 2011 तक के उपन्यासों में किन्नर संतान को अपनाने की पहल हुई है, लेकिन माता-पिता समाज के हिजड़ा संतान वाले टेग से भय मुक्त नहीं हुए हैं । विनीत ने माता-पिता को समाज की निगाहों में गिरने से बचाने और स्वयं को स्वच्छंद करने वाले रास्ते का सफर तय किया, उसे भी ज्ञान नहीं था कि उसकी मंजिल कहाँ और कैसी होगी?  खून के रिश्तों का बंधन भी कुछ ऐसा होता है, जिसे कभी आसानी से मिटा नहीं सकते । ऐसा उदाहरण उपन्यास के अंत में मिलता है कि इसी बीच गौतम साहब ने एक पैकेट विनीता के आगे बढ़ाया । विनीता ने सोचा कि वे उसके खाने के लिए कुछ लाये हैं । उसने  पैकेट को खोलने की बजाय लगभग फाड़ डाला । उसमें एक बनारसी साड़ी थी, कुछ चूड़ियाँ, बिंदी के पैकेट और सस्ती किस्म की कुछ लिपिस्टिक व मेकअप का सामान । साड़ी देखकर विनीता भावुक हो गई । गौतम साहब विनीता को साड़ी भेंट करके प्रायश्चित करना चाहते थे कि तुम विनीत नहीं थे...तुम्हें विनीत बनाने की मेरी कोशिश झूठी थी। 7 अर्थात् भारतीय सांस्कृतिक जीवन में पिता की अहम भूमिका होती है । एक तरफ वे सामाजिक बंधनों और लोक-मर्यादा में बंधे रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनी संतान के लिए तिल-तिल होकर मरते हैं । गौतम साहब की तरह अनेक पिता समाज के आवरण में निष्ठुर पिता बन जाते हैं, परन्तु उनके लिए अपनी संतान को भूल जाना असंभव है । गौतम साहब की तरह तारा, सिमरन, प्रीत, विनोद जैसे किन्नर पात्रों के पिताओं की भी दुर्बल दशा रही है । दुर्भाग्य यही है कि अधिकांश लोगों ने रूढ़ग्रस्त समाज का चोला पहना है इसलिए वे समय रहते हुए अपनी अलैंगिक संतान की मासूमियत और दैहिक विसंगति को समझ नहीं पाते ।

समाज ने बदलाव के रास्ते पर चलना भी सीखा है, इसलिए कुछ परिवारों में किन्नर बच्चे को उपेक्षित और तिरस्कृत करने की बजाय उसकी अलैंगिकता को स्वीकार करते हुए हर परिस्थिति में माता-पिता साथ खड़े रहते हैं । ऐसे बदलाव के उदाहरण मैं भी औरत हूँ,अस्तित्व,जिंदगी 50-50, ऐ जिंदगी तुझे सलाम, मेरे होने में क्या बुराई,श्रापित किन्नर,हॉफ मैन,मैं क्यों नहीं उपन्यासों में तथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी,पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मनआत्मकथाओं में देख सकते हैं । यह बदलाव सिर्फ साहित्य की कथाओं में ही नहीं बल्कि वास्तविक समाज में भी होने लगा है । समाज के उपेक्षित व्यवहार के बावजूद भी अपनी संतान के प्रति ममत्व से समाज की रूढ़ियों का सामना करने की ताकत मिल रही है।

समाज में पारिवारिक और खून के रिश्तों से जब-जब तिरस्कार, उपेक्षा, पीड़ाएं  और कष्ट मिलें हैं, तभी किन्नर समुदाय के लोगों ने आपसी संवेदनशील रिश्तों की गहराई को समझकर एक-दूसरे के साथी बनें । उनके बनाए हुए आपसी रिश्ते इस समाज की मानसिकता से लड़ने की हिम्मत प्रदान करते हैं । वे आजीवन अपने माँ-बाप की सलामती और उनकी एक झलक मिल जाने के लिए तरसते रहते हैं । अपने ही समुदाय में आत्मीय रिश्तों के साथ जीवन जीने की कला सीखते हैं । जैसे विनोद उर्फ बिन्नी, हर्षा, विनीता, तारा, सोना, संध्या, नाजबीबी, सिमरन,रोशनी, नाज, अंगूरी,चमेली,दयारानी, तारा, महताब गुरु इत्यादि।

मैं पायल उपन्यास में जुगनू को परिवार में दादा, माँ, बहनों का खूब प्यार और स्नेह मिलता था । लेकिन उसके पिता में जो सामान्य ट्रक ड्राईवर में जितनी बुराई होनी थी, वे सब बुराईयां और नशेड़ी आदतें थी । जब भी बाहर से घर आते तब नशे में अपनी पत्नी और बच्चों की मार-पीटाई करते और जुगनू को देखते ही भड़क जाते थे । इस संदर्भ में  पायल बताती है कि पिताजी ने पास रखी बाल्टी में भरे पानी से मुझे नहला दिया, फिर वहीं रखी चमड़े की चप्पल को टब में भरे पानी में डुबा-डुबाकर मेरे नग्न शरीर की चमड़ी उधेड़ने में लगे रहे जब तक कि मैं बेहोश नहीं हो गई । पल भर के लिए होश आता देखती अम्मा मेरे ऊपर लेटी पिताजी की चप्पलों से पिट रही थी, फिर वह मुझे बचाते हुए स्वयं कितनी देर तक पीटती रही पता नहीं मैं तो कब की बेसुध हो चुकी थी ।8 तथ्यानुसार किन्नर बच्चे का पैदा होना और उसके शारीरिक बदलाव आना उसके हाथ में नहीं है, किन्तु समाज में पुरुषसत्ता इसका दोषी अपनी पत्नी और बच्चे को मानता है । पायल के पिता क्षत्रिय परिवार से है, किन्तु उनमें एक भी लक्षण क्षत्रिय के नहीं है, उन्हें अपने कर्म पर अफसोस नहीं है । वह बेटे के इंतजार में पांच-पांच बेटियों को पैदा कर चुका हैं- । उनमें जुगनू ना बेटा है,ना ही बेटी । परन्तु पिता की इच्छा है कि उसे बेटे के रूप में बड़ा किया जाए ताकि भविष्य में कोई शादी-ब्याह जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़े । लेकिन दैहिक विसंगति के कारण छुपते-छुपाते बहनों के साथ जुगनू लड़की की तरह बन जाती थी । इन सब हरकतों के कारण पिता ने उसे मार-पिटाई के अलावा फांसी तक दे दिया था । इस अत्याचार के कारण पायल घर छोड़कर एक दिन भाग जाती है । वास्तविक दुनिया में पिता से भी ज्यादा अत्याचारी और देह शोषण करने वाले मिले । जुगनू को माँ और बहनों का प्यार मिला वहीं पिता और भाई का अत्याचार । घर में हिजड़ा पैदा होने पर समाज उन्हें परिवार का कलंक मानते हैं, वहीं प्रमोद, दरोगा, पप्पू और रेल में मिले अकंल जैसे लोग हिजड़े की देह का भोग करना चाहते हैं।

इसी प्रकार किन्नर कथा उपन्यास में सोना की लैगिंकता का पता चलते ही महाराज जगतसिंह उसे मौत के घाट उतारने के लिए पंचमसिंह को सौप देते हैं, लेकिन पंचमसिंह सोना की हत्या न करते हुए किन्नर गुरु तारासिंह को सोना की परवरिश करने के लिए सौंप देता है । तारा सिंह उसका अच्छी परवरिश करते हुए नृत्यांगना बनाने के साथ-साथ उसका ऑपरेशन करवाकर उसे एक औरत बनाने की इच्छा रखती है। दुखद बात यह है कि परिवार के लोग अपनी अलैंगिक संतान को समाज में उनकी इज्जत पर सवाल उठने के भय से घर से निकाल देते हैं । लेकिन बच्चों को परिवार से निकालने या उपेक्षित करने के कारण उनकी मानसिकता पर क्या असर पड़ता है? कोई सोच ही नहीं सकता ? ऐसे बच्चे वैसे भी दैहिक विसंगति के कारण अपने मस्तिष्क और शरीर के साथ लड़ते-लड़ते थक चुके हैं,और ऊपर से घर और समाज का दबाव उन्हें कई बार मौत के मुंह में धकेल देता है ।

उपन्यासों में ऐसे भी पात्र हैं जिनके माता-पिता हर परिस्थिति में साथ खड़े रहे थे । वे पात्र केवल अपनी दैहिक विसंगति से लड़ रहे थे लेकिन उन्हें पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा मिलने के कारण वे पढ़-लिखकर सफल होने के साथ-साथ सुखद दाम्पत्य जीवन भी जी रहे हैं । भले समाज में शुरूआती दौर में माता-पिता को समाज की घिनौनी सोच का सामना करना पड़ा लेकिन माता-पिता की समझदारी से उठाए गये कदम के कारण प्रीत, सुर्या, रोशनी, हिना का सुखद जीवन देखकर  सुखानुभूति होती है । यह केवल उपन्यासों में काल्पनिक पात्र ही नहीं हैं, बल्कि समाज में भी कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं । अलैंगिक बच्चों के साथ माता-पिता का होना कितना मायने रखता है, यह उदाहरण मानोबी बंद्योपाध्याय, लक्ष्मीनरायण त्रिपाठी, जोइता मंडल, पद्मिनी प्रकाश के रूप में देख सकते हैं ।

संदर्भ ग्रंथ-1.नीरजा माधव,यमदीप,पृष्ठ संख्या- 113-114

 2. नीरजा माधव,यमदीप,पृष्ठ संख्या 114

3. चित्रामुद्गल,पोस्ट बॉक्स नं. 203- नाला सोपारा, पृष्ठ संख्या- 80

4. भुवनेश्वर उपाध्याय,हॉफ मैन,पृष्ठ संख्या- 23

5.भगवंत अनमोल, जिदंगी 50-50,पृष्ठ संख्या-201

6.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली,पृष्ठ संख्या-82

7.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली,पृष्ठ संख्या-120

8.  महेन्द्र भीष्म, मैं पायल,पृष्ठ संख्या-36

लेखक परिचय-

डॉ. मिलन बिश्नोई,

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,

खाजा बंदानवाज़ विश्वविद्यालय,कलबुर्गी,कर्नाटक

मोबाइल नं.-6380568643

ई-मेल.-milanbishnoi@gmail.com