
हिंदी की ज्ञान परम्परा : गुरु जांभोजी की सबदवाणी में पर्यावरण चिंतन
भारतीय संस्कृति में ज्ञान, परम्परा और आध्यात्म की शिक्षा सदैव गौरवान्वित करने वाली रही हैं । किंतु समय के साथ बाहरी शक्तियों ने सभ्यता और संस्कृति को मिटाने का प्रयास निरन्तर किया हैं । इस घोर अंधकार समय में भी भारतीय ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं और समाज सुधारकों ने समय के अनुरूप जनता को संभालने का सराहनीय काम किया हैं । वर्तमान में भारतीय परम्परा और संस्कृति की धरोहर को बचाएं रखने के लिए कई प्रकार के व्यावधानों से जूझ रहे हैं ।
किंतु आजादी के अमृत महोत्सव में भारतीय संस्कृति का पुररुत्थान करने का प्रयास किया जा रहा है, जो सराहनीय है । आज भाषा, संस्कृति, धर्म-आध्यात्मिक के तत्त्व-चिंतन को लेकर अनेकानेक बहस हो रही है। किंतु पाश्चात्य संस्कृति के परमपोषकों को भारतीय ज्ञान-परम्परा से ज्ञानार्जन करने की आवश्यकता है । खासकर कोविड-19 ने सबको सबक सिखाया भी था । भारतीय संस्कृति ने सदैव आंतरिक यात्रा (आंतरिक तत्त्व खोज) को महत्त्व दिया है । जितने भी महापुरुष हुए हैं जैसे राम,कृष्ण, बुद्ध, गुरु जांभोजी, नानक, कबीर, रैदास, दादूदयाल, सुंदरदास, जसनाथ, रामदेव, हड़बूजी, पाबूजी, वीर तेजाजी इत्यादि । इन सभी महापुरुषों ने अपने ‘स्व’ को पहचानते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया हैं । यह सर्वविदित है हमारे महापुरुषों और संतों ने भारतीय परम्परा के माध्यम मानव और प्रकृति सहज संबंध बनाएं रखने में विश्वास बढ़ाया हैं ।
साहित्यकार डॉ. आनंद पाटिल परदेशीय संस्कृति की और पलायन करने वालों को देखकर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि “अतः एक प्रश्न बारंबार मन-मस्तिष्क में आता है कि ऐसी गुलामी मानसिकता वाले लोग-बाग अपनी धरोहर के संबंध में भला क्या (कुछ!) सोचेंगे ? इस मामले बिश्नोई समाज(संप्रदाय) ने इस नवऔपनिवेशिक समय में गुरु जांभोजी एवं उनके तत्त्व-चिंतन पर पुनः मनन-चिंतन करने का जो उपक्रम आरंभ किया है, वह सैद्धांतिक भटकाव और मुठभेड़ वाले इस समय में वांछित भी है और अनिवार्य भी! यह प्रयास अपनी धरोहर की ओर लौटने का यथेष्ट उपक्रम भी है और परदेशीय चिंतन से पल्ला छुड़ाने और अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए वैचारिक दृष्टि से स्वतंत्र और सुदृढ़ होने की अदम्य चाह का अप्रतीम उदाहरण भी ।” अर्थात् एक तरफ हम भारतीयता की बात करते हैं किंतु हम स्वयं आने वाली पीढ़ी तक हमारे रीति-रिवाज, तत्त्व-चिंतन और संस्कृति पहुँचाने में अक्षम है । किंतु गुरु जम्भेश्वर के अनुयायी आज विश्व स्तर पर अपनी संस्कृति और गुरुजी की ‘सबदवाणी’ को प्रसारित करने का अथक प्रयास कर रहे हैं ।
“यद्यपि आचार्य शुक्ल ने यह कथन कबीर (1398-1518) और (1469-1539) के आविर्भाव की चर्चा करते हुए किया है किंतु तत्त्व-चिंतन की समानता को यदि एक क्षण के लिए ध्यान में न भी लिया जाए तो जन्म और जीवनावधि की दृष्टि से विचार करने से ज्ञात होता है कि गुरु जांभोजी (1451-1536) कबीर और नानक के समकालीन हुए हैं । अतः जो कथन कबीर-नानक पर लागू होता है, वही जाम्भोजी पर यथावत लागू होता है । किंतु साहित्येतिहास ग्रंथकारों ने जाम्भोजी के रचना और कर्म का संज्ञान नहीं लिया । बहरहाल, स्मरणीय है कि कबीर निर्गुण भक्ति के संवाहक थे तो नानक (कबीर से मिलने से पूर्व) की प्रवृत्ति एक भक्त की थी और जाम्भोजी सगुणोन्मुख निर्गुण भक्ति के संवर्धक थे ।” हिंदी साहित्य इतिहास में भक्तिकाल में भारतीय संत-परम्परा बखूबी से वर्णन किया है । भक्तिकाल में रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण काव्य परम्परा में कबीर, गुरु नानक, रैदास, दादूदयाल और सुंदरदास का उल्लेख किया हैं, किंतु खेद का विषय है कि उनकी दृष्टि उत्तर भारत की संत परम्परा में महान पर्यावरणविद्, समाजसुधारक और नारी हितैषी गुरु जांभोजी तक नहीं पहुंची । जबकि डॉ. नगेन्द्र और परशुराम चतुर्वेदी ने गुरु जांभोजी के बारे में विस्तारपूर्वक बताया हैं । रामचन्द्र शुक्ल जी का कथन हैं कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है ।’ जबकि वे अपने इतिहास में कबीर की सबदवाणी का जिक्र करते हैं लेकिन गुरु जांभोजी की सबदवाणी और उनके जीवन उच्चादर्श को बताना भूल जाते हैं... गुरु जांभोजी का जन्म उस समय हुआ जब देश भयानक राजनीति, रूढ़िवादी, अंधकार, पाखंड और अत्याचार से जूझ रहा था । किंतु उनके व्यक्तित्व और शिक्षा से प्रभावित होकर दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी, नागौर का नवाब मुहम्मद खान नागौरी, मेड़ता के राव दूदा, जैसलमेर के राव जैतसी, जोधपुर के राठौड़ राव सातल देव, मेवाड़ के राणा सांगा उनकी शरण में आये थे ।
गुरु जांभोजी का जीवन परिचय- गुरु जांभोजी का जन्म 1451 ई.में राजस्थान के जोधपुर के निकट नागौर परगने के पीपासर ग्राम में हुआ । उनकी माता का नाम हंसा और पिता लोहटजी राजपूत थे । जनश्रुति के अनुसार कई वर्ष तक इन्होंने एक भी शब्द उच्चरित नहीं किया और चमत्कारिक प्रर्दशन के कारण जनता ने इन्हें ‘जम्भंजी’ कहना प्रारंभ किया । गुरुजी के अनेक नाम सामने आए हैं-“जम्भनाथ, जम्भे, जम्भै, जम्भेश्वर, जम्भैस्वराय, जम्भैजी, जांभराज, जाम्भेश्वर, जाम्भोविसन, भांभ, भांभैसर, भांभाजी, झांभराज इत्यादि ।” गुरु जी के केवल इतने नाम ही नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक सुधार संबंधित अनेक पुरुषार्थ देखने को मिलते हैं । उन्होंने 29 नियमों का निर्धारित करते हुए ‘बिश्नोई’ पंथ की स्थापना 1542 ई. में कार्तिक बदी अष्टमी को ‘समराथल’ के ऊँचे मरूभूमि के टीले पर की थी । आज भी बिश्नोई समाज के लोग इसे अपना ‘पवित्र तीर्थ स्थल’ मानते हैं तथा इसे ‘मुक्ति धाम’ और ‘धोक धोरे’ के नाम से जाना जाता है । ‘बिश्नोई’ का अर्थ 20+9 है । इस शब्द की उत्पति ‘वैष्णवी’ शब्द से हुई है । जिसका अर्थ विष्णु के अनुयायी होता है । ये लोग अपने गुरुजी को भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं । गुरुजी का मूलमंत्र – ‘विष्णु-विष्णु भण रे प्राणी’। गुरु जी के अनुयायी आज भी इनकी पूजा अपने आराध्य की भाँति करते हैं । और उनके द्वारा बताये गए नियमों का पालन दैनिक दिनचर्या में करते हैं ।
गुरु जांभोजी के 29 नियमों के बारें में भारत के उपराष्ट्रपति माननीय जगदीश धनकड़ ने बताया हैं कि-“गुरु जम्भेश्वर जी द्वारा रचित शब्द वाणी तथा बिश्नोई समाज के 29 धर्म नियमों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत का निचोड़ बताया और कहा कि इनके अनुपालन से जीवनशैली और समाज सदैव सही रास्ते पर रहेंगे ।” अतः गुरु जांभोजी द्वारा निर्धारित 29 नियम सरल-सहज और स्वस्थ जीवन यापन करने के लिए बनाए गए हैं- 1. तीस दिन सूतक 2. पांच दिन ऋतुवंती 3. सेरा करो स्नान 4.शील का पालन करें 5. संतोष धारण करें 6. बाहरी व आंतरिक पवित्रता रखें 7. प्रातः-सांय संध्या वंदना करें 8. संध्या को आरती और हरिगुण गान करें 9. प्रेमपूर्वक हवन करें 10.पानी, वाणी ईधन व दूध को छानकर प्रयोग करें 12. चोरी न करें 13. निंदा न करें 14. झूठ न बोलों 15 . वाद-विवाद न करें 16. अमावस्या का व्रत रखें 17. विष्णु का जप करें 18. हरा वृक्ष न काटें 20. काम, क्रोध,मद व लोभ, मोह से दूर रहें 21. हरा वृक्ष नहीं काटना 22. रसोई अपने हाथ से करनी 23. थाट अमर रखना 24. बैल का बधियाकरण नहीं करना 25. अमल-तम्बाकू का निषेध 26. मद्यपान का निषेध 28. मांस नहीं खाना 29. नील वस्त्र का त्याग
इन उनत्तीस नियमों का अत्यधिक महत्त्व बिश्नोई समाज के लिए आज भी हैं । 500 साल बाद भी गुरु जांभोजी के अनुयायी निस्वार्थ भाव से पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए प्राण न्यौछावर कर रहे हैं । क्योंकि गुरुजी के द्वारा बतायी गई इस आचार संहिता में सर्वप्रथम महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए प्रथम दो नियम उनके लिए बनाएं गए । वर्तमान केन्द्र सरकार और राज्य सरकार महिलाओं के महावारी में होने वाली समस्या और सामाजिक जागरूकता के लिए अभियान चला रही है किंतु गुरुदेव ने 15 वीं शताब्दी में महिलाओं के स्वास्थ्य की चिंता व्यक्त करते हुए कहा ‘पांच दिन ऋतुवंती न्यारो’ अर्थात् महावारी के समय महिलाओं के गृहकार्य, रसोई घर में जोखिम भरे कार्यों से मुक्त रखना । पुराने जमाने में महिलाएं बहुत दूर से पानी सिर पर उठाकर लाती थी । संयुक्त परिवार में महिलाओं को अकेले खाना बनाना पड़ता था इसलिए इस प्रकार उनके स्वास्थ्य में गिरावट की संभावना अधिक दिखाई दी । तब गुरुजी ने यह नियम लागू किया था, किंतु स्वास्थ्यप्रद लाभ को ध्यान में रखते हुए आज भी बिश्नोई समाज में महावारी के दिन महिलाओं को स्वस्थ भोजन घर के अन्य सदस्य बनाकर खिलाते हैं । यदि घर में कोई महिला नहीं है तो पिता-पति और भाई भी उसे आदरपूर्वक भोजन और सुविधाएं प्रदान करते हैं । महावारी जैसी आम बात को भारत में पुरुषों से छुपायी जाती हैं लेकिन यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है इस बात को बिश्नोई समाज में लज्जा की दृष्टि से नहीं बल्कि सम्मान के साथ महिला को देखा जाता है ।
‘तीस दिन सूतक’- महिला की संतान उत्पति के समय माँ और संतान के अच्छे स्वास्थ्य के लिए उसे एकांत और शांतमयी स्थान प्रदान करने के साथ गृहकार्यों से मुक्त रखकर उसको आराम करने की हिदायत दी गई है । तीस दिन तक किसी प्रकार के कार्य नहीं करवाएं जाते हैं । मां को पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए स्वस्थ आहार देना तथा जज्चा और बच्चा दोनों की देखभाल अन्य सदस्यों की जिम्मेदीरी होती हैं । इस नियम को भी केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें आज समझ सकी हैं वे अस्पताल में जज्जे और बच्चे की सुरक्षा की बात करती हैं । अर्थात् महिलाओं की शारीरिक और मानसिक समस्याओं को समझते हुए उनके स्वास्थ्य हेतु उचित संदेश दिए गए ।
इसी प्रकार पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण हेतु नियम बनाये गए हैं । जिसमें वन्यजीवों के प्रति दयाभाव, बैल का बधियाकरण पर निषेध, हरे वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध, गाय और अन्य जानवरों को कसाई खाने में भेजने पर प्रतिबंध, सूखी लकड़ियों को जलाने से पूर्व उनमें कीड़े-मकोड़े देखना यदि है तो ऐसी लकड़ी नही जलाने का आदेश दिया । अर्थात गुरुजी के इन नियमों को बहुत गहराई से समझें तो यह नियम केवल बिश्नोई समाज के लिए ही नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए बनाए गए हैं ।
पुराने जमाने में प्राकृतिक आपदा, भूकंप, बाढ़, जल-प्लावन,वन्य जीवों के शिकार तथा पारिस्थितिकी असंतुलन को देखते हुए गुरुजी ने नियमों को निर्धारित किया । यदि संपूर्ण भारत उनके नियमों की समझ होती तो शायद पर्यावरण प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता । ‘स्वच्छ भारत’ की चिंता गुरुदेव ने अपनी वाणी में कई बार की हैं । उन्होंने स्वच्छता से संबंधित नियम 29 नियमों में निर्धारित किये हैं । जिसमें आस-पास के वातावरण की शुद्धता के साथ आंतरिक शुद्धता को भी बनाये रखने का आह्वान किया हैं ।
आंतरिक वातावरण में पारिवारिक कलह, रिश्तों की टकराहट, आत्महत्या, अत्याचार जैसी घटनाएं निरन्तर बढ़ रही थी । ऐसे में गुरुजी ने शील-संतोष और क्षमा दया और “तन-मन धौइये संजम होइये हरख न खोइये” की बात बतायी हैं ।
बिश्नोई समाज द्वारा पर्यावरण संरक्षण और बलिदान- 1730 में जोधपुर मारवाड़ के महाराजा अभयसिंह ने चुने के भट्टे को जलाने के लिए ईधन की आवश्यकता बतायी । और राजा ने मंत्री गिरधारी भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री ने जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर खेजड़ली गाँव से वृक्ष लाने की सलाह दी । खेजड़ली गाँव में बिश्नोई पंथ के लोग वहाँ अधिक रहते थे इसलिए वहाँ हरे वृक्ष अत्यधिक मात्रा में थे । बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण और वन्यजीव के प्रति अत्यधिक प्रेमभाव रखते हैं । वहाँ से जब गिरधारीसिंह के नेतृत्व में वृक्ष काटने लगे । तब वहाँ की 42 वर्षीय अमृता देवी और उनकी तीन पुत्रियाँ आसु, रतनी, भागु बाई और पति रामू खोड़ सहित 363 लोगों ने अपने जान की परवाह नहीं करते हुए पेड़ बचाने के लिए बलिदान दिया । यद्यपि भारत के ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत यहीं से मानी जाती है । अमृता देवी पहली आधुनिक नारी मानी जाती हैं जिसने वृक्षों के लिए राजा-महाराजाओं का सामना किया।
खेजड़ली आंदोलन की तरह पेड़ों के लिए बूचोजी के बलिदान की भी अमर कथा बिश्नोई समाज में मिलती हैं । नरसिंघदास ठाकुर ने ईमारती लकड़ियों के लिए अपने लोगों पोलावास गांव मेड़ते में भेजा था । तब वहाँ बूचोजी ने उन लोगों को ललकारते हुए कहाँ- “यह मैं शहीद होने के लिए तैयार खड़ा हूँ आइये, कौन कर मेरा तमाम करेगा । मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं बिल्कुल इस जगह से हिलूंगा नहीं, सामने हाथ उठाउंगा नहीं, मेरा सिर धड़ से अलग कर दीजिये । नहीं अन्य कोई मेरा भाई बंधु विरोध करते हुए आपका सामना करेगा । आप लोगों में से जो अपने को शूरवीर समझता है वह सामने आ जाइये । मेरी एक शर्त है वह भी सुन लो मेरे बलिदान हो जाने के बाद फिर कभी तुम्हारे संबंधियों से कोई हरा वृक्ष नहीं काटेगा और नहीं कटवाने की प्रेरण देगा । यह जो वृक्ष कट गये है इनकी जगह तुम्हे दूसरे रूंख लगवाकर देने होगे यही रूंख कटने की घटना इस इलाके में अंतिम होनी चाहिये । इसलिए मेरा शरीर समर्पित है । मेरा शरीर काट लीजिये परन्तु रूंख नहीं काटना ।” अर्थात इस प्रकार गुरुजी के अनुयायी पर्यावरण की रक्षा करते हुए प्राणोत्सर्ग करने से पीछे नहीं हटते हैं । हाल ही में बॉलीवुड के प्रसिद्ध कलाकार सलमान खान सहित कुछ फिल्म अभिनेताओं को बिश्नोईयों के गाँव जोधपुर के निकट काले हिरण का शिकार करते हुए देख लिया तो बिश्नोई समाज लोग एकत्रित होकर वन्यजीव संरक्षण के प्रति आवाज उठाई । सलमान खान ने उन लोगों को पैसों का लालच देकर, असमाजिक तत्वों के डराने-धमाकने का खूब प्रयास किया किंतु आम सामान्य किसान परिवार के लोग बेझिझक होकर वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु लड़ते रहें ।
आजकल आधुनिक दौर में कई प्रकार योजनाएं और तकनीकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता हैं । लेकिन उन योजनाओं और आधुनिक संयत्रों के नकारात्मक प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया जाता । हाल ही में पश्चिमी राजस्थान की तरफ सोलर हब विकसित हो रहे हैं । इससे पर्यावरण और वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे को देखते हुए बिश्नोई समाज के लोगों ने जनआंदोलन किया हैं । उन्होंने बताया कि- “अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा का आरोप है कि गांव में सोलर प्लांट लगाने के लिए ली गई जमीनों पर मौजूट खेजड़ी के हजारों पेड़ों को काट कर दफना दिया गया है । बिश्नोई समाज के मुताबिक, खेजड़ी के लगभग 10,000 पेड़ों को काटा गया है जिसमें प्रशासन की मिलीभगत शामिल है । वहीं बिश्नोई समाज के कुच लोगों ने प्रशासन के सामने जेसीबी के पेड़ों के अवशेष मिले जिसके बाद समाज के लोगों का आक्रोश फूटा । इसके बाद पर्यावरण प्रेमियों ने एक-एक कर सैकड़ों की संख्या में काटकर जमीन में दबे पेड़ों को बाहर निकाला कार्रवाई के लिए फलोदी एडीएम को ज्ञापन सौंपा और अनिश्चितकालीन आमरण अनशन किया ।” यह बिश्नोई समाज का केवल एक ज्ञापन और केवल खाना-पूर्ति करने वाला अनशन नहीं था बल्कि 500 साल बाद भी गुरु जांभोजी की वाणी और संदेशों को निष्ठापूर्वक जीवन में उतारते हुए जीवनयापन करने का उदाहरण हैं ।
गुरु जी की वाणी का प्रभाव न केवल बिश्नोई पंथ के लोगों के पर हैं बल्कि बिश्नोई समाज के आसपास लोग भी उनकी तरह तरह पर्यावरण, वन्यजीव और मानवता की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । जैसाकि रामचन्द्र शुक्ल जी ने कहा है कि “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है । आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृतियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है । जनता की चित्तवृति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है । अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का किचिंत दिग्दर्शन भी साथ-ही-साथ आवश्यक है ।” अर्थात् गुरुजी की ‘सबदवाणी’ समस्त राजस्थान के कई संत महात्माओं पर दिखाय़ी देता हैं उन्होंने गायों, महिलाओं की रक्षा करते हुए मानवता का पाठ पढ़ाते है-वीर तेजाजी ,गोगाजी, हड़बूजी, रामदेवजी, जसनाथ,दादूदयाल, सुंदरदास इत्यादि।
इतना ही नहीं आज के संदर्भ में यदि देखा जाए तो आधुनिक समय और भागदौड़ में महिलाओं को अपनी संतान का पालन-पोषण करने में असफल होते दिखायी दे रही हैं । वहीं राजस्थान में बिश्नोई समाज की महिलाएं घायल नवजात हिरण, खरगोश, गाय के बछड़ों, मोर, नील गायों का इलाज करवाकर पालन पोषण करती हैं । ये महिलाएं कई बार हिरण के बच्चों को स्तनपान भी करती हैं । इस समुदाय के लोग वन्यजीव की सुरक्षा करते हुए हत्यारों और शिकारियों से लड़ते हुए बलिदान देते हैं । इनके इलाके में वन्यजीवों शिकार करना और पेड़ काटने का पूर्ण प्रतिबंध हैं । इनकी जीवन शैली अत्यधिक साधारण औऱ उच्चादर्शों से परिपूर्ण हैं ।
बिश्नोई समाज के लोग भारतीय आदर्शों को जीवन पूर्ण रूप से उतारते हैं । इनका मानना हैं-
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग भवेत् ।” ये लोग स्वार्थता से परे होकर मानवता की रक्षा सदैव करते आए हैं । हाल ही के ताजा उदाहरणों में बिश्नोई समाज के लोगों ने कोविड महामारी में दीन-गरीब और असहाय लोगों के लिए बिना किसी भेदभाव के तमाम प्रकार की सहायता करने आगे आए । राजस्थान में गायों में आयी ‘लम्पी महामारी’ के दौरान सरकार ने उचित समय पर कोई सहयोग नहीं किया किंतु बिश्नोई समुदाय के लोग ग्रामीणों के साथ मिलकर उन गायों का इलाज करवाने, देशी उपचार और चारा-पानी देने में डटें रहें । इनके प्रत्येक गाँव में वन्यजीव संरक्षण और गौशाला का प्रबंध सरकारी आर्थिक सहयोग के बिना स्वयं करते हैं । राजस्थान जैसे इलाके में भयंकर ठंडी और गर्मी में वन्यजीवों,गायों और वनोन्मूलन की सुरक्षा करने के लिए ग्रामीण लोग चंदा इकट्ठा करके करते हैं ।
गुरुजी की वाणी में ‘पहला सुख निरोगी काया’ बिश्नोई समाज लोग नित्य स्नान करके हवन करते हैं । इनके समाज में अमल,तम्बाकू और भांग, अफीम, मदिरा पर पूर्ण प्रतिबंध हैं । इस समाज के लोग नशा प्रवृत्ति से दूर रहते हैं । नशे के कारण आज लाखों की संख्या में प्रतिदिन एक्सीडेंट और हत्याएं तथा दुराचार हो रहे हैं किंतु बिश्नोई समाज के लोग सदैव प्रयासरत रहते हैं कि इनके समाज को स्वस्थ और स्वच्छ बनाएं रखने के लिए । यदि कोई नशा करते हुए, महिलाओं का अत्याचार करते हुए, चोरी करते हुए देखा जाए तो समाज के संत-महात्मा और बड़े लोग दण्ड देते हैं । गुरु जांभोजी का मुक्तिधाम मुकाम में प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है । वहाँ प्रत्येक वर्ष की गतिविधियों के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा करते हुए संत-महात्मा सुधार करने का आदेश देते हैं । गुरुजी के अनुयायियों ने उनकी शिक्षा अपने जीवन इस प्रकार उतारा हैं कि पाँच सौ साल बीत जाने के बाद भी बहुत संवेदनशील होकर उनकी वाणी का अनुसरण करते हैं । इस समाज के लोग सदैव आत्मनिर्भर रहे हैं । सबसे बड़ी बात यह है कि बिश्नोई समाज का कोई भी इंसान चाहे उच्च हो या निम्न हो वह कभी भिक्षा मांगते हुए कभी नजर नहीं आता हैं । इनके समाज का गरीब से गरीब अपनी मेहनत और परिश्रम के साथ जीवनयापन करता है और आस-पास के पशु-पक्षियों को भी दाना-पानी देता है । इस समाज में जब फसल निकाली जाती है, प्रत्येक घरों में उस अनाज का बहुत बड़ा हिस्सा आवारा गायों, पशु-पक्षियों और हिरणों-नील गायों के लिए दिया जाता हैं । अमावस्य,पूर्णिमा और ग्यारस के दिन ये लोग वन्यजीवों, गायों तथा पक्षियों के लिए मंदिर,चबूतरों और गौशाला में अनाज तथा चारा दान में देते हैं । मंदिरों और घरों में वातावरण शुद्धिकरण के लिए प्रतिदिन यज्ञ किया जाता हैं ।
गुरुजी की वाणी 500 वर्ष के बाद भी प्रासंगिक हैं और उनके अनुयायी समय के साथ पर्यावरण और मानवता का संदेश राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर देने के लिए प्रयासरत हैं । 4-5 फरवरी 2023 को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन दुबई में आयोजित करने जा रहे हैं । इस अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन का विषय पर “वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियाँ और बिश्नोई समाज के सिद्धांतों में समाधान” चिंतन-मंथन किया जाएगा । इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यह है कि आज पर्यावरण के समक्ष वैश्विक स्तर पर अनेक चुनौतियां हैं । जल, जमीन और जंगल खतरे में हैं । वायु और ध्वनि प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार की बिमारियाँ से त्रस्त हैं । ओजोन परत छलनी हो रही है । जैव विविधता में दिन-ब-दिन संकट बढ़ रहे हैं । जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिग, मरूस्थलीकरण, वनोन्मूलन, पारिस्थितिकी असुंलन, अम्लीय वर्षा इत्यादि कारणों से पर्यावरण के सामने संकट और चुनौतियाँ हैं, इन तमाम समस्याओं के साथ जीवनयापन करना आसान नहीं है । आज भले ही कृत्रिम मेधा (Artificial intelligence) बढ़ावा दिया जाने लगा हो ...किंतु इन समस्याओं और संकटों से निपटने के लिए हमारी ज्ञान-परम्पराओं और संस्कारों को जीवन में लागू करते हुए आगे बढ़ना होगा ।
कई बार समाज के लोग अपनी तृप्ती और धार्मिक आडम्बरों के कारण वातावरण और जीव-जन्तुओं को हानि पहुंचाते हैं । उन्हें गुरुजी जीवन के उच्चादर्श बताते हैं कि –
सुंणि रे काजी सुंणि रे मुल्ला सुंणि रे बकर कसाई ।
किण री थरपी छाळी रोसो किण री गाडर गाई ?
कांढै भागै करक दुहेली जायौ जीव न धाई ।
थे तुरकी छुरकी भिसती दैवौ खायबा खाज अखाजूं ।
चरि फिरि आवै सहजि दुहावै तिंहका खीर हलाली ।
तिंहकै गळै करद क्यौं सा’रो ? थे पढि गुंणि रहिया खाली । हीरालाल माहेश्वरी ने एक तथ्य में स्पष्ट किया है कि गुरुजी के दर्शन का प्रभाव जनसाधारण के साथ-साथ कई शासकों पर भी पड़ा था । जीव-दया पालनी की बात का महत्त्व समझते हुए सिंकदर लोदी, मुहम्मद खाँ नागौरी,मेड़ता के राव जैतसी, जोधपुर के राठौड़ राव दूदा, जैसलमेर के रावल जैतसी, मेवाड़ के राणा सांगा ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया था ।
विस्तृत फलक में देखा जाए तो गुरु जम्भेश्वर का तत्त्व-चिंतन समन्वयवादी हैं । उन्होंने जीवनादर्शों से विचलित होने वालों चेतावनी देते हुए कहते हैं- “इस कलियुग में तत्त्वज्ञान न हो पाने के कारण सभी भ्रम में पड़े दीखते हैं । ब्राह्मण वेदों को, काजी क़ुरान को और जोगी जोग को भुला बैठे हैं तथा मुण्डियों में तो अक्ल नहीं रही है।” वे कहते है-“मैं किसी का नहीं हूँ ; केवल सच्चे पुरुषों का हूँ । मैं तो सच्चे हिंदू का देव और सच्चे मुसलमान का पीर हूँ ।” गुरु जांभोजी की वाणी तथा उनके तत्त्व चिंतन की गहराई, भक्ति-वैविध्य, गुरु महिमा,ज्ञानोपदेश, कर्मशीलता, आत्मालोचना और आत्मज्ञान में लोकमंगल की भावनाएँ तथा सुधारवादी दृष्टि दिखाई देती हैं ।
हमारे देश में गुरु की महत्ता का बखान सदैव होता हैं । गुरु जांभोजी ने भी गुरु के संबंध बताया हैं-
सतगुरु ऐसा तत्त्व बतावै, जुग जुग जीवै बहुरि न आवै
गुरु न चीन्हों पंथ न पायो, अहल गई जमवारू
उत्तम जंग सूं, उत्तम रंग सूं रंगू । उत्तम लंग सूं, उत्तम ढंग सूं ढंगू ।
आज देश को पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर बात करनी पड़ती हैं । विश्वस्तर पर पर्यावरण और जैव विविधता के बढ़ते खतरों के कारण संपूर्ण राष्ट्र चिंतित हैं और इससे संबंधित सम्मेलनों का आयोजन भी किया जा रहा हैं । इसके संदर्भ में प्रबुद्ध साहित्यकार ऋषभदेव शर्मा लिखते है-“पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी यह अच्छी खबर है कि सम्मेलन में करीब 190 देशों के मत्रियों और अधिकारियों ने सहमति जताई है कि जैव विविधता की रक्षा वर्तमान विश्व की प्राथमिकता होनी चाहिए । इस आपसी समझ का ही असर है कि इस समझौते में कीटनाशकों के उपयोग को क करने जैव विविधता को होने वाले नुकसान को रोकने और उसे सुधारने के लिए संकल्प जताया गया। ” उनका मानना है पर्यावरण के हितैषी आदिवासी समाज भी सदैव रहा है । सरकारी योजनाओं से भी वे भयभीत रहते हैं क्योंकि जल,जमीन और जंगल को सदैव इनसे खतरा हैं । इसी प्रकार गुरुजी और बिश्नोई समाज के बारे में देश के प्रबुद्ध राजनेताओं ने कई बार अपने मंचीय भाषणों के माध्यम संदेशों के बारे में बताया हैं –गजेन्द्रसिंह शेखावत ने कहा-“मित्रों मैं बिश्नोई समाज से निवेदन करता हूँ कि वे मुझे गोद लेंवे मैं उनके साथ 24 घंटे काम करूँगा और पर्यावरण की रक्षा करूँगा ।” उन्होंने यह भी बताया कि “बिश्नोई समाज जल, जगंल और जमीन के वास्ते बात करता है, जबकि पाश्चात्य संस्कृति के अंधाधुंध अनुकरण के कारण हमने इन प्रकृति प्रदत्त चीजों का खुद को मालिक समझ लिया । भगवान जंभेश्वर ने प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का संदेश ना दिया होता तो हमारे लिए क्या ये पर्यावरण बचता ? आप लोगों ने पेड़ों की रक्षा के वास्ते बलिदान दिया । आज विश्वस्तर पर उदाहरण पेश करने की क्षमता है।” आजादी के अमृत महोत्सव में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने वक्तव्य में पर्यावरण की बात करते हुए बताया है कि “संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत को ‘चैम्पियन ऑफ द अर्थ’ सम्मान बिश्नोई जैसे समुदायों द्वारा किए गए बलिदानों के कारण ही संभव हो पाया हैं...लोग कहते है कि मोदी जी आपका सम्मान हो गया है । मुझे लगता है कि दुनिया को पता नहीं है मेरी राजस्थान की धरती पर बिश्नोई समाज...जब दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग का ‘ग’ मालूम नहीं था और पर्यावरण का ‘प’ पता नहीं था, तब मेरे बिश्नोई समाज के लोगों ने सदियों पहले पर्यावरण की रक्षा के लिए बलिदान दिए आज भारत को चैम्पियन द अर्थ जो सम्मान मिला है उसके मूल में पर्यावरण की रक्षा के लिए बलिदान देने की परम्परा वाले देश के कोने-कोने में हैं । भाइयों-बहनों भारत आज उसकी महान परम्परा और उसके मूल्यों के द्वारा मिली शिक्षा है उसके लिए इन सदियों से चली आई परम्परा वालों को शत-शत नमन करता हूँ । इस परम्परा से जुड़े हर व्यक्ति को मैं नमन करता हूँ ।” अर्थात् आधुनिक समय में राष्ट्र और पर्यावरण हित के लिए हमारी संत-महात्माओं के द्वारा बतायी गई ज्ञान परम्परा की और लौटने की आवश्यकता है ।
संदर्भ- गुरु जांभोजी : तत्त्व-चिंतन और उच्च जीवनादर्श का आग्रह, गगनांचल पत्रिका,मई –जून 2022 अंक, पृष्ठ संख्या-36
2. वही, पृष्ठ सख्या 36
3. https://pib.gov.in /pressReleaselframepage.aspx?prid=186102
4. https://www.bishnoism.org-ka-balidan.html?m=1
5.jodhpurthousandofkhejritreesdi-rajasthan-au275-129602.html
6.श्री जम्भवाणी टीका,डॉ हीरालाल माहेश्वरी, श्री गुरु जम्भेश्वर साहित्य सभा, फिरोजपुर,द्वितीय संस्करण 2011
7.हीरालाल माहेश्वरी,वही,पृष्ठ संख्या-33
8.वही, पृष्ठ संख्या-13
9. https://www.newslaundary.com/2018/12/06/raje-goverment
10 विविधता बचेगी,तो मनुष्य बचेगा,डेली हिंदी मिलाप,बुधवार,21 दिसम्बर 2022
लेखक परिचय
डॉ. मिलन बिश्नोई
सहायक आचार्य
खाज़ा बंदानवाज विश्वविद्यालय,कलबुर्गी,कर्नाटक
ई-मेल –milanbishnoi@gmail.com
Mob-6380568643
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