बुधवार, 1 मई 2019

21 वीं सदी के हिंदी कथा साहित्य में किन्नर जीवन के अनछुए पहलु

मिलन बिश्नोई
प्रकाशित आलेख-  सं. पु. किन्नर विमर्श साहित्य और समाज
ISBN:978-93-86248-52-7, विद्या प्रकाशन,कानपुर, page no.96-113


अगर हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श की शुरुआत कथा साहित्य से मानी जाए तो यमदीप उपन्यास सन 2002 में नीरजा माधव के द्वारा लिखा गया। तब से साहित्यकारों का ध्यान किन्नर लेखन की तरफ गया | उसके बाद मनमीत पत्रिका में ‘किन्नर विशेषांक’निकला जो एक किन्नर जीवन के यथार्थ से जुड़ा हुआ है | जिसके सम्पादक कुमार अरविन्द वे एक पत्रकार हैं  इसके कारण उन्होंने बहुत सारे किन्नर लोगों के साक्षत्कार लिए जिसमें  किन्नरों ने अपनी पीड़ा और वेदना प्रकट किया, तो एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि किन्नर विमर्श की शुरुआत सन 2000 के बाद ही हुई हैं | वर्तमान समय में  साहित्य में कई विश्वविद्यालयों  में शोध कार्य भी हो रहा हैं | यमदीप उपन्यास के बाद में कथाकार महेंद्र भीष्म ने ‘किन्नर कथा’  सन  2010  उपन्यास लिखा और वर्तमान समय में काफी सारे उपन्यास ओर कहानियाँ लिखी जा रही है । हिंदी के प्रमुख किन्नर आधारित उपन्यास  यमदीप, किन्नर कथा, मैं पायल और गुलाममंडी,जिन्दगी 50-50, प्रदीप सौरभ का तीसरी ताली उपन्यास बहुत  ही चर्चित है और हिंदी कहानी संग्रह भी लिखे जा रहे है जैसे हम भी इंसान हैं,वांग्मय आदि इसी के साथ पत्रिका जनकृति में  किन्नर विशेषांक निकला गया | साहित्य की इन विभिन्न विधाओं में किन्नर समस्याओ की पड़ताल की गयी हैं | उपन्यास और कहानी  में पात्रों के माध्यम से किन्नर से जुड़ी संवेदनाओ को प्रकट किया गया | उनकी पारिवारिक उपेक्षा और रिश्तो की तड़प व संवेदनाओं की तलाश और आर्थिक संकट,सामाजिक तिरस्कार , शैक्षणिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए  किस तरह संघर्ष करते हैं |
 लिंगोपासक समाज ने किन्नरों को घोर अभिशप्त माना हैं ‘किन्नर’ समुदाय के अन्तरंग  जीवन की मार्मिक गाथा को यमदीप उपन्यास में यथार्थ देखने को मिलता हैं “ यह उपन्यास नीरजा माधव  को एक ओर तो स्त्री – लेखन एवं दलित- लेखन की भीड़ से अलग करता हैं तो दूसरी ओर नारी- अस्मिता और शोषित –उपेक्षित वर्ग के अनछुए पहलुओं को भी सामने रखता हैं जिनकी और आज तक कोई सजग लेखनी उन्मुख ही नहीं हुई |” उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता हैं कि वाकई में नीरजा माधव ने अपने उपन्यास में हाशियाकृत किन्नर समुदाय से संबंधित सभी सामाजिक समस्याओं यथार्थ अंकन किया हैं | इस उपन्यास में लेखिका ने हिजड़ो की जिन्दगी के ज्ञात-अज्ञात  सभी पहलुओ को ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया हैं | वेश्यागिरी करना या धन के लिए  तरह – तरह  मर्दों के सम्पर्क में आदि। इन सब कार्यों के लिए मह्ताब  खिलाफ हैं | उनका मानना हैं कि इस प्रकार के कार्य  से यौन रोग के अवसर बढ़गें | वे नाजबीबी से कहते हैं “देखो नाज , चोरी –छिपे यहाँ जो धंधा चल रहा हैं उसका फल तो तुम देख ही रही हो | जुबौदा चल बसी और अब सोराबती की बारी हैं-अब चला जाय कि तब  इसीलिए  हम सबको मना करते रहे कि जिस करम को करने अल्ला ने ही हमें नहीं बनाया तो उसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती मत करो |”[ii] उपरोक्त कथन यमदीप उपन्यास की  पात्र महताब किन्नर गुरु  हैं वह अपने चेलो को लेकर अतिचिन्तित हैं क्योंकि वे यौन रोगग्रस्त से पीड़ित हैं इसलिए वह कहती हैं कि अप्राकृतिक रूप से पैसे नहीं कमाने हैं भले ही ताली बजाकर कम आमदनी मिले | वेश्यावृति करके पैसे कमाकर क्या करना हैं और वो पैसे किस काम आएगा   | कम खायेंगे,सोने-चांदी के आभुषण कम पहनेंगे तो वेश्यावृति नहीं करनी पड़ेगी |
नाजबीबी और सब किन्नर को महताब किन्नर जीवन को समझाती हैं | तब नाजबीबी ने उनकी बात को स्वीकार कर लिया लेकिन कुछ हिजड़े  गुरु के सामने सहमति जताते है, पर उन हिजड़ो के मन में सवाल उठते हैं कि वे अपने आपको समाज से एक उपेक्षित वर्ग मानते हैं | उन्हें भी लगता कि सरकार उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देती और घरवाले तो पैदा होते ही आँख खुलने से पहले बाहर फेंकने को उतावले रहते हैं | वे भी मनुष्य हैं  उनकी भी आवश्यकताएं  हैं | चमेली के संवादों में वेदना दिखती हैं “तन को भगवान ने आधा टुकड़ा बनाया कि किसी लायक नहीं रहें और पेट ...? पेट तो नहीं बंद करके भेजा | ‘वह तो खुला ही हैं रोज भरो, रोज  खाली|’ चमेली की इस  बात पर मंजू ने कहा ‘हमारे  पेट की  सुध किसे हैं? न सरकार को न जजमान को ...महताब गुरु ने अपने अनुभवजन्य बातो से सबको शांत करते हुए कहा ‘ सरकार भी क्या करे ? आबादी इतनी बढ गयी कहाँ से खाना-पीना होगा ? सबको नौकरी चाहिए , सबको संपति चाहिए | कोई हिजड़ा तो नहीं  सब कि आगे-पीछे ,और  एक कोठरी, एक कथरी में जिन्दगी बीत जाए |”[iii]  वाकई में यह सच हैं सरकार भी हिजड़ो की जिन्दगी को लेकर कोई सतर्क नहीं हैं इस उपन्यास के प्रस्तुत संवादों से पहले किन्नरों के पास कोई सुविधा या आरक्षण नहीं था जैसा की आज संवैधानिक तौर पर किन्नर को तृतीय लिंगीं समाज का दर्जा मिला |इस उपन्यास के पन्नों में हिजड़ो की समस्या को लेखिका ने समाज से रूबरू करवाया हैं | सब लोग अक्सर कहते हैं  कि हिजड़े वेश्यावृति करते हैं और लोगों से पैसे लूटते लेकिन असली वजह  को इस उपन्यास का  अध्ययन करने से पता चलता | समाज में उनके लिए भी जगह होनी चाहिए उपेक्षित करने की बजाय उन्हें समझने की जरुरत हैं किन्नर लोगों  के पास भी उतनी ही सोच-समझ और  स्नहे, प्यार, ममता, मैत्री और करुणा,दया हैं जितनी समझ लिंगोपासक समाज के पास हैं |
 सामान्य समाज को किन्नर समाज के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है उन्हें कब तक हाशिये के सांचे में धकेले रखेंगे | किन्नर समाज को आज के दौर में उन्हें अपनाने की जरूरत हैं, सर्वप्रथम परिवार के लोगों को लैंगिक विकलांग बालक को परिवार से निष्कासित न करके  अच्छी शिक्षा देने की जरूरत हैं  हिजड़े रूपी बालक को सामान्य बच्चे के साथ स्कूल भेजा जाये, उनकी मानसिकता में ये अहसास न कराए कि तुम हिजड़े हो , इसलिए सामान्य समाज से भिन्न हो | तृतीय लिंगी बालक को स्कूल में प्रवेश देना भी निषेध मानते ऐसा व्यवहार क्यों किया जाता? आज संवैधानिक रूप से तृतीय लिंगी समाज का दर्जा मिल गया हैं परन्तु आज भी वे अधिकांश जगहों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश नहीं ले सकते हैं | न ही उन्हें कोई रोजगार देता हैं न ही उन्हें अपनी बिरादरी में जीने का हक | सच तो ये हैं कि किन्नर आज भी किसी कतार का आखिरी छोर पर खड़ा दिखता हैं | अगर सामान्य समाज किसी विकलांग, मानसिक विकृति, रोगग्रस्त बच्चे को अपनाती हैं तो किन्नर बालक को अपनाने में क्या हर्ज हैं | इस सन्दर्भ में लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी कहती हैं “ समाज नाम का जानवर तो तब भी खड़ा ही रहता हैं ...कनाडा में भी उन्हें बहुत-सी समस्याओं का सामना  करना पड़ता हैं | समाज उन्हें झट से अपनाता नहीं हैं | परिवार ही जब नहीं अपनाता तो समाज क्या...हैं किसी की नौकरी चली जाती हैं, किसी को जान से मारने की  धमकी दी  जाती हैं ...फिर ट्रांसजेडर सर्जरी होने के बाद बहुत-से लोग नौकरियां बदलते हैं |”[iv] प्रस्तुत अवतरण से स्पष्ट होता की किन्नर समाज  के साथ हास्यात्मक  व्यवहार भारत में नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशो में  भी इसी तरह का व्यवहार होता हैं |
हिदी कथासाहित्यकारों ने किन्नर समाज की समस्या को गहराई से लिया  और उनके लेखन में उतारा हैं | महेद्र भीष्म कृत ‘मैं पायल’ उपन्यास में मुख्य पात्र पायल किन्नर हैं ओर उनका क्षत्रिय परिवार में  जन्म हुआ था और जब उनके पिता को पता चलता हैं ये पूर्ण रूप से न लड़की हैं, न ही लड़का तब से उसके पिता जुगनू का मुंह तक देखना पसंद नहीं करते थे | तब पायल बहुत छोटी थीं उन्हें हिजड़ा क्या होता इस बात का पता ही नहीं था | जब वह  धीरे-धीरे बङी हुई तब , वह स्वंय के घर सुनने  लगी उनके पिता द्वारा कहे जाने वाले  शब्द “ जब कभी पिताजी दारू के नशे में कोसतें, गाली देते, ‘ये जुगनी ! हम क्षत्रिय वंश में कलंक पैदा हुई हैं, साली हिजड़ा हैं ... आदि जाने क्या-क्या वे बकते रहते थे | ‘हिजड़ा’ यह शब्द सबसे पहले मैंने उन्हीं के मुख से सुना था,पर तब मायने से बिल्कुल अनभिज्ञ थी |”[v] प्रस्तुत  कथन से ज्ञात होता हैं कि पितृसतात्म्क समाज जननांग दोष वाले बालक को पिता किस दृष्टी से देखते हैं | उनके लिए हिजड़ा होना मतलब एक कलंक के रूप हैं, जब इस बात का घरवालों को पता चल जाये तब से वे उन्हें हेय नजर से देखते हैं | अगर परिवार नहीं अपनायेगा तो समाज कैसे अपनायेंगे यह प्रश्न उठता है |
डॉ लवलेश दत्त की कहानी ‘नवाब’ चरित्र प्रधान कहानी है जिसमें कहानीकार ने हिजड़ो को करुणा,त्याग और प्रेम  आदि गुणों से युक्त आम इंसान माना हैं | नवाब एक हिजड़ा होने के बावजूद लिंगोंपासक  समाज से कई गुना अधिक सभी हैं | वह विशेष अवसरों पर घरों  में जाकर बधाई देता हैं | संयोगवंश एक दिन एक मन्दिर के पास झाड़ियो में फेंकी हुई छोटी बालिका मिलती हैं तब वह उसका देखभाल करने की जिम्मेदारी लेता हैं ओर नवाब को मुख्यधारा के लोंगों का विरोध भी सहन करना पड़ता हैं क्योंकि वे लोग उस पर चोरी का इल्जाम लगते हैं इसके बावजूद भी वह  हार न मानते हुए अपनी बेटी के रूप में अपनाता हैं | परन्तु लोगों की मानसिकता हमेशा स्त्री के प्रति शरीर भोगी वस्तु बनकर रही हैं इसलिए लिंगोपासक समाज हमेशा नारी के प्रति व हिजड़ो के प्रति नकरात्मक  सोच बनाये उसे हाशियाकृत परिधि में रखते हुए उनका शोषण करते रहे |  यही हाल एक दिन सभ्य कहे  जाने वाले समाज के एक पुरुष ने जया के साथ नवाब को देख कर बोलता हैं “क्यों नवाब ...बहुत माल बनेगी यह ... तुम्हारा बुढ़ापा तो सुधर ही जायेगा ...|”[vi] इस सन्दर्भ से स्पष्ट होता हैं कि नवाब ने उस बालिका को फेंकी हुई देख लाया अपने और वह सामन्य समाज जिस तरह हिजड़ो को घर से निकलते उसी भांति ही लड़कियों को फेकते, भ्रूण हत्या करते हैं | दूसरी तरफ नवाब एक हिजड़ा होकर भी उनमे संवेदना थी वो हिजड़ा का पेशा छोड़कर जया की देखभाल करता हैं तब भी लोगों नीची सोच वे उन्हें ताने मारते की बुढ़ापे में काम आयेगी, माल हैं इस तरह बाते करते हैं | नवाब मेहनत-मजदूरी से जीविकोपार्जन करता हैं |
हिजड़ो के प्रति नकारात्मक सोच के भय से जया को नारी निकेतन में भेज देता हैं |  उसके बीमार होने पर संयम के गुर्दे निकालकर जय का प्राण बचाता है क्या सामान्य समाज में इस प्रकार कोई कर सकता हैं क्यों ? और जब जया शादी करने लायक होती हैं उसे कन्यादान  करने का अवसर  तक देना नहीं चाहते हैं तब भी संघर्ष करके वहां पहुचता हैं तो उसे हिजड़ा कह कर उपेक्षित किया जाता तब जया  कहती हैं कि ये ही मेरे अम्मा-बापू है जो मुझे मौत के मुंह से बचाया अगर मेरे से शादी करना हैं तो मेरे बापू ही मेरा कन्यादान करेंगे | वे कहती कि मुख्यधारा के लोगों को हिजड़ो को उपेक्षित करना आता हैं पर उन्हें समझा कभी नहीं की वाकई सामान्य समाज से कितना ठीक हैं उनमें भी कितने सभ्य गुण हैं जो कुछ समाज के लोगों  में नहीं हैं |
मैं पायल उपन्यास में कथाकार ये बताना चाहते है कि घर में असामान्य बालक के पैदा होने  पर घर के लोग समाज से किस प्रकार डरते हैं | इसका मुख्यकारण ये  भी हो सकता हैं कि उनमें जागरूकता की कमी है वे अपनी लैंगिंक विकृति के बालक के प्रति सोच कर अपनी खानदानी इज्जत के बारे में ज्यादा सोचते हैं समाज के लोग क्या कहेंगे  हिजड़े बच्चे को देखकर उसकी वजह से वे लोग उस बालक को छुपाकर रखने की कोशिश करते हैं | उसके साथ दोगला व्यवहार किया जाता हैं जिस प्रकार जुगनी को उनके पिता मारते-पीटते हैं “पिताजी ने पास रखी बाल्टी में भरे पानी से मुझे नहला दिया, फिर वहीं रखी चप्पल को टब में भरे पानी में डुबाडुबाकर  मेरे नग्न शरीर की चमड़ी उधेड़ने लगे ...रस्सी का एक छोर बांधकर मुझे मारने के लिए रस्सी के दुसरे छोर का फंदा मेरी गर्दन में बांध पिताजी ने मुझे फांसी दे दी थी |”[vii] क्या हिजड़ा होना किसी के वश की बात नहीं है आज तक विज्ञान भी पूर्ण रूप से इसका कोई समाधान नहीं ढूँढ सकी तो किसी हिजड़े बालक का क्या दोष हैं ये ही सवाल पायल के मन में उठते हैं इसे बेकसूर इस तरह क्यों मारा जाता हैं ? अगर  किसी विकलांग बच्चे को पाल- पोसकर बड़ा किया जाता तो किन्नर बालक  को सिर्फ उस घर में जीने का हक तक नहीं दिया जाता |  असहनीय पीड़ा कष्ट को पायल ने अपने घर में सहन किया उसको मारने के  साथ उनकी माँ भी हमेशा कष्ट सहन करती थी | इसलिए पायल इससे हमेशा के लिए मुक्ति पाना चाहती है | वे सोचती हैं कि उसकी वजह से ही पिताजी हमेशा माँ को भी साथ में मारते थे | अपने गम को भुलाने के लिए नशे में रहते । इससे अच्छा है की हमेशा के लिए ये दुनिया छोड़ दी जाये ताकि माँ-बहनों को मार न खानी पड़ेगी | समाज के लोग भी उनके भाई व पिता को ताने नहीं मारेंगे इस तरह घर में कितने दिन पिता की आँखों से बचेगी | यह वह जानती थी कि स्वयं को हिजड़ा होने का दंश कितना गहरा घाव करता हैं |
इस प्रकार ‘मैं पायल’ उपन्यास में एक किन्नर पात्र की पारिवारिक समस्या के साथ  संघर्ष को  किस तरह अपनाया हैं वह घर छोड़ के भाग जाती ओर मरने का निश्चय करती हैं | मौत को भी अपना नहीं बना सकती हैं लेकिन संघर्षमयी जिन्दगी को अपना बनाने के लिए समाज में वे प्रयत्न करती रहती हैं | एक तरफ लिंगोपासक समाज हिजड़ो को घर से बाहर धकेलते हैं वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे  उनकी अधूरी देह को भोगना चाहते हैं तब उन्हें कोई इज्जत ,मान ,मर्यादा याद नहीं  रहती हैं | जैसा  कि पायल को एक क्षण पहले उनके पिता उसे फांसी देते हैं वहां से भाग कर अपनी असली जिन्दगी में कदम रखते ही अधेड़ उम्र का आदमी पायल के साथ शारीरिक शोषण करना चाहता हैं ||चलती ट्रेन में वह पायल के के साथ अश्श्लिल हरकते करते हुए उसे ट्रेन के बाथरूम आने के लिए कहता हैं क्या ये सभ्य समाज के गुण और धर्म हैं ? यही से पायल के साथ और अमानवीयता के व्यवहार बढ़ जाते हैं जब ट्रेन से नीचे उतरकर प्लेटफॉर्म पर जाती तब पुलिस  वाला आकर उसे डंडे के बल से डराते हुए कहता है कि चल मेरे साथ और उसके अंगो नोच ने लग गया | ये अति सोचनीय बात हैं की एक प्रशासन का आदमी भी बेसहारा लोगों के साथ इस  तरह अमानवीयता का व्यवहार करेगा तो कौन साथ देगा ?
किन्नर को कोई रोजगार नहीं देते हैं चाहे भले पढ़ा लिखा क्यों न हो जैसे पायल एक आत्म निर्भर बनने के लिए वेश बदलकर लड़के रूप में रहकर काम करती है एक दिन जब साथ वाले नौकर को पता चलता तब उसका शोषण कर देता हैं | वह काम छोड़ कर चली जाती तब उन्हें हिजड़े पकड़  कर ले जाते डेरे में वे जबरदस्ती से पायल को  किन्नर बनना चाहते | पायल नहीं चाहती थी कि  ताली -बजाकर, भीख मांगकर अपना जीवन बिताए लेकिन हिजड़े लोग अपने स्वार्थ के लिए उससे किन्नर बना देते | इस बात का खुलासा करते हुए वे किन्नर समाज में भी व्याप्त गलत धारणाओं को बताती हैं कि किन्नर गुरु अपने शिष्यों के साथ अन्याय करते उन्हें अपनी मर्जी का काम नहीं करने देते और नाच-गान करने को मजबूर करते हैं |  
इस तरह हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुदगल का प्रसिद्ध उपन्यास नाला सापोरा में एक हिजड़े बालक की वेदना व संवेदना को बताया गया हैं | यह उपन्यास पत्रकारिता की शैली में लिखा  गया हैं जिसमें माँ-बेटे के बीच पत्र के माध्यम से होती हैं|  बिन्नी उर्फ़ बिमली नाम का लड़का जो जन्म से नपुसंकलिंगी होता परन्तु पढ़ने में बहुत होशियार लेकिन घर वाले को समाज का भय होने के कारण किन्नर के हाथों सौप दिया जाता हैं | परन्तु माँ को अपने बेटे से अधिक लगाव था लेकिन इसके बावजूद वह उसे  रोक नहीं सकी | परन्तु घर वालों से छुपाकर पोस्ट बॉक्स द्वारा प्राप्त पत्र के माध्यम से बात करती थी | एक माँ होने के नाते अपने बेटे से दूर होना उनके लिए बहुत ही कष्ट होता हैं | इस उपन्यास में एक की संवेदनाओ को दबा कर समाज के सामने वे अपने बेटे की मौत का संदेश फैलाते हैं क्योंकि किसी को ये न लगे का इनका बेटा हिजड़ा था | जब विनोद  अपनी माँ से प्रश्न पूछता हैं कि मेरे जीते जी मौत की खबर क्यों फैलाई जा रही रही हैं ? वह स्वीकार भी करती कि सामाजिक बंधन कुछ इस तरह के जो आज हिजड़ो को स्वीकार नहीं करता लेकिन आने वाले समय में जरुर इनको न्याय मिलेगा | “क्या मैं सचमुच दुनिया की सबसे खुबसूरत माँ हूँ | कैसे हो सकती हूँ बिन्नी, मेरे बच्चे ! तुझे दुःख है न कि मैंने और तेरे पापा ने तुझे उस नरक में क्यों धकेल दिया,इसके बावजूद ?...सच तो ये है दीकरा, बच्चों जैसा निष्कलुष मन कहाँ होता हैं माँ नाम की स्त्री के पास ? दुनियादरी में बंटी हुई स्त्री ! टुकड़ा- टुकड़ा |”[viii] विनोद और माँ के संवाद से स्पष्ट होता हैं कि स्त्री बच्चे को जन्म इतनी पीड़ा सहन करके देती हैं परन्तु उनको पालने का अधिकार नहीं हैं यहाँ लेखिका स्वयमं एक नारी होने के साथ महिला लेखिका की वेदना प्रकट करती हैं |
नाला सोपारा उपन्यास में लेखिका न सिर्फ एक घर से तिरस्कृत विनोद की वेदना को प्रकट किया बल्कि उसके साथ वह हिजड़ा समाज के साथ होने वाले शोषण को भी बताती हैं | उन्हें बड़े राजनेता किस तरह से अपनी वोट बैंक बढ़ाने के लिए उनको अपना मोहरा बनाते हैं | और मनोरंजन के रूप में किन्नर को अपनाते फिर भी किस तरह लिंगोपासक समाज के साथ मानवतावादी व्यवहार करते हैं | किन्नर के आपसी संबंध के बारे भी बहुत अच्छी तरह बताया हैं कि बिन्नी को उसके घर वाले किन्नर के हाथों सौप देते हैं फिर वहां पूनम  किन्नर होते हुए बिन्नी के लिए पैसे इकठ्टे करके उसे पढ़ाना चाहती है उसको विधायक जी से मिलवाती हैं यानि एक हिजड़ा होते हुए वह किसी के कुछ लगती नहीं फिर भी एक दुसरों मदद करते रहती हैं |इस तरह बिन्नी को घर का सहारा न मिलते हुए पूनम ने एक सखी के रूप में तो कभी माँ के रूप में प्यार  करती हैं | वे बिन्नी को अपनी माँ से मिलाने के लिया अपनी जमा राशि से उसे मुम्बई भेजती हैं | किन्नर लोगों की संवेदना को समाज समझता नहीं उन्हें अपनाता नहीं यह ही उनकी सबसे बढ़ी गलती हैं | इस उपन्यास के अंत में माँ माफ़ीनाम पेश करती हैं लेकिन ये माफीनामा माँ का सिर्फ माफीनामा नहीं हैं बल्कि समाज की तरफ से हैं |
‘किन्नर कथा’ उपन्यास कथाकार लिंगोंपास्क  समाज से प्रश्न करते हैं कि क्यों तृतीयपंथी लोगों को सहारा नहीं दिया जाता | किन्नरों को सिर्फ आम जनता ही निष्काषित नहीं करती बल्कि राजघराने के राजा महाराजा भी अपनाने से डरते हैं अर्थात इस उपन्यास में भी घटना कुछ इस तरह से जो पाठकों को अचम्भित कर देती हैं, जो राजघराने और किन्नर गुरु के डेरे के इर्द-गिर्द घूमती कथा हैं | इसमें महाराज जगतसिह के घर दो जुड़वाँ सोना और रूपा राजकुमारियों का जन्म हुआ था | कुछ दिन बाद जब महाराज को पता चलता हैं की सोना हिजड़ा हैं तब दीवान के हाथों उसे मारने के लिए  सौंप दिया जाता हैं | दीवान साहब का मन रूपा को देख कर  पिघल गया उसे मारा नहीं परन्तु किन्नर गुरु तारा के हाथ सौंप दिया जाता हैं | “तो सुनो तारा, बुंदेला राजा ने इन्हें इस हिजड़ा बच्चा को समाप्त करने का फरमान सुनाया हैं ...दीवान जी नन्ही बच्ची के प्राण ले नहीं पाए और यहाँ लेकर चले आये अब ये बच्ची तुम्हारे हवाले हैं, अब आगे अपने डेरे में रखो | इसका लालन-पालन करो, ईश्वर तुम्हें अच्छा फल देगा | हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं |”[ix] इस से स्पष्ट होता हैं कि अपनी झूठी शान, इज्जत का दिखावा करते हैं यहाँ राजा भी अगर एक असामान्य बालक को पालने की हिम्मत नहीं करता तो आम जनता तो उन्हें कब अपनाएगी | तारा जैसी गुरु ने सोना को एक राजकुमारी की  तरह पाला और उसे अच्छे संस्कार दिए | सोना अब चंदा नाम से प्रचलित हैं और अच्छी नृत्यांगना भी बन जाती हैं अक्सर लिंगोपासक समाज किन्नरों को घर से निकालने को  तैयार रहते हैं अगर हिजड़ो को अपनाया जाये तो वे ताली बजाकर  नाच- गान करने का पेशा नहीं अपनाते |
 इसी तरह चंदा किन्नर डेरे में पली-बढती हैं संयोग से 15 साल बाद  वह अपनी बहन की शादी में बधाई देने जाती है उसे अपने अतीत की याद आ जाता हैं वे अपने घर को पहचान लेती हैं तब उनकी माँ भी उसे अपनाने की कोशिश करती हैं पर महराज तब भी चंदा को मारने को तैयार हो जाते हैं | हिंदी कथा साहित्य में किन्नर बच्चों के प्रति माँ की संवेदना दिखाई जा रही हैं | पुरुष समाज अपनाते हुए नहीं दिखाई दिया | इसी प्रकार इस उपयास में भी चंदा को उसके पिता नहीं अपनाते |  वहीं हाल किन्नर गुरु तारा का था उसे भी इस तरह  ही घर से भगाने को मजबूर कर  दिया जाता हैं  | इस उपन्यास को दो तरह से लेखक ने दिखाने की कोशिश करते हैं , एक तरफ युवा और शिक्षित कुछ समझदार लोग मनीष जैसे लैंगिक भेदभाव को मिटाने के लिए भरपूर कोशिश करते हैं मनीष तारा को किन्नर रूप स्वीकार करता और उसके साथ जीवन बिताने का शपथ लेता हैं वहीं राजघराने परिवार की समधिन जो उसे चंदा को सर्जरी के द्वारा ठीक करवाने की राय  देते हुए उसे अपनाने को कहती हैं | अर्थात अंत में जैसे चंदा को अपनाया जाता है इस उपन्यास को आज के  सन्दर्भ में देखे तो सरकार ने किन्नर को जीवन जीने और उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें अपने अधिकार दिए हैं लेकिन संपूर्ण रूप से समाज नहीं अपना रही हैं पहले से अब थोड़ा बदलाव आता दिखाई दे रहा हैं |
कथा साहित्य में पारिवारिक और सामाजिक दृष्टिकोण-
21वीं सदी के हिन्दी साहित्य में अगर किन्नर जीवन पर दृष्टि डालें तो देखने को मिलेगा कि उनकी दैहिक विसंगति का प्रभाव व मानसिक प्रभाव, किन्नरों का शोषण, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष: अस्मिता, अस्तित्व का प्रश्न इन सभी पहलुओं से गुजरना पड़ता है। वे किस तरह हाशिए की परिधि में संघर्ष कर रहे हैं।नाला सोपारापोस्ट बॉक्स नं. 203’ चित्रा मुद्गल के द्वारा लिखित इस उपन्यास में मुख्य पात्र विनोद उर्फ विमली उर्फ बिन्नी का संवाद अपनी माँ के साथ पत्र के माध्यम से अपनी विसंगतियों को बताता है, जैसा किमैं पायलउपन्यास में पायल अपनी माँ से चोरी से मिलती है, और घर-परिवार के सदस्यों के प्रति चिन्तित रहती है, उसी तरह बिन्नी जो पोस्ट के द्वारा अपनी माँ से बात करता है, वह अपनी जननांग की कमी को लेकर चिन्ता जाहिर करता है। मानसिक तनाव में आकर सारे सवाल करता है कि क्या सिर्फ जननांग की कमी के कारण उसे घर से निकाल देना, किसी के हाथ सौंप देना, मौत की अफवाह फैलाना सही है ? ऐसे सवालों का जवाब अपनी माँ से करता है। तब माँ उन्हें समझाती है कि-‘‘तुझे कैसे समझाऊँ! अब देख बिन्नी ! आँखों से अन्धा हमारे समय में पाठशाला नहीं जा सकता था। तू बताता है न कि तेरे बड़े स्कूल में आँखों से अंधे दो बच्चे पढ़ते हैं, बल्कि उनके लिए उनकी जरूरत के मुताबिक अलग स्कूल हैं, उंगलियों से पढ़ी जाने वाली भाषा है। बिना टाँग वाले भी तो नकली टाँग पर चलते हैं। हो सकता है, भविष्य में इस अधूरेपन का कोई इलाज निकल आए। तेरे पापा ने तुझे ले जाकर बड़े स्पेस्लिस्ट को दिखाया न ![x]’’ संदर्भ से स्पष्ट होता है कि बिन्नी के मन में सवाल उसे झकझोर रहे हैं। उन सवालों का जवाब देते हुए उसकी माँ आने वाले समय में हिजड़ों के इलाज के लिए उम्मीद की किरण जगाती है, वे विज्ञान की तरफ इशारा करती है कि हो सकता है कि अधूरेपन का कोई इलाज हो।
बिन्नी पढ़ने लिखने में अव्वल था, और उसमें स्त्रैण भावना भी कहीं अधिक नहीं थी और अपने अधूरेपन के अहसास होने के साथ में ये भी एहसास होता कि जो औरत होती है, वह स्वयं अपनी संतान के लिए पालने का अधिकार नहीं है ‘‘तू विश्वास कर सकता है तो अपनी बा पर विश्वास न डिगने दे। तू जिस नरक से गुजर रहा है, वहां मैं तेरे साथ नहीं हूँ। मगर तेरे उस नरक की हर गली, मेरी छाती से होकर गुजरती है।[xi]’’ यह स्पष्ट होता है कि माँ के गर्भ से चाहे कैसी भी संतान पैदा हो जाये, लेकिन वह उसके प्रति सदैव ममत्व की भावना रखती है। सामाजिक व पारिवारिक दबाव में आकर उन्हें अपने अधूरी देह के बच्चों से अलग होना स्वभाविक है, किन्तु जिस तरह बिन्नी से वंदना बेन को अलग होना पड़ा । वह उसके बेटे को चंपाबाई के हाथ देने से रोक नहीं सकी, उसे सौंपना पड़ा फिर भी वह विश्वास दिलाती है बिन्नी को मेरा प्यार, आशीर्वाद तेरे साथ है, जिस दुनिया में तू नरक का दंश झेल रहा है, उसी नरक की पीड़ा से मैं भी गुजरती हूँ।
बिन्नी समाज से प्रश्न करना चाहता है कि क्या समाज हिजड़ों को स्वीकार करने से डरती है । बिन्नी वह कहना चाहता है कि अगर विरोध करने से भले परिणाम पहले अच्छे नहीं आएंगे परन्तु बदलाव तो आएगा।तू जानना चाहता है न दीकरा, तेरे पप्पा ने तेरी मौत को लेकर भानू मामा से कौन-सा बहाना गढ़ा?जटिल प्रश्न है । अपने चरित्र में भी जटिल प्रश्न तुझे कभी नहीं लगे।[xii]’’ ऐसे बिन्नी के सवाल से भले ही सब अनुत्तरित हों, लेकिन वाकई समाज को इन सवालों के जवाब देने होंगे। हमेशा के लिए किन्नर समुदाय उपेक्षित होता नहीं रहेगा। आज सरकार तृतीय लिंगी समाज के साथ है, फिर भी समाज अपनी मान-मर्यादा, इज्जत पर लोग सवाल उठायेंगे, इस डर से स्वीकार नहीं करती है। दूसरा कारण है कि भारतीय समाज में जाति, छुआछूत के भेदभाव से भले ही परे हो गई, लेकिन लिंगीय भेदभाव से बाहर आने में समय लगेगा।
          मानसिकता पर तो इनके प्रभाव पड़ता ही है, उसके साथ-साथ इनकी दैहिक विसंगति का प्रभाव अत्यधिक गहरा होता है, जिसे लेकर चिंतित रहते हैं, स्वयं में खोये रहते हैं। जैसे - ‘डॉ. सूरज बड़त्याकी कबीरन कहानी में दिखाई देता है, कबीरन नाम की लड़की होती है, उसे पैदा होते ही अनाथालय में भेज दी जाती है, वह ट्रेन में भीख माँगकर अपना जीवन-यापन करती है ‘‘बना के क्यूँ बिगाड़ा रे ऽऽऽऽऽ बिगाड़ा रे नसीबा ऽऽऽऽऽ ऊपर वाले ऽऽऽऽऽ ओ ऊपर वाले ऽऽऽऽऽ।[xiii]’’ भले ही ये एक पंक्ति है, लेकिन हकीकत में कितनी दर्द भरी आवाज में वो गाती है, ईश्वर को कोसती है कि तुमने मेरी देह को बनाकर अधूरेपन को सांचे में क्यों डाल दिया ? सुमेध को दर्द होता है। वे चेहरे से आकर्षित मोनालिसा-सी सुन्दर दिखती थी। गुलाबी होंठ, नुकीली नाक, आँखों में उदासी और चमक हमेशा तैरती है। आत्मीय और अपनापन भी भरा हुआ है। इसके बावजूद भी लोग उसके साथ भद्दा मजाक करते हैं, फिर भी एक बार तो उसका चेहरा रक्ताम होता है, दूसरे ही पहल में वह मुस्करा देती है। 
          कबीरन ने औरत हिजड़ी के तौर पर अपनी जिंदगी गुजारती है जब उसका भाई सुमेध उन्हें वापस अपने घर ले जाना चाहता है, तब कबीरन कहती है कि वापस मुझे सामान्य समाज के लोगों के बीच नहीं जाना है यथा- ‘‘मेरा क्या कसूर था जो बापू ने मुझे घर से निकाल दिया ? आज मैं दर-दर की ठोंकरें खा रही हूँ तो क्यूँ ?[xiv]’’ परिवार को दोषी मानूँ ? समाज का ? किसे ? ‘‘पता है बाबूजी, हम हिजड़ों में भी स्त्री और पुरूष होते हैं।’’[xv]मैं तो औरत हिजड़ा हूँ जब अनाथालय में थी तो वहाँ तुम्हारी दुनिया के पुरूष से ही पहली बार मेरा बलात्कार हुआ।’’[xvi] कहीं किसी कानून में लिखा है कि हिजड़े के साथ बलात्कार की क्या सजा है ? तुम्हारा समाज न तो हमें स्त्री मानता है और न ही पुरूष।’’ स्पष्ट होता है कि इस कहानी से सुमेध जैसे समाज के कुछ युवा हिजड़ों को समाज में समानता का अधिकार दिलाना चाहते हैं, वहीं सभ्य समाज की आबादी हिजड़ों का बलात्कार कर रही है। एक तरफ से वे उन्हें समाज के हाशिए में धकेल रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ उनका शोषण कर रहे हैं। इस बात को कबीरन सुमेध से कहती है कि क्यों चलूँ तुम्हारी समाज में ? वहाँ हमारे लिये कौन से अधिकार हैं। सरकार ने हिजड़ों के साथ बलात्कार होता है, तो कौन सी सजा देने का प्रावधान किया है ?
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          द्विलिंगीय समाज के बारे में मातिन कहती है  कि - ऐसे समाज के बीच जहाँ केवल पुरूष स्त्री का शोषण करना व भोगना चाहते हैं, उससे तो हिजड़ा समाज बहुत अच्छा लगा, जहाँ इंसान को सारी स्वतंत्रता मिलती है, वे सबको समान दृष्टि से देखते हैं। इस तरह वह सोचकर ईश्वर से प्रार्थना करती है कि सोना के लिए सोना भी राजवंश परिवार से धकियाई हुई बालिका जो मातिन व तारा जैसी माँ व संरक्षिका का सहारा मिला। इस नन्हीं-सी बालिका को देखकर उन्हें अपने पुराने दिन याद आ गए। उन्हें भी सोना की तरह निकाला था, जिसके कारण आज इस पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ रहा है।
          जब तारा सोना को लाती है तब वह अपने विचारों में डूब रही है, वे तारा के भविष्य के बारे में चिंता करती है। भले बच्ची छोटी है, समय बीतने के साथ-साथ भूलती जाएगी अपने अतीत को, पर क्या कभी भुला पाएगी अपने अतीत को, इस सन्दर्भ में उसे अपना अतीत याद आता है ‘‘कभी नहीं, पल-छिन उसे अपने घर-परिवार के लोग याद आते रहे हैं। माँ की सूनी, उसे निहारती, आशीष देती आँखें, पिता अपने हृदय पर पत्थर रखे पसीजती आँखों से विदा कर रहे थे, रोकना नहीं चाहते थे उसे, और उसे अपने से दूर भी नहीं जाने देना चाहते थे। तब कोई चैदह-पंद्रह बरस का रहा होगा, जब उसे हिजड़ों को सौंप दिया गया था।[xix]’’ इस से स्पष्ट होता है कि तारा के हिजड़ेपन होने के कारण परिवार से बिछुड़ना पड़ा। उस समय माँ आशीष देती, पिता हृदय पर पत्थर रखे, मतलब वे उन्हें दूर भी नहीं करना चाहते हैं, हिजड़ों के परिवार अपने बेटे को नहीं भेजना चाहते हैं। लेकिन सामाजिक दबाव, लोगों के उपहास, ताने व इज्जत के डर से अपना भी नहीं सकते हैं। फिर तो भुला सकें या न भुलायें, लेकिन हिजड़ा समाज का दंश झेलते हुए अपने अतीत के बारे में सवाल करता हुआ ईश्वर से प्रश्न करता है क्यों उन्हें अधूरी देह दिया, जिसके कारण उन्हें ये वेदना पीड़ा, तिरस्कार सब सहना पड़ रहा है। उन्हें हिजड़ा समाज में रहकर ताली बजाना, नाच-गान करना सीखना, ये उन्हें कतई पसन्द नहीं है, फिर भी ये पेशा अपनाना पड़ता है।
          समाज में न सिर्फ अनादर किया जाता बल्कि उनके साथ मार-पिटाई भी करते हैं। उन्हें घर से सर्वप्रथम उपेक्षित किया जाता है, लेकिन समय के साथ जागरूकता की आवश्यकता होती है, वे कितने दिन इस तरह कुंठित होते रहेंगें और आखिर क्यों ‘‘अपने दोनों घुटनों में सिर छिपकर वह दूर से माँ की जलती चिता देखता और रोता रहा था। अगर उसके साथ उस दिन उसके दो-तीन हिजड़ा साथी न होते तो जरूर कोई अनहोनी घट सकती थी, तब भतीजे ने उसे धमकाते हुए कहा था, तू हिजड़ा है, हिजड़ा, हमारा तेरे से कोई नाता नहीं, तू हमारा कुछ नहीं लगता, भाग जा यहाँ से, क्यों हमारी नाक कटाने पर तुला है, हिजड़ा कहीं का।[xx]’’ स्पष्ट होता है कि किसी भी इंसान के लिए माँ से बढ़कर दुनिया में उनसे बड़ा कोई नहीं होता है। जैसे तारा के माँ की मौत होती है तब उसे कोई सूचना नहीं दी जाती है तो तारा श्मशान घाट जाकर अपनी माँ की चिता को प्रणाम करना चाहती है, वहाँ तारा के घरवालों ने उन्हें देखा तो उसे धमकाते हुए कहते हैं - ‘‘जा तू कहीं से क्यों चला आया ? यहाँ इन कथनों में इंसानियत नहीं दिखती है। एक तरफ द्विलिंगीय समाज उन हिजड़ों को तिरस्कृत करता है तो उन्हें मानवीयता के नाते अपनी माँ की चिता तक देखने का अधिकार नहीं, ये बहुत अन्याय है। स्वतंत्र समाज में पढ़े-लिखे युवा भी अगर हिजड़ों के साथ रूखा, उखड़ा हुआ व्यवहार करेंगें तो उन्हें कौन अपनायेगा? इसलिए जागरूकता की आवश्यकता है।”[xxi]
          उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि हिजड़ा होना कितना अभिशप्त है, वे समाज के सामान्य लोगों  से उपेक्षित होकर सारे कष्ट सहने को मजबूर हो जाते हैं। इसी प्रकार तारा का जीवन था तो वे अपने भोगे हुए यथार्थ के बारे में सोचने पर उसे सोना जीवन इस नरक का भोगी हुए दिखाई देता है, वे चिंतित होती है कि आखिर समाज इस तरह इनको क्यों तिरस्कृत करती है। इनकी कमी, अधूरेपन की सजा फिर समाज क्यों देती है ?
          किन्नर कथा उपन्यास में जीवन के दो पहलुओं को दिखाया गया है, जहाँ एक तरफ समाज के सामान्य लोग तारा व चन्दा जैसी हिजड़ों को घर निकालते हैं, उनके साथ समाज भद्रता का व्यवहार करती है, वहीं दूसरी तरफ समाज के कुछ युवा लोग वर्तमान स्थिति को किन्नर समाज की समस्याओं से रूबरू होना चाहते हैं, मनीप, ओमप्रकाश, आयुष और वकील जैसे लोगों ने न तारा का साथ दिया। वे चाहते हैं कि इस हाशिए में जी रहे किन्नर समाज को अपने अधिकार मिले। वे लोग समाज में व्याप्त नकली हिजड़ों के बढ़ते अपराध की घोर निंदा करते हैं और मनीष तारा का भतीजा उन्हें कई दिनों बाद पता चलता है कि इस घर की सदस्या थी, तब से वह बहुत दुःखी हो जाता है। इस बात को लेकर घरवालों के खिलाफ भी बोलता है। वह चन्दा जैसी किन्नर से प्यार भी करने लगता है। मनीष और चंदा का ऐसा निश्चल प्यार आध्यात्मिक प्यार करता है, चन्दा के लिए मनीष घर भी छोड़ने को तैयार हो जाता है। मनीष और तारा का मिलना हनुमान मंदिर में होता है, मनीष उनके तारा को रोते हुए देख पास आता है और वह बात करना चाहता है, मनीष जैसे युवा को होना समाज के लिए अति आवश्यक है।
          समाज के उपहास से तृतीय लिंगी लोग कुंठित, शोषित महसूस कर रहे हैं। जैसा कि उपन्यास की किन्नर पात्र तारा को उनकी माँ की मौत के बाद वह सोचती है कि हिजड़ा के रूप में पैदा होने में उनके माँ-बाप की क्या गलती है ? हिजड़ा रूप में होना गलत है ? ईश्वर ने जैसा भी बनाया हो, मानव तो बनाया, फिर समाज में हिजड़ा रूप स्वीकार कार्य नहीं ? दूसरी तरफ तारा सोचती है कि ईश्वर ने उन्हें अधूरी देह देकर अभिशप्त और अपमानित क्यों किया ? क्या यह ईश्वर द्वारा किया अन्याय नहीं है, वह कहती है कि क्या हम किन्नर ईश्वरीय पाप की परिणति हैं ? जो प्रकृति का उपहास बनकर रह गये। इसलिए वह निर्दोष सोना के बारे में भी सोचती है कि ‘‘क्या नन्ही सोना जैसी बच्ची के शेष जीवन के लिए प्रकृति का अभिशाप नहीं है, जिस निर्दोष का जीवन अब उसी की तरह बीतने वाला है। घर, परिवार, समाज से बहिष्कृत, तिरस्कृत और त्रासदी लिप्त हुए। जब तक जीवन है, त्रासदियाँ उनके साथ हैं, वह जो न नर है, न नारी है, है तो सिर्फ और सिर्फ एकहिजड़ा’, यही उसकी पहचान है, यही कटु सत्य है”।[xxii]
          तारा, मनीष और चंदा को देख खुश थी कि चंदा को कोई तो अपनाने वाला होगा, ताकि वह खुश रह सके। तारा सोचती है कि चंदा को सर्जरी करवाकर सम्पूर्ण स्त्री बना दी जाये। वहीं मनीष के घर वाले दूसरी तरफ मनीष को तारा से दूर रहने की चेतावनी देते हैं। वे तारा को भी घर बुलाकर समझाते हैं कि किन्नर डेरों के आस-पास मनीष को न भटकने दे। तारा जब मनीष को बताती है कि बालकृष्ण नहीं चाहते कि तुम चंदा के साथ घूमो-फिरो। तब वह तारा से अपने अन्तर्मन की बात बताता है- “आप जानती हो कि हम दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते हैं। चन्दा के बिना मैं अधूरा हूँ, मेरा जीवन निस्सार है। मैं उसे अपना बनाना चाहता हूँ।[xxiii]’’ उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि मनीष ने चन्दा से शारीरिक प्रेम न करके उस सच्चे मन से प्रेम किया, जिसमें मोह, माया न हो। वह समाज की परवाह न करते हुए चंदा को अपनाना चाहता है। तारा के बताने पर वह अपने मन की बात बताता है वह कहता है कि ऑपरेशन के द्वारा चंदा अपना जीवन जी सकती है। अगर उनके लिए ऑपरेशन की सुविधा न हो तो भी वह जैसी है, वैसी उसे पसन्द है। तारा को वह वचन देता है कि चन्दा का जीवन भर साथ देने का वचन देता है। इस समाज में कुछ युवाओं का रवैया किन्नरों के प्रति अच्छा है लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें उपेक्षित करते हैं।
          समाज में व्याप्त नकली हिजड़े भी पैसे कमाने के लिए वेश बदलकर लोगों से पैसे लूटते हैं। जन्मजात हिजड़ों की रोटी छीनते हैं। आयुष और निखिल जैसे ईमानदार उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं। लंबू जैसे नकली हिजड़ों की एक गैंग जो हमेशा रात में लोगों को लूटपाट करते हैं, साथ ही असली हिजड़ों का नाम खराब करता है। किन्नरों को समाज उपेक्षित व तिरस्कृत करता है वहीं उन्हें नकली हिजड़ों के साथ संघर्ष करना पड़ता । तारा जैसी ईमानदार किन्नर को नकली हिजड़ें धोखे से मार देते हैं, तब मनीष को नगीना ने रो-रोकर बताया-“ रंगशाला से लौटकर सभी थके-हारे अपने-अपने कमरे में जाकर सो गए । गुरुमाई बहुचरमाई के चबूतरे के पास वाले कमरे में सोती थी, वहीं सोने चली गई, पता नहीं किस वक्त हत्यारें आए और गुरुमाई को मार गए, कुछ पता नहीं चला । किसी को चीख, कोई खटका कुछ सुनाई नहीं दिया । मातिन जब सुबह-सवेरे कमरे में गई तो गुरुमाई मरी पड़ी थी।” [xxiv] उपयुर्क्त कथन से स्पष्ट होता है कि जैसा कि तारा किन्नर समाज में प्रसिद्ध थी और वह नकली हिजड़ों के खिलाफ थी तो किसी अज्ञात ने उनकी रात में हत्या कर दी । तारा हत्या के दिन ही प्रधानमंत्री इन्दिरागांधी की हत्या हुई थी, लेकिन इस मौत ने सारे किन्नर समाज को झंकझोर दिया । खास करके चंदा को क्योंकि तारा उसे अपनी बेटी की तरह मानती थी, बचपन से राजकुमारी की तरह उनका पालन-पोषण किया । अब चंदा के लिए जीवन में घनघोर अंधकार आ गया । अब मनीष के अलावा उनका कोई नहीं रहा । तारा की मौत के बाद आरोपी पकड़े गए और बाद में जब अंतिम संस्कार किया जा रहा था तब मनीष ने हिजड़ों का विरोध किया क्योंकि वे हिजड़ों की परम्परा के अनुसार आधी रात में चुपके से दफनाना और उसकी अर्थी पर जूते-चप्पल मारते हुए ले जाना चाहते थे, लेकिन मनीष पढ़ा-लिखा युवक होने की वजह से मातिन, चंदा व कुछ हिजड़ों को समझाया कि तारा भी मानव समाज का हिस्सा और उनका भी  सामान्य जन की भांति अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए । फिर सारे लोग मान गए और मनीष के साथ ग्रामीण लोग जिला अधिकारी को उपस्थित देख किन्नर समाज गौरवान्तित महसूस कर रहे थे । vFkkZr~ bl miU;kl esa dbZ ,sls eksM+ vkrs gSa tks lekt dks >d>ksj कर nsrk gSA pank dh leL;k gh ugha blesa fdUuj lekt o jktoa'k ifjokj dh समस्या Hkh crkbZ xbZ gSA pank ifjokj esa frjLd`r gqbZ ysfdu tc euh"k tSlk thou lkFkh vk;k mls viuk;kA tgk¡ cpiu esa mls fgtM+ksa ds gkFk lkSai nh xbZ eksuk ,d fQj vius firk ds ?kj c/kkbZ nsus igq¡prh gS& vksSj rc mldh ek¡ igpku ysrh gS yksd e;kZnk ds dkj.k og T;knk ckr ugha djrh gS fQj Hkh viuh csVh ds fy, vkrh gSA egkjktk txrflag igys dh rjg gh /ku nkSyr nsdj pank dks Hkxkuk pkgrs gSaA pank dh ftn vkSj ek¡ dk I;kj ,d fnu pank dks okil mlh ?kj esa viukus dks etcwj dj nsrs gSaA
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सन्दर्भ ग्रन्थ सूची



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[i] नीरजा माधव, यमदीप उपन्यास ,पृष्ट सं आवरण पृष्ट , सुनील साहित्य सदन २००९ |
[ii]  डॉ विजेद्रप्रतापसिह / रविकुमार गोड, भारतीय समाज एवं समाज में तृतीयलिंगीं विमर्श, पृ.सं.113,अमनप्रकाशन २०१६
[iii]  नीरजा माधव, यमदीप, पृ. सं 113 सामयिक प्रकाशन
[iv].  लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, मैं हिजड़ा ...मैं लक्ष्मी, पृ.सं. 77, वाणीप्रकाशन 2011 |
[v]. महेंद्र भीष्म, मैं पायल ,पृ.सं.24,अमन प्रकाशन 2016
[vi]. डॉ.  लवलेशदत , नवाब (कहानी) 
[vii]. महेद्र भीष्म, मैं पायल ,पृ. सं.36, अमन प्रकाशन 2016
[viii]. चित्रामुद्गल, पोस्ट बॉक्स नं. 203-नाला सोपारा, पृ.सं 2, सामयिक प्रकाशन 2017
[ix]. महेद्र भीष्म, किन्नर कथा,पृ.सं.41 सामयिक बुक्स 2011 
[x]चित्रा मुद्गल, पोस्ट बॉक्स  नं. 203, नाला सोपारा, पृ.सं. 71, सामयिक प्रकाशन, 2017  
[xi] चित्रा मुद्गल, पोस्ट बॉक्स  नं. 203, नाला सोपारा, पृ.सं. 71, सामयिक प्रकाशन, 2017                  
[xii] चित्रा मुद्गल, पोस्ट बॉक्स  नं. 203, नाला सोपारा, पृ.सं. 71, सामयिक प्रकाशन, 2017
[xiii] डॉ. सूरज बड़त्या, (कहानी) कबीरन, पृ.सं. 11, हम भी इंसान है, वाड्मय बुक्स
[xiv] डॉ. सूरज बड़त्या, (कहानी) कबीरन, पृ.सं. 11, हम भी इंसान है, वाड्मय बुक्स      
[xv] डॉ. सूरज बड़त्या, (कहानी) कबीरन, पृ.सं. 11, हम भी इंसान है, वाड्मय बुक्स      
[xvi] डॉ. सूरज बड़त्या, (कहानी) कबीरन, पृ.सं. 11, हम भी इंसान है, वाड्मय बुक्स प्रकाशन     

[xvii] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 49, सामयिक प्रकाशन,
[xviii]संदर्भ: महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 48, सामयिक प्रकाशन, 2011   

[xix] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 49, सामयिक प्रकाशन, 49

[xx] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 51, सामयिक प्रकाशन, 57
[xxii] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 51, सामयिक प्रकाशन, 2011
[xxiii] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 118, सामयिक प्रकाशन, 2011

[xxiv] महेन्द्र भीष्म, किन्नर कथा, पृ.सं. 132, सामयिक प्रकाशन, 2011


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