आज के प्रोफेसरों और शोधार्थियों को ठीक ढंग से मध्यकाल को पढ़ना और पढ़ाना नहीं आता है इसलिए कई बार सूर, तुलसी, रैदास, घनानंद,मीरा को पाठ्यक्रम से हटाने की बात करते हैं...यदि सही मायने में देखा जाए तो राष्ट्रीय एकता की दृष्टिकोण से जातिवाद/धर्मवाद का विरोध मध्यकाल में सबसे अधिक हुआ है। मध्यकाल के साहित्य में सामाजिक सुधार, राजनैतिक सुधार, धार्मिक सुधार, पर्यावरण के प्रति चेतना और स्वस्थ प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई। वहीं वर्तमान साहित्य में अशोभनीय राजनीति और भौतिकवाद का पलड़ा भारी दिखाई देता है। - डॉ मिलन बिश्नोई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
if you have any doubts ask me plz...