सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

साहित्य और इतिहास में किन्नर

 Article Published - Akshara Multidiciplinary Research Journal Peer-Reviwed &Refreed International Research Journal, E-ISSN 2582-5429,July-September 2022, Volume-03, Issue V (B),Page No.-54-58, -#DrMilanBishnoi

                                    


                                                              शोध-सार

साहित्येतिहास मेंतृतीयलिंगी लोगों की उपस्थिति होने के बावजूद उनके अस्तित्व के लिए प्रश्न उठाए जाते हैं । इस समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में स्त्री’ के लिबास में पुरुष के शव को दफनाने का प्रमाण मिलता है। ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है, किन्तु इस समुदाय को भारतसंयुक्त राज्य अमेरिकाब्रिटेनचीनजापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों में असमानता और अछूतेपन का शिकार होना पड़ा । बीते साठ-सत्तर वर्षों से विश्वस्तर पर सुनवाई होने लगी है । तृतीयलिंगी समुदाय को ट्रांसजेंडर के रूप में लगभग 1965 ई. से जानने लगे हैं । जाहिर-सी बात है कि उन्हें मर्द और ‘औरत के  सामाजिक गुणों से जोड़कर देखने का षड़यंत्र मध्यवर्गीय लोगों ने ही किया था । अर्थात् उनमें  दाढ़ी वाले पुरुष के अंदर और औरतपन का भाव  होने के कारण विशिष्ट लिंग वाली शब्दावली का प्रयोग किया जाने लगा । कुछ तृतीयपंथियों का जन्म शारीरिक रूप से तो सामान्य होता है, परंतु वह आंतरिक भाव से जन्मजात लिंग के प्रति असहजता प्रकट करते हैं, इसलिए वे लोग विपरीत लिंगी वेशभूषा, व्यवहार, चाल-चलन के प्रति आकर्षित होते हुए स्वयं में उस लिंग का रूपान्तरण करने में इच्छुक रहते हैं, इसलिए ‘अलैंगिक और विपरीतलिंगियों को नकारा और धिक्कारा जाता है । जबकि इन लोगों ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है जिसके कारण उनके साथ असामान्य व्यवहार किया जाए । वहीं तृतीय लिंगी समुदाय के अस्तित्व का संदर्भ वैश्विक और भारतीय साहित्येतिहास में अनेकानेक रूपों में देखने को मिलता है ।

            खैर आमतौर पर सदियों से अपनी स्वार्थता के लिए इंसान को गोरे-काले, लिंग, जाति, धर्म और अर्थ के आधार पर बांटने का प्रयास किया गया/ जा रहा है । पितृसत्तात्मक सोच के शक्तिशाली लोगों ने शारीरिक और आंगिक क्षमतानुसार लैंगिकता के सांचे बनाये हैं । विश्वस्तरीय इतिहास में देखा जाए तो राजा वही बनता था, जिसके पास शौर्य और पराक्रम की शक्ति थी । उस शासनकाल के दौर में महिलाओं और किन्नरों को उपभोग की वस्तु समझा गया । और ऐसे शासकों के शासन काल में कन्या का अपहरण’, ‘अनैतिक व्यवहार, ‘अनैतिक तरीके से दूसरों की संपत्ति और क्षेत्र में कब्जा करना इत्यादि होता आया है ।

बीज शब्द- वैश्विक साहित्येतिहास, ट्रांसजेंडर, थर्डजेंडर, हिजड़ा, विशिष्ट लिंग, किन्नर, तृतीयलिंगी, पुरात्वविदों, कास्युगीन, मध्यमवर्गीय, परिदृश्य, समलैंगिक, अस्तित्व, सनातन संस्कृति इत्यादि।

 मूल आलेख

          साहित्येतिहास में तृतीयलिंगी समुदाय की भिन्न-भिन्न अवधारणा देखने को मिलती है जैसे-नामोल्लेख,संस्कृति-सभ्यता । तृतीयलिंगी/किन्नर समुदाय की उपस्थिति के अनेकानेक प्रमाण मौजूद है । इस जन समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में स्त्री’ के लिबास में पुरुष के शव को दफनाने की प्रथा के प्रमाण देखे जा सकते हैं । ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है । थर्डजेंडर समुदाय को भारतसंयुक्त राज्य अमेरिकाब्रिटेनचीनजापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों की संस्कृति और सभ्यता में उनकी उपस्थिति सामान्य और असामान्य दृष्टिकोण से देखने को मिलती है । तृतीयलिंगी समुदाय की स्थिति और अस्तित्व से संबंधित जानकारी मिलती है कि “Before the advent of Europeans, Native Americans, embraced gender fluidity. There were no gender binaries. There were men and women, and then there were feminine men and manly women, and transgendered individuals. In native North American societies, these individuals were considered to be ‘normal’. In fact, those who adopted fluid gender roles were called Two Spirit female and Two Spirit male; and were considered supremely gifted, having the knowledge and ability to understand two opposing sides. There were no defined rules, no distinct binaries. In these societies, men and women frequently assumed opposite gender identities, occasionally cross-dressing, but almost always adopting the universal occupational roles assigned to each sex.”1 इससे यह विदित होता है कि युरोपीय लोगों के आने से पहले अमेरिका में भी लैंगिक भेदभाव देखने को नहीं मिलता है । वहाँ के  प्राचीन इतिहास में ‘स्त्री और ‘पुरुष’ तथा ‘ट्रांसजेंडर सभी की समान स्थिति रही है । स्पष्ट है कि ऐतिहासिक, पौराणिक और प्राचीनकाल में हिजड़ा, ट्रांसजेंडर, समलैंगिक लोगों की उपस्थिति बराबर रही है।

          मूल अमेरिकियों की तरह म्यांमार में भी समान स्थिति थी । जो जैविक रूप से मर्द हैंलेकिन औरत के रूप में क्रॉस-ड्रेस और समाज में औरत की भूमिकाओं को निभाना अधिक पसंद करते हैं । बर्मी समाज में भी हिजड़ों को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा गयाउन्हें 'प्रतिभाशालीइंसान के रुप में जाना जाता है । जो अक्सर बाहर के लोगों को बर्मी संस्कृति के साथ जोड़ने का काम करते हैं ।

          ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मेडागास्कर और समोआ में सकलावास के जातिय समुदाय को देखा जाना चाहिए । जो मेडागास्कर की कुल जनसंख्या का 6.2 प्रतिशत है, जो वहाँ के कुछ लड़कों को लड़कियों के रूप में देख सकते हैंजो शारीरिक रुप से स्त्रैण माने जाते हैं । इस समाज के अंतर्गत ‘अंतांड्रोय और होवा जनजातियाँ में अपने  बेटों का बेटी की तरह संस्कार देते हुए साज-श्रृंगार, वेषभूषा पालन-पोषण किया जाता है, उसे महिला की आवाज में बात करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है । अर्थात् पूरी तरह से एक औरत के हाव-भाव सिखाए जाते हैं, ताकि सामाजिक स्तर पर औरत के साथ व्यवहार कर सके ।

           इसी तरह समोआ में ‘तृतीय लिंगी’ को ‘ Fa'afafine’ (किन्नर)  के नाम से जाना जाता है । ऐतिहासिक काल में यहाँ किन्नरों को समाज में मान्यता प्राप्त थी । सामोन संस्कृति में किन्नर को अभिन्न अंग के रूप में देखा गया । Fa'afafine’ (किन्नर) नवजात शिशु का जन्म एक ‘male’ शरीर के साथ होता है, लेकिन आयु बढ़ने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से ‘Female’ जैसा महसूस करता हैं, ऐसे बच्चों की पहचान उनके माता-पिता जल्दी ही कर लेते हैं । इसलिए माना जाता है कि उन बच्चों का पालन-पोषण लड़कियों की तरह किया जाता है अर्थात् उन्हें लिंगभेद का सामना नहीं करना पड़ा । भले ही ‘Fa'afafine’ (किन्नर)  पुरुषों और महिलाओं के साथ यौन संबंध रखता हैलेकिन वहाँ पर fa'afine को 'समलैंगिकनहीं माना गया है, वे हिजड़ा समुदाय के प्रति सहज है, वहीं 'समलैंगिकता' को पूरी तरह से यूरो-पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बतलाया गया । युरोपीय लोगों के आगमन से पहले समोआ में मातृ-सत्तात्मक शासन के कारण उनके आस-पास किन्नरों की मौजूदगी देखने को मिलती है । इसी कारण समोआ में महिलाओं और तृतीयपंथी के नेतृत्व में उनकी भूमिकाओं को महत्त्व दिया जाता था ।

          मिस्र’ में 1200 से 1500 ई. के दौरान, ‘मामलुक काल के शासनकाल में अलैंगिक बच्चों को पुरुष की तरह माना जाता था । पुरुषों के रूप में होने के कारण उन्हें सारी सुख-सुविधाओं मिलती थी । पुरुष के रूप में परवरिश होने के कारण उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता था । “‘हवाई  संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रशान्त महासागर में स्थित है । वहाँ शारीरिक पहचान थर्डजेंडर के रूप में होने बावजूद भी स्त्री या पुरुष की लैंगिकता में रहने के लिए बाध्य नहीं करते हैं, बल्कि हवाईयन की मूल संस्कृति में महूओं’(तृतीयलिंगी) को प्राचीन परम्पराओं के प्रसार- प्रचार करने में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है ।2 और उन्हें शिक्षकों के दृष्टिकोण से सम्मानित भी किया जाता था । जिस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासकों के द्वारा किन्नरों को अपराधिक श्रेणी में रखा गया उसी प्रकार हवाई पर यूरोपीय लोगों के आक्रमण के पश्चात किन्नर संस्कृति का विनाश हुआ । यूरोपीय मानसिकता से प्रभावित लोगों ने ही लैंगिक भेदभाव शुरुआत की है ।

          थाईलैंड में किन्नरों को  'कैथोयया 'काटोईनाम से जाना जाता है । उनको लेडीबॉय की तरह में माना जाता है । वहाँ देश में ट्रांसजेंडर और ‘महिलाओं के समान अधिकार होते हैं । वास्तविक रूप से सामाजिक स्तर भेदभाव के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता है । जनसंख्या के अनुपात में कैथोय (तृतीयलिंगी) की काफी अहम भागीदारी देखने को मिलती है । कैबरे और अन्य नृत्य शो करने का पेशा तृतीयलिंगियों ने अपनाया और पढें-लिखे किन्नर अच्छी नौकरी भी कर रहे हैं ।

          विश्वस्तरीय इतिहास में यदि भारतीय संदर्भ में किन्नरों को देखा जाए तो अंग्रेजों की सोकॉल्ड पाश्चताय संस्कृति में किन्नर समुदाय की संकल्पना ही नहीं बैठती थी । किन्नरों के सभ्य सामाजिक जीवन में अंग्रेजों ने उन्हें गलत समझते हुए उनके खिलाफ अनेक धाराएँ लगाकर उन्हें प्रतिबंधित किया गया । पुरुषों के हिजड़ा बनने पर रोकथाम किया गया ।  दक्षिण एशियाई संस्कृतियों में किन्नरों के द्वारा प्रजनन करने वालों को आशीर्वाद या शाप देने की शक्ति प्राप्त थी । खासकर भारतीय जनता के मन किन्नरों के प्रति एक आध्यात्मिक और आस्था के दृष्टिकोण से स्थान हमेशा देखने को मिलता है । वे नवदम्पति और नवजात शिशु को आशीर्वाद देकर बधाई प्राप्त करते है । उनकी आजीविका चलाने का इतिहास मात्र बधाई माँगने का रहा है । भारतीय सनातन संस्कृति में तृतीयलिंगी और ट्रांसजेंडरों की उपस्थिति के इतिहास में नयी नहीं है, उन्हें हमारे पौराणिक साहित्य और प्राचीन साहित्येतिहास में मान्यता प्राप्त थी । किन्नर समुदाय को अरवानीजोगप्पाहिजड़े, कोठीशिव-शक्ति,अर्धनारीश्वर, शिखंडी आदि के रूपों में देखा जाता था । तृतीयलिंगी के रूप में हिंदू पौराणिक कथाओं और अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा भारतीय संस्कृति में मजबूत ऐतिहासिक उपस्थिति रही है । प्राचीन सनातन संस्कृति में महर्षि वात्सायन द्वारा रचित ग्रंथ कामसूत्र में  'तृतीय प्रकृतिके रूप में संदर्भ दिया गया ।वात्स्यायन के कामसूत्र में तृतीयप्रकृति कहकर हिजड़ों का उल्लेख है । वो स्त्री अथवा पुरुष किसी के कपड़े पहन सकते हैं,ऐसा उसमें कहा गया है । वात्स्यायन ने और शेष बहुत से पंडितों ने उन हिजड़ों को नायिका कहा है । कोई राजकुमार या किसी सरदार का पुत्र काम-क्रीड़ा में कमजोर हो,तो उसे सिखाने के लिए हिजड़ों को नियुक्त की जाती है ।प्राचीन वैदिक और पौराणिक साहित्य में तृतीयप्रकृति को लोगों का संस्कृति की विविधता बनाए रखने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है । भारतीय वैदिक संस्कृत भाषा के व्याकरण में स्त्रीलिंग,पुल्लिंग और 'नपुंसकइन तीनों लिगों का प्रयोग किया जाता है । इसके अलावा प्राकृत और अपभ्रंश भाषा में  भी उल्लेख मिलता  है ।

          सनातन संस्कृति में किन्नरों को दैवीय दृष्टि से देखा गया है । पौराणिक काल में अनेक मिथक कहानियों का उल्लेख मिलता है । महाभारत में ‘अरावन या अरवाण का उल्लेख किया गया, यहाँ वर्तमान समय में भी तमिलनाडु में हिजड़ा समुदाय का प्रति वर्ष मेला भरता है, जिसमें देशभर के किन्नर यहाँ आकर एक रात के लिए अरावन से शादी करते हैं । जो शारीरिक रूप से पुरुष और स्त्री का मिला-जुला चेहरा स्वयं को औरत मानते हुए अरवाण से शादी करने की इच्छा प्रकट करते हैं, तथा ये लोग शादी के दूसरे ही दिन विधवा बनकर विलाप करते हैं । अरावन को ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो वह बड़ा योद्धा था । इस संदर्भ तीसरी ताली उपन्यास कौरवों और पांडवों के युद्ध में अरावन पांडव पक्ष की तरफ से युद्ध लड़ने के लिए स्वयं आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अर्जुन का बेटा हूँ और अपने पिता की युद्ध जीत सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को इस बलिदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ ।अर्जुन की पत्नी नागवंशी चित्रागंदा से अरवाण पुत्र की प्राप्ति हुई है । उसे अमरत्व प्राप्ति का वरदान प्राप्त था परंतु युद्ध में पाड़वों को काली माँ को बलि देने के लिए आवश्यकता होने पर अरावन ने कृष्ण को अपनी आखिरी इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि मैं कम से कम तीन सप्ताह पाण्डवों की तरफ से युद्ध लड़ना चाहता हूँ और युद्ध में जाने से पहले मेरा विवाह करना होगा ।5 इस प्रकार अरावन की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए कृष्ण मोहिनी बनकर शादी कर लेते हैं और सुबह के होने पर अरवाण को युद्ध मैदान में लाया जाता है ।

          मैं क्यों नहीं?  उपन्यास में कथानायिका ऐतिहासिक प्रसंग को बताती है कि  सर, गुजरात में वड़ोदरा शहर में सयाजीराव महाराज ने बहरामपुरा इलाके में हिजड़ों के लिए तीन इमारतें बाँधी हैं । यहाँ करीब छह सौ से सात सौ हिजड़े सुख-चैन से जीवन बसर करते हैं । हम मुंबई में ऐसी जगह की याचना करते हैं तो इसमें बुरा क्या हैं ।विवेच्य उपन्यास के अनुसार समाज में कुछ एक जगहों में ऐतिहासिक बदलाव लाते हुए राजा-महाराजाओं ने किन्नरों की सुरक्षा के प्रति ध्यान दिया होगा तो भी मीडिया और साहित्य में दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि जमीनी हकीकत जानने में कुछ कमियाँ रही होंगी ।

          मुगलकाल में किन्नरों के संदर्भ में अनेकानेक उल्लेख मिलते है । उन्हें महारानियों  के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में भी तैनात किया जाता था । इसके लिए कई बार ऐसे गरीब नवयुवकों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था । ऐसा माना जाता है कि मुगल शासक राजपूत लड़कों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करते थे । अंततः लिगच्छेदन पर रोकथाम का उल्लेख मिलता है – औरंगजेब के शासनकाल में लिंगछेद पर रोक लगायी गयी । फिर भी छुपकर वो काम होता था । उस समय मुसलमान हिजड़ों को आदर मिलता था । वो अमीर भी थे । उनकी संख्या में हिंदू हिजड़े गरीब थे । बहुत से हिंदू हिजड़ों ने उस समय धर्मान्तरण किया था।आज भी  किन्नर समुदाय के अधिकांश सदस्यों का जीवन रहस्यमयी बना हुआ है । शोधकार्य के दौरान कई लोगों से मिलने का प्रयास किया और उनके इतिहास जानने की कोशिश की लेकिन निराशा ही मिली । लेकिन समय के साथ पढ़े-लिखे किन्नर अपने समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष पर चिंतन मनन करते हुए आगे बढ़ने में प्रयासरत है ।

  लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का मानना है कि हिजड़े बहुत मेहनत करने वाले और ईमानदार होते हैं और किसी प्रकार के काम के लिए आनाकान नहीं करते तथा काम में जी-जान लगा देते हैं । राजा-महाराओं को उनकी जरूरत महसूस होती थी इसके कारण लिंगच्छेदन किया जाता था । उनका मत है कि “अन्त में एक खास कानून बनाकर बड़ौदा के महाराज गायकवाड़जी ने खच्चीकरण (बधियाकरण) पर प्रतिबंध लगाया । भारतीय संविधान की धारा 320 में इसका उल्लेख है ।इसके अनुसार दूसरे का लिंग काटना कानून अपराध माना गया है । किन्नर समुदाय के लोगों के पास मुगलकाल में जीविकोपार्जन के रास्ते खुले थे किंतु ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में उनकी स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गयी थी ।

 

          हजारों साल के इतिहास में बदलाव पहली बार 21 वीं सदी में देखने को मिल रहा है । समयानुसार उनको देश के विभिन्न उच्च पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर ऐतिहासिक बदलाव लाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं । लेकिन इतिहास में पहली बार हिजड़ा समाज की तरफ से केस कोर्ट में दर्ज करवाया गया । उस समय उनके पक्ष के वकील, नेता और किन्नर अध्यक्ष को भारी कटाक्ष भरे शब्दों का सामना करना पड़ा था । वे समाज, सरकार, साहित्यकारों का ध्यान लगातार खींच रहे हैं । देश के विभिन्न राज्यों में लगातार ऐतिहासिक बदलाव लाने का प्रयास हो रहे हैं उसकी सराहना होनी भी चाहिए ।

          भारत में मुगल शासनकाल में फिर भी उनकी स्थिति ठीक थी । अधिकांश मुगल शासकों के साम्राज्य में बेगमों के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में हिजड़ों को नियुक्त किया जाता था, क्योंकि हिजड़ों की निगरानी में बेगमों की सुरक्षा से उन्हें कोई खतरा या शक नहीं चिंता नहीं थी । लेकिन यहाँ से ही नकली और लिंगच्छेदन करके हिजड़ा बनने का प्रचलन काफी हुआ । कई बार गरीबी के कारण अपना लिंगच्छेद करवाकर हिजड़ा भेष अपनाने को तैयार हो जाते थे । इसका उदाहरण प्रदीप सौरभ के तीसरी ताली में राजा के माध्यम से देख सकते हैं । किन्नर समुदाय को भारतीय नागरिक होने के बावजूद ब्रिटिश शासन के कार्यकाल में सामाजिक और आर्थिक स्तर के सारे अधिकार उनसे छीन लिए गये । उन्होंने किन्नरों को अछूत, भिखारी, चोर, समाज  में अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर उन पर अनेक बंधन लगाकर समाज से निष्कासित करने का प्रयास किया गया । “Eunuchs were not allowed to wear female clothing and jewellery or perform in public and were threatened with fines or thrown into prison if they did not comply. Police would even cut off their long hair and strip them if they were female clothing and ornaments. They "experienced police intimidation and coercion, though the patterns of police violence are unclear",  says Dr Hinchy9 अंग्रेजों ने किन्नर समुदाय को बधाई से मिलने वाली रोजी-रोटी छीनकर उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय किया । बधाई और उनकी वेशभूषा ही उनकी पहचान थी । इन्होंने अनेक किन्नरों को मारा-पीटा और हत्याएँ की  जिसमें 1871 में मैनपुरी की किन्नर गुरु भूरा की हत्या का उदाहरण देखने को मिलता है । किन्नर गुरु के साथ-साथ माना जाता है कि लगभग 2500 किन्नरों को मारा गया । इस हत्याकांड के तत्पश्चात अग्रेंजो ने कुछ नियमावली बनाकर उन्हें भगाने की कोशिश की थी । “Years after her murder, the provinces launched a campaign to reduce the number of eunuchs with the objective of gradually causing their "extinction". They were considered a "criminal tribe" under a controversial 1871 law which targeted caste groups considered to be hereditary criminals.”10 अंग्रेजों ने किन्नरों की जनसंख्या को कम करने के लिए एक कानून प्रस्ताव पास करके 1871 में आपराधिक जनजाति के तहत इन्हें हमेशा-हमेशा के लिए समाज से निकालने का काम कर लिया ।

          भारतीय इतिहास में बिना किसी धार्मिक भेदभाव किए किन्नरों का एक समाज स्थापित है इस संदर्भ में किन्नर गुरु तारा बताती है कि भले ही हम किसी भी धर्म से आए हों, हमारे नाम मुस्लिम हों या हिंदू, हम सब एक हिजड़ा समाज के होते हैं । हमारे सात घर होते हैं । प्रत्येक घर का एक मुखिया होता है, जिसे नायक कहते हैं, गुरु नियुक्त करता है । गुरु चेलो को बधाई, गाना-नाचना सिखाता है । गुरु के स्थान को गुरुधाम बोला जाता है, जहाँ धाम से जुड़े हिजड़े कमाई का एक हिस्सा जमा करते हैं । भारत वर्ष में कुल 450 धाम और इतने ही गुरुधाम हैं ।11 तथ्यानुसार अलग-अलग प्रांत के किन्नर साल में एक बार बहुचरा माता के मंदिर में इकट्टे होते हैं और बहुचरा माता के मंदिर में भंडारे का आयोजन भी करते हैं । इससे संबंधित जानकारी तीसरी ताली और यमदीप उपन्यास में भी मिलती है।

          उत्तर भारत में हिंदू सस्कृति को ठेस पहुँचाने का लगातार प्रयास मुगल शासकों ने किया था । आक्रमण के दौरान सर्वप्रथम हिंदू स्थापत्य कलाओं और मंदिरों को ध्वस्त करके लोगों की आस्था पर प्रहार किया । गुजरात में सोमनाथ मंदिर को लूटने और तोड़ने के साथ-साथ किन्नरों की कुल देवी बहुचर माता को भी विध्वंस किरने की घटना तारा गुरु बताती है कि तो सुनिए, अलाउद्दीन खिलजी की सेना जब माँ बहुचर देवी के मंदिर को विध्वंस करने पहुंची, तब उसके तमाम सैनिकों ने मंदिर की मुर्गियाँ खा ली ।12 इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश शासक किन्नर समुदाय के लोगों को अपराधी घोषित करके भारतीय लोगों में उनके प्रति नफरत और भेदभाव के भाव जगाने में सफल हुए ।  और मुगल साम्राज्य में औरंगजेब जैसे शासकों ने स्वार्थ-सिद्धि हेतु किन्नरों के लिए रोजी-रोटी का प्रबंध तो किया था, लेकिन उनके ईश्वरीय विश्वास और आस्था के मंदिर को विध्वंस करते हुए निराश और भयभीत करते हुए उनकी लैंगिकता को नकारा है ।

          नाज मुगल काल में निजी स्वार्थ के लिए बच्चों को हिजड़ा बनाने की प्रक्रिया का जिक्र इस प्रकार करती है कि  सुना है कि निजामशाही में तो दस-बारह साल से कम उम्र वाले लड़कों के माता पिता को इस बात का डर रहता कि पता नहीं कब निजाम के लोग आकर उनके बच्चों को भगा कर ले जाए । अधिकतर को तो उनकी मर्जी के विरुद्ध सौदा करना पड़ता था । दस-बारह साल के लड़कों को उठाना, उनका खस्सीकरण करना । अच्छी तरह से खिला-पिलाकर उन्हें तंदुरुस्त रखना । खोजा बनाना और रानी के महल में पहरेदार के रुप में बेझिझक तैनात करना । खस्सीकरण के बाद बनाया गया खोजा था तो आखिर हिजड़ा ना ! माँ, इन राजाओं ने निजी स्वार्थ के लिए कितना पाप किया था !”13 आलोच्य उपन्यास में लेखिका ने बताया है कि रानियाँ हरम में सुरक्षा के लिए बच्चों के लिंग काटकर सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करने की घटना काफी प्रचलित भी है । ऐतिहासिक काल पर आधारित जोधा-अकबर धारावाहिक और फिल्म में भी हिजड़ों को सुरक्षाकर्मी के रूप में दिखाया गया है ।

निष्कर्ष             

          निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो हिंदी साहित्येतिहास या उपन्यास विधा में 20 वीं सदी तक किन्नर समुदाय को आधार बनाकर या किसी उपन्यास में सशक्त किन्नर के रूप में पात्र नहीं देखने को मिलता है । कुछ उपन्यासों में समलैंगिकता के आधार पर उपन्यास जरूर लिखा गया है । LGBT के समूह के हिसाब से कुछ शुरुआत 20 वीं सदी के अन्तिम दशकों से देखी जा सकती है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य और समाज किन्नरों के प्रति बहुत पहले ही संवेदनशील था । किन्नर विमर्श वर्तमान समय में भी शैशवावस्था के दौर में है । अभी तक उपन्यास साहित्य इतिहास में मुश्किल से दो दर्जन उपन्यास लिखे गये हैं  । शोध की दृष्टि से अगर तटस्थता के साथ बात की जाए तो कई उपन्यासों की कथाएँ एक समान देखने को मिलती हैं ।

          उपन्यासों में राजनैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में बात न के बराबर हुई है । लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है, किन्नर जीवन पर आधारित लेखन का श्री गणेश करके इतिहास बदलने में 21वीं सदी के उपन्यासकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । उपन्यास ही वह विधा है जो जीवन के तमाम पहलुओं को बताने में सक्षम हो सकती है। उपन्यासकारों ने अवश्य ही किन्नर समुदाय से जुड़े शिक्षा, रोजगार, घर वापसी, संतान को सम्मान, मानवाधिकार के साथ स्वस्थ जीवन जीने और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने जैसे मुद्दों पर लेखन करके सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने का प्रयास किया है । उनमें यमदीप, किन्नर कथा, गुलाममंडी, मैं भी औरत हूँ, दरमियाना, जिंदगी 50-50, पोस्ट बॉक्स 204- नाला सोपारा, मेरे हिस्से की धूप, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मेरे होने में क्या बुराई, वह, आधा आदमी, हॉफ मैन, शिखंडी, शिखंडी स्त्री देह से परे, मुनिया मौसी, अस्तित्व इत्यादि उपन्यास लिखे गये जिन्होंने साहित्येतिहास में किन्नर-विमर्श चेतना को बल देने का कार्य किया । किन्नर समुदाय पर आधारित आधुनिक हिंदी उपन्यासों के माध्यम में कुछ किन्नरों से संबंधित विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख हुआ है । अधिकांश लेखकों ने ऐतिहासिक कथाओं के माध्यम से किन्नरों की वर्तमान परिस्थिति का सही अंकन करने लिए सफलतापूर्वक प्रयास किया है ।

संदर्भ सूची-

1.https://indianexpress.com/article/world/indigenous-tribes-embraced-gender-fluity-prior-to-colonisation-but-europeans-enforced-specific-gender-roles/

 2. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-48442934

 3.लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-164

4.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189

5. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-165

7. वही,पृष्ठ संख्या-164

8. वही, पृष्ठ संख्या-165

9.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189

10.पारू मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास),अनु.सुनीता परांजपे, राजकमल प्रकाशनदरियागंजनई दिल्लीप्रथम संस्करण 2012,पृष्ठ संख्या-152

11. महेन्द्र भीष्म,किन्नर कथा, सामयिक बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली,  प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-92

12.वही, पृष्ठ संख्या-93

 13. पारु मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास), अनुवाद- सुनीता परांजपेराजकमल प्रकाशनदरियागंजनई दिल्लीप्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या-86

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