सोमवार, 30 जनवरी 2023

हिंदी उपन्यासों में किन्नरों की पारिवारिक उपेक्षा व रिश्तों की तड़प

                            



यह सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति में परिवार और रिश्तों का आपसी संबध अन्योन्याश्रित हैं । सनातन संस्कृति में पारिवारिक संस्कार इतने सदृढ़ और सहिष्णुत्ववादी है कि सुख-दुःख में परिवार के लोग ही एक-दूसरे के सहारा बनते हैं । इसके लिए देश और समाज को सदैव गौरवान्वित महसूस करवाया गया । भारतीय सांस्कृतिक  की विविधता में एकता से कौन अपरिचित है! भारतीय संस्कृति में अलग-अलग रीति-रिवाज और रिश्तों के परिवेश में शिक्षा तथा संस्कार को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों की पहचान का पाठ सातों पीढ़ियों तक पढ़ाया जाता है । यहाँ का परिवार एक विशाल वटवृक्ष की भाँति माना गया, जो परिवार के मुखिया तथा छोटे-बड़े सदस्यों से मिल-जुलकर बना होता है, जिसमें गुरु- शिष्य, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन, माता-पिता, पति-पत्नी, बहू-बेटा, पुत्र-पुत्री, पोता-पोती, बुआ-भतीज इत्यादि सम्मानीय रिश्ते हैं । यह रिश्ते अतिसंवेदनशील और एक-दूसरों के प्रति भावनात्मक गहरायों से बंधे हुए है , सुख-दुःख में एक दूसरे के लिए प्राण न्यौछावर कर देने वाले अनेक उदाहरण मिलते हैं । परिवार का कर्ता-धर्ता हमेशा मुख्य सदस्य होता है, इसलिए घर-परिवार और संतान के लालन-पालन, शादी, शिक्षा, विवाह जैसे निर्णय अक्सर लेने की जिम्मेदारी पिता ही लेते हैं ।

     वैसे शास्त्र और पौराणिक कथाओं और कहानियों में घर की लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती के रूप नारी को माना गया है । लेकिन वास्तविकता यह भी है कि 21 वीं सदी में बलात्कार, भ्रूण हत्याएँ, दहेज प्रताड़ना, पारिवारिक क्लेश में बहू को केरोसिन डालकर जलाने जैसी घरेलू हिंसा की घटनाओं से मुंह मोड़ भी नहीं सकते । उत्तर भारत के कुछ राज्यों में बहू बनाकर हर कोई ले आना चाहते हैं, लेकिन अपने घर में बेटी पैदा करके विदाई करने का सपना शायद ही कोई परिवार देख रहा होगा?  राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में भ्रूण हत्याएं अत्यधिक हो रही है, तथा वर्तमान समय में भी जोड़े निर्धारित करने का निर्णय खांप पंचायत ही तय करती है । बेटों के इंतजार में पांच-पांच बेटियां पैदा करने के पीछे का कारण पुत्र मोह ही है । भले ही दक्षिण भारत में दो बेटियों के जन्म के पश्चात परिवार नियोजन का रास्ता अपना लेते हैं, लेकिन दहेज प्रथा का प्रचलन उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में अधिक है । यहाँ बेटियों के पैदा होते ही पिता बेटी को दहेज देने के लिए हर समय सम्पत्ति जोड़ने में रहता हैं । सुशिक्षित करके उसे आत्मनिर्भर बनाने के बावजूद भी ससुराल पक्ष को मुँह माँगी रकम देनी पड़ती है। इसलिए भारतवर्ष में पितृसत्तात्मक सत्ता का दबदबा आज भी उतना ही शक्तिशाली है, केवल उसके कुछ मायनों में बदलाव अवश्य आया होगा । आज भी कई गरीब परिवारों की बेटियों की खरीददारी की जाती है, हजारों महिलाओं को घर में जलाया जाता है, शिक्षित महिलाओं को नौकरी छुड़वाकर भी घर में बिठाया जाता है । उनके आत्मसम्मान, इच्छाओं और आंकाक्षाओं को कभी किसी ने जानने की कोशिश नहीं की है । आधुनिकता के दौर में शिक्षा, संस्कृति और समाज में अवश्य ही बदलाव देखने को मिलते हैं । लेकिन इस बात को भी नकार नहीं सकते है कि किसी भी प्रांत में महिला की कोख, देह और उसकी आमदनी पर पुरुष हक जताए बिना उसे स्वीकर कर रहा हो ? भारत में पिता की सम्पति पर सौ प्रतिशत हक बेटों का ही रहता है, संविधान में भले ही बेटे-बेटियों को समान अधिकार की वरियता दी गई है, परंतु वास्तविकता यह है कि पिता के देहान्त के पश्चात चौथे-पांचवे दिन में परिजन उनकी बेटियों को अपने भाईयों के नाम सम्पति कर देने की सलाह देते हैं । खैर महिलाओं की कोई अपनी सम्पति होती ही कहाँ है? क्योंकि उन्हें जन्मजात पराया धन समझकर परायेपन का अहसास करवा दिया जाता है । महिलाएँ भी अपने आप को उसी ढ़ाँचे में धकेल देती है, वह स्वयं को इस अनुरूप में नहीं देखती तो आर्थिक और मानसिक रूप से सुदृढ़  अवश्य होती । वह अपनी देह, कोख को किसी की सम्पति नहीं बनने देती तो शायद अपनी संतान और अपने अधिकार का महत्त्व समझते हुए आगे बढ़ती । महिलाओं को जीविकोपार्जन के लिए पिता, पति, पुत्र के अधीन रहना पड़ता है । यह भी सत्य है कि एक महिला ही महिला को अधिकार दिलाने के पक्षधर नहीं है । जब पिता अपनी बेटी की परवरिश पर विशेष ध्यान देने लगे तब भी माँ अपने बेटे के लिए सोचेगी । जब बात शिक्षा और खर्च की आए तो माँ बेटी को सरकारी स्कूल तथा कला के क्षेत्र में भेजने के लिए सोचेगी और बेटे को विज्ञान तथा तकनीकि क्षेत्र में शिक्षा दिलाने का प्रयास करेगी । ससुराल में बहू को सास हमेशा दबाकर रखना चाहेगी, क्योंकि उसे अपने जमाने में खान-पान-रहन-सहन में स्वतंत्रता नहीं मिली तो वह बहू के ऊपर भी वैसी ही नियमावली थोंपने का प्रयास करेगी ।

वर्तमान समाज में सक्षम और आत्मनिर्भर माताएं अपने अलैंगिक संतान को स्वीकार कर रही हैं । वहीं गृहस्थ और अशिक्षित माताओं के पास अलैंगिक संतान को अपनाने का माध्यम नहीं है, वरना तृतीयलिंगी बच्चे अपनी माँ की ममता का आंचल छोड़कर सुदूर गंदी बस्तियों में अपना डेरा लगाएं रहने वाले गुरुओं के साथ जाने के लिए क्यों मजबूर होते? वे देह व्यापार की ओर कभी नहीं बढ़ते, अपनी स्कूल की शिक्षा व घर छोड़कर ऐसे ही नहीं भागते । यजमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किन्नर सस्ते वाला मेकअप करके, मुंह पर उस्तरा घिसकर,बिन बुलाये अनजान घर का मेहमान  बनना नहीं चाहते हैं ।

      अलैंगिक बच्चों को माता-पिता का दर्द देर-सबेर समझ आ ही जाता है । वे जानते है कि परिवार तथा रिश्तों की श्रृंखला में सामाजिक दृष्टिकोण से उनका कोई महत्त्व नहीं है । उपन्यास साहित्य में अधिकांश पात्रों को मजबूरी में अपना परिवार छोड़कर जीवनभर समाज के कटाक्ष भरे व्यंग्य, मानसिक पीड़ा, आर्थिक कष्ट और शोषण का शिकार होना ही किन्नरों की नीति बन गई है । परिवार में उनका रहना किसी के लिए मायने नहीं रखता है । अपनी संतान की अलैंगिकता सर्वप्रथम पिता के पुरुषत्व को ठेस पहुंचाती है । अधिकतर किन्नर पात्रों को घर में सबसे पहले पिता के द्वारा प्रताड़ित किया जाता है । लैंगिक विकृति वाली संतान के प्रति दादी का बड़ा क्रुर व्यवहार देखने को मिलता है, वह अपनी बहू को प्रसव के दौरान बच्चे के मौत की कहानी बनाकर माँ की कोख से बच्चे को अलग करके अपने पुत्र के साथ मिलकर किन्नरों के हाथ अपने पोते-पोती को सौंपने का काम करती है । कुछ परिवार में अगर पिता उसे स्वीकार भी कर ले तो वे उसकी परवरिश बेटे की तरह करना चाहते हैं । इस तरह की मानसिकता के पीछे दो कारण उभरकर आए हैं - एक तो पिता को भी पितृसत्तात्मक परिवेश मिला, दूसरा कारण यह है कि यदि समाज में किन्नर बच्चे की लैंगिकता को बेटी के रूप स्वीकार किया जाए तो शादी-ब्याह करवाना तथा  उसकी शारीरिक संरचना को छुपाना ना मुमकिन है ।

       यमदीप उपन्यास की पात्र नाज के पिता पद से मेजर है, माता-पिता बेटी की लैंगिकता को लेकर चिंतित भी है, किंतु माता-पिता ने नंदरानी पर कभी हाथ नहीं उठाया और न ही उसे घर से तिरस्कृत किया । वहीं मेजर साहब के बेटे यानि नंदरानी का भाई उसके साथ हमेशा बुरा बर्ताव करता रहा । कई बार कह चुका था कि इस हिजड़ा की वजह से घर में किसी की शादी नहीं होगी । अंत में नंदरानी घर छोड़कर महताब गुरु के आश्रम में आ जाती है । और कभी-कभी माँ-पापा से फोन पर चोरी छुपे बात कर लेती है । एक-दो बार पापा- मम्मी मिलने भी आए थे, लेकिन मेजर साहब अपनी नंदरानी को घर ले जाने की पहल नहीं कर पाए । वे अपने बेटे और समाज से भयभीत अवश्य थे, वे बस्ती में महताब गुरु से निवेदन करते हैं, कि साफ-सुधरी जगह में कमरा दिलवा दें ताकि वे लोग कभी-कभी मिलने आया करेंगे । महताब गुरु का मानना था कि हिजड़ों को कौन कमरा किराये देता है? और अकेले रहना नाजबीबी के लिए सुरक्षित भी नहीं है, परिवार में भले कोई इन्हें साथ रखना नहीं चाहते लेकिन कुछ मर्द अपनी हवस मिटाने के लिए अकेले किन्नर को देखते ही वे अपनी संपत्ति समझकर जबरदस्ती से यौन शोषण करने में देर नहीं लगाते हैं । खैर जब से नंदरानी ने घर छोड़ा तब से हिजड़ा समुदाय ही उसका परिवार बन गया । जन्मजात रिश्तों को भुलाना भी कहाँ आसान था, जिस घर में जन्म लिया उस परिवार की मर्यादा के लिए सब कुछ छोड़कर चली आई किन्नरों की दुनिया में, लेकिन उसके लिए माता-पिता के बिना सुख और चैन से रहना असंभव था ।

     नंदरानी उर्फ नाजबीबी को एक दिन माँ-पापा की याद वापस उस घर में जाने को मजबूर करती है । वहाँ जाने पर उसे भाभी के द्वारा तिरस्कृत व्यंग्य से पता चला उसकी माँ इस दुनिया में नहीं रही । नाज वहाँ से पागलों की तरह भागते हुए श्मशान में चली जाती है और जलती चिता में से माँ का एक दांत उठा लाती है । नाज के पिता उसे तब सीने से लगाते हुए उसकी माँ के चले जाने का अफसोस प्रकट करते हैं, तब उनका बेटा बड़ी बेरूखी से लोगों के सामने नाज को धिक्कारता है किअब तो तुम जितना भद्दा कर सकती थी हम लोगों का कर ही लिया । कृपा करके चली जाओ यहाँ से ।”1 इस बीच में पापा नंदन को रोकते हुए कहते अब कहाँ जाएगी? नंदन अचानक गुस्से में आकर अपने पिता का सम्मान करना भी भूल जाता है कि नंदन ने उनकी बांह पकड़ लगभग घसीटते हुए उत्तर दिया । जहां से आई है, वहीं जाएगी, और कहाँ ?’ ‘पर नदंन, उसे यहाँ से तो लेता चल ! तेरी छोटी बहन है । इतना कठोर कैसे बन रहा है ? भगवान ने उसके अत्याचार किया है, तू तो न कर ।”2 आलोच्य उपन्यास में पिता अपनी अलैंगिक संतान को स्वीकारने और उसे साथ ले चलने की बात जीवन के अंतिम पड़ाव में करते हैं । किन्तु तब भी पितृमोह से मुक्त होकर अपना नहीं सके। उनके बेटे ने अपने अंहकार तथा समाज की झूठी मर्यादा का चोला ओढ़े हुए वह पिता का अपमान करने में भी नहीं हिचकिचाता है, वहीं रिश्तों की अहमियत की कद्र करते हुए नाज अपने भाई से निवेदन करती है, कि वह पापा का अपमान न करें वह स्वयं यहाँ से चली जाएगी।

       नाज बीबी की तरह किन्नर समुदाय के अनेकानेक बच्चे होंगे जिन्हें माँ-बाप का प्यार तो मिलता है, लेकिन वे अपने बेटों और समाज के डर से साथ रखने में हिचकिचाते हैं । माँ-बाप के जीते जी वे भी चोरी-छिपे मिलने की कोशिश करते रहते हैं । वे लोग परिवार की जिम्मेदारियां चाहते हुए भी नहीं उठा सकते, फिर भी वे अपनी कमाई के कुछ पैसों से माँ-बाप के लिए उपहार खरीदकर देना चाहते हैं, लेकिन यह सब उनके सपने ही रह जाते हैं ।

          विभिन्न उपन्यासों के पात्रों में विनोद उर्फ विनीता, नंदरानी उर्फ नाजबीबी, सोना, संध्या, तारा, हर्षा, सिमरन, जुगनी उर्फ पायल,मोना, प्रीत, विनोद उर्फ बिन्नी, रमीला, संजय उर्फ संध्या, तारा, दयारानी, दीपक उर्फ दीपिका माई, नरेन्द्र उर्फ नाज आदि पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होते आए हैं । माता-पिता इन बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की कोशिश करते हैं, किंतु अपनी संतान की अलैंगिकता का डर हमेशा मन-मस्तिष्क में बना रहता है, वे इन बच्चों को घर से सिखाकर भेजते हैं कि उन्हें किस तरह स्कूल में चलना,फिरना,उठना-बैठना और रहना है । खैर एक दिन तो उनकी असलियत सबके सामने आ ही जाती है और वहां से उनका शोषण होना शुरू हो जाता है । स्कूल में शिक्षक भी उनके साथ दोगला व्यवहार करते हैं, ऐसे बच्चों को अपराध बोध में डाल दिया जाता है,वे धीरे-धीरे स्कूल तक जाना छोड़ देते हैं और घरवाले भी उन बच्चों को प्रताड़ित करते हैं । जबकि माता-पिता अपने बच्चों के हक की लड़ाई में आवाज नहीं उठाते हैं ।

      भारतीय माँ की ममता, प्यार, स्नेह, त्याग और समर्पण ही उसे एक अलग पहचान दिलाती है। लेकिन वह पुरुषसत्ता के आगे मजबूर है इसलिए अपने बच्चों के हित में कदम नहीं उठा पाती । कथाकार चित्रा मुद्गल अपने उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं. 203 – नाला सोपारा में किन्नर संतान के प्रति एक माँ की अभिव्यक्ति को बताने की कोशिश इस प्रकार करती हैं कि सच तो यह है दीकरा,बच्चों जैसा निष्कलुष मन कहाँ होता है माँ नाम की स्री के पास? दुनियादारी में बंटी हुई स्त्री ! टुकड़ा-टुकड़ा ।”3 विवेच्यानुसार लेखिका ने यहाँ एक साधारण औरत की स्थिति को बताया लेकिन समय बदल रहा है, माताओं को भी अपने अधिकारों की अहमियत समझने की आवश्यकता है । ऐसा भी नहीं हो कि अपने गर्भ में नौ महीना तक अपनी संतान के साथ मन-मस्तिष्क से जुड़कर हजारों सपने देखे हो और  बच्चे की अलैंगिकता के कारण समाज तथा परिवार के दबाव में आकर अपनी संतान  को स्वयं से दूर करके जीवन भर घुट-घुटकर रोते रहें । बिन्नी से माँ-बाप का बहुत लगाव था और वह पढ़ने-लिखने में अव्वल छात्र था, कई बार किन्नर उनके घर आकर उसके माता-पिता पर बिन्नी को सौंपने के लिए भी दबाव डालते रहे । वहीं बिन्नी का भाई अपनी माँ को कई बार कह चुका था कि कितने दिन छुपाकर रखेंगे । वह भी बिन्नी को लेकर काफी नाखुश था, तथा अंत में पिताजी चंपाबाई के हवाले बिन्नी को कर के समाज में दुर्घटना की अफवाह फैला देते हैं । माँ अपने बेटे को याद करते हुए आम औरत की तरह ही छुप-छुपकर पत्राचार के माध्यम से बात करती है, बिन्नी अपने माता-पिता और भाईयों के प्रति चिंता व्यक्त करते दिखाई देता है,उसे किन्नर समाज में रहना अच्छा भी नहीं लगता वह इस जिंदगी को नरक के समान समझता है । रिश्तों की तड़प उसे हर क्षण होती है उसे तीज-त्यौहार, अपने बचपन की दोस्त और माँ के हाथ का खाना, पिता के स्वास्थ्य की चिंता और उन्हें दवाईयां देने की याद हर समय विचलित करती है, लेकिन वह चाहकर भी उस दुनिया में लौट नहीं पाता क्योंकि वह समाज और परिवार का दिया हुआ दंड भोग रहा है ।

         समाज में कुछ लोग रूढ़िवादी परिपाटी पर चलते हैं, लेकिन अपनी संतान की हिफाजत के लिए कुछ माताएँ दुनिया की मान-मर्यादा की परवाह किए बिना अलिंगीय बच्चों के साथ खड़ी होती है । जैसा कि पारस ने बताया है कि  सजल, जिंदगी जांघों के बीच से शुरू तो होती है,परंतु वहीं खत्म नहीं होती । इसमें बहुत कुछ करने के लिए होता है । हमारा अर्जुन लोगों की धारणाएँ तोड़ेगा ; और ये तभी संभव है कि वह भीतर से बहुत परिपक्व और जीवटता वाला बने !”4 भुवनेश्वर उपाध्याय ने हॉफ मैन उपन्यास में माता-पिता का वह किरदार दिखाया जो समाज और रिश्तेदारों की परवाह न करते हुए भी अपने संतान के उज्जवल भविष्य के लिए कदम उठाया । सजल और पारस को डॉक्टर ने बच्चे के जन्म से पहले ही जानकारी दे दी थी, कि बच्चा अलैंगिकता के साथ पैदा होगा लेकिन उन्होंने तय किया था, बच्चा जैसा भी होगा वे उसकी अच्छी परवरिश करेंगे । इस उपन्यास में माता-पिता अपनी संतान की जिम्मेदारी उठाने के लिए सामाजिक चुनौतियों को स्वीकार कर रहे हैं ।

वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे माता-पिता भी हैं, जो अपनी अलैंगिक संतान का तिरस्कार और शोषण करते हैं । इस संदर्भ में हर्षा का मत है किमैं जुट गयी पैसा कमाने में । मेरी तबीयत खराब रहती । मैं दवा खाती । फिर काम पर जाती । खाँस-खाँसकर बुरा हाल था । बाबूजी की खुशी का इंतजाम होता रहा । मैं अंदर से खोखली होती गयी पर जब भी कमजोर होता, बाबूजी के चेहरे पर मुस्कान की कल्पना मेरी आँखों में चमक ला देती । उनकी यह मुस्कान एक दवा की तरह थी जो खोखले होते शरीर में नया जोश पैदा कर देती । 5 हर्षा जैसे बच्चों का घर में कोई इज्जत या मान-सम्मान नहीं होता है, उसे परिस्थितियाँ उम्र से पहले समझदार बना देती है । हर्षा की लैंगिकता ने उसका बचपन, माँ-बाप का प्यार और भाई का साथ छुड़वाकर किन्नर समुदाय में अपने जैसे लोगों के साथ रहने को मजबूर कर दिया लेकिन हर्षा के मन में कभी पिता के प्रति विद्रोही भाव नहीं आये । उसके पिताजी  अपने दूसरे बेटे अनमोल पर बहुत गर्व करते थे, उसका खूब लाड़-प्यार करते थे, हर्षा को बात-बात पर डांटते-फटकारते थे, इतना ही नहीं उसकी जान तक लेने को तैयार हो गये थे । जब पिता को अपनी जमीन के लिए आठ लाख रुपयों की जरूरत थी, तब इंजीनियर बेटा पैसों का जुगाड़ नही करता है, हर्षा से बनी हर्षिता ने अपना देह व्यापार करके और बधाई में मिली नेग राशि से पिताजी को कर्ज मुक्त करवाया । यहाँ स्पष्ट है कि समाज की दकियानुसी सोच से परे जाकर यदि माता-पिता अलैंगिक बच्चों को अपनाने की कोशिश करेंगे तो ये बच्चे भी सामान्य बच्चों से बढ़कर पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने में सफल हो सकते हैं ।

     प्रदीप सौरभ ने 2011 में तीसरी ताली में गौतम साहब अपनी अलैंगिक संतान को किन्नरों के हाथ सौंपने के बजाय जद्दोजहद कर सामान्य बेटा ही बनाए रखना चाहते हैं । इस संदर्भ में लेखक ने बताया हैं कि वह अजीब मानसिकता से गुजर रहा था । कई-कई हफ्ते घर के अन्दर बन्द रहता । उसे लगता कि उसके पिता उसे जबरिया लड़का बनाने पर तुले हैं । वह अपनी बहनों की तरह ही अपने को लड़की मानता था । उसे लड़कों के कपड़े पहनने में परहेज होने लगा ।6 लेकिन अपने बेटे की असलियत को गौतम साहब घर की चारदीवारी तक सीमित रखकर समाज से छिपाने की कोशिश कर रहे थे । इस घुटन भरी चारदीवारी में विनीत की देह में विनीता को जीने नहीं दे रही है । विनीत को कोई समझने वाला नहीं था और गौतम साहब के सामने भी कोई दूसरा रास्ता नहीं था ।

अर्थात् यहाँ 2011 तक के उपन्यासों में किन्नर संतान को अपनाने की पहल हुई है, लेकिन माता-पिता समाज के हिजड़ा संतान वाले टेग से भय मुक्त नहीं हुए हैं । विनीत ने माता-पिता को समाज की निगाहों में गिरने से बचाने और स्वयं को स्वच्छंद करने वाले रास्ते का सफर तय किया, उसे भी ज्ञान नहीं था कि उसकी मंजिल कहाँ और कैसी होगी?  खून के रिश्तों का बंधन भी कुछ ऐसा होता है, जिसे कभी आसानी से मिटा नहीं सकते । ऐसा उदाहरण उपन्यास के अंत में मिलता है कि इसी बीच गौतम साहब ने एक पैकेट विनीता के आगे बढ़ाया । विनीता ने सोचा कि वे उसके खाने के लिए कुछ लाये हैं । उसने  पैकेट को खोलने की बजाय लगभग फाड़ डाला । उसमें एक बनारसी साड़ी थी, कुछ चूड़ियाँ, बिंदी के पैकेट और सस्ती किस्म की कुछ लिपिस्टिक व मेकअप का सामान । साड़ी देखकर विनीता भावुक हो गई । गौतम साहब विनीता को साड़ी भेंट करके प्रायश्चित करना चाहते थे कि तुम विनीत नहीं थे...तुम्हें विनीत बनाने की मेरी कोशिश झूठी थी। 7 अर्थात् भारतीय सांस्कृतिक जीवन में पिता की अहम भूमिका होती है । एक तरफ वे सामाजिक बंधनों और लोक-मर्यादा में बंधे रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनी संतान के लिए तिल-तिल होकर मरते हैं । गौतम साहब की तरह अनेक पिता समाज के आवरण में निष्ठुर पिता बन जाते हैं, परन्तु उनके लिए अपनी संतान को भूल जाना असंभव है । गौतम साहब की तरह तारा, सिमरन, प्रीत, विनोद जैसे किन्नर पात्रों के पिताओं की भी दुर्बल दशा रही है । दुर्भाग्य यही है कि अधिकांश लोगों ने रूढ़ग्रस्त समाज का चोला पहना है इसलिए वे समय रहते हुए अपनी अलैंगिक संतान की मासूमियत और दैहिक विसंगति को समझ नहीं पाते ।

समाज ने बदलाव के रास्ते पर चलना भी सीखा है, इसलिए कुछ परिवारों में किन्नर बच्चे को उपेक्षित और तिरस्कृत करने की बजाय उसकी अलैंगिकता को स्वीकार करते हुए हर परिस्थिति में माता-पिता साथ खड़े रहते हैं । ऐसे बदलाव के उदाहरण मैं भी औरत हूँ,अस्तित्व,जिंदगी 50-50, ऐ जिंदगी तुझे सलाम, मेरे होने में क्या बुराई,श्रापित किन्नर,हॉफ मैन,मैं क्यों नहीं उपन्यासों में तथा मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी,पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मनआत्मकथाओं में देख सकते हैं । यह बदलाव सिर्फ साहित्य की कथाओं में ही नहीं बल्कि वास्तविक समाज में भी होने लगा है । समाज के उपेक्षित व्यवहार के बावजूद भी अपनी संतान के प्रति ममत्व से समाज की रूढ़ियों का सामना करने की ताकत मिल रही है।

समाज में पारिवारिक और खून के रिश्तों से जब-जब तिरस्कार, उपेक्षा, पीड़ाएं  और कष्ट मिलें हैं, तभी किन्नर समुदाय के लोगों ने आपसी संवेदनशील रिश्तों की गहराई को समझकर एक-दूसरे के साथी बनें । उनके बनाए हुए आपसी रिश्ते इस समाज की मानसिकता से लड़ने की हिम्मत प्रदान करते हैं । वे आजीवन अपने माँ-बाप की सलामती और उनकी एक झलक मिल जाने के लिए तरसते रहते हैं । अपने ही समुदाय में आत्मीय रिश्तों के साथ जीवन जीने की कला सीखते हैं । जैसे विनोद उर्फ बिन्नी, हर्षा, विनीता, तारा, सोना, संध्या, नाजबीबी, सिमरन,रोशनी, नाज, अंगूरी,चमेली,दयारानी, तारा, महताब गुरु इत्यादि।

मैं पायल उपन्यास में जुगनू को परिवार में दादा, माँ, बहनों का खूब प्यार और स्नेह मिलता था । लेकिन उसके पिता में जो सामान्य ट्रक ड्राईवर में जितनी बुराई होनी थी, वे सब बुराईयां और नशेड़ी आदतें थी । जब भी बाहर से घर आते तब नशे में अपनी पत्नी और बच्चों की मार-पीटाई करते और जुगनू को देखते ही भड़क जाते थे । इस संदर्भ में  पायल बताती है कि पिताजी ने पास रखी बाल्टी में भरे पानी से मुझे नहला दिया, फिर वहीं रखी चमड़े की चप्पल को टब में भरे पानी में डुबा-डुबाकर मेरे नग्न शरीर की चमड़ी उधेड़ने में लगे रहे जब तक कि मैं बेहोश नहीं हो गई । पल भर के लिए होश आता देखती अम्मा मेरे ऊपर लेटी पिताजी की चप्पलों से पिट रही थी, फिर वह मुझे बचाते हुए स्वयं कितनी देर तक पीटती रही पता नहीं मैं तो कब की बेसुध हो चुकी थी ।8 तथ्यानुसार किन्नर बच्चे का पैदा होना और उसके शारीरिक बदलाव आना उसके हाथ में नहीं है, किन्तु समाज में पुरुषसत्ता इसका दोषी अपनी पत्नी और बच्चे को मानता है । पायल के पिता क्षत्रिय परिवार से है, किन्तु उनमें एक भी लक्षण क्षत्रिय के नहीं है, उन्हें अपने कर्म पर अफसोस नहीं है । वह बेटे के इंतजार में पांच-पांच बेटियों को पैदा कर चुका हैं- । उनमें जुगनू ना बेटा है,ना ही बेटी । परन्तु पिता की इच्छा है कि उसे बेटे के रूप में बड़ा किया जाए ताकि भविष्य में कोई शादी-ब्याह जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़े । लेकिन दैहिक विसंगति के कारण छुपते-छुपाते बहनों के साथ जुगनू लड़की की तरह बन जाती थी । इन सब हरकतों के कारण पिता ने उसे मार-पिटाई के अलावा फांसी तक दे दिया था । इस अत्याचार के कारण पायल घर छोड़कर एक दिन भाग जाती है । वास्तविक दुनिया में पिता से भी ज्यादा अत्याचारी और देह शोषण करने वाले मिले । जुगनू को माँ और बहनों का प्यार मिला वहीं पिता और भाई का अत्याचार । घर में हिजड़ा पैदा होने पर समाज उन्हें परिवार का कलंक मानते हैं, वहीं प्रमोद, दरोगा, पप्पू और रेल में मिले अकंल जैसे लोग हिजड़े की देह का भोग करना चाहते हैं।

इसी प्रकार किन्नर कथा उपन्यास में सोना की लैगिंकता का पता चलते ही महाराज जगतसिंह उसे मौत के घाट उतारने के लिए पंचमसिंह को सौप देते हैं, लेकिन पंचमसिंह सोना की हत्या न करते हुए किन्नर गुरु तारासिंह को सोना की परवरिश करने के लिए सौंप देता है । तारा सिंह उसका अच्छी परवरिश करते हुए नृत्यांगना बनाने के साथ-साथ उसका ऑपरेशन करवाकर उसे एक औरत बनाने की इच्छा रखती है। दुखद बात यह है कि परिवार के लोग अपनी अलैंगिक संतान को समाज में उनकी इज्जत पर सवाल उठने के भय से घर से निकाल देते हैं । लेकिन बच्चों को परिवार से निकालने या उपेक्षित करने के कारण उनकी मानसिकता पर क्या असर पड़ता है? कोई सोच ही नहीं सकता ? ऐसे बच्चे वैसे भी दैहिक विसंगति के कारण अपने मस्तिष्क और शरीर के साथ लड़ते-लड़ते थक चुके हैं,और ऊपर से घर और समाज का दबाव उन्हें कई बार मौत के मुंह में धकेल देता है ।

उपन्यासों में ऐसे भी पात्र हैं जिनके माता-पिता हर परिस्थिति में साथ खड़े रहे थे । वे पात्र केवल अपनी दैहिक विसंगति से लड़ रहे थे लेकिन उन्हें पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा मिलने के कारण वे पढ़-लिखकर सफल होने के साथ-साथ सुखद दाम्पत्य जीवन भी जी रहे हैं । भले समाज में शुरूआती दौर में माता-पिता को समाज की घिनौनी सोच का सामना करना पड़ा लेकिन माता-पिता की समझदारी से उठाए गये कदम के कारण प्रीत, सुर्या, रोशनी, हिना का सुखद जीवन देखकर  सुखानुभूति होती है । यह केवल उपन्यासों में काल्पनिक पात्र ही नहीं हैं, बल्कि समाज में भी कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं । अलैंगिक बच्चों के साथ माता-पिता का होना कितना मायने रखता है, यह उदाहरण मानोबी बंद्योपाध्याय, लक्ष्मीनरायण त्रिपाठी, जोइता मंडल, पद्मिनी प्रकाश के रूप में देख सकते हैं ।

संदर्भ ग्रंथ-1.नीरजा माधव,यमदीप,पृष्ठ संख्या- 113-114

 2. नीरजा माधव,यमदीप,पृष्ठ संख्या 114

3. चित्रामुद्गल,पोस्ट बॉक्स नं. 203- नाला सोपारा, पृष्ठ संख्या- 80

4. भुवनेश्वर उपाध्याय,हॉफ मैन,पृष्ठ संख्या- 23

5.भगवंत अनमोल, जिदंगी 50-50,पृष्ठ संख्या-201

6.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली,पृष्ठ संख्या-82

7.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली,पृष्ठ संख्या-120

8.  महेन्द्र भीष्म, मैं पायल,पृष्ठ संख्या-36

लेखक परिचय-

डॉ. मिलन बिश्नोई,

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,

खाजा बंदानवाज़ विश्वविद्यालय,कलबुर्गी,कर्नाटक

मोबाइल नं.-6380568643

ई-मेल.-milanbishnoi@gmail.com

 

 

 

 

 

 

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