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उपन्यासों में किन्नरों की आर्थिक स्थिति
आर्थिक
संदर्भ किसी भी समाज या समुदाय की आर्थिक सुदृढ़ता सुव्यवस्थित शिक्षा, तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के
समुचित उपयोग पर आधारित होती है। किंतु यदि हम किन्नर समुदाय की आर्थिक स्थिति पर
दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि उनके पास आजीविका के
सीमित साधन हैं—मुख्यतः बधाई मांगना और देह व्यापार।
संविधान
द्वारा वर्ष 2014 से किन्नरों को
पिता की संपत्ति में अधिकार प्रदान किया गया है, किन्तु
वास्तविकता यह है कि भारत में केवल लगभग 2% ट्रांसजेंडर ही
अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। अधिकांश परिवार अपने बच्चों की वास्तविक लैंगिक
पहचान को छिपाकर उन्हें साथ रखने की कोशिश करते हैं, परंतु
घर की चारदीवारी के भीतर भी इस पहचान को लंबे समय तक छिपाना संभव नहीं हो पाता।
परिणामस्वरूप, लगातार मानसिक दबाव और तनाव झेलते हुए अनेक
ट्रांसजेंडर बच्चे घर छोड़कर भाग जाते हैं।
घर
से बाहर निकलने के बाद कुछ बच्चों को अच्छे गुरु और सुरक्षित आश्रय मिल जाते हैं, लेकिन अधिकांश किन्नरों को अपने ही डेरों
में शोषण का सामना करना पड़ता है। संवैधानिक अधिकार प्राप्त किए हुए उन्हें लगभग दस
वर्ष हो गए है, फिर भी सामाजिक, पारिवारिक,
राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर कोई ठोस परिवर्तन नहीं दिखाई देता।
मानवाधिकार
आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब भी बड़े पैमाने पर
अपने मौलिक अधिकारों से समझौता करना पड़ता है। घर,
समुदाय और शैक्षणिक संस्थानों में उनके साथ भेदभाव किया जाता है।
न्यायिक प्रक्रिया में भी उन्हें निष्पक्षता नहीं मिलती, क्योंकि
पुलिस और प्रशासन से वे भयभीत रहते हैं—अक्सर स्वयं पुलिस ही उन्हें प्रताड़ित
करती है।
आज
भी किन्नर समुदाय रोटी, कपड़ा,
मकान और सम्मान जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। उनके लिए शिक्षा,
रोजगार और आवास सुनिश्चित करने हेतु कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई है।
भारत में विवाह, दांपत्य जीवन और परिवार स्थापित करने का भी
उन्हें कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। आवास के मामले में तो स्थिति और भी दयनीय
है—मकान या होटल किराये पर लेने के लिए उन्हें बार-बार अपमान और अस्वीकार का सामना
करना पड़ता है।
कई बार हिंदी और अंग्रेजी अखबारों
में समाचार पढ़ने को मिलते हैं, वे आज भी भारत में ‘परलिंगी’ समुदाय के लोग विशेष कानूनी मान्यता
प्राप्त ‘लिंगीय पहचान’के संदर्भ में
समस्याओं का सामना करते हैं । खासकर राशनकार्ड, पासपोर्ट, आधारकार्ड, बैकअंकाउट,
ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने तथा आम जनसुविधाओं
में जैसे टॉयलेट, बस, ट्रेन, स्कूल-कॉलेज, सैलून, होटल, दर्शनीय स्थल
इत्यादि छोटी-मोटी सुविधाओं से भी वंचित हो रहे हैं और बेझिझक होकर उन सब सुविधाओं
का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे । 13 अगस्त 2018 की टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के
अनुसार- “99% have suffered social
rejection on more than occasion,
including from their family.96% of transgender are denied jobs and forced to
take low paying or undignified work for livelihood like badhais sex work and begging.89% of transgender
said there are no jobs for even qualified ones.50% to 60% of transgenders have
never attended schools, and those who did faced discrimination.57% of
transgender are keep on getting sex-alignment surgery but don’t have money for
it. Only 2% of transgenders live with parents.53% live under guru-chela system,
where gurus provide shelter in lieu of cut in incomes.”[1](Study
on Human Rights of transgenders in India.) अर्थात् इन आंकड़ों से
किन्नरों की आर्थिक दशा और दिशा का अनुमान लगा सकते हैं कि वे किन-किन परिस्थियों
का सामना कर रहे हैं ।
यहाँ ट्रांसजेडरों को लाभकारी
रोजगार को सुनिश्चित करने के लिए कुछ जगहों पर प्रयास किए गए । जैसा कि 2017 में
केरल में कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड ने 23 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को रोजगार दिया
गया । जबकि वहाँ उनमें से आठ व्यक्तियों
ने एक महीने के अंतर्गत नौकरी छोड़ दी । क्योंकि कई मकान मालिकों ने उन्हें
रहने के लिए आवास उपलब्ध नहीं करवाये । जिन्होंने रहने के लिए जगह दी तो किराये की
मनमानी राशि तय की ।
शुलभ शौचालय की अनुपलब्धता की
समस्या का सामना किन्नर बड़े पैमाने में कर रहे हैं । इस प्रकार की असुविधा के
कारण वे महिला और पुरुष दोनों से भेदभाव और उपेक्षा के शिकार होते हैं । इनके लिए
सार्वजनिक बस स्टैण्ड, रेलवे, हवाई अड्डे तथा कम्पनियों में न्यूट्रल बाथरूम और टॉयलेट की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
हालांकि 2017 में केंद्र सरकार ने पुरुषों
और महिलाओं दोनों के लिए बने टॉयलेट का
इस्तेमाल करने की अनुमति देकर किन्नरों की
समस्या का निदान करने का प्रयास किया है । कुछ कॉपरेट कम्पनियों में IBM. Intel, Tata Steel, Infosys, Goldman Sachs, Cummins इत्यादि कंपनियों ने यूनिवर्सल-एक्सेस टॉयलेट की स्थापना की है ।
किन्नर समुदाय की आमदनी का मुख्य
स्त्रोत बधाई माँगना है । यदि देखा जाए बधाई से प्राप्त आमदनी से अधिक उनके दैनिकी
खर्चे हैं । 21 वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु उभर कर आए
हैं, इन तमाम मुद्दों पर समाज और सरकार को विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है
। जैसा कि – 1. सार्वजनिक यातायात में हास्यात्मक और भेदभाव का सामना करना पड़ता
है इसलिए कई बार निजी वाहन या किराये लेकर जाते हैं, तब इन्हें भारी राशि चुकानी
पड़ती है ।
2.
सरकारी
स्कूलों और कॉलेजों में भी इनके साथ सामान्य व्यवहार नहीं किया जाता इसलिए कुछ
किन्नर शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें बहुत अधिक फीस अदा करनी पड़ती है
।
3.
छोटी-मोटी
बिमारी होने पर भी सरकारी डॉक्टर इनका इलाज करना नहीं चाहते इसलिए प्राइवेट
अस्पतालों में इलाज करवाने के मनचाहे पैसे लूटते हैं ।
4.
सामान्य
रेस्टारेंट, मॉल और पब्लिक यातायात इत्यादि संस्थानों में सुविधा नहीं होने के
कारण किन्नरों को अपनी क्षमता से अधिक पैसे व्यय करने पड़ते हैं ।
5.
इस
प्रकार उपन्यासों में किन्नरों के रोजगार, शिक्षण संस्थान, शारीरिक परामर्श और
अस्पतालों की सुविधाओं की कमी देखने को मिल रही है । इन तमाम बिंदुओं का प्रभाव
किन्नरों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है
।
6.
उपन्यासों
के कथानायकों में नाजबीबी, हर्षा, विनीत ,छैलू, सिमरन, बिन्नी, पूनम, प्रीत, तारा
इत्यादि पात्र आर्थिक कमजोरी को महसूस कर रहे है
21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में किन्नरों की आर्थिक स्थिति और उनकी आमदनी
स्त्रोत देखा जाए तो नीरजा माधव ने 2002 में यमदीप उपन्यास लिखकर साहित्य को
किन्नर जीवन से जोड़ने का काम किया है । ‘यमदीप’ उपन्यास पात्र हिजड़ा परम्परा के अनुसार ‘बधाई’ से ही अपनी जीविकोपार्जन करते दिखाई देते हैं । दिनभर की कमाई का कुछ
हिस्सा अपने गुरु को भी देते हैं क्योंकि गुरु ने ही कमाई का जरिया सिखाया और
जजमानों के घर शिष्यों को सौंपे हैं । परंतु बधाई के पैसों से सारी जरूरतें पूरी
भी नहीं हो रही है इसलिए कुछ किन्नर चोरी-छुपे सेक्सवर्क करने लग जाते हैं ताकि
अपनी कमाई का गुरु को हिस्सा देने के बाद कुछ उनके पास बचें । नाजबीबी के द्वारा
सोना को डेरे में ले आने से खर्चा और बढ़ जाता है, इसलिए महताब गुरु उस दिन
नाजबीबी से अपना हिस्सा नहीं लेते हुए अन्य शिष्यों से लेती है तब चमेली इस तरह के
व्यवहार पर प्रश्न करती है, जब महताब गुरु ने उसे समझाया तो नाजबीबी से अपनी चिंता
व्यक्त करती है कि- “सोचते तो हम भी हैं, नाज । पर तन तो
भगवान ने आधा टुकड़ा बनाया कि किसी लायक नहीं रहे और पेट...?
पेट तो नहीं न बंद करके भेजा । वह तो खुला ही है । रोज भरो, रोज खाली । उसे भी
काटकर या सीकर भेजता तो कम से कम बस जीना ही तो रहता।”[2] आलोच्य उपन्यास में चमेली की चिंता से समस्त हिजड़ा समुदाय की वास्तविक स्थिति
समझ सकते हैं । समाज और परिवार तो इनसे भेदभाव करके हाशिये पर फेंक देंगे लेकिन
पेट की भूख शांत करने के लिए किसी तरह पैसा इन्हें कमाना ही पड़ेगा । दूसरे संदर्भ
में चमेली रोजी-रोटी के लिए चिंता व्यक्त कर रही है कि “अरे,
अब जजमान के यहाँ भी क्या आशा? सरकार ने उनका भी बधिया करवा
दिया है । दो से ज्यादा पैदा ही नहीं करते । ”[3] अर्थात् किन्नर समुदाय की आर्थिक स्थिति अधिक कमजोर होने के निम्न कारण
प्रमुख माने जा रहे हैं – 1. महानगरों में अपार्टमेंट्स सिस्टम को बढ़ावा 2.
गांवों से शहरों की ओर पलायन 3. परिवार नियोजन 4. आधुनिक लोगों का आशीर्वाद लेने
और नेग देने जैसी धारणाओं के प्रति मोह भंग होना इत्यादि लेकिन किन्नरों का
रोजी-रोटी के लिए ‘बधाई’ एकमात्र
माध्यम समझकर जनसंख्या बढ़ाने के प्रति लालच भी अज्ञानता और अशिक्षा है । इनको
रोजगार के लिए समाज और सरकार को उन्हें शिक्षा, वाणिज्य-व्यापार से जोड़ने की
आवश्यता है । खैर इस उपन्यास का लेखन काल
2002 के समय का था आज स्थितियाँ काफी बदल रही है । यह बदलाव आगे के उपन्यासों में
काफी सकारात्मक दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है।
‘मैं भी औरत हूँ’(2005)में अनुसूया त्यागी कृत
उपन्यास में सशक्त माता-पिता लैंगिक अस्पष्टता वाली संतान की सर्जरी करवाकर स्वस्थ
जीवन जीने की आजादी ही नहीं देते बल्कि रोशनी को सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक
दृष्टिकोण से भी सक्षम बनाने का सहयोग करते हैं । पढ़-लिखकर एक कम्पनी की सी.ई.ओ.
बनकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाती हैं । समय के बदलते दौर में काफी क्षेत्रों
में ट्रांसजेंडर को नौकरी देने की शुरुआत हो चुकी है । शिक्षा और रोजगार के
क्षेत्रों में अवसर मिलने के कारण उनकी जीवनशैली में अवश्य बदलाव देखने को मिल रहा
है । रोशनी के संदर्भ में कुछ निजी कम्पनियों के नाम उल्लेख किया जा रहा है जहाँ
पर ट्रांसजेंडर को काम करने का अवसर दिया जाने लगा । –“10 Companies that
Hired Transgenders in india-Accenture, Altran India Pvt
Ltd, Etasha, EY, Future Group, Future Group, Kochi Metro, Delhi Metro, SPI
Cinemas Pvt Ltd, Third Eye Café, Tweet Foundition etc.”[4] यानि बहुत ही बड़ा बदलाव उपन्यास में ही नहीं बल्कि सामाजिक क्षेत्र और
देश की संस्थाओं में भी आ रहा है ।
2011 में प्रदीप सौरभ ने ‘तीसरी ताली’ उपन्यास में
किन्नर, गे, लेस्बियन, लौंडेबाज, समलैंगिकता पर आधारित उपन्यास में पात्रों के
माध्यम से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का संघर्षपूर्ण जीवन का यथार्थ
अंकन किया है। लेखक खोजी पत्रकार होने के कारण किन्नर समाज के विभिन्न पहलुओं को
बहुत नजदीकी से पड़ताल करते हुए उनकी अच्छाई और बुराई के दोनों पक्षों का बखूबी से
चित्रण किया है। समाज में गरीब लोगों का शोषण किस तरह होता है और दो वक्त की रोटी
के लिए उन्हें क्या नहीं करना पड़ता? समाज के कई लोग ऐसे हैं
जिन्हें मजबूरन हिजड़ा बनना पड़ता हैं । लेखक इसका उदाहरण ‘तीसरी
ताली’ उपन्यास में पात्र के माध्यम से देते हैं कि “माना मैं मर्द हूँ, लेकिन समाज मुझसे मर्द का काम लेने के लिए राजी नहीं
है । मुझे इस समाज ने मादा की तरह भोग की चीज में तब्दील कर दिया है । मैं मर्द
रहूँ, औरत रहूँ या फिर हिजड़ा बन जाऊँ, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पेट की
आग तो बड़े-बड़ों को न जाने क्या-क्या बना देती है । ”[5] ज्योति एक दलित लड़का है उसके अंदर की नृत्यकला के कारण स्त्री-भाव जागृत
होने कारण बाबू साहब जैसे लोग उनका शोषण करते हैं और इस शोषण से परेशान होकर एक
दिन हिजड़ा बनने की ठान लेता है ।
‘तीसरी ताली’ उपन्यास में कमाई के अलग-अलग माध्यम है
। किसी के साथ जोर-जबरदस्ती किए बिना इज्जत के साथ ‘बधाई’
माँगकर जीविकोपार्जन करते हैं । लेकिन कुछ किन्नर ऐसे भी हैं यदि
उनकी इच्छानुसार जजमान उन्हें ‘नेग राशि’ नहीं दें तो वे नंगा नाच शुरू कर देते हैं और इस तरह की कमाई करने वालों
के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं रहती । कला मौसी जैसी कई बुजुर्ग किन्नरों की हालत
खराब देखने को मिलती है, क्योंकि उनकी मण्डली के अन्य हिजड़े दूसरी मंडली में
शामिल हो गये और मण्डली के आपसी विवादों और झगड़ो में उनकी कमाई के सारे पैसे चले
गये । लेकिन डिम्पल के पास खूब पैसे सोना-चांदी है क्योंकि वह खास अवसरों पर
जजमानों के सामने ताल ठोककर बधाई की ऊँची माँग रखती है, लोग उसकी
बेइज्जती से बचने के लिए उनकी माँग के अनुसार नेग दे भी देते हैं ।
उपन्यास में किन्नर समुदाय की संभावनाओं में ‘बधाई’ के अलावा भी
आमदनी के स्त्रोत दिखाई देते हैं । विनीत से विनीता बनकर ब्युटिशियन बनकर अपने
जीवन में आगे बढ़ती हैं, उन्हें भी आम अलैंगिक बच्चों की
भांति परिवार और समाज से तिरस्कार और शोषण का सामना करना पड़ता है, लेकिन विनीता अन्य ट्रांसजेंडरों की भांति देह-व्यापार, भीख माँगना, नेग
वसूली इत्यादि परम्परागत रास्तों से हटकर अपना संघर्ष जारी रखती है । एक दिन
ब्यूटिशियन बनकर गौतम साहब और किन्नर समुदाय का नाम रोशन करती है । वहीं दूसरी तरफ
इस उपन्यास का सकारात्मक पक्ष देखने को मिलता है कि डिम्पल
ना सिर्फ ‘बधाई की कमाई’ पर
आश्रित बल्कि वह पशु-पालन का भी काम करती है । अपने डेरे पर राजा जैसे गरीब को
रोजगार देती है अपनी मंडली में नाच-गान और ढ़ोलक बजाने वालों को काम भी देती हैं ।
महेन्द्र भीष्म कृत ‘किन्नर कथा’
उपन्यास में किन्नर गुरु तारा के डेरे की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी है । तारा के
पास दान में मिली और खरीदी हुई कृषि करने योग्य जमीन है । उनके पास साइकिल से लेकर
स्कुटर, बस वगैरह सब कुछ संसाधन है । तारा कृषि और पशुपालन के लिए कुछ लोगों को
काम भी दे रही है और उसके पास नाच-गान
करने वाली मंडली भी है इसलिए उनको शादी ब्याह में बुलाया जाता है ।
किन्नर समुदाय को मानसिक रूप से
मजबूत बनने के लिए भी उन्हें आर्थिक पक्ष को सुदृढ़ करना कहीं ना कहीं जरूरी है ।
हिंदी के किन्नर उपन्यासों में पात्रों की इच्छा भी यही दिखाई दे रही है । ‘बधाई’ उनका एकमात्र ‘इनकमसोर्स’ माना जाता है और उससे समस्त किन्नरों की
आवश्यकताएं पूरी नहीं हो रही हैं इसलिए कुछ किन्नर देह-व्यापार के धंधों में लिप्त
होने लगे । लेकिन महताब गुरु इस तरह के कामों में लिप्त होते देखकर चिंता प्रकट
करती है कि - “देखो, नाज, चोरी-छिपे यहाँ जो धंधा चल रहा है
उसका फल तो तुम देख रही ही हो । जुबैदा चल बसी और अब सोबराती की बारी है - अब चला
जाए कि तब । इसीलिए बस्ती में हम सबको मना करते रहे कि जिस करम को करने लायक अल्ला
ने ही हमें नहीं बनाया तो उसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती मत करो । लेकिन कौन सुनता है ? कभी रेलवे स्टेशन पर मोर्चा खाए पुराने डिब्बे में से पुलिसवाले के साथ
कोई निकलता है तो शराबियों-कबाबियों के साथ हमारा कोई बिरादर पकड़ता है । दस-बीस
रूपयों के लिए इतना गंदा काम करने की क्या जरूरत? अरे, थोड़ा
कम खाएंगे, कम सोना-चांदी पहनेंगे, लेकिन वेश्यागिरी तो नहीं करनी पड़ेगी ।”[6] महताब गुरु की चिंता जायज है, लेकिन किन्नर को अपने शौक पूरे करने के लिए
वे वेश्यागिरी को अपनाने से पीछे नहीं हटते हैं ।
21 वीं सदी के हिंदी में किन्नर
उपन्यासों के पात्र संघर्ष, मेहनत, ईमानदारी के साथ जीविकोपार्जन करने के माध्यम
ढूँढ़ रहे हैं । बहुत सारे किन्नर इन पात्रों की तरह ही बधाई और देह-व्यापार करके
पैसा कमाना नहीं चाहते । वे स्वयं को आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, और वे भी होटल,
ब्यूटीपार्लर, शारीरिक प्रशिक्षण, रेलवे, एयरलाइन, मेडिकल,चिकित्सा,यातायात,
टैक्सी ड्राइवर, व्यवसाय, सिलाई-कटाई, बागवानी, सुरक्षाकर्मी और शिक्षण-प्रशिक्षण
इत्यादि क्षेत्रों में नौकरी पाने को इच्छुक हैं । वास्तव में अगर उन्हें
पढ़ने-लिखने और काम करने का मौका दिया जाए तो आर्थिक पक्ष में मजबूती अवश्य देखने
को मिलेगी । इस समुदाय में आर्थिक पक्ष को दो भागों में बांटकर देखना भी जरूरी
लगता है । समुदाय में एक तरफ धनाढ्य और अमीर किन्नर गुरु या गद्दीपति हैं, दूसरी
तरफ वे जो सुबह-शाम की रोटी के लिए दर-दर भटकते हैं इसके बावजूद भी उन्हें जरूरत भर की कमाई का जरिया नहीं
मिलता ।
गुलाममंड़ी की पात्र
रानी किन्नर की दास्तान से समाज और प्रशासन का वास्तविक आइना देख सकते हैं कि “कोई काम भी नहीं देता था । लोगों के घर बर्तन माँजने गयी तो बोले-
‘हिजड़े से बर्तन मंजवाएंगे क्या?’ मैंने कह
दिया-‘...से बर्तन थोड़ी माँजते हैं । माँजते तो हाथ से ही
हैं न । इस पर धराती ने थाने पर रिपोर्ट कर दी कि हिजड़ा घर में औरतों को छेड़ रहा
है । अश्लील बातें कर रहा है । पुलिस मुझे पकड़कर ले गयी । मारा भी और रेप भी किया
। अब पूछो कानून के रखवालों से, भला हिजड़ों को पुरुष के थाने में क्यों भेजते हैं
? नहीं तो बनाएं तीसरा थाना । नहीं क्या?’...”[7] इससे से यह पता चलता है कि किन्नर के लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं है,
वे लोगों के सामने भीख के लिए हाथ ना फैलाकर मजदूरी के लिए काम माँगने पर कोई काम
देने को आगे नहीं आते । संवैधानिक स्तर पर सबको बराबरी वाला दर्जा तो मिल गया है,
आम इंसान की भांति आज भी इन्हें रोजी-रोटी कमाने के अवसर नहीं मिले रहे हैं ।
पुरुष तन में स्त्री संरचना में
ढले हुए अपने आप में असहज महसूस करने वाले मासूम बालक जब किशोरावस्था में कदम रखते
हैं, तब उनके ऊपर चारों तरफ से हमले होना शुरू हो जाते हैं । शारीरिक बदलाव और
हाव-भाव के कारण परिवार की प्रताड़ना से घर से विस्थापन, देह की लचक देख समाज का
बढ़ता शोषण, घर से भागे हुए किन्नरों का एकमात्र खुला द्वार किन्नर डेरा ही है,
उसमें गुरु की मनमानी तथा गुरु की नजरों में सम्मान पाने के लिए ज्यादा पैसा कमाने
की होड़ देह व्यापार से होकर गुजरती है और धीरे-धीरे इन्हें ना जाने कितनी
संक्रमित बिमारियों के गर्त में धकेल देती है । ‘मैं पायल’ उपन्यास की पात्र पायल को पिता की
प्रताड़ना घर छोड़ने को मजबूर कर देता है । वास्तव में घर से निकलती तो आत्महत्या
करने के लिए, पर वैसा संयोग से हो नहीं पाया । फिर वहाँ से वास्तविक दुनिया में
कदम रखती है तो उसे पहला कदम रखते ही उसके साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार करने की
कोशिश और हरकतें शुरू हो जाती है । घर में पिता की प्रताड़ना और बाहर निकलते ही
बूढ़े अंकल, पुलिसकर्मी, सहकर्मी और खासकर किन्नर गुरु स्वयं के द्वारा अपने गिरिया
कहें या पाले हुए गुंडे, प्रमोद इत्यादि लोगों से शोषित होती है । इन सबसे शारीरिक
प्रताड़ना मिलने के बावजूद वह संघर्ष करने से पीछे नहीं हटती है, अपनी अस्मिता और
अवसर की तलाश में रहती है । पायल ने कभी किन्नरों के पारम्परिक धंधे को तव्वजों
नहीं दी । वह चाय की होटल में, गेट कीपर, प्रोजेक्टर चलाने का काम करते हुए मेहनत
मजदूरी करके आगे बढ़ने विश्वास रखती है । आज समाज में पायल राजनेता के रूप में,
किन्नर गुरु, माँ, सोशल एक्टिविस्ट तथा सिनेमा जगत् में प्रसिद्धि हासिल करने के
साथ-साथ आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न और सुदृढ़ है ।
इसी तरह भीख माँगने, चौराहे पर
गाड़ियों के शीशे उतरवाने, बधाई माँगने, चोरी, लुट-पाट और देह-व्यापार न करके
उपन्यासों के कुछ पात्र माता-पिता की अच्छी परवरिश के कारण आर्थिक और मानसिक रूप
से सुदृढ़ होकर समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं । जैसे गिरिजा भारती
के उपन्यास में ‘प्रीत’ की अलैंगिकता को उसके माता-पिता ने स्वीकारते हुए उसे पढ़ाया-लिखाया और
आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया । वह एक कम्पनी में अच्छी नौकरी करते हुए अपने भाई
की पढ़ाई-लिखाई में आर्थिक सहयोग भी करती है । ‘जिंदगी 50-50’ में ‘हर्षा’ और ‘सूर्या’दोनों एक परिवार में पैदा हुए हैं, लेकिन
हर्षा को किन्नर जीवन का अभिशाप भोगना पड़ा । घर छोड़ने के पश्चात् रोजी-रोटी के
लिए भी कई बार देह बेचने के अलावा कोई उनके पास रास्ता नहीं बचता है । हर्षा की
जिंदगी में सारे उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं, जहाँ वह एक रूढ़िवादी परिवार का
किन्नर बच्चा जो उपेक्षित व तिरस्कृत होकर आर्थिक, शारीरिक, मानसिक कष्टों से हार
कर आत्म हत्या का रास्ता चुन लेता है । वहीं सूर्या को परिवार की स्वीकार्यता ने
उसे एक सफल इंसान बेटे के रूप में पहचान दिलाई है । वह परिवार के साथ और सहयोग से
पढ़-लिखकर कम्पनी में अच्छे पद पर काम कर रहा है । ‘अस्तित्व
की तलाश में सिमरन’ उपन्यास की पात्र ‘सिमरन’ को माता-पिता प्रताड़ित करते हैं और वह अलैंगिकता कलंक से मुक्त होने के
लिए लगातार छोटे-बड़े काम करके आर्थिक रूप से सक्षम होने का प्रयास करती है ।
आज सिमरन रेडियो जॉकी बनकर, एनजीओ
में काम करना तथा चित्रकारी करके अपनी आजीविका कमाती है । कोरोनाकाल में आम लोगों
को राशन देकर उनकी मदद भी कर रही थी । ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ के विनोद उर्फ
बिन्नी को उसका पिता किन्नर चंपाबाई के हवाले कर देता है । बिन्नी बचपन से पढ़ने
लिखने में होशियार था लेकिन माँ-बाप ने उसे नरक में धकेल दिया था । उसके बावजूद भी
अपनी पढ़ाई जारी रखता है, पूनम किन्नर उसकी पढ़ाई के लिए उसे विधायक जी से मिलवाती
है । बिन्नी को विधायक जी शरण भी देते हैं और कंप्यूटर का कोर्स करवाने के साथ नौकरी
भी देते हैं । बिन्नी और पूनम आत्मनिर्भर पात्र हैं, उन्होंने भीख माँगने की बजाय
मेहनत करके जीना सीखा । पूनम भी गाड़ियाँ साफ करने का काम कर रही है और बिन्नी ने
भी कुछ दिन गाड़ियाँ साफ करने का काम किया था परन्तु कुछ ही दिनों बाद विधायक जी
की ऑफिस में नौकरी करने लग जाता है ।
इस प्रकार सभी रचनाकारों ने किन्नर
जीवन के सामाजिक पक्ष से संबंधित सभी आयामों का सफलतापूर्ण चित्रण किया है । इससे
यह स्थापित है कि यदि समाज तृतीय प्रकृति के लोगों का सकारात्मक ढंग से सहयोग करे
तो किन्नर भी साधारण जन-जीवन में मिल-जुलकर रहना ही नहीं यद्यपि वे राष्ट्र की
उन्नति में भाग लेने हेतु शत-प्रतिशत तैयार है । इसी क्रम में रचनाकारों ने
किन्नरों की आर्थिक स्थिति से संबंधित दोनों पक्षों का यथार्थपरक चित्रण किया है,
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है ।
संदर्भ
सूची
1. Chauhan,
Neeraj. “99% Transgenders Have Faced Social Rejection: NHRC Study.” Times of
India, 13 Aug. 2018, timesofindia.com.
2.माधव, नीरजा. यमदीप. पृ. 27.
3.माधव, नीरजा. यमदीप. पृ. 27.
4. Zero Kaata – Indian Jewelry Blog. zerokaata.com.
5. सौरभ, प्रदीप. तीसरी ताली. पृ. 57.
6.माधव, नीरजा. यमदीप. पृ. 29.
7. अहमद, एम. फ़ीरोज़, संपादक. थर्ड जेंडर : कथा आलोचना. वाड्मय त्रैमासिक पत्रिका, पृ. 90.
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