मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

समय और थोड़ा अर्थतंत्र मजबूत हो तो यात्राएं कर लेनी चाहिए - डॉ मिलन बिश्नोई

 भारत में सीनियर सिटीजन के पास यदि समय और थोड़ा बहुत अर्थतंत्र मजबूत है तो उन्हें यात्राएं जरूर करनी चाहिए। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि युवाओं को यात्रा नहीं करनी...

 किंतु भारत के अधिकांश मध्यमवर्गीय वरिष्ठ धन जोड़ने और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए सातों जनम की सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराने में इतना व्यस्त हो गए थे... उन्होंने कभी स्वयं की इच्छाओं, ख्वाहिशों, सपनों और मनोरंजन के बारे में सोचा ही नहीं।

आज उन्होंने धन तो बेशक इकट्ठा कर लिया किंतु उनके पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे अपना स्वतंत्र जीवनयापन करें और अपनी संतान या संगी-साथियों को स्वतंत्र जीवनयापन करने दें। 

मुझे लगता है यात्राएं करने इंसान अलग-अलग संस्कृतियों में भी ढलना सीखता है वरना वह ले-देकर अपनी जाति,अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने धर्म वाले को ही ढूंढते है।

देखने में यह भी आता है कि अधिकांश शिक्षण संस्थानों और व्यवसायिक क्षेत्रों में भी सीनियर सहकर्मी कहीं न कहीं अपने साथियों का जाने-अनजाने में मानसिक शोषण करते हैं।

जब उनके साथ भिन्न संस्कृति का सहकर्मी आता है तो सबसे पहले उसके खान-पान के बारे में पूछा जाता है, फिर सरनेम, फिर धर्म रीति-रिवाज... ऐसे करते करते यदि उनके विचार उनसे भिन्न मिलते हैं तो कई प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं...कई बार उनके बारे में भला-बुरा कहा जाता है। क्योंकि जो लोग अपना शहर छोड़कर भी कभी बाहर गए नहीं तो वे अपने जैसे विचारों की ही अपेक्षा रखेंगे। उन्हें लगता सामने वाला भी हमारे जैसे क्यों नहीं है। उन्हें धीरे-धीरे लगता है कि यंगस्टर्स हमारी इज्जत नहीं करते... हमारे विचारों से सहमत नहीं हैं किंतु विचारों में मतभेद हो सकता है। लेकिन इज्ज़त और मान-सम्मान तो एक-दूसरे के व्यवहार पर निर्भर करता है। 

किंतु आज के युवा धन जोड़ने से अधिक वे अनेकानेक रास्तों, पगडंडियों, पहाड़ों, झरनों, नदी-नालों से लेकर समुद्र की गहराई और आसमान की ऊंचाई तक नापना पसंद करता है। 

आज की युवा पीढ़ी और वरिष्ठ पीढ़ी के सोच-विचार में बहुत अधिक भिन्नता दिखाई देती है। किंतु मैं फिर से कहूंगी कि बुढ़ापे में ही सही उन्हें आस-पास कई यात्राएं कर लेनी चाहिए।

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