मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

साहित्य में किन्नर विमर्श : LGBTQ+ समुदाय

आलेख प्रकाशित- परिवर्तन पत्रिका, अप्रैल-सितंम्बर 2022, पेज नं.-154-161, ISSN-2455-5169 

           समाज में हाशिये की परिधि पर खड़े किए गये वर्ग या समुदाय की उपस्थिति सदियों से बनी रही है । परंतु उन्हें निजी स्वार्थ के कारण सामान्य या सभ्य कही जाने वाली जनता और जनसमुदाय ने कभी भी अपनाने की कोशिश नहीं की । इस संदर्भ में वैश्विक परिदृश्य के दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है, तब भी विस्तृत फलक में निराशाजनक परिणाम ही देखने को मिलते हैं । किसी भी देश का साहित्य और इतिहास को देखा जाए तो किन्नर समुदाय यानि थर्डजेंडर को दोयम दर्जे के दृष्टिकोण से ही देखा जाता है । उन्हें सामान्य इंसान की श्रेणी से कोसों दूर रखा गया । वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि किन्नरों के साथ अमानवीय व्यवहार ही किया जा रहा है ।

        समाज की बनी बनाई परम्परा में स्त्री औरपुरुषयानि की ‘Male’ और ‘Female’ का ढांचा बना दिया गया है, जो सिर्फ संतान पैदा करने की क्षमता रखता है, वे ही सामान्य समाज का सदस्य कहलाने और इस समाज की संरचना को निर्धारित करने योग्य हैं । स्त्री और पुरुष के मध्य अपने आप को भिन्न समझने वाले या लैंगिक विकृति और प्राकृतिक रूप से लैंगिक कमजोरी वाले इंसान को सामाजिक रूप से मानवीयता का दर्जा नहीं दिया गया । संवैधानिक रूप से 21वीं सदी में कानून के द्वारा तो उन्हें उचित अधिकार मिल गए हैं किन्तु आज भी उन्हें खोखले समाज में स्वीकृति नहीं मिली है ।

       थर्डजेंडर की पहचान कोई आज और कल में नहीं हुई है, जो मुख्यधारा के लोग इन्हें अजूबे की तरह देख रहे हैं । आज भी इन्हें अपने ही घर और परिवार तथा समाज से भगाया और दुत्कारा जाता है । ये भी मानव समाज का ही अंग है, इन्हें धिक्कार, तिरस्कार, उपेक्षित व्यवहार के बजाय सम्मान के साथ अपनाने की जरूरत है । समाज में उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है- अरावनी, जोगप्पा, छक्का, मामू, ख्वाजासरा, थर्डजेंडर, पवैया, नपुंसक, तृतीयलिंगी, मंगलमुखी, किन्नर इत्यादि । विभिन्न नामों से संबोधित किए जाने वाला समुदाय दर-दर की ठोकरें खा रहा है । कुछ लोग मंगलमुखी, शिखण्डी,जोगप्पा या अर्धनारीश्वर के नामों से बुलाना सम्मानजनक मानते हैं लेकिन वास्तविक सम्मान तो तब मिलेगा जब समाज इन्हें सामान्य संतान की भांति अपनाने की पहल करेंगे ।

          सामान्य समाज के द्वारा दुरदुराए और सहमें हुए अपने आप को हीनतर समझने औरं कमतर आंकने वाले  इस किन्नर समुदाय ने स्वयं का समुदाय ही स्थापित किया है । स्वयं का समुदाय स्थापित करना भी जरूरी था, क्योंकि परिवार और समाज ने किन्नर बच्चों को लावारिश बनाकर कचरे के ढ़ेर में फेंकने का काम किया है । आज किन्नर स्वयं एक-दूसरे का सहारा बनकर अपने अस्तित्व की जंग बिना किसी हथियार और हड़ताल के लड़ रहे हैं । विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग समय में इन्हें मान्यता और संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ । दक्षिण एशिया में हिजड़ा,थाइलैंड में कैथोय और मैक्सिको में मक्स नाम से इन्हें जाना जाता है । वर्तमान समय में ‘LGBTQ’ से ताल्लुक रखने वालों को लगभग 175 देशों में थर्डजेंडर और ‘Transgender’ के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त है । समाज ने अपनी निगाहों में थर्डजेंडर को एक अजूबे की भाँति या फिर डरावने जंगली जानवर की तरह ही देखा है । लैंगिक अपरिपक्वता और अधूरापन ही उनके जीवन का अभिशाप बन गया है, समाज उनसे नफरत तो करता है, साथ वह यह भी चाहता है कि तथाकथित सभ्य समाज पर उनकी परछाई भी न पड़े । समाज के लोग जैविक दोष और यौन-अविकास वाले बच्चों को परिवार में रखना कलंक तक मानते हैं । सामाजिक दबाव के कारण ही सही लेकिन लिंग अस्पष्टता के कारण  उनके माता-पिता भी अपनी संतान से पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते हैं । इन बच्चों (नपुंसक) को तिरस्कृत करने तथा स्वयं को समाज के ठेकेदार समझने वाले विकृत, विकलांग मानसिकता तो लिए हुए हैं ही साथ ही वे दंभी सोच से ग्रसित भी हैं । ये वे लोग हैं जो अपनी दोहरी मानसिकता के कारण कैंसर पीड़ित, पोलियो, चर्म रोग, मानसिक विकृति और विकलांग बच्चों का पालन-पोषण करने में असमर्थता प्रकट नहीं करते, लेकिन मात्र कपड़ों में छुपी रहने वाली लैंगिक कमी के कारण ये लोग तृतीयलिंगी बच्चों को स्वीकार नहीं कर पाते ।

               शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद भी थर्डजेंडर बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है । कहने को तो हम वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी आदर्श बातों में विश्वास रखते हैं परंतु वास्तविक जीवन में हम अपनी ही संतान को समाज से विस्थापित करने पर तुले रहते हैं । तब क्या भारतीय प्रतिष्ठा और नैतिकता पर आंच नहीं आती? भारतीय समाज में स्त्री को शक्ति का दर्जा देकर भी उनके साथ शोषण करने से नहीं चूकते । स्त्रियों को भी अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए हजारों साल लड़ना पड़ा है । उसी प्रकार किन्नरों को समाज एक तरफ दैवीय शक्ति से कम नहीं समझता है , दूसरी तरफ इन्हें हिकारत व कलंकित समझता है । समाज के लोग इनका शुभ अवसर में आशीर्वाद मिलने पर खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं, तो फिर इनका तिरस्कार और शोषण क्यों किया जा रहा है? थर्डजेंडर का साहित्य और इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, इसके बावजूद भी द्विलिंगीय समाज ने इनका सिर्फ ‘Use’ (उपयोग) व उपभोग किया है ।

           पौराणिक काल से लेकर पाश्चात्य साहित्य तक किन्नरों ने विभिन्न प्रकार की सेवाओं में अपना योगदान दिया है । ‘380-85 ई.पू. से लेकर आज तक इस समुदाय के अनेकानेक संदर्भ देखने को मिलते हैं, फिर भी साहित्य और समाज में इनको सम्मानजनक स्थान से रखा गया । आज भी किन्नर अपने अस्तित्व की तलाश में भटक रहे हैं । मूलभूत सुविधाओं से वंचित आज भी यह समुदाय हर क्षेत्र में आखिरी छोर पर खड़ा दिखाई देता है । खैर 21 वीं सदी में नवीन और चर्चित विमर्शों में से किन्नर विमर्श भी चर्चा का विषय बना और साहित्यकारों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित होने लगा है ।  साहित्य में इस नव्य विमर्श को तृतीयलिंगी विमर्शकिन्नर विमर्शके नाम से प्रचलित करने का प्रयास किया गया है ।  अर्थात् यहाँ  किन्नर शब्द का अभिप्राय हाशियागत समुदाय से है । जो स्त्री और पुरुष से इतर अथवा तृतीय लिंग के अन्तर्गत परिगणित होते हैं ।

          साहित्य और समाज में किन्नर शब्द को लेकर कई बार आपत्तिजनक बहसबाजी होती रही है, किन्नर’, ‘हिजड़ा’, औरथर्डजेंडर के प्रयोग पर विभिन्न मत देखने को मिलते हैं । कुछ साहित्यकार किन्नरको हिजड़ा नाम से संबोधित करने की सलाह देते हैं । अधिकांश साहित्यकार पौराणिक/प्राचीन ग्रंथों के अनुसारकिन्नर शब्द से बुलाना उचित मानते हैं, वहीं कुछ साहित्यकार मंगलमुखी शब्द से संबोधित करना उत्तम समझते हैं, क्योंकि भारतीय हिंदू परम्परा में किन्नरों से आशीर्वाद लेकर उन्हें  बधाई (नेग) देकर मंगलकार्य की शुरुआत करते हैं इसलिए इन्हें मंगलमुखी कहा जाता है ।

           यद्यपि समाज और साहित्य के पुरोधाओं ने किन्नरों को हिजड़ा या थर्डजेंडर कहना ही उचित समझा । तब मन में कहीं ना कहीं सवाल उभर कर आ ही जाता है कि फिर इनके हिसाब से प्रथम जेंडर किसे माना जाए? यदि माना भी जाए तो पहला,दूसरा और तीसरा दर्जा किसी को किस हिसाब से देना उचित होगा? अगर थर्डजेंडर संबोधन के संदर्भ में स्वयं उस समुदाय से जुड़े लोगों की बात करें तो स्पष्ट होता है कि वे स्वयं को तीसरे दर्जे का इंसान मानने को राजी नहीं हैं । भला मानेंगे भी क्यों? खैर वर्तमान में संवैधानिक स्तर पर थर्डजेंडर शब्द मान्यता प्राप्त है । लेकिन  हिजड़ा शब्द कहना और सुनना गाली देने जैसा प्रतीत होता है ।

किन्नर और हिजड़ा शब्द-प्रयोग के संदर्भ में नीरजा माधव का कहना है कि एक तथाकथित प्रचलित-सा नाम किन्नर कहीं से क्या उछला कि सभी लेखक, आलोचक, प्रोफेसर और शोध छात्र देखा-देखी उसका प्रयोग हिजड़ा समुदाय के लिए करने लगे । बिना किन्नर शब्द का वास्तविक अर्थ शब्दकोशों में ढूँढे एक ताना-बाना बुना जाने लगा किन्नर विमर्श । जबकि शब्दकोशों के अनुसार किन्नर एक जाति विशेष के लोगों का संबोधन है जो देव योनि के माने जाते हैं । उनके भीतर हिजड़ों की भाँति कोई लैंगिक विकृति नहीं पाई जाती है ।  नीरजा माधव ने अपने उपन्यास में बार-बार हिजड़ा शब्द प्रयोग किया है । जैसा कि उन्होंने आलोचकों,    शोधार्थियों, प्रोफेसरों पर भी आरोप लगाया कि बिना अर्थ जाने-समझे किन्नर शब्द का प्रचलन शुरू कर दिया । यह कहना भी साहित्य और किन्नर समुदाय के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है।

       उक्त भ्रम किन्नोर प्रदेश (हिमाचल) की एक क्षेत्रीय जाति के कारण उत्पन्न हुआ है । यह तर्क जब किन्नर विमर्श में किन्नर शब्द-प्रयोग के विरुद्ध कहा जाता है तो हास्यास्पद स्थिति बन जाती है । किन्नर शब्द को संस्कृत भाषाकारों ने अश्वमुखी कहकर संबोधित किया जिसका सीधा अर्थ न स्त्री और न पुरुष होता है, इतना ही नहीं किन्नर शब्द का एक पर्याय किंपुरुष शब्द भी माना जाता है । किन्नर जाति के गुण-धर्म (संगीत,नृत्यादि) की समानता तृतीयलिंगी से मिलती-जुलती है, महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप एक नृत्यांगना के तौर पर उल्लेखनीय है जिन्हें नपुंसक होने का श्राप मिलने की कथा भी प्रचलित है । वर्तमान में भारतीय पौराणिकता को मद्देनज़र रखते हुए ही कुंभ जैसे मेलों में अखाड़ा पद्धति के अंतर्गत तृतीयलिंगी समुदाय का अखाड़ा भी किन्नर अखाड़ा नाम  से प्रसिद्ध तथा मान्यता प्राप्त है । किन्नर समुदाय पौराणिक परम्परानुसार सदियों से नाच-गान  व आशीर्वाद देकर जीविकोपार्जन भी करता रहा है।

तृतीयलिंगी समुदाय स्वयं किन्नर शब्द को सहर्ष स्वीकार करता है । हमारे पौराणिक धर्म ग्रंथों में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा मानस-किन्नर शीर्षक से मुरारी बापू की एक कृति देखने को मिलती है । रामायण में किन्नर शब्द का उल्लेख किया गया है, मानस किन्नर पुस्तक में किन्नरशब्द से संबंधित विस्तार से चर्चा की गई है । इस संदर्भ में मुरारी बापू कहते है कि जिन किन्नरों के बारें में मेरे गोस्वामी ने मैदान में...डिम-डिम-डिम घोष करते हुए सोलह बार रामचरितमानस में किन्नर शब्द का प्रयोग किया । और गोस्वामी के अन्य संदर्भ-ग्रंथों का यदि विवरण आपको दूँ तो और किन्नर शब्द आपको मिलेंगे । कुल मिलाकर छब्बीस बार तुलसी ने किन्नर को साधु हृदय से याद किया है । संदर्भ से दृष्टिगत होता है कि लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा में हिजड़ा शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए किन्नर शब्द को स्वीकार किया है- हिजड़ा मूल उर्दू भाषा का शब्द है । वो भी हिजर इस अरेबिक शब्द से आया हुआ ।हिजर यानि अपना समुदाय छोड़ा हुआ, उस समुदाय से बाहर निकला हुआ । मतलब स्त्री-पुरुष के हमेशा समाज से बाहर निकलकर स्वतंत्र समाज बनाकर रहने वाला। यहाँ हिजड़ा शब्द को परिभाषित किया है । इसी प्रकार विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है । इसके साथ उन्होंने इस आत्मकथा में यह भी बताया है कि हिजड़ा शब्द को वर्तमान में गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।

           लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के अनुसार- उर्दू और हिंदी में हिजड़ा शब्द है । इसके साथ ही उर्दू में ख्वाजासरा भी कहा जाता है । हिजड़ों को अपने प्राचीन धर्म ग्रंथों में किन्नर शब्द की संकल्पना है । इस वजह से हिजड़ों को हिन्दी में किन्नर भी कहते हैं । मराठी में हिजड़ा और छक्का, पंजाबी में जनखा। तेलुगु में नपुंसक्कुडु,कोज्जा,मादा कहा जाता है तो तमिल में थिरूरनागाई,अली,अरवन्नी,अरावनी,अरूवनीइत्यादि शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है ।  अर्थात् यहां नीरजा माधव के अनुसार हिजड़ा शब्द को स्वीकारने के बावजूद भी किन्नर शब्द को नकारा भी नहीं जा सकता । क्योंकि जब स्वयं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर किन्नर शब्द को स्वीकृत करते हुए सहज दिखाई दे रही हैं तो अन्य लोगों को इसे बहस का विषय नहीं बनाना चाहिए । विवेच्य अर्थों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि - किसी इंसान को छक्का,मामू,हिजड़ा कहने की बजाय उन्हें स्वस्थ मानसिकता के साथ बुलाना अधिक उचित समझा जाए । उन्हें उनके नाम से बुलाने में  एतराज नहीं होना चाहिए । किसी आदमी को यदि बार-बार मर्द शब्द संबोधन के साथ बुलाया जाएगा तो वह सहजता महसूस करेगा ? खैर किन्नरों को बहसबाजी, तिरस्कार, धिक्कार और शोषण का सामना करने की हिम्मत 21 वीं सदी में मिल रही है ।

स्वाभिमान और अस्तित्व की पहचान की कीमत देर-सवेर किन्नर समुदाय स्वयं ही समझ रहा है । जब यह समुदाय अपने अस्तित्व के लिए आवाज उठानी शुरू करते हैं, तो हिंदी साहित्यकार भी संवेदनशील होकर प्रासंगिक किन्नर विमर्श का नवसृजन और नवअध्याय लेखन में अपनी सहभागिता की उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ-साथ उनके जीवन में मिले सामाजिक स्तर के गहरे घावों पर मरहम लगाने का सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं।

         हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श

          विमर्श को अंग्रेजी में ‘DISCOURSE’  कहा जाता है, उसे हिंदी में किसी विषय का गहन अध्ययन करना,चिंतन-मनन करना,तर्क-विर्तक करना तथा उस से संबंधित विषय के विभिन्न पहलुओं को जानना और सभी पक्षों की तटस्थता से पड़ताल करना ही विमर्श है । हिंदी कोश में विमर्श का अर्थ – सोच-विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता लगाना, किसी बात या विषय पर कुछ सोचना, समझना, विचार करना, गुण-दोष आदि की आलोचना या मीमांसा करना, जाँचना और परखना, किसी से परामर्श या सलाह करना । हिंदी साहित्य में विमर्शों की शुरुआत स्त्री-विमर्श से माना जा सकती है, साथ ही मुख्यधारा में पीड़ित-शोषित वर्ग की आवाज रोटी-कपड़ा-मकान तक सीमित न होकर अपने देश के वातावरण में स्वतंत्र होकर समानाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले मानवीय बुद्धिजीवियों के लिए नव चिंतन-मनन की आवश्यकता महसूस हुई ।

       विमर्शों की शुरुआती आहट अधिक पुरानी नहीं है । स्त्री विमर्श से शुरू होकर दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, समलैंगिक विमर्श,कृषक विमर्श,पर्यावरण विमर्श’, ‘पुरुष विमर्श, ब्राह्मण विमर्श और किन्नर विमर्श तक हलचल होने लगी है । अवलोकनकर्ताओं ने विमर्श का उद्देश्य मुख्यधारा के समाज व सत्ता के नेतृत्वकर्ताओं को अपनी सम्पूर्ण समस्याओं से परिचित करवाते हुए  अपने मानवोचित अधिकार मांगने के साथ इंसानियत का दर्जा प्राप्त करना बताया है ।स्त्री विमर्श की शुरुआत सदियों से स्त्रियों को चारदीवारी में रखने तथा पर्दा प्रथा,सती प्रथा,बालविवाहजैसी तमाम कुरीतियों से मुक्ति पाने के लिए हुई है । इसी प्रकार  दलित विमर्श में छुआछूत और भेदभाव का सामना करने के साथ-साथ शोषित-पीड़ित होने वाले समाज ने अपनी आवाज बुलंद कर अधिकारों की माँग की । जल- जंगल और जमीन के रक्षक आदिवासियों ने समय की माँग के अनुरूप अपनी समस्याओं के प्रति सजग होकर अपने अधिकारों की मांग की है । इसी प्रकार 21वीं सदी में दबे-कुचले और पिछड़े वर्गों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के प्रति जागरूक होकर मुख्यधारा से जुड़ने की पहल की है । इन तमाम हाशियागत वर्ग-समुदायों की आवाज और जन आंदोलन के साथ-साथ विविध विमर्शों में  किन्नर अस्तित्व की तरफ देखना भी जरूरी है ।

       किन्नर विमर्श की बात की जाए तो इस समुदाय की जटिल समस्याओं और मूलभूत आवश्यकताओं को सामान्य स्तर पर समझना होगा । सदियों से अर्थात् मानव सभ्यता के आरम्भिक दौर से लेकर समाज के विकसित होने तक किन्नरों की उपस्थिति लगातार बनी रही है, इसके बावजूद भी मुख्यधारा के लोगों ने इन्हें हाशिये के कठघरे में खड़ा रखा है । प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा  के अनुसार-हिंदी के आधुनिक काल के साहित्य में निरालाकेकुल्लीभाट का चरित्र यदि समलैंगिक व्यक्ति का चरित्र है तो शिवप्रसादसिंह की बहाववृति तथा बिंदा महाराज जैसी कहानियों के चरित्र में तृतीयलिंगी विमर्श की आरम्भिक आहट देने वाले किन्नर चरित्र है जो समाज की मूलकथा में पुनर्वास के लिए जूझ रहे हैं । वृंदावनलाल वर्मा की एकांकी नीलकंठ का भी इस श्रेणी में उल्लेख किया जा सकता है । इसी कड़ी में सुभाष अखिल की दरमियानाकहानी 1980 में सारिका पत्रिका में प्रकाशित हुई इन्होंने 2018 में  इस कहानी को विस्तृत रूप देकर उपन्यास में तब्दिल किया । वैसे तो किन्नरों के जीवन से संबंधित कुछ गिनी-चुनी रचनाएं हिंदी साहित्य में पहले से मौजूद थी, 1980 के दौर से पहले ही कुछ अंश में नाटक और अन्य विधाओं में दिखाई देती है, लेकिन हिंदी साहित्य में इस दौर के पश्चात लंबा ठहराव देखने को मिलता है जो आगे चलकर 2002 में तृतीयलिंगी विमर्श के रूप में उभरकर सामने आता है ।

          आलोच्य 21 वीं सदी में किन्नर विमर्श यानि तृतीयलिंगी समुदाय को साहित्य के केंद्र में लाने का काफी प्रयास किया जा रहा है । इस समुदाय की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को साहित्य के माध्यम से समाज को रू-ब-रू करवाने में उपन्यासकार और कहानीकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । जिनमें नीरजा माधवयमदीप, महेन्द्र भीष्मकिन्नर-कथा,मैं पायल, प्रदीप सौरभ तीसरी ताली’, निर्मला भुराड़ियागुलाममंडी, मैं भी औरत हूँअनुसूया त्यागी, सुभाष अखिलदरमियाना, चित्रामुद्गलपोस्ट बॉक्स नं.203, राजेश मल्लिकआधा आदमी, डॉ विमला मल्होत्राकिन्नर मुनिया मौसी, भंगवत अनमोल जिंदगी 50-50, गिरिजाभारती अस्तित्व, हरभजनसिंह मेहरोत्राऐ जिंदगी तुझे सलाम, भुवनेश्वर उपाध्याय हॉफमैन, नरेन्द्र कोहलीशिखण्डी, डॉ मोनिका शर्माअस्तित्व की तलाश में सिमरन, रेनू बहल मेरे होने में क्या बुराई, डॉ लता अग्रवालमंगलमुखी, शरदसिंहशिखण्डी स्त्री देह से परे, ड़ॉ मुक्ति शर्मा श्रापित किन्नर, अर्चना कोचर किन्नर कथा-एक अंतहीन सफर इत्यादि । 20 वीं सदी के छठे-सातवें दशक में विमर्शों को आधार बनाकर उपन्यासकारों ने समाज के शोषित वर्ग को तथाकथित समाज के केन्द्र में लाने का प्रयास किया है । जिनमें नारी विमर्श को आधार बनाकर उपन्यास लिखे गये और समय के साथ-साथ दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, किसान विमर्श, सत्ता विमर्श, आदिवासी विमर्श और किन्नर पर भी कलम चलाने की शुरुआत हुई ।

         अंग्रेजी साहित्य में किन्नर समुदाय/थर्डजेंडर समुदाय

          विवेच्य साहित्य के परिदृश्य में देखा जाए तो अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी साहित्य में ‘LGBTQ’ समुदाय पर अधिक लेखन किया गया । अंग्रेजी भाषा में विभिन्न देशों के साहित्यकारों ने ट्रांसजेडर और थर्डजेंडर समुदाय के जीवन पर विस्तृत रूप से लिखा है । भारतीय भाषा में भी उनकी उपस्थिति मनुस्मृति, कामसूत्र, महाभारत और रामायण में देखने को मिलती है । अंग्रेजी साहित्यकारों के संस्मरण के रूप में ट्रांस-आइडेंटिफाइड,ट्रांसजेंडर,समलैंगिकता पर अनेकानेक संस्मरण पढ़ने को मिलते हैं          लिली एल्बे की पुस्तक ‘The Danish Girl’ सेक्स री असाइनमेंट पर यानि सर्जरी करवाने वाली लड़की के जीवन को आधार बनाकर लिखी गई है । जिनकी देखरेख सेक्सोलॉजिस्ट मैग्नस हिर्शफेल्ड ने की थी । 1931 में ऑपरेशन के बाद लिली एल्बे की मृत्यु हो जाती है, उसके दो साल बाद मैन इन टू वुमन नाम से संस्मरण प्रकाशित होता है, जिसे अर्स्ट लुडविग जैकबसन में नील्स होयर द्वारा संपादित किया गया । यह पुस्तक ट्रांसजेडर, ट्रांस- सेक्सुअलिटी वाले लोगों के प्रति सामान्य जनता, प्रशासन और मीडिया का ध्यान आकर्षित करवाती है ।

          ट्रांस जूलियट जैक्स द्वारा संस्मरण समीक्षा लिखी गई ‘An Honest Account Of Gender Transition’ इस में 1980 के दशक के अंत तक लेखक इन सस्मरणों पर सम्मेलनों में सवाल उठा रहे थे । विशेष रूप से उन्होंने सवाल उठायापुरुष और महिला के बीच की जगह का प्रतिनिधित्व कैसे किया जाए? ‘स्त्री-पुरुष के अलावातीसरे लिंग की पहचान करने वाले डॉक्टर्स के खिलाफ बात की गई और नारीवाद के भीतर ट्रांसफोबिया होने के बारे में बताया गया ।सैडी स्टोन ने द एम्पायर स्ट्राइक्स बैक: ए पोस्ट-ट्रांस सेक्सुअल को मेनिफेस्टो के रूप में ऑनलाईन के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदायों में प्रसारित किया ।

       संस्मरणों का अनुसंधान करने पर ज्ञात होता है कि अधिकांश संस्मरण में ट्रांस और जेंडर को एक पहचान और एक भाषा देने की मांग की गई है । उन्हें अपनी आइडेंटिटी स्वयं निर्धारित करने की बात की गई है । उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय को संगठित करने और उनके भीतरी सवालों पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया है । यह संस्मरण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बाहरी लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया । यह संस्मरण आत्मकथाओं के दौर में लिखा हुआ है । अस्तु अंग्रेजी साहित्य में समलैंगिक,विषमलैंगिक,होमोसेक्सुअल,थर्डजेंडर और ट्रांसजेंडर जीवन के बारे में जानने के लिए आत्मकथा, संस्मरण,  उपन्यास और कहानियों को देखा जा सकता है ।

          सेवेरो सरड्यू 1960-1970 वें दशक के लेखकों में से एक है । उन्होंने 1972 में कोबरानामक ट्रांसवेस्टाइट की कहानी लिखी है । इसमें जन्मजात तृतीयलिंगी देह में बदलाव करने का जुनून दिखाया गया है, जो विषमलिंगी पुरुष से समलैंगिक महिला बनने का सफर है । यह पुस्तक ट्रांसजेंडर के अनुभवों को समझने में मदद करती है ।

       Third Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in Culture And History - Gilbert Herdt विवेच्य पुस्तक थर्डजेंडर के अस्तित्व को समझने में सक्षम बनाती है ; साथ ही बीजानिटिन महल के किन्नरों और भारतीय तृतीयलिंग समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके मानदण्डों के बारे में लिखा गया ।थर्डजेंडर के अस्तित्व को समझने में सक्षम बनाती है ; साथ ही बीजानिटिन महल के किन्नरों और भारतीय तृतीयलिंगी समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके मानदण्डों के बारे में बताया गया है । जबकि ‘Gilbert Herdt’ की संपादित पुस्तक ‘Third Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in Culture And History’ है ।इस पुस्तक में बधियाकरण जैसी प्रथाओं की आवश्यकता और शुरुआती दिनों में डच सेदामाइटस के बीच अंतरंग और निषिद्ध इच्छाओं को व्यक्त किया गया । इसके अलावा 18 वीं सदी में इंग्लैण्ड के सैफिस्ट और उन्नसवीं सदी में यूरोप और अमेरिका के तथा कथित उभयलिंगी-समलैंगिक लोगों के बारे में विस्तृत रूप में लिखा गया ।

               यह नई दिल्ली की फोटोग्राफर दयनितासिंह की पहली किताब Myself Mona Ahmed’ है ।मोना अहमद समाज के हाशिये पर खड़े समुदाय का जीता-जागता उदाहरण है । मोना अहमद स्वयं किन्नर है जो सदियों से दरकिनार किये गए वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । इस आत्मकथा में दयनितासिंह मोना अहमद के बधियाकरण से लेकर उसके गोद लिए हुए बच्चे के खो जाने की कहानी को बयां करती हैं । अर्थात् मोना एक संवेदनशील इंसान होने के साथ वह अपने समाज की आवाज बुंलद करती है साथ ही लेखिका ने मोना की आवाज उठाने तथा उसकी आकांक्षा को संरक्षित करने का सफलतापूर्वक दायित्व निभाया है ।

          ‘I’m Vidya: A Transgender Journey’ ट्रांसजेंडर लिंविग विद्या की आत्मकथा है। जैसा कि विद्या के बारे में बताया गया है कि “Living Smile Vidya is Also known as Smiley is an Indian trans-women, actress, assistant director and writer from Chennai. She is a transgender activist and blogger. She holds a post-graduate degree from the Thanjavarur University in applied linguistics. She started her career as an electronic data processing assistant and thereby became the first trans-woman in India who worked in a mainstream job rather than working for NGOs.” तथाकथित मुख्यधारा के समाज में इंसान की कार्यशैली से अधिक उसकी लैंगिकता को महत्त्व दिया जाता है । लिंग के अनुसार उनकी जीवन शैली का मानदण्ड निर्धारित कर दिया जाता है ।

          विद्या की तरह प्रखर मेधा वाले किन्नरों को हाशियागत किया जाता है तो द्विलिंगीय समाज की निम्नस्तरीय सोच परिलक्षित होती है । विद्या के सदर्भ में एक शोधाध्ययन से स्पष्ट होता है कि- ‘I am Vidya : A Transgender Journey’ was written in Tamil and later Translated into Seven different languages including English. It is regarded as one of the most brilliant transgender memoris.it was first published in 2007.it is the transgender autobiography in india.it showcases the struggle of Sarvanan to become Vidya. The struggle includes a lot of physical and mental training in addition to her life the  autobiography also presents the plight of contemporary transgender like Vidya in  India.’ यह भारत की प्रथम आत्मकथाओं में से है जो ट्रांसजेंडर के जीवन पर आधारित है । इस आत्मकथा में सरवन्ना से विद्या बनने के सफर को दर्शाया गया है । इसमें आत्मकथाकार के संघर्ष से सफलता के शिखर तक पहुँचने और अस्तित्व की पहचान बनाने की प्रेरणादायी कहानी है । मुख्यधारा के समाज ने विद्या को लैंगिक असमानता के आधार पर समाज में उपेक्षित और तिरस्कृत निगाहों से देखा इतना ही नहीं उसके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया गया बावजूद इसके विद्या ने अपनी सफलता के माध्यम से मुख्यधारा के लोगों की सोच पर तमाचा लगाया है ।

A Gift of Goddess Lakshmi - Manobi Bandyopadhyay पत्रकार झिमली मुखर्जी ने भारत की प्रथम ट्रांसजेंडर प्रिंसीपल मानोबी बंद्योपाध्याय की जीवनी लिखी । यह जीवनी ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक प्रेरक की भांति मार्गदर्शन करती है । सोमनाथ से मानोबी बंद्योपाध्याय बनने का संघर्ष, संवेदना और समाज की प्रताड़ना को बताया गया है कि - “A Gift of Goddess Lakshmi is a candid biography of Manobi Bandyopadhyay written by Jhimili Mukherjee Pandey who is a Journalist. It is Called as a candid biographyof India’s first transgender principal by the writers as Manobi tell her story of transformation from a man into a woman with unflinching honesty and deep understand.” द्विलिंगीय समाज ने लैंगिक अस्पष्टता वाले इंसान की योग्यता और उसकी काबिलियत को महत्त्व ना देकर उनकी अधूरी देह के कारण हरेक पहलू से उन्हें प्रताड़ित किया है । ऐसे में किन्नर अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा नहीं कर पाते । खैर, मानोबी के परिवार ने उसे अपनाया और उसे सभ्य, शिक्षित, संस्कारी और आत्मनिर्भर बनाने में पूर्ण योगदान दिया है ।

       जैसा कि सर्वविदित है कि आज 21 वीं सदी में इंसान अंतरिक्ष और मंगलग्रह पर अपनी जगह बनाने में सफलता अर्जित कर रहा है । किन्तु आज भी निराशा होती है कि किन्नर समुदाय के लोग अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं - रोटी, कपड़ा और मकान के लिए आज भी संपूर्ण किन्नर वर्ग लड़ाई लड़ रहा है ।साहित्यकारों ने किन्नर समाज की समस्याओं को जानने की कोशिश लगातार की है लेकिन आज भी कई प्रकार की खामियां देखने को मिलती हैं । किन्नरों की समस्याएँ और संवेदनाओं तथा संघर्ष को पूरी तरह जानना असंभव भी है, क्योंकि इस समुदाय में शिक्षा की कमी के कारण कई प्रकार की रूढ़ मान्यताएं हैं । इन रूढ़िवादी मान्यताओं और परम्पराओं के कारण ये लोग रीति-रिवाज, आचार-विचार, रहन-सहन आदि को मुख्यधारा के लोगों के साथ साझा करने से डरते रहे हैं ।

      संदर्भ ग्रंथ सूची-

1.       किन्नर नहीं हिजड़ा समुदाय, नीरजा माधव,पृष्ठ संख्या- दो शब्द, ए.बी.एस पब्लिकेशन, आशापुर,सारनाथ, प्रथम संस्करण 2019

2.       मानस-किन्नर, मुरारी बापू , संतकृपा सनातन, पृष्ठ संख्या – 05 नाथद्वारा, राजस्थान,संस्करण 2017

3.       मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी (अनुवाद-शशिकला राय), लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी,पृष्ठ संख्या-157, वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015

4.       वही, पृष्ठ संख्या-157

5.       https://www.scptbzz.org,विमर्श का अर्थ एवं परिभाषा by Bandey 16 feb 2021

6.       किन्नर विमर्श साहित्य और समाज, सं. मिलन बिश्नोई, पृष्ठ संख्या-भूमिका(ऋषभदेव शर्मा) विद्या प्रकाशन, कानपुर , उत्तर प्रदेश,प्रथम संस्करण 2018

7.        Zonebooks.org.

8.        Press.princeton.edu/books/eBooks/third-sex-third gender

9.        Press.princeton.edu/books/eBooks/third-sex-third gender

10.   Gift of Goddess Lakshmi , Manobi Bandyopadhyay, Penguin Random House India, 2017

11.   Born in the third Gender -  Yulia Yu Sakurazawa, kindle Edition ,13 Jun 2015

12.   .Gender born gender made: Raising Healthy Gender-Nonconforming Children, Diane Ehrensaft, The Experiment LLC, 3rd Revised 2012

13.   Genderless Exile, Kindle, Yulia Yu Sakurazawa, Kindle Edition, 2 july 2015

14.   Governing Gender and Sexuality in Colonial India: The Hijra,Jecica Haichi, BC 1850-1900, Cambridge University press, April 2018

15.   I’m Vidya -A Transgender Journey- Living Smile Vidya,Rupa Publicati on, 15 July 2013

 लेखक- डॉ. मिलन बिश्नोई

संपर्क-avimili29@gmail.com

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