रविवार, 15 जनवरी 2023

‘सवाल और सरोकार’ में आमजन के प्रश्नोत्तर - डॉ.मिलन बिश्नोई

         तेवरी काव्यांदोलन के प्रवर्त्तक डॉ. ऋषभदेव शर्मा का जन्म 4 जुलाई, 1957 को ग्राम गंगधाड़ी, मुजफ्फ़रनगर, उत्तरप्रदेश में हुआ है । ये हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु कविता और आलोचना ग्रंथों की रचना के साथ देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में संपादकीय, अग्रलेख या स्तंभ भी निरंतर लिख रहे हैं। यदि एक दृष्टि इनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर डालें तो पता चलता है कि इतने लंबे समय से वे साधक की भांति हिंदी में रमते गये हैं। आसूचना ब्यूरो की नौकरी छोड़कर इन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा हेतु दक्षिण भारत में हिंदी अध्यापन का चुनाव करते हुए हैदराबाद को अपनी कर्मभूमि बना लिया । दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में फैले इनके छात्र इनके द्वारा स्थापित ‘हिंदी सेवी सेना’ के सदृश हैं, जो निरंतर लेखन, संगोष्ठी, कवि सम्मेलन इत्यादि गतिविधियों का आयोजन करते रहते हैं । डॉ. ऋषभदेव शर्मा के आत्मीय व्यवहार से हर कोई व्यक्तिगत रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है ।     तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (2011), प्रेम बना रहे (2012), सूँ साँ माणस गंध (2013), धूप ने कविता लिखी है (2014) इत्यादि शर्माजी के चर्चित कविता संग्रह हैं । इनके आलोचना ग्रंथों में तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता: आठवाँ-नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), कविता का समकाल (2011), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद: परंपरा और प्रदेय (2015), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), कविता के पक्ष में (2016), कथाकारों की दुनिया (2017), साहित्य, संस्कृति और भाषा (2020), रामायण संदर्शन (2022) तथा वैचारिक निबंध संग्रहों में संपादकीयम् (2019), समकाल से मुठभेड़ (2019), सवाल और सरोकार (2020), इलेक्शन गाथा (ऑनलाइन : 2020), लोकतंत्र के घाट पर (ऑनलाइन: किंडल,2020), आदि शामिल हैं । इसके अलावा इन्होंने अनेक उच्चस्तरीय हिंदी पुस्तकों का संपादन किया है। लेखक ने इन तमाम रचनाओं में जनसमुदाय और आम नागरिक की चिंताएँ व्यक्त की हैं । लोकतंत्र की आवाज, राजनीतिक मुठभेड़, भष्टाचार, अतिक्रमण, नेताओं की जुबानी फिसलन, शिक्षा, आर्थिक उतार-चढ़ाव, भाषायी विवाद जैसे मुद्दों के प्रश्न ‘सवाल और सरोकार’ (2020) में दिखाई देते हैं । ऋषभदेव शर्मा की वैचारिक कृति ‘सवाल और सरोकार’ (परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश : प्रथम संस्करण-2020) चर्चित पुस्तक मानी जाती है। क्योंकि इसमें मूक-बधिर बन बैठी जनता के सवाल करने की हिमायत लेखक अपने आलेखों के माध्यम से करते हुए दिखाई देते हैं । इस संदर्भ में प्रो. गोपाल शर्मा लिखते हैं कि- “मनुष्य की आंतरिक प्रश्नाकुलता सनातन है, अनंत है। पर तमाम तरह की चिंताओं के जाल में उलझा हुआ आम आदमी कुछ कहने से डरता है। आजकल तो कुछ अधिक ही भयभीत रहता है। उसे पहरुए सावधान रहने को अवश्य कह रहे हैं, किंतु राजनीतिक, सामाजिक, लोकतांत्रिक, धार्मिक और अनेक आर्थिक मुद्दों के प्रति जनप्रतिनिधि और जनता जितनी सजग है, यह जगजाहिर है। उनकी इस भोली सजगता के सरोकारों को सवाल-जवाब की शक्ल देते हुए प्रस्तुत करना भी संपादकीय दायित्व है। इस पुस्तक को लेखक ने आठ खंडों में अलग-अलग विषयों पर व्यंग्यात्मक आलेखों को पाठक के सामने प्रस्तुत किया है।" (सवाल और सरोकार, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, भूमिका- प्रो. गोपाल शर्मा,पृष्ठ संख्या-5) 

खंड-1- ‘सियासत की बिसात’ में आठ आलेख प्रस्तुत करते हुए राजनैतिक मुद्दों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है। सबसे रोचक बात है कि संपादकीय आलेखों की हेडलाइन ही पाठकों को कंटेट की ओर खींचकर ले जाती है । 'सवाल और सरोकार' के प्रथम आलेख ‘उपराष्ट्रपति की पाठशाला के ये बिगड़ैल बच्चे’ में लेखक ने बताया है कि “सभापति महोदय के बार-बार चेताने पर भी कक्षा के बिगड़ैल बच्चों की तरह सदस्य मानते नहीं हैं। कोई छोटी सी पाठशाला होती तो ऐसे बच्चों को कभी का निष्काषित कर दिया जाता और सदा के लिए एडमिशन पर रोक लगा दी जाती। लेकिन देश की सबसे बड़ी पंचायत को पंगु बनाने वालों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। ज्यादा से ज्यादा आप उन्हें मार्शलों की मदद से बाहर खदेड़ सकते हैं। पर इससे क्या फर्क पड़ता है? बिगड़े बच्चे अगली घंटी बचते ही फिर क्लास में आ धमकेंगे और मास्टर जी की नाक में दम करेंगे!” (सवाल और सरोकार, प्रो. ऋषभदेव शर्मा,पृष्ठ संख्या-10)। यहाँ व्यंग्यात्मकता के साथ प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग करते हुए लेखक साँप भी मार रहे हैं और लाठी को भी टूटने नहीं देते हैं । पिछले दिनों से संसद की गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करने तथा अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल बेझिक हो रहा है । देश की सर्वोच्च संस्था में यदि ऐसा व्यवहार होता रहे तो जनता आदर्श नेताओं के बारे में क्या सोचेगी? किंतु इससे आजकल नैतिक दिवालियापन से ग्रस्त माननीयों को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है । ‘सभ्यता : सार्वजनिक जीवन में!’ लेखक ने लिखा है– “कहना न होगा कि इस उपदेश के श्रोता भले ही युवा रहे हों, निशाना तो सार्वजननिक जीवन में रचे-पचे वे तमाम अधेड़ जीव हैं जिन्हें लोकतंत्र की इस मूलभूत सभ्यता से कुछ लेना-देना नहीं है कि यहाँ हम कम से कम ‘असहमत होने के लिए सहमत’ होते हैं । ऐसे जीव आज की राजनीति में सर्वत्र पाए जाते हैं । पक्ष हो या विपक्ष, कोई इस आरोप से बरी नहीं है कि उन्हें अपने से भिन्न विचारधारा के लोगों को सुनने का तनिक भी धीरज नहीं है । उपदेश देना तो खैर प्रभुओं-महाप्रभुओं का एकाधिकार है। लेकिन लोकतंत्र उस समय सिसकियाँ भरता है, जब प्रभु लोग ही अपने लोगों के धीरज खोने पर कान में तेल और मुँह में दही जमा कर क्षीर सागर में सो जाते हैं!” (सवाल और सरोकार, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, पृष्ठ संख्या-11)। इस आलेख में प्रधानमंत्री द्वारा विपक्ष को दिए गए उपदेशात्मक भाषण के बारे में बताया गया है । किंतु इसमें लेखक यह भी बताना चाह रहे है कि राजनैतिक स्तर में दिन-ब-दिन गिरावट देखने को मिल रही है । पक्ष और विपक्ष दोनों ही एक-दूसरे को सुनने को तैयार नहीं हैं । “कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि दूसरों को न सुनना और न ही बोलने देना राजनीति करने वालों को शायद ड्रिल करा करके सिखाया जाता होगा। तभी तो वे बड़ी से बड़ी पंचायत के कुँए में कूद कर सामूहिक रूप से इतने ज़ोर-ज़ोर से टर्राते हैं कि बोलने वाला क्या बोल रहा है, इसे वहाँ बैठे सरपंच और प्रधान तक नहीं सुन पाते। देश की जनता तो भला क्या ही सुनेगी!” (वही, पृष्ठ संख्या-11)

 ‘आरक्षण की वकालत!’ के बारे में लेखक ने बताया है- “पूछा जा सकता है कि बैठे ठाले इस तरह के बयान की ज़रूरत क्यों आन पड़ी । जवाब भी सबको पता है कि आरक्षण को उखाड़ फेंकने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना फिलहाल केंद्र सरकार के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। लेकिन यह भी सच है कि आरक्षण उसकी आँख का काँटा तो है। इसलिए समय-समय पर इस मुद्दे को उछालकर जीवित रखना उसकी रणनीति रही है ।” यहाँ लेखक आजकल अनुसंधानात्मक दृष्टिकोण से तटस्थता के साथ सरकार पर पैनी नज़र बनाए हुए दिखाई देते हैं । वे संपादकीय आलेखों में सरकार के तमाम फैसलों पर तटस्थता और निडरता के साथ टिप्पणी करते हैं। किंतु आजकल की विडंबना यह भी है कि अधिकांश पत्रकार, संपादक, मीडियाकर्मी या तो सरकार की गोद में जा दुबके हैं, या कुछ अन्य पत्रकार बेहद नफरती टिप्पणियों के साथ जहर उगलते हुए दिख रहे हैं। अब समस्या यह कि आम नागरिक सुने तो सुने किसको? किसी पत्रकार ने तो लोगों को टीवी से नाता तोड़ने की भी सलाह दे दी है । ऐसे में मेरी सलाह तो यह है कि जो लोग निष्पक्ष विवेचन पढ़ने में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें डॉ. ऋषभदेव शर्मा की सामयिक टिप्पणियाँ अवश्य पढ़नी चाहिए। 

‘है तो सही राजभाषा पर...’ आलेख का शीर्षक पाठक को विपरीत परिणति की ओर आकर्षित करता है । दरअसल वर्तमान समय में राजनीति के क्षेत्र में भाषा, धर्म और आरक्षण को लेकर समयानुसार बहसबाजी, आरोप-प्रत्यारोपण होता है । किंतु भारत की सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा को राजभाषा तक सीमित रखना कहाँ उचित है? हमें गुलामी की मानसिकता का विरोध अवश्य ही करना पड़ेगा। “हर साल की तरह इस साल भी 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जा ही रहा है। जाने और कितने साल इसी तरह यह दिवस मनाया जाता रहेगा। पता नहीं कि तब भी कभी सही अर्थों में हिंदी राजभाषा के अपने संवैधानिक अधिकार को पा सकेगी या नहीं। ऐसा भी नहीं है कि राजभाषा के रूप में हिंदी को संविधान में आगा-पीछा सोचे बिना जल्दीबाजी में स्वीकार किया गया हो। सयाने बताते हैं कि भारत के संविधान का शायद भाषा विषयक भाग ही वह भाग है जिसके एक-एक अनुच्छेद पर सबसे लंबी चर्चा संविधान सभा की बैठकों में हुई थी। इतना ही नहीं, इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का वह सुदीर्घ अनुभव भी काम कर रहा था, जिससे इस देश के महान नेताओं ने यह समझा और समझाया था कि भारत के बहुभाषी चरित्र को देखते हुए हिंदी ही केंद्र सरकार के कामकाज के लिए सबसे उपयुक्त भाषा हो सकती है।” (वही, पृष्ठ संख्या-15)। ‘हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए!’ आलेख में लेखक जनता को गुमराह करने, नफरत की राजनीति करने तथा समाज में भ्रांति फैलाने वालों के प्रति रोष प्रकट करते हैं । राम और गांधी की परंपरा की दुहाई देने वाले समाज और देश में हिंसक प्रवृत्तियाँ और आंदोलनकारियों की अराजकता अशोभनीय लगती है। लेखक का मानना है कि सरकार जब भी कोई कानून पास करती है, तब कुछ स्वार्थी लोग अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए जनता को गुमराह करते हुए देश में अशांति फैलाने का काम करते हैं । “इधर के तमाम घटनाक्रम से कम से कम यह बात पुख्ता हो गई है कि राजनीतिक फायदे के लिए देश को नफरत की आग में झोंकने वाली ताक़तें हमारे बीच ही उपस्थित रहती हैं और मौका मिलते ही जाग जाती हैं। इसलिए समाज और देश की अगुवाई करने वालों से उम्मीद की जाती है कि वे आपसी मेलजोल, प्रेम और अहिंसा का सकारात्मक परिवेश रचने की जिम्मेदारी निभाएँ तथा नफरत और हिंसा की भड़काऊ सियासत से बाज़ आएँ।” (वही, पृष्ठ संख्या-21)। 

खंड-2-‘फिरदौस बर रूये ज़मीं अस्त’ में तीन आलेख शामिल हैं। ‘अफगानिस्तान का कश्मीर कनेक्शन?’ में पाकिस्तान की ओछी हरकतों के बारे में बताया है। ‘कश्मीर तो बहाना है…’ में पाकिस्तान की बौखलाहट तथा उसकी जनता को गुमराह करने के बहाने को दिखाया गया है। ‘कितनी खूबसूरत यह तस्वीर है!’ में लेखक जनता और सरकार के मैत्री भाव से किए गए कार्य की सराहना करते हैं- “कहना न होगा कि सत्ता और जनता के बीच अगर आपसी सहयोग और सद्भाव का वातावरण हो, दोनों एक दूसरे को शत्रु न समझें, उनमें हुक्काम और मातहत नहीं जनसेवक और जनता वाला रिश्ता हो, तो शांति, कला और संस्कृति को भी फलने-फूलने का मौका मिलता है ।” (वहीं, पृष्ठ संख्या-29) 

खंड-3- ‘अगल-बगल’ में ‘पाक की बैचेनी बनाम मुस्लिम जगत का मौन’, ‘मीडिया से डरता है ड्रैगन !’, ‘जरूरी है परमाणु-प्रयोग पर पुनर्विचार’, ‘पाक की फजीहत: शीशमहल में भटका बच्चा’, ‘गलियारा: सरहद के आर-पार, 'फिर पुकारा पाकिस्तान...,’ ‘जिससे डरते थे, वही बात हो गई!’, ‘पाक का आत्मघाती अहंकार बनाम महँगाई की मार’, ‘परमाणु युद्ध हुआ तो...’ शीर्षक लेखों में पाकिस्तान की तुच्छ हरकतों तथा आतंकवाद पोषण नीति पर प्रहार किया है और भारत की विश्वशांतिमयी भावना के बारे में विस्तारपूर्वक बताया है कि आधुनिक समय में भारत अपनी सीमा सुरक्षा, आध्यात्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक सुरक्षा हेतु किस तरह सुझ-बूझ से रास्ता बनाते हुए विश्वस्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर रहा है। वहीं पाकिस्तान अपनी ओछी हरकतों को बार-बार दोहराने से नहीं चूकता है; उससे निपटने के लिए लेखक कई प्रकार की सलाह अपने आलेखों में देते हैं। 

खंड-4- ‘लोक बनाम तंत्र’ में लेखक ने भारतीय लोकतंत्र में आम जनसमुदाय की समस्याओं, गैंगरेप, दुष्कर्म, उत्पीड़न, जन आंदोलन-अराजकता तथा सोशल मीडिया के माध्यम से बढ़ती अभद्रता के प्रति चिंता व्यक्त की है। इसके अलावा सत्ता और जनता के आपसी रिश्ते में निरंतर बढ़ती नफरत की भावना मिटाकर सकारात्मक दृष्टि देने का प्रयास भी करते हैं। लेखक ने 21 वीं सदी के लोकतांत्रिक देश में वकील और पुलिस की भिंड़त, जनता का आक्रोश, सार्वजनिक संपत्ति को आग में झोंकने तथा विश्वविद्यालय स्तर पर बढ़ती राजनीति और राजनीति में भटक रहे युवाओं की वर्तमान स्थिति का चित्रण किया है- “सुनते आए हैं कि जनता लोकतंत्र में सत्ता का असली मालिक होती है। जनता द्वारा जनता के लिए जनता का अपना शासन ही तो लोकतंत्र है न? पर यहाँ तो आए दिन जिस तरह जनता और सत्ता की खुल्लमखुल्ला हिंसक भिडंत होती है, उससे यह लगने लगा है कि जनता और सत्ता के बीच युगों का बैर चला आ रहा है शायद ।” (वही, पृष्ठ संख्या -25)। इसी प्रकार आजकल के आंदोलनों को देखते हुए लिखते हैं कि उचित हो या अनुचित, जनता का कोई भी वर्ग अपने आक्रोश को लोकतांत्रिक ढंग से व्यक्त करने के लिए आज़ाद है, लेकिन जनता की संपत्ति को लूटने और आग लगाने और पत्थर बरसाने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती; इसलिए समझा जा रहा है कि जन-आंदोलन छात्र-आंदोलन न रहकर अराजकता का माध्यम बन गया है।

 खंड-5- ‘मंदी की मार बुरी’ में राष्ट्रीय और विश्व स्तर पर आर्थिक अर्थव्यवस्था के बारे में तटस्थता और व्यंग्यात्मक तथा आदर्शांत्मक उदारणों के साथ तथ्य बताए गए हैं । लेखक ने बताया है कि- “भारत सचमुच महादेश है- महान देश भी । हमारे पास कुटुंब संस्कृति की एक बड़ी धरोहर है – बुरे वक्त़ों में सब एक-दूसरे को सँभाल लेते हैं। अभी भी हमारे युवाओं के पास पुख्ता नैतिक मूल्यों की वह संपदा है।” (वही, पृष्ठ संख्या-71)। लेखक यहाँ आशावादी दृष्टिकोण से जनता को धैर्य और संयम बनाए रखने की प्रेरणा दे रहे हैं। बाकी आर्थिक स्थिति और आम जनता की स्थिति से कौन अनभिज्ञ है? 

खंड-6- ‘समाज :आज’ सामाजिक अंधविश्वास, वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान में उपराष्ट्रपति के वक्तव्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान, उपयोगिता और आवश्यकता तथा परंपरा के बारे में बताया गया है। दूसरी तरफ आधुनिक युवा पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच दिन-ब-दिन बढ़ने वाले अंतराल और असलियत का भी संवेदनात्मक और यथार्थपरक ढंग से विवचन किया गया है । इस खंड में सफाईकर्मी, आम जनजीवन, ज्ञान-परंपरा और समाज के बारे में विस्तृत और रोचंक ढंग से बहुत ज्ञानवर्धक तथ्य पेश किए गए हैं। साथ ही, 'सवाल और सरोकार' के अंतिम दो खंडों 'पृथ्वी की पुकार' तथा 'प्रलय की छाया' में लेखक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर की समस्याओं, आतंकवाद, पर्यावरण व पारिस्थितिकी, जलवायु आपदा तथा प्रदूषण जैसी समस्याओं को बताया है। इस प्रकार लेखक की वैचारिक कृति ‘सवाल और सरोकार’ आम जन की पूँजी बन जाती है। इसे पढ़ते हुए देश-दुनिया, समाज, सरकार, लोकतंत्र, लोकसत्ता और जनतंत्र की वास्तविक शक्ति को सही मायने में पहचाने का प्रयास हर कोई पाठक करता होगा। जब मैं ‘सवाल और सरोकार’ पढ़ती हूँ, उसी समय अनायास ही लेखक की कविताएँ भी बराबर अपनी ओर खींच रही होती हैं, जो भारतीय लोकतंत्र में प्रेम, समर्पण, त्याग व बलिदान के साथ निरंतर आगे बढ़ते हुए और अपनी समस्याओं को व्यावहारिक ढंग से निपटाने का संकेत देती हैं। जैसे- 

यह बिंदु है बदलाव का 

यह बिंदु है भटकाव का 

यह बिंदु है बहकाव का... 

साजिशों में कैद है, 

आकाश अपना, 

किंतु आँखों में अभी है शेष सपना। 

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डॉ.मिलन बिश्नोई, 

हिंदी विभाग,असिस्टेंट प्रोफेसर, 

खाजा बंदानवाज़ विश्वविद्यालय, कलबुर्गी, (कर्नाटक)। 

मोबाइल: 6380568643. 

ईमेल: – milanbishnoi@gmail.com

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