सोमवार, 26 दिसंबर 2022

हिंदी की ज्ञान परम्परा : गुरु जांभोजी की सबदवाणी में पर्यावरण चिंतन

                   




 हिंदी की ज्ञान परम्परा : गुरु जांभोजी की सबदवाणी में पर्यावरण चिंतन 
भारतीय संस्कृति में ज्ञान, परम्परा और आध्यात्म की शिक्षा सदैव गौरवान्वित करने वाली रही हैं । किंतु समय के साथ बाहरी शक्तियों ने सभ्यता और संस्कृति को मिटाने का प्रयास निरन्तर किया हैं । इस घोर अंधकार समय में भी भारतीय ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं और समाज सुधारकों ने समय के अनुरूप जनता को संभालने का सराहनीय काम किया हैं । वर्तमान में भारतीय परम्परा और संस्कृति की धरोहर को बचाएं रखने के लिए कई प्रकार के व्यावधानों से जूझ रहे हैं । किंतु आजादी के अमृत महोत्सव में भारतीय संस्कृति का पुररुत्थान करने का प्रयास किया जा रहा है, जो सराहनीय है । आज भाषा, संस्कृति, धर्म-आध्यात्मिक के तत्त्व-चिंतन को लेकर अनेकानेक बहस हो रही है। किंतु पाश्चात्य संस्कृति के परमपोषकों को भारतीय ज्ञान-परम्परा से ज्ञानार्जन करने की आवश्यकता है । खासकर कोविड-19 ने सबको सबक सिखाया भी था । भारतीय संस्कृति ने सदैव आंतरिक यात्रा (आंतरिक तत्त्व खोज) को महत्त्व दिया है । जितने भी महापुरुष हुए हैं जैसे राम,कृष्ण, बुद्ध, गुरु जांभोजी, नानक, कबीर, रैदास, दादूदयाल, सुंदरदास, जसनाथ, रामदेव, हड़बूजी, पाबूजी, वीर तेजाजी इत्यादि । इन सभी महापुरुषों ने अपने ‘स्व’ को पहचानते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया हैं । यह सर्वविदित है हमारे महापुरुषों और संतों ने भारतीय परम्परा के माध्यम मानव और प्रकृति सहज संबंध बनाएं रखने में विश्वास बढ़ाया हैं । साहित्यकार डॉ. आनंद पाटिल परदेशीय संस्कृति की और पलायन करने वालों को देखकर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि “अतः एक प्रश्न बारंबार मन-मस्तिष्क में आता है कि ऐसी गुलामी मानसिकता वाले लोग-बाग अपनी धरोहर के संबंध में भला क्या (कुछ!) सोचेंगे ? इस मामले बिश्नोई समाज(संप्रदाय) ने इस नवऔपनिवेशिक समय में गुरु जांभोजी एवं उनके तत्त्व-चिंतन पर पुनः मनन-चिंतन करने का जो उपक्रम आरंभ किया है, वह सैद्धांतिक भटकाव और मुठभेड़ वाले इस समय में वांछित भी है और अनिवार्य भी! यह प्रयास अपनी धरोहर की ओर लौटने का यथेष्ट उपक्रम भी है और परदेशीय चिंतन से पल्ला छुड़ाने और अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए वैचारिक दृष्टि से स्वतंत्र और सुदृढ़ होने की अदम्य चाह का अप्रतीम उदाहरण भी ।” अर्थात् एक तरफ हम भारतीयता की बात करते हैं किंतु हम स्वयं आने वाली पीढ़ी तक हमारे रीति-रिवाज, तत्त्व-चिंतन और संस्कृति पहुँचाने में अक्षम है । किंतु गुरु जम्भेश्वर के अनुयायी आज विश्व स्तर पर अपनी संस्कृति और गुरुजी की ‘सबदवाणी’ को प्रसारित करने का अथक प्रयास कर रहे हैं । “यद्यपि आचार्य शुक्ल ने यह कथन कबीर (1398-1518) और (1469-1539) के आविर्भाव की चर्चा करते हुए किया है किंतु तत्त्व-चिंतन की समानता को यदि एक क्षण के लिए ध्यान में न भी लिया जाए तो जन्म और जीवनावधि की दृष्टि से विचार करने से ज्ञात होता है कि गुरु जांभोजी (1451-1536) कबीर और नानक के समकालीन हुए हैं । अतः जो कथन कबीर-नानक पर लागू होता है, वही जाम्भोजी पर यथावत लागू होता है । किंतु साहित्येतिहास ग्रंथकारों ने जाम्भोजी के रचना और कर्म का संज्ञान नहीं लिया । बहरहाल, स्मरणीय है कि कबीर निर्गुण भक्ति के संवाहक थे तो नानक (कबीर से मिलने से पूर्व) की प्रवृत्ति एक भक्त की थी और जाम्भोजी सगुणोन्मुख निर्गुण भक्ति के संवर्धक थे ।” हिंदी साहित्य इतिहास में भक्तिकाल में भारतीय संत-परम्परा बखूबी से वर्णन किया है । भक्तिकाल में रामचंद्र शुक्ल ने निर्गुण काव्य परम्परा में कबीर, गुरु नानक, रैदास, दादूदयाल और सुंदरदास का उल्लेख किया हैं, किंतु खेद का विषय है कि उनकी दृष्टि उत्तर भारत की संत परम्परा में महान पर्यावरणविद्, समाजसुधारक और नारी हितैषी गुरु जांभोजी तक नहीं पहुंची । जबकि डॉ. नगेन्द्र और परशुराम चतुर्वेदी ने गुरु जांभोजी के बारे में विस्तारपूर्वक बताया हैं । रामचन्द्र शुक्ल जी का कथन हैं कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है ।’ जबकि वे अपने इतिहास में कबीर की सबदवाणी का जिक्र करते हैं लेकिन गुरु जांभोजी की सबदवाणी और उनके जीवन उच्चादर्श को बताना भूल जाते हैं... गुरु जांभोजी का जन्म उस समय हुआ जब देश भयानक राजनीति, रूढ़िवादी, अंधकार, पाखंड और अत्याचार से जूझ रहा था । किंतु उनके व्यक्तित्व और शिक्षा से प्रभावित होकर दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी, नागौर का नवाब मुहम्मद खान नागौरी, मेड़ता के राव दूदा, जैसलमेर के राव जैतसी, जोधपुर के राठौड़ राव सातल देव, मेवाड़ के राणा सांगा उनकी शरण में आये थे । गुरु जांभोजी का जीवन परिचय- गुरु जांभोजी का जन्म 1451 ई.में राजस्थान के जोधपुर के निकट नागौर परगने के पीपासर ग्राम में हुआ । उनकी माता का नाम हंसा और पिता लोहटजी राजपूत थे । जनश्रुति के अनुसार कई वर्ष तक इन्होंने एक भी शब्द उच्चरित नहीं किया और चमत्कारिक प्रर्दशन के कारण जनता ने इन्हें ‘जम्भंजी’ कहना प्रारंभ किया । गुरुजी के अनेक नाम सामने आए हैं-“जम्भनाथ, जम्भे, जम्भै, जम्भेश्वर, जम्भैस्वराय, जम्भैजी, जांभराज, जाम्भेश्वर, जाम्भोविसन, भांभ, भांभैसर, भांभाजी, झांभराज इत्यादि ।” गुरु जी के केवल इतने नाम ही नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक सुधार संबंधित अनेक पुरुषार्थ देखने को मिलते हैं । उन्होंने 29 नियमों का निर्धारित करते हुए ‘बिश्नोई’ पंथ की स्थापना 1542 ई. में कार्तिक बदी अष्टमी को ‘समराथल’ के ऊँचे मरूभूमि के टीले पर की थी । आज भी बिश्नोई समाज के लोग इसे अपना ‘पवित्र तीर्थ स्थल’ मानते हैं तथा इसे ‘मुक्ति धाम’ और ‘धोक धोरे’ के नाम से जाना जाता है । ‘बिश्नोई’ का अर्थ 20+9 है । इस शब्द की उत्पति ‘वैष्णवी’ शब्द से हुई है । जिसका अर्थ विष्णु के अनुयायी होता है । ये लोग अपने गुरुजी को भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं । गुरुजी का मूलमंत्र – ‘विष्णु-विष्णु भण रे प्राणी’। गुरु जी के अनुयायी आज भी इनकी पूजा अपने आराध्य की भाँति करते हैं । और उनके द्वारा बताये गए नियमों का पालन दैनिक दिनचर्या में करते हैं । गुरु जांभोजी के 29 नियमों के बारें में भारत के उपराष्ट्रपति माननीय जगदीश धनकड़ ने बताया हैं कि-“गुरु जम्भेश्वर जी द्वारा रचित शब्द वाणी तथा बिश्नोई समाज के 29 धर्म नियमों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत का निचोड़ बताया और कहा कि इनके अनुपालन से जीवनशैली और समाज सदैव सही रास्ते पर रहेंगे ।” अतः गुरु जांभोजी द्वारा निर्धारित 29 नियम सरल-सहज और स्वस्थ जीवन यापन करने के लिए बनाए गए हैं- 1. तीस दिन सूतक 2. पांच दिन ऋतुवंती 3. सेरा करो स्नान 4.शील का पालन करें 5. संतोष धारण करें 6. बाहरी व आंतरिक पवित्रता रखें 7. प्रातः-सांय संध्या वंदना करें 8. संध्या को आरती और हरिगुण गान करें 9. प्रेमपूर्वक हवन करें 10.पानी, वाणी ईधन व दूध को छानकर प्रयोग करें 12. चोरी न करें 13. निंदा न करें 14. झूठ न बोलों 15 . वाद-विवाद न करें 16. अमावस्या का व्रत रखें 17. विष्णु का जप करें 18. हरा वृक्ष न काटें 20. काम, क्रोध,मद व लोभ, मोह से दूर रहें 21. हरा वृक्ष नहीं काटना 22. रसोई अपने हाथ से करनी 23. थाट अमर रखना 24. बैल का बधियाकरण नहीं करना 25. अमल-तम्बाकू का निषेध 26. मद्यपान का निषेध 28. मांस नहीं खाना 29. नील वस्त्र का त्याग इन उनत्तीस नियमों का अत्यधिक महत्त्व बिश्नोई समाज के लिए आज भी हैं । 500 साल बाद भी गुरु जांभोजी के अनुयायी निस्वार्थ भाव से पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए प्राण न्यौछावर कर रहे हैं । क्योंकि गुरुजी के द्वारा बतायी गई इस आचार संहिता में सर्वप्रथम महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए प्रथम दो नियम उनके लिए बनाएं गए । वर्तमान केन्द्र सरकार और राज्य सरकार महिलाओं के महावारी में होने वाली समस्या और सामाजिक जागरूकता के लिए अभियान चला रही है किंतु गुरुदेव ने 15 वीं शताब्दी में महिलाओं के स्वास्थ्य की चिंता व्यक्त करते हुए कहा ‘पांच दिन ऋतुवंती न्यारो’ अर्थात् महावारी के समय महिलाओं के गृहकार्य, रसोई घर में जोखिम भरे कार्यों से मुक्त रखना । पुराने जमाने में महिलाएं बहुत दूर से पानी सिर पर उठाकर लाती थी । संयुक्त परिवार में महिलाओं को अकेले खाना बनाना पड़ता था इसलिए इस प्रकार उनके स्वास्थ्य में गिरावट की संभावना अधिक दिखाई दी । तब गुरुजी ने यह नियम लागू किया था, किंतु स्वास्थ्यप्रद लाभ को ध्यान में रखते हुए आज भी बिश्नोई समाज में महावारी के दिन महिलाओं को स्वस्थ भोजन घर के अन्य सदस्य बनाकर खिलाते हैं । यदि घर में कोई महिला नहीं है तो पिता-पति और भाई भी उसे आदरपूर्वक भोजन और सुविधाएं प्रदान करते हैं । महावारी जैसी आम बात को भारत में पुरुषों से छुपायी जाती हैं लेकिन यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है इस बात को बिश्नोई समाज में लज्जा की दृष्टि से नहीं बल्कि सम्मान के साथ महिला को देखा जाता है । ‘तीस दिन सूतक’- महिला की संतान उत्पति के समय माँ और संतान के अच्छे स्वास्थ्य के लिए उसे एकांत और शांतमयी स्थान प्रदान करने के साथ गृहकार्यों से मुक्त रखकर उसको आराम करने की हिदायत दी गई है । तीस दिन तक किसी प्रकार के कार्य नहीं करवाएं जाते हैं । मां को पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए स्वस्थ आहार देना तथा जज्चा और बच्चा दोनों की देखभाल अन्य सदस्यों की जिम्मेदीरी होती हैं । इस नियम को भी केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें आज समझ सकी हैं वे अस्पताल में जज्जे और बच्चे की सुरक्षा की बात करती हैं । अर्थात् महिलाओं की शारीरिक और मानसिक समस्याओं को समझते हुए उनके स्वास्थ्य हेतु उचित संदेश दिए गए । इसी प्रकार पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण हेतु नियम बनाये गए हैं । जिसमें वन्यजीवों के प्रति दयाभाव, बैल का बधियाकरण पर निषेध, हरे वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध, गाय और अन्य जानवरों को कसाई खाने में भेजने पर प्रतिबंध, सूखी लकड़ियों को जलाने से पूर्व उनमें कीड़े-मकोड़े देखना यदि है तो ऐसी लकड़ी नही जलाने का आदेश दिया । अर्थात गुरुजी के इन नियमों को बहुत गहराई से समझें तो यह नियम केवल बिश्नोई समाज के लिए ही नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए बनाए गए हैं । पुराने जमाने में प्राकृतिक आपदा, भूकंप, बाढ़, जल-प्लावन,वन्य जीवों के शिकार तथा पारिस्थितिकी असंतुलन को देखते हुए गुरुजी ने नियमों को निर्धारित किया । यदि संपूर्ण भारत उनके नियमों की समझ होती तो शायद पर्यावरण प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता । ‘स्वच्छ भारत’ की चिंता गुरुदेव ने अपनी वाणी में कई बार की हैं । उन्होंने स्वच्छता से संबंधित नियम 29 नियमों में निर्धारित किये हैं । जिसमें आस-पास के वातावरण की शुद्धता के साथ आंतरिक शुद्धता को भी बनाये रखने का आह्वान किया हैं । आंतरिक वातावरण में पारिवारिक कलह, रिश्तों की टकराहट, आत्महत्या, अत्याचार जैसी घटनाएं निरन्तर बढ़ रही थी । ऐसे में गुरुजी ने शील-संतोष और क्षमा दया और “तन-मन धौइये संजम होइये हरख न खोइये” की बात बतायी हैं । बिश्नोई समाज द्वारा पर्यावरण संरक्षण और बलिदान- 1730 में जोधपुर मारवाड़ के महाराजा अभयसिंह ने चुने के भट्टे को जलाने के लिए ईधन की आवश्यकता बतायी । और राजा ने मंत्री गिरधारी भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री ने जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर खेजड़ली गाँव से वृक्ष लाने की सलाह दी । खेजड़ली गाँव में बिश्नोई पंथ के लोग वहाँ अधिक रहते थे इसलिए वहाँ हरे वृक्ष अत्यधिक मात्रा में थे । बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण और वन्यजीव के प्रति अत्यधिक प्रेमभाव रखते हैं । वहाँ से जब गिरधारीसिंह के नेतृत्व में वृक्ष काटने लगे । तब वहाँ की 42 वर्षीय अमृता देवी और उनकी तीन पुत्रियाँ आसु, रतनी, भागु बाई और पति रामू खोड़ सहित 363 लोगों ने अपने जान की परवाह नहीं करते हुए पेड़ बचाने के लिए बलिदान दिया । यद्यपि भारत के ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत यहीं से मानी जाती है । अमृता देवी पहली आधुनिक नारी मानी जाती हैं जिसने वृक्षों के लिए राजा-महाराजाओं का सामना किया। खेजड़ली आंदोलन की तरह पेड़ों के लिए बूचोजी के बलिदान की भी अमर कथा बिश्नोई समाज में मिलती हैं । नरसिंघदास ठाकुर ने ईमारती लकड़ियों के लिए अपने लोगों पोलावास गांव मेड़ते में भेजा था । तब वहाँ बूचोजी ने उन लोगों को ललकारते हुए कहाँ- “यह मैं शहीद होने के लिए तैयार खड़ा हूँ आइये, कौन कर मेरा तमाम करेगा । मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं बिल्कुल इस जगह से हिलूंगा नहीं, सामने हाथ उठाउंगा नहीं, मेरा सिर धड़ से अलग कर दीजिये । नहीं अन्य कोई मेरा भाई बंधु विरोध करते हुए आपका सामना करेगा । आप लोगों में से जो अपने को शूरवीर समझता है वह सामने आ जाइये । मेरी एक शर्त है वह भी सुन लो मेरे बलिदान हो जाने के बाद फिर कभी तुम्हारे संबंधियों से कोई हरा वृक्ष नहीं काटेगा और नहीं कटवाने की प्रेरण देगा । यह जो वृक्ष कट गये है इनकी जगह तुम्हे दूसरे रूंख लगवाकर देने होगे यही रूंख कटने की घटना इस इलाके में अंतिम होनी चाहिये । इसलिए मेरा शरीर समर्पित है । मेरा शरीर काट लीजिये परन्तु रूंख नहीं काटना ।” अर्थात इस प्रकार गुरुजी के अनुयायी पर्यावरण की रक्षा करते हुए प्राणोत्सर्ग करने से पीछे नहीं हटते हैं । हाल ही में बॉलीवुड के प्रसिद्ध कलाकार सलमान खान सहित कुछ फिल्म अभिनेताओं को बिश्नोईयों के गाँव जोधपुर के निकट काले हिरण का शिकार करते हुए देख लिया तो बिश्नोई समाज लोग एकत्रित होकर वन्यजीव संरक्षण के प्रति आवाज उठाई । सलमान खान ने उन लोगों को पैसों का लालच देकर, असमाजिक तत्वों के डराने-धमाकने का खूब प्रयास किया किंतु आम सामान्य किसान परिवार के लोग बेझिझक होकर वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु लड़ते रहें । आजकल आधुनिक दौर में कई प्रकार योजनाएं और तकनीकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता हैं । लेकिन उन योजनाओं और आधुनिक संयत्रों के नकारात्मक प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया जाता । हाल ही में पश्चिमी राजस्थान की तरफ सोलर हब विकसित हो रहे हैं । इससे पर्यावरण और वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे को देखते हुए बिश्नोई समाज के लोगों ने जनआंदोलन किया हैं । उन्होंने बताया कि- “अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा का आरोप है कि गांव में सोलर प्लांट लगाने के लिए ली गई जमीनों पर मौजूट खेजड़ी के हजारों पेड़ों को काट कर दफना दिया गया है । बिश्नोई समाज के मुताबिक, खेजड़ी के लगभग 10,000 पेड़ों को काटा गया है जिसमें प्रशासन की मिलीभगत शामिल है । वहीं बिश्नोई समाज के कुच लोगों ने प्रशासन के सामने जेसीबी के पेड़ों के अवशेष मिले जिसके बाद समाज के लोगों का आक्रोश फूटा । इसके बाद पर्यावरण प्रेमियों ने एक-एक कर सैकड़ों की संख्या में काटकर जमीन में दबे पेड़ों को बाहर निकाला कार्रवाई के लिए फलोदी एडीएम को ज्ञापन सौंपा और अनिश्चितकालीन आमरण अनशन किया ।” यह बिश्नोई समाज का केवल एक ज्ञापन और केवल खाना-पूर्ति करने वाला अनशन नहीं था बल्कि 500 साल बाद भी गुरु जांभोजी की वाणी और संदेशों को निष्ठापूर्वक जीवन में उतारते हुए जीवनयापन करने का उदाहरण हैं । गुरु जी की वाणी का प्रभाव न केवल बिश्नोई पंथ के लोगों के पर हैं बल्कि बिश्नोई समाज के आसपास लोग भी उनकी तरह तरह पर्यावरण, वन्यजीव और मानवता की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । जैसाकि रामचन्द्र शुक्ल जी ने कहा है कि “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है । आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृतियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है । जनता की चित्तवृति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है । अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का किचिंत दिग्दर्शन भी साथ-ही-साथ आवश्यक है ।” अर्थात् गुरुजी की ‘सबदवाणी’ समस्त राजस्थान के कई संत महात्माओं पर दिखाय़ी देता हैं उन्होंने गायों, महिलाओं की रक्षा करते हुए मानवता का पाठ पढ़ाते है-वीर तेजाजी ,गोगाजी, हड़बूजी, रामदेवजी, जसनाथ,दादूदयाल, सुंदरदास इत्यादि। इतना ही नहीं आज के संदर्भ में यदि देखा जाए तो आधुनिक समय और भागदौड़ में महिलाओं को अपनी संतान का पालन-पोषण करने में असफल होते दिखायी दे रही हैं । वहीं राजस्थान में बिश्नोई समाज की महिलाएं घायल नवजात हिरण, खरगोश, गाय के बछड़ों, मोर, नील गायों का इलाज करवाकर पालन पोषण करती हैं । ये महिलाएं कई बार हिरण के बच्चों को स्तनपान भी करती हैं । इस समुदाय के लोग वन्यजीव की सुरक्षा करते हुए हत्यारों और शिकारियों से लड़ते हुए बलिदान देते हैं । इनके इलाके में वन्यजीवों शिकार करना और पेड़ काटने का पूर्ण प्रतिबंध हैं । इनकी जीवन शैली अत्यधिक साधारण औऱ उच्चादर्शों से परिपूर्ण हैं । बिश्नोई समाज के लोग भारतीय आदर्शों को जीवन पूर्ण रूप से उतारते हैं । इनका मानना हैं- “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग भवेत् ।” ये लोग स्वार्थता से परे होकर मानवता की रक्षा सदैव करते आए हैं । हाल ही के ताजा उदाहरणों में बिश्नोई समाज के लोगों ने कोविड महामारी में दीन-गरीब और असहाय लोगों के लिए बिना किसी भेदभाव के तमाम प्रकार की सहायता करने आगे आए । राजस्थान में गायों में आयी ‘लम्पी महामारी’ के दौरान सरकार ने उचित समय पर कोई सहयोग नहीं किया किंतु बिश्नोई समुदाय के लोग ग्रामीणों के साथ मिलकर उन गायों का इलाज करवाने, देशी उपचार और चारा-पानी देने में डटें रहें । इनके प्रत्येक गाँव में वन्यजीव संरक्षण और गौशाला का प्रबंध सरकारी आर्थिक सहयोग के बिना स्वयं करते हैं । राजस्थान जैसे इलाके में भयंकर ठंडी और गर्मी में वन्यजीवों,गायों और वनोन्मूलन की सुरक्षा करने के लिए ग्रामीण लोग चंदा इकट्ठा करके करते हैं । गुरुजी की वाणी में ‘पहला सुख निरोगी काया’ बिश्नोई समाज लोग नित्य स्नान करके हवन करते हैं । इनके समाज में अमल,तम्बाकू और भांग, अफीम, मदिरा पर पूर्ण प्रतिबंध हैं । इस समाज के लोग नशा प्रवृत्ति से दूर रहते हैं । नशे के कारण आज लाखों की संख्या में प्रतिदिन एक्सीडेंट और हत्याएं तथा दुराचार हो रहे हैं किंतु बिश्नोई समाज के लोग सदैव प्रयासरत रहते हैं कि इनके समाज को स्वस्थ और स्वच्छ बनाएं रखने के लिए । यदि कोई नशा करते हुए, महिलाओं का अत्याचार करते हुए, चोरी करते हुए देखा जाए तो समाज के संत-महात्मा और बड़े लोग दण्ड देते हैं । गुरु जांभोजी का मुक्तिधाम मुकाम में प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है । वहाँ प्रत्येक वर्ष की गतिविधियों के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा करते हुए संत-महात्मा सुधार करने का आदेश देते हैं । गुरुजी के अनुयायियों ने उनकी शिक्षा अपने जीवन इस प्रकार उतारा हैं कि पाँच सौ साल बीत जाने के बाद भी बहुत संवेदनशील होकर उनकी वाणी का अनुसरण करते हैं । इस समाज के लोग सदैव आत्मनिर्भर रहे हैं । सबसे बड़ी बात यह है कि बिश्नोई समाज का कोई भी इंसान चाहे उच्च हो या निम्न हो वह कभी भिक्षा मांगते हुए कभी नजर नहीं आता हैं । इनके समाज का गरीब से गरीब अपनी मेहनत और परिश्रम के साथ जीवनयापन करता है और आस-पास के पशु-पक्षियों को भी दाना-पानी देता है । इस समाज में जब फसल निकाली जाती है, प्रत्येक घरों में उस अनाज का बहुत बड़ा हिस्सा आवारा गायों, पशु-पक्षियों और हिरणों-नील गायों के लिए दिया जाता हैं । अमावस्य,पूर्णिमा और ग्यारस के दिन ये लोग वन्यजीवों, गायों तथा पक्षियों के लिए मंदिर,चबूतरों और गौशाला में अनाज तथा चारा दान में देते हैं । मंदिरों और घरों में वातावरण शुद्धिकरण के लिए प्रतिदिन यज्ञ किया जाता हैं । गुरुजी की वाणी 500 वर्ष के बाद भी प्रासंगिक हैं और उनके अनुयायी समय के साथ पर्यावरण और मानवता का संदेश राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर देने के लिए प्रयासरत हैं । 4-5 फरवरी 2023 को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन दुबई में आयोजित करने जा रहे हैं । इस अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन का विषय पर “वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियाँ और बिश्नोई समाज के सिद्धांतों में समाधान” चिंतन-मंथन किया जाएगा । इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यह है कि आज पर्यावरण के समक्ष वैश्विक स्तर पर अनेक चुनौतियां हैं । जल, जमीन और जंगल खतरे में हैं । वायु और ध्वनि प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार की बिमारियाँ से त्रस्त हैं । ओजोन परत छलनी हो रही है । जैव विविधता में दिन-ब-दिन संकट बढ़ रहे हैं । जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिग, मरूस्थलीकरण, वनोन्मूलन, पारिस्थितिकी असुंलन, अम्लीय वर्षा इत्यादि कारणों से पर्यावरण के सामने संकट और चुनौतियाँ हैं, इन तमाम समस्याओं के साथ जीवनयापन करना आसान नहीं है । आज भले ही कृत्रिम मेधा (Artificial intelligence) बढ़ावा दिया जाने लगा हो ...किंतु इन समस्याओं और संकटों से निपटने के लिए हमारी ज्ञान-परम्पराओं और संस्कारों को जीवन में लागू करते हुए आगे बढ़ना होगा । कई बार समाज के लोग अपनी तृप्ती और धार्मिक आडम्बरों के कारण वातावरण और जीव-जन्तुओं को हानि पहुंचाते हैं । उन्हें गुरुजी जीवन के उच्चादर्श बताते हैं कि – सुंणि रे काजी सुंणि रे मुल्ला सुंणि रे बकर कसाई । किण री थरपी छाळी रोसो किण री गाडर गाई ? कांढै भागै करक दुहेली जायौ जीव न धाई । थे तुरकी छुरकी भिसती दैवौ खायबा खाज अखाजूं । चरि फिरि आवै सहजि दुहावै तिंहका खीर हलाली । तिंहकै गळै करद क्यौं सा’रो ? थे पढि गुंणि रहिया खाली । हीरालाल माहेश्वरी ने एक तथ्य में स्पष्ट किया है कि गुरुजी के दर्शन का प्रभाव जनसाधारण के साथ-साथ कई शासकों पर भी पड़ा था । जीव-दया पालनी की बात का महत्त्व समझते हुए सिंकदर लोदी, मुहम्मद खाँ नागौरी,मेड़ता के राव जैतसी, जोधपुर के राठौड़ राव दूदा, जैसलमेर के रावल जैतसी, मेवाड़ के राणा सांगा ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया था । विस्तृत फलक में देखा जाए तो गुरु जम्भेश्वर का तत्त्व-चिंतन समन्वयवादी हैं । उन्होंने जीवनादर्शों से विचलित होने वालों चेतावनी देते हुए कहते हैं- “इस कलियुग में तत्त्वज्ञान न हो पाने के कारण सभी भ्रम में पड़े दीखते हैं । ब्राह्मण वेदों को, काजी क़ुरान को और जोगी जोग को भुला बैठे हैं तथा मुण्डियों में तो अक्ल नहीं रही है।” वे कहते है-“मैं किसी का नहीं हूँ ; केवल सच्चे पुरुषों का हूँ । मैं तो सच्चे हिंदू का देव और सच्चे मुसलमान का पीर हूँ ।” गुरु जांभोजी की वाणी तथा उनके तत्त्व चिंतन की गहराई, भक्ति-वैविध्य, गुरु महिमा,ज्ञानोपदेश, कर्मशीलता, आत्मालोचना और आत्मज्ञान में लोकमंगल की भावनाएँ तथा सुधारवादी दृष्टि दिखाई देती हैं । हमारे देश में गुरु की महत्ता का बखान सदैव होता हैं । गुरु जांभोजी ने भी गुरु के संबंध बताया हैं- सतगुरु ऐसा तत्त्व बतावै, जुग जुग जीवै बहुरि न आवै गुरु न चीन्हों पंथ न पायो, अहल गई जमवारू उत्तम जंग सूं, उत्तम रंग सूं रंगू । उत्तम लंग सूं, उत्तम ढंग सूं ढंगू । आज देश को पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर बात करनी पड़ती हैं । विश्वस्तर पर पर्यावरण और जैव विविधता के बढ़ते खतरों के कारण संपूर्ण राष्ट्र चिंतित हैं और इससे संबंधित सम्मेलनों का आयोजन भी किया जा रहा हैं । इसके संदर्भ में प्रबुद्ध साहित्यकार ऋषभदेव शर्मा लिखते है-“पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी यह अच्छी खबर है कि सम्मेलन में करीब 190 देशों के मत्रियों और अधिकारियों ने सहमति जताई है कि जैव विविधता की रक्षा वर्तमान विश्व की प्राथमिकता होनी चाहिए । इस आपसी समझ का ही असर है कि इस समझौते में कीटनाशकों के उपयोग को क करने जैव विविधता को होने वाले नुकसान को रोकने और उसे सुधारने के लिए संकल्प जताया गया। ” उनका मानना है पर्यावरण के हितैषी आदिवासी समाज भी सदैव रहा है । सरकारी योजनाओं से भी वे भयभीत रहते हैं क्योंकि जल,जमीन और जंगल को सदैव इनसे खतरा हैं । इसी प्रकार गुरुजी और बिश्नोई समाज के बारे में देश के प्रबुद्ध राजनेताओं ने कई बार अपने मंचीय भाषणों के माध्यम संदेशों के बारे में बताया हैं –गजेन्द्रसिंह शेखावत ने कहा-“मित्रों मैं बिश्नोई समाज से निवेदन करता हूँ कि वे मुझे गोद लेंवे मैं उनके साथ 24 घंटे काम करूँगा और पर्यावरण की रक्षा करूँगा ।” उन्होंने यह भी बताया कि “बिश्नोई समाज जल, जगंल और जमीन के वास्ते बात करता है, जबकि पाश्चात्य संस्कृति के अंधाधुंध अनुकरण के कारण हमने इन प्रकृति प्रदत्त चीजों का खुद को मालिक समझ लिया । भगवान जंभेश्वर ने प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का संदेश ना दिया होता तो हमारे लिए क्या ये पर्यावरण बचता ? आप लोगों ने पेड़ों की रक्षा के वास्ते बलिदान दिया । आज विश्वस्तर पर उदाहरण पेश करने की क्षमता है।” आजादी के अमृत महोत्सव में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने वक्तव्य में पर्यावरण की बात करते हुए बताया है कि “संयुक्त राष्ट्र द्वारा भारत को ‘चैम्पियन ऑफ द अर्थ’ सम्मान बिश्नोई जैसे समुदायों द्वारा किए गए बलिदानों के कारण ही संभव हो पाया हैं...लोग कहते है कि मोदी जी आपका सम्मान हो गया है । मुझे लगता है कि दुनिया को पता नहीं है मेरी राजस्थान की धरती पर बिश्नोई समाज...जब दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग का ‘ग’ मालूम नहीं था और पर्यावरण का ‘प’ पता नहीं था, तब मेरे बिश्नोई समाज के लोगों ने सदियों पहले पर्यावरण की रक्षा के लिए बलिदान दिए आज भारत को चैम्पियन द अर्थ जो सम्मान मिला है उसके मूल में पर्यावरण की रक्षा के लिए बलिदान देने की परम्परा वाले देश के कोने-कोने में हैं । भाइयों-बहनों भारत आज उसकी महान परम्परा और उसके मूल्यों के द्वारा मिली शिक्षा है उसके लिए इन सदियों से चली आई परम्परा वालों को शत-शत नमन करता हूँ । इस परम्परा से जुड़े हर व्यक्ति को मैं नमन करता हूँ ।” अर्थात् आधुनिक समय में राष्ट्र और पर्यावरण हित के लिए हमारी संत-महात्माओं के द्वारा बतायी गई ज्ञान परम्परा की और लौटने की आवश्यकता है । 
 संदर्भ- गुरु जांभोजी : तत्त्व-चिंतन और उच्च जीवनादर्श का आग्रह, गगनांचल पत्रिका,मई –जून 2022 अंक, पृष्ठ संख्या-36
 2. वही, पृष्ठ सख्या 36 
3. https://pib.gov.in /pressReleaselframepage.aspx?prid=186102
 4. https://www.bishnoism.org-ka-balidan.html?m=1
 5.jodhpurthousandofkhejritreesdi-rajasthan-au275-129602.html 
6.श्री जम्भवाणी टीका,डॉ हीरालाल माहेश्वरी, श्री गुरु जम्भेश्वर साहित्य सभा, फिरोजपुर,द्वितीय संस्करण 2011 7.हीरालाल माहेश्वरी,वही,पृष्ठ संख्या-33 
8.वही, पृष्ठ संख्या-13 
9. https://www.newslaundary.com/2018/12/06/raje-goverment 10 विविधता बचेगी,तो मनुष्य बचेगा,डेली हिंदी मिलाप,बुधवार,21 दिसम्बर 2022 
लेखक परिचय 
डॉ. मिलन बिश्नोई
 सहायक आचार्य 
 खाज़ा बंदानवाज विश्वविद्यालय,कलबुर्गी,कर्नाटक
 ई-मेल –milanbishnoi@gmail.com
 Mob-6380568643

सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

साहित्य और इतिहास में किन्नर

 Article Published - Akshara Multidiciplinary Research Journal Peer-Reviwed &Refreed International Research Journal, E-ISSN 2582-5429,July-September 2022, Volume-03, Issue V (B),Page No.-54-58, -#DrMilanBishnoi

                                    


                                                              शोध-सार

साहित्येतिहास मेंतृतीयलिंगी लोगों की उपस्थिति होने के बावजूद उनके अस्तित्व के लिए प्रश्न उठाए जाते हैं । इस समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में स्त्री’ के लिबास में पुरुष के शव को दफनाने का प्रमाण मिलता है। ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है, किन्तु इस समुदाय को भारतसंयुक्त राज्य अमेरिकाब्रिटेनचीनजापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों में असमानता और अछूतेपन का शिकार होना पड़ा । बीते साठ-सत्तर वर्षों से विश्वस्तर पर सुनवाई होने लगी है । तृतीयलिंगी समुदाय को ट्रांसजेंडर के रूप में लगभग 1965 ई. से जानने लगे हैं । जाहिर-सी बात है कि उन्हें मर्द और ‘औरत के  सामाजिक गुणों से जोड़कर देखने का षड़यंत्र मध्यवर्गीय लोगों ने ही किया था । अर्थात् उनमें  दाढ़ी वाले पुरुष के अंदर और औरतपन का भाव  होने के कारण विशिष्ट लिंग वाली शब्दावली का प्रयोग किया जाने लगा । कुछ तृतीयपंथियों का जन्म शारीरिक रूप से तो सामान्य होता है, परंतु वह आंतरिक भाव से जन्मजात लिंग के प्रति असहजता प्रकट करते हैं, इसलिए वे लोग विपरीत लिंगी वेशभूषा, व्यवहार, चाल-चलन के प्रति आकर्षित होते हुए स्वयं में उस लिंग का रूपान्तरण करने में इच्छुक रहते हैं, इसलिए ‘अलैंगिक और विपरीतलिंगियों को नकारा और धिक्कारा जाता है । जबकि इन लोगों ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है जिसके कारण उनके साथ असामान्य व्यवहार किया जाए । वहीं तृतीय लिंगी समुदाय के अस्तित्व का संदर्भ वैश्विक और भारतीय साहित्येतिहास में अनेकानेक रूपों में देखने को मिलता है ।

            खैर आमतौर पर सदियों से अपनी स्वार्थता के लिए इंसान को गोरे-काले, लिंग, जाति, धर्म और अर्थ के आधार पर बांटने का प्रयास किया गया/ जा रहा है । पितृसत्तात्मक सोच के शक्तिशाली लोगों ने शारीरिक और आंगिक क्षमतानुसार लैंगिकता के सांचे बनाये हैं । विश्वस्तरीय इतिहास में देखा जाए तो राजा वही बनता था, जिसके पास शौर्य और पराक्रम की शक्ति थी । उस शासनकाल के दौर में महिलाओं और किन्नरों को उपभोग की वस्तु समझा गया । और ऐसे शासकों के शासन काल में कन्या का अपहरण’, ‘अनैतिक व्यवहार, ‘अनैतिक तरीके से दूसरों की संपत्ति और क्षेत्र में कब्जा करना इत्यादि होता आया है ।

बीज शब्द- वैश्विक साहित्येतिहास, ट्रांसजेंडर, थर्डजेंडर, हिजड़ा, विशिष्ट लिंग, किन्नर, तृतीयलिंगी, पुरात्वविदों, कास्युगीन, मध्यमवर्गीय, परिदृश्य, समलैंगिक, अस्तित्व, सनातन संस्कृति इत्यादि।

 मूल आलेख

          साहित्येतिहास में तृतीयलिंगी समुदाय की भिन्न-भिन्न अवधारणा देखने को मिलती है जैसे-नामोल्लेख,संस्कृति-सभ्यता । तृतीयलिंगी/किन्नर समुदाय की उपस्थिति के अनेकानेक प्रमाण मौजूद है । इस जन समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में स्त्री’ के लिबास में पुरुष के शव को दफनाने की प्रथा के प्रमाण देखे जा सकते हैं । ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है । थर्डजेंडर समुदाय को भारतसंयुक्त राज्य अमेरिकाब्रिटेनचीनजापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों की संस्कृति और सभ्यता में उनकी उपस्थिति सामान्य और असामान्य दृष्टिकोण से देखने को मिलती है । तृतीयलिंगी समुदाय की स्थिति और अस्तित्व से संबंधित जानकारी मिलती है कि “Before the advent of Europeans, Native Americans, embraced gender fluidity. There were no gender binaries. There were men and women, and then there were feminine men and manly women, and transgendered individuals. In native North American societies, these individuals were considered to be ‘normal’. In fact, those who adopted fluid gender roles were called Two Spirit female and Two Spirit male; and were considered supremely gifted, having the knowledge and ability to understand two opposing sides. There were no defined rules, no distinct binaries. In these societies, men and women frequently assumed opposite gender identities, occasionally cross-dressing, but almost always adopting the universal occupational roles assigned to each sex.”1 इससे यह विदित होता है कि युरोपीय लोगों के आने से पहले अमेरिका में भी लैंगिक भेदभाव देखने को नहीं मिलता है । वहाँ के  प्राचीन इतिहास में ‘स्त्री और ‘पुरुष’ तथा ‘ट्रांसजेंडर सभी की समान स्थिति रही है । स्पष्ट है कि ऐतिहासिक, पौराणिक और प्राचीनकाल में हिजड़ा, ट्रांसजेंडर, समलैंगिक लोगों की उपस्थिति बराबर रही है।

          मूल अमेरिकियों की तरह म्यांमार में भी समान स्थिति थी । जो जैविक रूप से मर्द हैंलेकिन औरत के रूप में क्रॉस-ड्रेस और समाज में औरत की भूमिकाओं को निभाना अधिक पसंद करते हैं । बर्मी समाज में भी हिजड़ों को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा गयाउन्हें 'प्रतिभाशालीइंसान के रुप में जाना जाता है । जो अक्सर बाहर के लोगों को बर्मी संस्कृति के साथ जोड़ने का काम करते हैं ।

          ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मेडागास्कर और समोआ में सकलावास के जातिय समुदाय को देखा जाना चाहिए । जो मेडागास्कर की कुल जनसंख्या का 6.2 प्रतिशत है, जो वहाँ के कुछ लड़कों को लड़कियों के रूप में देख सकते हैंजो शारीरिक रुप से स्त्रैण माने जाते हैं । इस समाज के अंतर्गत ‘अंतांड्रोय और होवा जनजातियाँ में अपने  बेटों का बेटी की तरह संस्कार देते हुए साज-श्रृंगार, वेषभूषा पालन-पोषण किया जाता है, उसे महिला की आवाज में बात करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है । अर्थात् पूरी तरह से एक औरत के हाव-भाव सिखाए जाते हैं, ताकि सामाजिक स्तर पर औरत के साथ व्यवहार कर सके ।

           इसी तरह समोआ में ‘तृतीय लिंगी’ को ‘ Fa'afafine’ (किन्नर)  के नाम से जाना जाता है । ऐतिहासिक काल में यहाँ किन्नरों को समाज में मान्यता प्राप्त थी । सामोन संस्कृति में किन्नर को अभिन्न अंग के रूप में देखा गया । Fa'afafine’ (किन्नर) नवजात शिशु का जन्म एक ‘male’ शरीर के साथ होता है, लेकिन आयु बढ़ने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से ‘Female’ जैसा महसूस करता हैं, ऐसे बच्चों की पहचान उनके माता-पिता जल्दी ही कर लेते हैं । इसलिए माना जाता है कि उन बच्चों का पालन-पोषण लड़कियों की तरह किया जाता है अर्थात् उन्हें लिंगभेद का सामना नहीं करना पड़ा । भले ही ‘Fa'afafine’ (किन्नर)  पुरुषों और महिलाओं के साथ यौन संबंध रखता हैलेकिन वहाँ पर fa'afine को 'समलैंगिकनहीं माना गया है, वे हिजड़ा समुदाय के प्रति सहज है, वहीं 'समलैंगिकता' को पूरी तरह से यूरो-पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बतलाया गया । युरोपीय लोगों के आगमन से पहले समोआ में मातृ-सत्तात्मक शासन के कारण उनके आस-पास किन्नरों की मौजूदगी देखने को मिलती है । इसी कारण समोआ में महिलाओं और तृतीयपंथी के नेतृत्व में उनकी भूमिकाओं को महत्त्व दिया जाता था ।

          मिस्र’ में 1200 से 1500 ई. के दौरान, ‘मामलुक काल के शासनकाल में अलैंगिक बच्चों को पुरुष की तरह माना जाता था । पुरुषों के रूप में होने के कारण उन्हें सारी सुख-सुविधाओं मिलती थी । पुरुष के रूप में परवरिश होने के कारण उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता था । “‘हवाई  संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रशान्त महासागर में स्थित है । वहाँ शारीरिक पहचान थर्डजेंडर के रूप में होने बावजूद भी स्त्री या पुरुष की लैंगिकता में रहने के लिए बाध्य नहीं करते हैं, बल्कि हवाईयन की मूल संस्कृति में महूओं’(तृतीयलिंगी) को प्राचीन परम्पराओं के प्रसार- प्रचार करने में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है ।2 और उन्हें शिक्षकों के दृष्टिकोण से सम्मानित भी किया जाता था । जिस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासकों के द्वारा किन्नरों को अपराधिक श्रेणी में रखा गया उसी प्रकार हवाई पर यूरोपीय लोगों के आक्रमण के पश्चात किन्नर संस्कृति का विनाश हुआ । यूरोपीय मानसिकता से प्रभावित लोगों ने ही लैंगिक भेदभाव शुरुआत की है ।

          थाईलैंड में किन्नरों को  'कैथोयया 'काटोईनाम से जाना जाता है । उनको लेडीबॉय की तरह में माना जाता है । वहाँ देश में ट्रांसजेंडर और ‘महिलाओं के समान अधिकार होते हैं । वास्तविक रूप से सामाजिक स्तर भेदभाव के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता है । जनसंख्या के अनुपात में कैथोय (तृतीयलिंगी) की काफी अहम भागीदारी देखने को मिलती है । कैबरे और अन्य नृत्य शो करने का पेशा तृतीयलिंगियों ने अपनाया और पढें-लिखे किन्नर अच्छी नौकरी भी कर रहे हैं ।

          विश्वस्तरीय इतिहास में यदि भारतीय संदर्भ में किन्नरों को देखा जाए तो अंग्रेजों की सोकॉल्ड पाश्चताय संस्कृति में किन्नर समुदाय की संकल्पना ही नहीं बैठती थी । किन्नरों के सभ्य सामाजिक जीवन में अंग्रेजों ने उन्हें गलत समझते हुए उनके खिलाफ अनेक धाराएँ लगाकर उन्हें प्रतिबंधित किया गया । पुरुषों के हिजड़ा बनने पर रोकथाम किया गया ।  दक्षिण एशियाई संस्कृतियों में किन्नरों के द्वारा प्रजनन करने वालों को आशीर्वाद या शाप देने की शक्ति प्राप्त थी । खासकर भारतीय जनता के मन किन्नरों के प्रति एक आध्यात्मिक और आस्था के दृष्टिकोण से स्थान हमेशा देखने को मिलता है । वे नवदम्पति और नवजात शिशु को आशीर्वाद देकर बधाई प्राप्त करते है । उनकी आजीविका चलाने का इतिहास मात्र बधाई माँगने का रहा है । भारतीय सनातन संस्कृति में तृतीयलिंगी और ट्रांसजेंडरों की उपस्थिति के इतिहास में नयी नहीं है, उन्हें हमारे पौराणिक साहित्य और प्राचीन साहित्येतिहास में मान्यता प्राप्त थी । किन्नर समुदाय को अरवानीजोगप्पाहिजड़े, कोठीशिव-शक्ति,अर्धनारीश्वर, शिखंडी आदि के रूपों में देखा जाता था । तृतीयलिंगी के रूप में हिंदू पौराणिक कथाओं और अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा भारतीय संस्कृति में मजबूत ऐतिहासिक उपस्थिति रही है । प्राचीन सनातन संस्कृति में महर्षि वात्सायन द्वारा रचित ग्रंथ कामसूत्र में  'तृतीय प्रकृतिके रूप में संदर्भ दिया गया ।वात्स्यायन के कामसूत्र में तृतीयप्रकृति कहकर हिजड़ों का उल्लेख है । वो स्त्री अथवा पुरुष किसी के कपड़े पहन सकते हैं,ऐसा उसमें कहा गया है । वात्स्यायन ने और शेष बहुत से पंडितों ने उन हिजड़ों को नायिका कहा है । कोई राजकुमार या किसी सरदार का पुत्र काम-क्रीड़ा में कमजोर हो,तो उसे सिखाने के लिए हिजड़ों को नियुक्त की जाती है ।प्राचीन वैदिक और पौराणिक साहित्य में तृतीयप्रकृति को लोगों का संस्कृति की विविधता बनाए रखने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है । भारतीय वैदिक संस्कृत भाषा के व्याकरण में स्त्रीलिंग,पुल्लिंग और 'नपुंसकइन तीनों लिगों का प्रयोग किया जाता है । इसके अलावा प्राकृत और अपभ्रंश भाषा में  भी उल्लेख मिलता  है ।

          सनातन संस्कृति में किन्नरों को दैवीय दृष्टि से देखा गया है । पौराणिक काल में अनेक मिथक कहानियों का उल्लेख मिलता है । महाभारत में ‘अरावन या अरवाण का उल्लेख किया गया, यहाँ वर्तमान समय में भी तमिलनाडु में हिजड़ा समुदाय का प्रति वर्ष मेला भरता है, जिसमें देशभर के किन्नर यहाँ आकर एक रात के लिए अरावन से शादी करते हैं । जो शारीरिक रूप से पुरुष और स्त्री का मिला-जुला चेहरा स्वयं को औरत मानते हुए अरवाण से शादी करने की इच्छा प्रकट करते हैं, तथा ये लोग शादी के दूसरे ही दिन विधवा बनकर विलाप करते हैं । अरावन को ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो वह बड़ा योद्धा था । इस संदर्भ तीसरी ताली उपन्यास कौरवों और पांडवों के युद्ध में अरावन पांडव पक्ष की तरफ से युद्ध लड़ने के लिए स्वयं आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अर्जुन का बेटा हूँ और अपने पिता की युद्ध जीत सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को इस बलिदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ ।अर्जुन की पत्नी नागवंशी चित्रागंदा से अरवाण पुत्र की प्राप्ति हुई है । उसे अमरत्व प्राप्ति का वरदान प्राप्त था परंतु युद्ध में पाड़वों को काली माँ को बलि देने के लिए आवश्यकता होने पर अरावन ने कृष्ण को अपनी आखिरी इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि मैं कम से कम तीन सप्ताह पाण्डवों की तरफ से युद्ध लड़ना चाहता हूँ और युद्ध में जाने से पहले मेरा विवाह करना होगा ।5 इस प्रकार अरावन की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए कृष्ण मोहिनी बनकर शादी कर लेते हैं और सुबह के होने पर अरवाण को युद्ध मैदान में लाया जाता है ।

          मैं क्यों नहीं?  उपन्यास में कथानायिका ऐतिहासिक प्रसंग को बताती है कि  सर, गुजरात में वड़ोदरा शहर में सयाजीराव महाराज ने बहरामपुरा इलाके में हिजड़ों के लिए तीन इमारतें बाँधी हैं । यहाँ करीब छह सौ से सात सौ हिजड़े सुख-चैन से जीवन बसर करते हैं । हम मुंबई में ऐसी जगह की याचना करते हैं तो इसमें बुरा क्या हैं ।विवेच्य उपन्यास के अनुसार समाज में कुछ एक जगहों में ऐतिहासिक बदलाव लाते हुए राजा-महाराजाओं ने किन्नरों की सुरक्षा के प्रति ध्यान दिया होगा तो भी मीडिया और साहित्य में दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि जमीनी हकीकत जानने में कुछ कमियाँ रही होंगी ।

          मुगलकाल में किन्नरों के संदर्भ में अनेकानेक उल्लेख मिलते है । उन्हें महारानियों  के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में भी तैनात किया जाता था । इसके लिए कई बार ऐसे गरीब नवयुवकों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था । ऐसा माना जाता है कि मुगल शासक राजपूत लड़कों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करते थे । अंततः लिगच्छेदन पर रोकथाम का उल्लेख मिलता है – औरंगजेब के शासनकाल में लिंगछेद पर रोक लगायी गयी । फिर भी छुपकर वो काम होता था । उस समय मुसलमान हिजड़ों को आदर मिलता था । वो अमीर भी थे । उनकी संख्या में हिंदू हिजड़े गरीब थे । बहुत से हिंदू हिजड़ों ने उस समय धर्मान्तरण किया था।आज भी  किन्नर समुदाय के अधिकांश सदस्यों का जीवन रहस्यमयी बना हुआ है । शोधकार्य के दौरान कई लोगों से मिलने का प्रयास किया और उनके इतिहास जानने की कोशिश की लेकिन निराशा ही मिली । लेकिन समय के साथ पढ़े-लिखे किन्नर अपने समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष पर चिंतन मनन करते हुए आगे बढ़ने में प्रयासरत है ।

  लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का मानना है कि हिजड़े बहुत मेहनत करने वाले और ईमानदार होते हैं और किसी प्रकार के काम के लिए आनाकान नहीं करते तथा काम में जी-जान लगा देते हैं । राजा-महाराओं को उनकी जरूरत महसूस होती थी इसके कारण लिंगच्छेदन किया जाता था । उनका मत है कि “अन्त में एक खास कानून बनाकर बड़ौदा के महाराज गायकवाड़जी ने खच्चीकरण (बधियाकरण) पर प्रतिबंध लगाया । भारतीय संविधान की धारा 320 में इसका उल्लेख है ।इसके अनुसार दूसरे का लिंग काटना कानून अपराध माना गया है । किन्नर समुदाय के लोगों के पास मुगलकाल में जीविकोपार्जन के रास्ते खुले थे किंतु ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में उनकी स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गयी थी ।

 

          हजारों साल के इतिहास में बदलाव पहली बार 21 वीं सदी में देखने को मिल रहा है । समयानुसार उनको देश के विभिन्न उच्च पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर ऐतिहासिक बदलाव लाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं । लेकिन इतिहास में पहली बार हिजड़ा समाज की तरफ से केस कोर्ट में दर्ज करवाया गया । उस समय उनके पक्ष के वकील, नेता और किन्नर अध्यक्ष को भारी कटाक्ष भरे शब्दों का सामना करना पड़ा था । वे समाज, सरकार, साहित्यकारों का ध्यान लगातार खींच रहे हैं । देश के विभिन्न राज्यों में लगातार ऐतिहासिक बदलाव लाने का प्रयास हो रहे हैं उसकी सराहना होनी भी चाहिए ।

          भारत में मुगल शासनकाल में फिर भी उनकी स्थिति ठीक थी । अधिकांश मुगल शासकों के साम्राज्य में बेगमों के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में हिजड़ों को नियुक्त किया जाता था, क्योंकि हिजड़ों की निगरानी में बेगमों की सुरक्षा से उन्हें कोई खतरा या शक नहीं चिंता नहीं थी । लेकिन यहाँ से ही नकली और लिंगच्छेदन करके हिजड़ा बनने का प्रचलन काफी हुआ । कई बार गरीबी के कारण अपना लिंगच्छेद करवाकर हिजड़ा भेष अपनाने को तैयार हो जाते थे । इसका उदाहरण प्रदीप सौरभ के तीसरी ताली में राजा के माध्यम से देख सकते हैं । किन्नर समुदाय को भारतीय नागरिक होने के बावजूद ब्रिटिश शासन के कार्यकाल में सामाजिक और आर्थिक स्तर के सारे अधिकार उनसे छीन लिए गये । उन्होंने किन्नरों को अछूत, भिखारी, चोर, समाज  में अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर उन पर अनेक बंधन लगाकर समाज से निष्कासित करने का प्रयास किया गया । “Eunuchs were not allowed to wear female clothing and jewellery or perform in public and were threatened with fines or thrown into prison if they did not comply. Police would even cut off their long hair and strip them if they were female clothing and ornaments. They "experienced police intimidation and coercion, though the patterns of police violence are unclear",  says Dr Hinchy9 अंग्रेजों ने किन्नर समुदाय को बधाई से मिलने वाली रोजी-रोटी छीनकर उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय किया । बधाई और उनकी वेशभूषा ही उनकी पहचान थी । इन्होंने अनेक किन्नरों को मारा-पीटा और हत्याएँ की  जिसमें 1871 में मैनपुरी की किन्नर गुरु भूरा की हत्या का उदाहरण देखने को मिलता है । किन्नर गुरु के साथ-साथ माना जाता है कि लगभग 2500 किन्नरों को मारा गया । इस हत्याकांड के तत्पश्चात अग्रेंजो ने कुछ नियमावली बनाकर उन्हें भगाने की कोशिश की थी । “Years after her murder, the provinces launched a campaign to reduce the number of eunuchs with the objective of gradually causing their "extinction". They were considered a "criminal tribe" under a controversial 1871 law which targeted caste groups considered to be hereditary criminals.”10 अंग्रेजों ने किन्नरों की जनसंख्या को कम करने के लिए एक कानून प्रस्ताव पास करके 1871 में आपराधिक जनजाति के तहत इन्हें हमेशा-हमेशा के लिए समाज से निकालने का काम कर लिया ।

          भारतीय इतिहास में बिना किसी धार्मिक भेदभाव किए किन्नरों का एक समाज स्थापित है इस संदर्भ में किन्नर गुरु तारा बताती है कि भले ही हम किसी भी धर्म से आए हों, हमारे नाम मुस्लिम हों या हिंदू, हम सब एक हिजड़ा समाज के होते हैं । हमारे सात घर होते हैं । प्रत्येक घर का एक मुखिया होता है, जिसे नायक कहते हैं, गुरु नियुक्त करता है । गुरु चेलो को बधाई, गाना-नाचना सिखाता है । गुरु के स्थान को गुरुधाम बोला जाता है, जहाँ धाम से जुड़े हिजड़े कमाई का एक हिस्सा जमा करते हैं । भारत वर्ष में कुल 450 धाम और इतने ही गुरुधाम हैं ।11 तथ्यानुसार अलग-अलग प्रांत के किन्नर साल में एक बार बहुचरा माता के मंदिर में इकट्टे होते हैं और बहुचरा माता के मंदिर में भंडारे का आयोजन भी करते हैं । इससे संबंधित जानकारी तीसरी ताली और यमदीप उपन्यास में भी मिलती है।

          उत्तर भारत में हिंदू सस्कृति को ठेस पहुँचाने का लगातार प्रयास मुगल शासकों ने किया था । आक्रमण के दौरान सर्वप्रथम हिंदू स्थापत्य कलाओं और मंदिरों को ध्वस्त करके लोगों की आस्था पर प्रहार किया । गुजरात में सोमनाथ मंदिर को लूटने और तोड़ने के साथ-साथ किन्नरों की कुल देवी बहुचर माता को भी विध्वंस किरने की घटना तारा गुरु बताती है कि तो सुनिए, अलाउद्दीन खिलजी की सेना जब माँ बहुचर देवी के मंदिर को विध्वंस करने पहुंची, तब उसके तमाम सैनिकों ने मंदिर की मुर्गियाँ खा ली ।12 इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश शासक किन्नर समुदाय के लोगों को अपराधी घोषित करके भारतीय लोगों में उनके प्रति नफरत और भेदभाव के भाव जगाने में सफल हुए ।  और मुगल साम्राज्य में औरंगजेब जैसे शासकों ने स्वार्थ-सिद्धि हेतु किन्नरों के लिए रोजी-रोटी का प्रबंध तो किया था, लेकिन उनके ईश्वरीय विश्वास और आस्था के मंदिर को विध्वंस करते हुए निराश और भयभीत करते हुए उनकी लैंगिकता को नकारा है ।

          नाज मुगल काल में निजी स्वार्थ के लिए बच्चों को हिजड़ा बनाने की प्रक्रिया का जिक्र इस प्रकार करती है कि  सुना है कि निजामशाही में तो दस-बारह साल से कम उम्र वाले लड़कों के माता पिता को इस बात का डर रहता कि पता नहीं कब निजाम के लोग आकर उनके बच्चों को भगा कर ले जाए । अधिकतर को तो उनकी मर्जी के विरुद्ध सौदा करना पड़ता था । दस-बारह साल के लड़कों को उठाना, उनका खस्सीकरण करना । अच्छी तरह से खिला-पिलाकर उन्हें तंदुरुस्त रखना । खोजा बनाना और रानी के महल में पहरेदार के रुप में बेझिझक तैनात करना । खस्सीकरण के बाद बनाया गया खोजा था तो आखिर हिजड़ा ना ! माँ, इन राजाओं ने निजी स्वार्थ के लिए कितना पाप किया था !”13 आलोच्य उपन्यास में लेखिका ने बताया है कि रानियाँ हरम में सुरक्षा के लिए बच्चों के लिंग काटकर सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करने की घटना काफी प्रचलित भी है । ऐतिहासिक काल पर आधारित जोधा-अकबर धारावाहिक और फिल्म में भी हिजड़ों को सुरक्षाकर्मी के रूप में दिखाया गया है ।

निष्कर्ष             

          निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो हिंदी साहित्येतिहास या उपन्यास विधा में 20 वीं सदी तक किन्नर समुदाय को आधार बनाकर या किसी उपन्यास में सशक्त किन्नर के रूप में पात्र नहीं देखने को मिलता है । कुछ उपन्यासों में समलैंगिकता के आधार पर उपन्यास जरूर लिखा गया है । LGBT के समूह के हिसाब से कुछ शुरुआत 20 वीं सदी के अन्तिम दशकों से देखी जा सकती है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य और समाज किन्नरों के प्रति बहुत पहले ही संवेदनशील था । किन्नर विमर्श वर्तमान समय में भी शैशवावस्था के दौर में है । अभी तक उपन्यास साहित्य इतिहास में मुश्किल से दो दर्जन उपन्यास लिखे गये हैं  । शोध की दृष्टि से अगर तटस्थता के साथ बात की जाए तो कई उपन्यासों की कथाएँ एक समान देखने को मिलती हैं ।

          उपन्यासों में राजनैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में बात न के बराबर हुई है । लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है, किन्नर जीवन पर आधारित लेखन का श्री गणेश करके इतिहास बदलने में 21वीं सदी के उपन्यासकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । उपन्यास ही वह विधा है जो जीवन के तमाम पहलुओं को बताने में सक्षम हो सकती है। उपन्यासकारों ने अवश्य ही किन्नर समुदाय से जुड़े शिक्षा, रोजगार, घर वापसी, संतान को सम्मान, मानवाधिकार के साथ स्वस्थ जीवन जीने और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने जैसे मुद्दों पर लेखन करके सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने का प्रयास किया है । उनमें यमदीप, किन्नर कथा, गुलाममंडी, मैं भी औरत हूँ, दरमियाना, जिंदगी 50-50, पोस्ट बॉक्स 204- नाला सोपारा, मेरे हिस्से की धूप, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मेरे होने में क्या बुराई, वह, आधा आदमी, हॉफ मैन, शिखंडी, शिखंडी स्त्री देह से परे, मुनिया मौसी, अस्तित्व इत्यादि उपन्यास लिखे गये जिन्होंने साहित्येतिहास में किन्नर-विमर्श चेतना को बल देने का कार्य किया । किन्नर समुदाय पर आधारित आधुनिक हिंदी उपन्यासों के माध्यम में कुछ किन्नरों से संबंधित विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख हुआ है । अधिकांश लेखकों ने ऐतिहासिक कथाओं के माध्यम से किन्नरों की वर्तमान परिस्थिति का सही अंकन करने लिए सफलतापूर्वक प्रयास किया है ।

संदर्भ सूची-

1.https://indianexpress.com/article/world/indigenous-tribes-embraced-gender-fluity-prior-to-colonisation-but-europeans-enforced-specific-gender-roles/

 2. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-48442934

 3.लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-164

4.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189

5. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-165

7. वही,पृष्ठ संख्या-164

8. वही, पृष्ठ संख्या-165

9.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189

10.पारू मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास),अनु.सुनीता परांजपे, राजकमल प्रकाशनदरियागंजनई दिल्लीप्रथम संस्करण 2012,पृष्ठ संख्या-152

11. महेन्द्र भीष्म,किन्नर कथा, सामयिक बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली,  प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-92

12.वही, पृष्ठ संख्या-93

 13. पारु मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास), अनुवाद- सुनीता परांजपेराजकमल प्रकाशनदरियागंजनई दिल्लीप्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या-86

#ThirdGender  #kinnar  #Transgender #किन्नर विमर्श

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

ट्रांसजेंडर सोशल एक्टिविस्ट सिमरन सिंह के साथ डॉ. मिलन बिश्नोई की बातचीत

                       

                                                अस्तित्व की तलाश में सिमरन
1. नमस्कार सिमरन,मैं आपके बचपन के जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में जानना चाहती हूँ। सिमरन - मेरा जन्म साधारण परिवार में हुआ था । मेरे पिताजी अपने व्यसाय के साथ नीजि कम्पनी में मशीन ऑपरेटर की नौकरी भी किया करते थे। मेरा परिवार पारम्परिक होने के साथ-साथ रूढ़ीवादी बातों में यकीन करता है । जैसाकि मैं अपने परिवार की पहली संतान हूँ और मेरे जन्मोंत्सव पर बहुत खुश थे । जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई ओर उन्हें पता चला कि मैं एक किन्नर हूँ,तो उनका मेरे प्रति रवैया ही बदल गया। उनकी पितृसत्तात्मक सोच के कारण वे मुझे अपनाने से कतराने लगे । मेरे सद्गुण और अच्छे काम को भी कोई महत्व नहीं दिया,बल्कि उनकी नजर में मेरा किन्नर रूप में पैदा होना अभिशाप बन गया । 
2.सिमरन, आपको किन्नर होने का अहसास कब और कैसे हुआ? 
सिमरन- मुझे किन्नर होने का अहसास कभी नहीं हुआ । बालक जब तक नासमझ होता है, तब तक धर्म, जाति, लिंग के बारे में कुछ नही जानता । क्योंकि अपनी वास्तविकता यानि लिंग के बारें में जानने और समझने में वक्त लगता है । उसे धीरे-धीरे उम्र और अनुभव के साथ समाज में रहने और झेलने से पता चलना शुरू होता है, वैसे ही मेरे दिमाग लिंग का द्वंद चलने लगा कि मैं कौन हूं? मैं अलग क्यों हूँ । जैसाकि जब से मैं समझने लगी तब स्वयं को लड़की की तरह महसूस करती हूँ और मानती भी हूँ । मुझे लड़कियों की तरह सजना-संवरना और उनके साथ रहना अच्छा लगता था । वैसे घर में भी शुरूआती दौर में कोई रोक-टोक नहीं थी । जैसे-जैसे मैं बड़ी होने लगी तब से मुझे कैसे उठना-बैठना ओर किसके साथ रहना है,यह सब घरवाले तय करने लगे । तब मुझे लगने लगा कि मैं अन्य लोगों से भिन्न हूँ ।
 3. आप दिखने में संपूर्ण महिला जैसी ही है, फिर भी डॉक्टर/चिकित्सक के अनुसार आप में कौनसी कमी है? सिमरन - दिखने में एक संपूर्ण महिला की भांति हूँ लेकिन डॉक्टर के अनुसार मुझमें प्रजनन की क्षमता नहीं है । बस मेरी आवाज़ थोड़ी भारी है लेकिन मुझमें बाकी सारी भावनाएँ और शरीर महिलाओं की तरह है ।
 4.क्या आपके माता-पिता ने बचपन में लैंगिक विकास की कमियों को देखते हुए इलाज करवाने की कोशिश की थी?
 सिमरन- मेरी शारीरिक समस्याओं को जानते हुए भी माता-पिता चिकित्सक के पास मुझे ले जाना जरूरी नहीं समझा । जबकि हमारे पारिवारिक डॉक्टर ने मेरी लैंगिकता के बारें में सचेत किया था। मेरी माँ ने जानबूझकर अनदेखा किया । उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उनके पास मेरे अलावा बेटेऔर बेटियां थी । इसलिए शायद उन्होंने मुझे मेरे हालातों पर छोड़ दिया ।
 5. सिमरन! आपको सामान्य बालक और किन्नर बालक में क्या असमानता देखने को मिली? खासकर मैं शारीरिक असमानता के बारें में जानना चाहती हूँ । 
सिमरन- मैं अभी एक लड़के-लड़कियों असमानता को जानती हूँ लेकिन किन्नरों की शारीरिक भिन्नता को अभी तक समझ नहीं पाई कि उनमें क्या असमानता होती है । बस यह जानती हूँ कि उनका लैंगिक विकास पूर्ण से नहीं होता और प्रजनन क्षमता नहीं होती है।
 6.सिमरन,वर्तमान में वैज्ञानिक और आधुनिक चिकित्सक तकनीकि से सर्जरी करके किन्नरों को अपना दैहिक अस्तित्व प्रदान किया जा रहा है?
 सिमरन- जी हाँ आधुनिक चिकित्सालय में कुछ ऐसी शल्य क्रियाएँ हैं,जिसके माध्यम से किन्नर पूर्ण रूप से महिलाओं का अस्तित्व प्राप्त कर सकते हैं । किंतु उनमें प्रजनन करने का क्षमता नहीं होती है । और यह शल्य क्रियाएं काफी महंगी होती है जो सारे किन्नर आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते है। इसलिए इन सुविधाओं का लाभ नहीं ले सकते । 
 7.सिमरन,बस ओर ट्रेनों में नकली किन्नरों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है और वे कई बार अमानवीय व्यवहार भी करते है । उनके रोकथाम हेतु क्या कदम उठाने चाहिए ? 
सिमरन- आप लोगों का डर उनका हथियार बन गया है । वास्तव में बस और ट्रेन में कुछ किन्नर और कुछ नकली किन्नर अमानवीयता हरकतें करते हैं,मैं उनसें सहमत नही हूँ । सरकार और पुलिस को उनके प्रति कानूनी कदम उठाने चाहिये। 
8.सिमरन,किन्नरों के पास नृत्यकला का हुनर और उनका वजूद भी है।क्या किसा ने इसे राष्ट्रीय स्तर तकपहचान दिलाने की पहल की है? 
सिमरन- जी हाँ कुछ लोगों ने कोशिश की है लेकिन मैं उनसे संतुष्ट नहीं हूँ सबका अपना स्वार्थ है । हमें आगे बढ़ने की स्वयं पहल करनी होगी... लोग हमें मनोरंजन का साधन समझते है। 
9.आपको मैंने नृत्य करते हुए देखा था इसलिए जानना चाहती हूं कि नृत्यकला कहाँ से सीखी ? सिमरन- मैंने नृत्यकला फिल्मों में अभिनय करते हुए कलाकारों को देखकर सीखा है । और सच कहूं तो हालात सब कुछ सीखा देता है। 
10.सिमरन,उत्तरप्रदेश सरकार और केंद्र सरकार से आपको कोई सुविधा मुहैया करवायी गयी है? 
सिमरन- नहीं जी...उत्तरप्रदेश सरकार ने हमें अभी तक कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवायी । हाँ केंद्र सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर बिल पास हो जाने के कारण कुछ राहत अवश्य मिली है ।
 11.सिमरन,क्या किन्नर गुरू अपने शिष्यों के साथ सदैव न्यायपूर्वक सम्मान देते है? सिमरन-जी ये हालातों पर निर्भर करता है उनके साथ न्यायपूर्वक व्यवहार करते है या नहीं । वैसे ज्यादातर ना ही जवाब होता है। 
12.सरकार ने ट्रांसजेंडर बिल पास किया है, आपके क्षेत्र में उसकी जागरूकता को लेकर कोई अभियान चलाया जा रहा है? सिमरन-जी, हमारे क्षेत्र में ऐसा कोई भी अभियान नहीं चलाया गया ।
 13.सिमरन,वर्तमान में किन्नरों के लिए कई सारी योजनाएँ है जिससे किन्नरों को रोटी,कपड़ा,मकान आसानी से मिल सकता है।क्या आप उन सुविधाओं से लाभान्वित हुई है ।
 सिमरन- जी मुझे अभी तक किसी प्रकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिला और मैंने कोशिश भी नहीं की ।
 14.सिमरन, आम भारतीय नागरिक की भांति किन्नर समाज को भी सरकार ने अधिकार दिए हैं फिर भी आप लोग इन अधिकारों से वंचित क्यों हैं? सिमरन-मेरा मानना है कि किन्नर समाज अशिक्षित होने के साथ-साथ समाज से भी उपेक्षित है इसलिए आज भी वे अपने मूल अधिकारों से वंचित रह रहा है । 
15.बधाई माँगने की परम्परा किन्नरों की सदियों से चली आ रही हैं लेकिन 21 वीं सदी में इस बधाई परम्परा की स्थिति के बारें बता सकती है?
 सिमरन-वर्तमान में कुछ किन्नरों के लालची स्वभाव के कारण किन्नर समुदाय और किन्नर परम्परा दोनों बदनाम हो रहे हैं । लेकिन यह परम्परा आज भी चल रही है और सदियों से चली आ रही है । मुझे आज भी अपनी परम्परा पर गर्व है।
16 सिमरन, आपका कोई विशेष संदेश शोधार्थियों के लिए.....
सिमरन- मैं उन तमाम शोधार्थियों को हार्दिक बधाई देती हूँ...जो इस हाशियाकृत समुदाय पर काम करने के लिए आगे आए । इस समुदाय की यथार्थपरक समस्याओं को देखते हुए काम करें तो अच्छा होगा । कुछ अपवाद और भ्रांतियाँ समाज में चर्चित है उनसे बचकर कर तटस्थता के साथ काम करेंगे तो यह समय हमारे लिए बहुत बदलाव लाने सहयोगी होगा । आपका विशेष आभार ...मुझसे जुड़ने और कुछ नया जानने का प्रयास किया मेरा आपको विशेषरूप से  आशीर्वाद । 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

साहित्य में किन्नर विमर्श : LGBTQ+ समुदाय

आलेख प्रकाशित- परिवर्तन पत्रिका, अप्रैल-सितंम्बर 2022, पेज नं.-154-161, ISSN-2455-5169 

           समाज में हाशिये की परिधि पर खड़े किए गये वर्ग या समुदाय की उपस्थिति सदियों से बनी रही है । परंतु उन्हें निजी स्वार्थ के कारण सामान्य या सभ्य कही जाने वाली जनता और जनसमुदाय ने कभी भी अपनाने की कोशिश नहीं की । इस संदर्भ में वैश्विक परिदृश्य के दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है, तब भी विस्तृत फलक में निराशाजनक परिणाम ही देखने को मिलते हैं । किसी भी देश का साहित्य और इतिहास को देखा जाए तो किन्नर समुदाय यानि थर्डजेंडर को दोयम दर्जे के दृष्टिकोण से ही देखा जाता है । उन्हें सामान्य इंसान की श्रेणी से कोसों दूर रखा गया । वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि किन्नरों के साथ अमानवीय व्यवहार ही किया जा रहा है ।

        समाज की बनी बनाई परम्परा में स्त्री औरपुरुषयानि की ‘Male’ और ‘Female’ का ढांचा बना दिया गया है, जो सिर्फ संतान पैदा करने की क्षमता रखता है, वे ही सामान्य समाज का सदस्य कहलाने और इस समाज की संरचना को निर्धारित करने योग्य हैं । स्त्री और पुरुष के मध्य अपने आप को भिन्न समझने वाले या लैंगिक विकृति और प्राकृतिक रूप से लैंगिक कमजोरी वाले इंसान को सामाजिक रूप से मानवीयता का दर्जा नहीं दिया गया । संवैधानिक रूप से 21वीं सदी में कानून के द्वारा तो उन्हें उचित अधिकार मिल गए हैं किन्तु आज भी उन्हें खोखले समाज में स्वीकृति नहीं मिली है ।

       थर्डजेंडर की पहचान कोई आज और कल में नहीं हुई है, जो मुख्यधारा के लोग इन्हें अजूबे की तरह देख रहे हैं । आज भी इन्हें अपने ही घर और परिवार तथा समाज से भगाया और दुत्कारा जाता है । ये भी मानव समाज का ही अंग है, इन्हें धिक्कार, तिरस्कार, उपेक्षित व्यवहार के बजाय सम्मान के साथ अपनाने की जरूरत है । समाज में उन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है- अरावनी, जोगप्पा, छक्का, मामू, ख्वाजासरा, थर्डजेंडर, पवैया, नपुंसक, तृतीयलिंगी, मंगलमुखी, किन्नर इत्यादि । विभिन्न नामों से संबोधित किए जाने वाला समुदाय दर-दर की ठोकरें खा रहा है । कुछ लोग मंगलमुखी, शिखण्डी,जोगप्पा या अर्धनारीश्वर के नामों से बुलाना सम्मानजनक मानते हैं लेकिन वास्तविक सम्मान तो तब मिलेगा जब समाज इन्हें सामान्य संतान की भांति अपनाने की पहल करेंगे ।

          सामान्य समाज के द्वारा दुरदुराए और सहमें हुए अपने आप को हीनतर समझने औरं कमतर आंकने वाले  इस किन्नर समुदाय ने स्वयं का समुदाय ही स्थापित किया है । स्वयं का समुदाय स्थापित करना भी जरूरी था, क्योंकि परिवार और समाज ने किन्नर बच्चों को लावारिश बनाकर कचरे के ढ़ेर में फेंकने का काम किया है । आज किन्नर स्वयं एक-दूसरे का सहारा बनकर अपने अस्तित्व की जंग बिना किसी हथियार और हड़ताल के लड़ रहे हैं । विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग समय में इन्हें मान्यता और संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ । दक्षिण एशिया में हिजड़ा,थाइलैंड में कैथोय और मैक्सिको में मक्स नाम से इन्हें जाना जाता है । वर्तमान समय में ‘LGBTQ’ से ताल्लुक रखने वालों को लगभग 175 देशों में थर्डजेंडर और ‘Transgender’ के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त है । समाज ने अपनी निगाहों में थर्डजेंडर को एक अजूबे की भाँति या फिर डरावने जंगली जानवर की तरह ही देखा है । लैंगिक अपरिपक्वता और अधूरापन ही उनके जीवन का अभिशाप बन गया है, समाज उनसे नफरत तो करता है, साथ वह यह भी चाहता है कि तथाकथित सभ्य समाज पर उनकी परछाई भी न पड़े । समाज के लोग जैविक दोष और यौन-अविकास वाले बच्चों को परिवार में रखना कलंक तक मानते हैं । सामाजिक दबाव के कारण ही सही लेकिन लिंग अस्पष्टता के कारण  उनके माता-पिता भी अपनी संतान से पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते हैं । इन बच्चों (नपुंसक) को तिरस्कृत करने तथा स्वयं को समाज के ठेकेदार समझने वाले विकृत, विकलांग मानसिकता तो लिए हुए हैं ही साथ ही वे दंभी सोच से ग्रसित भी हैं । ये वे लोग हैं जो अपनी दोहरी मानसिकता के कारण कैंसर पीड़ित, पोलियो, चर्म रोग, मानसिक विकृति और विकलांग बच्चों का पालन-पोषण करने में असमर्थता प्रकट नहीं करते, लेकिन मात्र कपड़ों में छुपी रहने वाली लैंगिक कमी के कारण ये लोग तृतीयलिंगी बच्चों को स्वीकार नहीं कर पाते ।

               शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद भी थर्डजेंडर बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है । कहने को तो हम वसुधैव कुटुम्बकम् जैसी आदर्श बातों में विश्वास रखते हैं परंतु वास्तविक जीवन में हम अपनी ही संतान को समाज से विस्थापित करने पर तुले रहते हैं । तब क्या भारतीय प्रतिष्ठा और नैतिकता पर आंच नहीं आती? भारतीय समाज में स्त्री को शक्ति का दर्जा देकर भी उनके साथ शोषण करने से नहीं चूकते । स्त्रियों को भी अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए हजारों साल लड़ना पड़ा है । उसी प्रकार किन्नरों को समाज एक तरफ दैवीय शक्ति से कम नहीं समझता है , दूसरी तरफ इन्हें हिकारत व कलंकित समझता है । समाज के लोग इनका शुभ अवसर में आशीर्वाद मिलने पर खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं, तो फिर इनका तिरस्कार और शोषण क्यों किया जा रहा है? थर्डजेंडर का साहित्य और इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, इसके बावजूद भी द्विलिंगीय समाज ने इनका सिर्फ ‘Use’ (उपयोग) व उपभोग किया है ।

           पौराणिक काल से लेकर पाश्चात्य साहित्य तक किन्नरों ने विभिन्न प्रकार की सेवाओं में अपना योगदान दिया है । ‘380-85 ई.पू. से लेकर आज तक इस समुदाय के अनेकानेक संदर्भ देखने को मिलते हैं, फिर भी साहित्य और समाज में इनको सम्मानजनक स्थान से रखा गया । आज भी किन्नर अपने अस्तित्व की तलाश में भटक रहे हैं । मूलभूत सुविधाओं से वंचित आज भी यह समुदाय हर क्षेत्र में आखिरी छोर पर खड़ा दिखाई देता है । खैर 21 वीं सदी में नवीन और चर्चित विमर्शों में से किन्नर विमर्श भी चर्चा का विषय बना और साहित्यकारों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित होने लगा है ।  साहित्य में इस नव्य विमर्श को तृतीयलिंगी विमर्शकिन्नर विमर्शके नाम से प्रचलित करने का प्रयास किया गया है ।  अर्थात् यहाँ  किन्नर शब्द का अभिप्राय हाशियागत समुदाय से है । जो स्त्री और पुरुष से इतर अथवा तृतीय लिंग के अन्तर्गत परिगणित होते हैं ।

          साहित्य और समाज में किन्नर शब्द को लेकर कई बार आपत्तिजनक बहसबाजी होती रही है, किन्नर’, ‘हिजड़ा’, औरथर्डजेंडर के प्रयोग पर विभिन्न मत देखने को मिलते हैं । कुछ साहित्यकार किन्नरको हिजड़ा नाम से संबोधित करने की सलाह देते हैं । अधिकांश साहित्यकार पौराणिक/प्राचीन ग्रंथों के अनुसारकिन्नर शब्द से बुलाना उचित मानते हैं, वहीं कुछ साहित्यकार मंगलमुखी शब्द से संबोधित करना उत्तम समझते हैं, क्योंकि भारतीय हिंदू परम्परा में किन्नरों से आशीर्वाद लेकर उन्हें  बधाई (नेग) देकर मंगलकार्य की शुरुआत करते हैं इसलिए इन्हें मंगलमुखी कहा जाता है ।

           यद्यपि समाज और साहित्य के पुरोधाओं ने किन्नरों को हिजड़ा या थर्डजेंडर कहना ही उचित समझा । तब मन में कहीं ना कहीं सवाल उभर कर आ ही जाता है कि फिर इनके हिसाब से प्रथम जेंडर किसे माना जाए? यदि माना भी जाए तो पहला,दूसरा और तीसरा दर्जा किसी को किस हिसाब से देना उचित होगा? अगर थर्डजेंडर संबोधन के संदर्भ में स्वयं उस समुदाय से जुड़े लोगों की बात करें तो स्पष्ट होता है कि वे स्वयं को तीसरे दर्जे का इंसान मानने को राजी नहीं हैं । भला मानेंगे भी क्यों? खैर वर्तमान में संवैधानिक स्तर पर थर्डजेंडर शब्द मान्यता प्राप्त है । लेकिन  हिजड़ा शब्द कहना और सुनना गाली देने जैसा प्रतीत होता है ।

किन्नर और हिजड़ा शब्द-प्रयोग के संदर्भ में नीरजा माधव का कहना है कि एक तथाकथित प्रचलित-सा नाम किन्नर कहीं से क्या उछला कि सभी लेखक, आलोचक, प्रोफेसर और शोध छात्र देखा-देखी उसका प्रयोग हिजड़ा समुदाय के लिए करने लगे । बिना किन्नर शब्द का वास्तविक अर्थ शब्दकोशों में ढूँढे एक ताना-बाना बुना जाने लगा किन्नर विमर्श । जबकि शब्दकोशों के अनुसार किन्नर एक जाति विशेष के लोगों का संबोधन है जो देव योनि के माने जाते हैं । उनके भीतर हिजड़ों की भाँति कोई लैंगिक विकृति नहीं पाई जाती है ।  नीरजा माधव ने अपने उपन्यास में बार-बार हिजड़ा शब्द प्रयोग किया है । जैसा कि उन्होंने आलोचकों,    शोधार्थियों, प्रोफेसरों पर भी आरोप लगाया कि बिना अर्थ जाने-समझे किन्नर शब्द का प्रचलन शुरू कर दिया । यह कहना भी साहित्य और किन्नर समुदाय के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है।

       उक्त भ्रम किन्नोर प्रदेश (हिमाचल) की एक क्षेत्रीय जाति के कारण उत्पन्न हुआ है । यह तर्क जब किन्नर विमर्श में किन्नर शब्द-प्रयोग के विरुद्ध कहा जाता है तो हास्यास्पद स्थिति बन जाती है । किन्नर शब्द को संस्कृत भाषाकारों ने अश्वमुखी कहकर संबोधित किया जिसका सीधा अर्थ न स्त्री और न पुरुष होता है, इतना ही नहीं किन्नर शब्द का एक पर्याय किंपुरुष शब्द भी माना जाता है । किन्नर जाति के गुण-धर्म (संगीत,नृत्यादि) की समानता तृतीयलिंगी से मिलती-जुलती है, महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप एक नृत्यांगना के तौर पर उल्लेखनीय है जिन्हें नपुंसक होने का श्राप मिलने की कथा भी प्रचलित है । वर्तमान में भारतीय पौराणिकता को मद्देनज़र रखते हुए ही कुंभ जैसे मेलों में अखाड़ा पद्धति के अंतर्गत तृतीयलिंगी समुदाय का अखाड़ा भी किन्नर अखाड़ा नाम  से प्रसिद्ध तथा मान्यता प्राप्त है । किन्नर समुदाय पौराणिक परम्परानुसार सदियों से नाच-गान  व आशीर्वाद देकर जीविकोपार्जन भी करता रहा है।

तृतीयलिंगी समुदाय स्वयं किन्नर शब्द को सहर्ष स्वीकार करता है । हमारे पौराणिक धर्म ग्रंथों में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा मानस-किन्नर शीर्षक से मुरारी बापू की एक कृति देखने को मिलती है । रामायण में किन्नर शब्द का उल्लेख किया गया है, मानस किन्नर पुस्तक में किन्नरशब्द से संबंधित विस्तार से चर्चा की गई है । इस संदर्भ में मुरारी बापू कहते है कि जिन किन्नरों के बारें में मेरे गोस्वामी ने मैदान में...डिम-डिम-डिम घोष करते हुए सोलह बार रामचरितमानस में किन्नर शब्द का प्रयोग किया । और गोस्वामी के अन्य संदर्भ-ग्रंथों का यदि विवरण आपको दूँ तो और किन्नर शब्द आपको मिलेंगे । कुल मिलाकर छब्बीस बार तुलसी ने किन्नर को साधु हृदय से याद किया है । संदर्भ से दृष्टिगत होता है कि लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा में हिजड़ा शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए किन्नर शब्द को स्वीकार किया है- हिजड़ा मूल उर्दू भाषा का शब्द है । वो भी हिजर इस अरेबिक शब्द से आया हुआ ।हिजर यानि अपना समुदाय छोड़ा हुआ, उस समुदाय से बाहर निकला हुआ । मतलब स्त्री-पुरुष के हमेशा समाज से बाहर निकलकर स्वतंत्र समाज बनाकर रहने वाला। यहाँ हिजड़ा शब्द को परिभाषित किया है । इसी प्रकार विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है । इसके साथ उन्होंने इस आत्मकथा में यह भी बताया है कि हिजड़ा शब्द को वर्तमान में गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।

           लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के अनुसार- उर्दू और हिंदी में हिजड़ा शब्द है । इसके साथ ही उर्दू में ख्वाजासरा भी कहा जाता है । हिजड़ों को अपने प्राचीन धर्म ग्रंथों में किन्नर शब्द की संकल्पना है । इस वजह से हिजड़ों को हिन्दी में किन्नर भी कहते हैं । मराठी में हिजड़ा और छक्का, पंजाबी में जनखा। तेलुगु में नपुंसक्कुडु,कोज्जा,मादा कहा जाता है तो तमिल में थिरूरनागाई,अली,अरवन्नी,अरावनी,अरूवनीइत्यादि शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है ।  अर्थात् यहां नीरजा माधव के अनुसार हिजड़ा शब्द को स्वीकारने के बावजूद भी किन्नर शब्द को नकारा भी नहीं जा सकता । क्योंकि जब स्वयं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर किन्नर शब्द को स्वीकृत करते हुए सहज दिखाई दे रही हैं तो अन्य लोगों को इसे बहस का विषय नहीं बनाना चाहिए । विवेच्य अर्थों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि - किसी इंसान को छक्का,मामू,हिजड़ा कहने की बजाय उन्हें स्वस्थ मानसिकता के साथ बुलाना अधिक उचित समझा जाए । उन्हें उनके नाम से बुलाने में  एतराज नहीं होना चाहिए । किसी आदमी को यदि बार-बार मर्द शब्द संबोधन के साथ बुलाया जाएगा तो वह सहजता महसूस करेगा ? खैर किन्नरों को बहसबाजी, तिरस्कार, धिक्कार और शोषण का सामना करने की हिम्मत 21 वीं सदी में मिल रही है ।

स्वाभिमान और अस्तित्व की पहचान की कीमत देर-सवेर किन्नर समुदाय स्वयं ही समझ रहा है । जब यह समुदाय अपने अस्तित्व के लिए आवाज उठानी शुरू करते हैं, तो हिंदी साहित्यकार भी संवेदनशील होकर प्रासंगिक किन्नर विमर्श का नवसृजन और नवअध्याय लेखन में अपनी सहभागिता की उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ-साथ उनके जीवन में मिले सामाजिक स्तर के गहरे घावों पर मरहम लगाने का सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं।

         हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श

          विमर्श को अंग्रेजी में ‘DISCOURSE’  कहा जाता है, उसे हिंदी में किसी विषय का गहन अध्ययन करना,चिंतन-मनन करना,तर्क-विर्तक करना तथा उस से संबंधित विषय के विभिन्न पहलुओं को जानना और सभी पक्षों की तटस्थता से पड़ताल करना ही विमर्श है । हिंदी कोश में विमर्श का अर्थ – सोच-विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता लगाना, किसी बात या विषय पर कुछ सोचना, समझना, विचार करना, गुण-दोष आदि की आलोचना या मीमांसा करना, जाँचना और परखना, किसी से परामर्श या सलाह करना । हिंदी साहित्य में विमर्शों की शुरुआत स्त्री-विमर्श से माना जा सकती है, साथ ही मुख्यधारा में पीड़ित-शोषित वर्ग की आवाज रोटी-कपड़ा-मकान तक सीमित न होकर अपने देश के वातावरण में स्वतंत्र होकर समानाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले मानवीय बुद्धिजीवियों के लिए नव चिंतन-मनन की आवश्यकता महसूस हुई ।

       विमर्शों की शुरुआती आहट अधिक पुरानी नहीं है । स्त्री विमर्श से शुरू होकर दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, समलैंगिक विमर्श,कृषक विमर्श,पर्यावरण विमर्श’, ‘पुरुष विमर्श, ब्राह्मण विमर्श और किन्नर विमर्श तक हलचल होने लगी है । अवलोकनकर्ताओं ने विमर्श का उद्देश्य मुख्यधारा के समाज व सत्ता के नेतृत्वकर्ताओं को अपनी सम्पूर्ण समस्याओं से परिचित करवाते हुए  अपने मानवोचित अधिकार मांगने के साथ इंसानियत का दर्जा प्राप्त करना बताया है ।स्त्री विमर्श की शुरुआत सदियों से स्त्रियों को चारदीवारी में रखने तथा पर्दा प्रथा,सती प्रथा,बालविवाहजैसी तमाम कुरीतियों से मुक्ति पाने के लिए हुई है । इसी प्रकार  दलित विमर्श में छुआछूत और भेदभाव का सामना करने के साथ-साथ शोषित-पीड़ित होने वाले समाज ने अपनी आवाज बुलंद कर अधिकारों की माँग की । जल- जंगल और जमीन के रक्षक आदिवासियों ने समय की माँग के अनुरूप अपनी समस्याओं के प्रति सजग होकर अपने अधिकारों की मांग की है । इसी प्रकार 21वीं सदी में दबे-कुचले और पिछड़े वर्गों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के प्रति जागरूक होकर मुख्यधारा से जुड़ने की पहल की है । इन तमाम हाशियागत वर्ग-समुदायों की आवाज और जन आंदोलन के साथ-साथ विविध विमर्शों में  किन्नर अस्तित्व की तरफ देखना भी जरूरी है ।

       किन्नर विमर्श की बात की जाए तो इस समुदाय की जटिल समस्याओं और मूलभूत आवश्यकताओं को सामान्य स्तर पर समझना होगा । सदियों से अर्थात् मानव सभ्यता के आरम्भिक दौर से लेकर समाज के विकसित होने तक किन्नरों की उपस्थिति लगातार बनी रही है, इसके बावजूद भी मुख्यधारा के लोगों ने इन्हें हाशिये के कठघरे में खड़ा रखा है । प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा  के अनुसार-हिंदी के आधुनिक काल के साहित्य में निरालाकेकुल्लीभाट का चरित्र यदि समलैंगिक व्यक्ति का चरित्र है तो शिवप्रसादसिंह की बहाववृति तथा बिंदा महाराज जैसी कहानियों के चरित्र में तृतीयलिंगी विमर्श की आरम्भिक आहट देने वाले किन्नर चरित्र है जो समाज की मूलकथा में पुनर्वास के लिए जूझ रहे हैं । वृंदावनलाल वर्मा की एकांकी नीलकंठ का भी इस श्रेणी में उल्लेख किया जा सकता है । इसी कड़ी में सुभाष अखिल की दरमियानाकहानी 1980 में सारिका पत्रिका में प्रकाशित हुई इन्होंने 2018 में  इस कहानी को विस्तृत रूप देकर उपन्यास में तब्दिल किया । वैसे तो किन्नरों के जीवन से संबंधित कुछ गिनी-चुनी रचनाएं हिंदी साहित्य में पहले से मौजूद थी, 1980 के दौर से पहले ही कुछ अंश में नाटक और अन्य विधाओं में दिखाई देती है, लेकिन हिंदी साहित्य में इस दौर के पश्चात लंबा ठहराव देखने को मिलता है जो आगे चलकर 2002 में तृतीयलिंगी विमर्श के रूप में उभरकर सामने आता है ।

          आलोच्य 21 वीं सदी में किन्नर विमर्श यानि तृतीयलिंगी समुदाय को साहित्य के केंद्र में लाने का काफी प्रयास किया जा रहा है । इस समुदाय की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को साहित्य के माध्यम से समाज को रू-ब-रू करवाने में उपन्यासकार और कहानीकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । जिनमें नीरजा माधवयमदीप, महेन्द्र भीष्मकिन्नर-कथा,मैं पायल, प्रदीप सौरभ तीसरी ताली’, निर्मला भुराड़ियागुलाममंडी, मैं भी औरत हूँअनुसूया त्यागी, सुभाष अखिलदरमियाना, चित्रामुद्गलपोस्ट बॉक्स नं.203, राजेश मल्लिकआधा आदमी, डॉ विमला मल्होत्राकिन्नर मुनिया मौसी, भंगवत अनमोल जिंदगी 50-50, गिरिजाभारती अस्तित्व, हरभजनसिंह मेहरोत्राऐ जिंदगी तुझे सलाम, भुवनेश्वर उपाध्याय हॉफमैन, नरेन्द्र कोहलीशिखण्डी, डॉ मोनिका शर्माअस्तित्व की तलाश में सिमरन, रेनू बहल मेरे होने में क्या बुराई, डॉ लता अग्रवालमंगलमुखी, शरदसिंहशिखण्डी स्त्री देह से परे, ड़ॉ मुक्ति शर्मा श्रापित किन्नर, अर्चना कोचर किन्नर कथा-एक अंतहीन सफर इत्यादि । 20 वीं सदी के छठे-सातवें दशक में विमर्शों को आधार बनाकर उपन्यासकारों ने समाज के शोषित वर्ग को तथाकथित समाज के केन्द्र में लाने का प्रयास किया है । जिनमें नारी विमर्श को आधार बनाकर उपन्यास लिखे गये और समय के साथ-साथ दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, किसान विमर्श, सत्ता विमर्श, आदिवासी विमर्श और किन्नर पर भी कलम चलाने की शुरुआत हुई ।

         अंग्रेजी साहित्य में किन्नर समुदाय/थर्डजेंडर समुदाय

          विवेच्य साहित्य के परिदृश्य में देखा जाए तो अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी साहित्य में ‘LGBTQ’ समुदाय पर अधिक लेखन किया गया । अंग्रेजी भाषा में विभिन्न देशों के साहित्यकारों ने ट्रांसजेडर और थर्डजेंडर समुदाय के जीवन पर विस्तृत रूप से लिखा है । भारतीय भाषा में भी उनकी उपस्थिति मनुस्मृति, कामसूत्र, महाभारत और रामायण में देखने को मिलती है । अंग्रेजी साहित्यकारों के संस्मरण के रूप में ट्रांस-आइडेंटिफाइड,ट्रांसजेंडर,समलैंगिकता पर अनेकानेक संस्मरण पढ़ने को मिलते हैं          लिली एल्बे की पुस्तक ‘The Danish Girl’ सेक्स री असाइनमेंट पर यानि सर्जरी करवाने वाली लड़की के जीवन को आधार बनाकर लिखी गई है । जिनकी देखरेख सेक्सोलॉजिस्ट मैग्नस हिर्शफेल्ड ने की थी । 1931 में ऑपरेशन के बाद लिली एल्बे की मृत्यु हो जाती है, उसके दो साल बाद मैन इन टू वुमन नाम से संस्मरण प्रकाशित होता है, जिसे अर्स्ट लुडविग जैकबसन में नील्स होयर द्वारा संपादित किया गया । यह पुस्तक ट्रांसजेडर, ट्रांस- सेक्सुअलिटी वाले लोगों के प्रति सामान्य जनता, प्रशासन और मीडिया का ध्यान आकर्षित करवाती है ।

          ट्रांस जूलियट जैक्स द्वारा संस्मरण समीक्षा लिखी गई ‘An Honest Account Of Gender Transition’ इस में 1980 के दशक के अंत तक लेखक इन सस्मरणों पर सम्मेलनों में सवाल उठा रहे थे । विशेष रूप से उन्होंने सवाल उठायापुरुष और महिला के बीच की जगह का प्रतिनिधित्व कैसे किया जाए? ‘स्त्री-पुरुष के अलावातीसरे लिंग की पहचान करने वाले डॉक्टर्स के खिलाफ बात की गई और नारीवाद के भीतर ट्रांसफोबिया होने के बारे में बताया गया ।सैडी स्टोन ने द एम्पायर स्ट्राइक्स बैक: ए पोस्ट-ट्रांस सेक्सुअल को मेनिफेस्टो के रूप में ऑनलाईन के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदायों में प्रसारित किया ।

       संस्मरणों का अनुसंधान करने पर ज्ञात होता है कि अधिकांश संस्मरण में ट्रांस और जेंडर को एक पहचान और एक भाषा देने की मांग की गई है । उन्हें अपनी आइडेंटिटी स्वयं निर्धारित करने की बात की गई है । उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय को संगठित करने और उनके भीतरी सवालों पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया है । यह संस्मरण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बाहरी लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया । यह संस्मरण आत्मकथाओं के दौर में लिखा हुआ है । अस्तु अंग्रेजी साहित्य में समलैंगिक,विषमलैंगिक,होमोसेक्सुअल,थर्डजेंडर और ट्रांसजेंडर जीवन के बारे में जानने के लिए आत्मकथा, संस्मरण,  उपन्यास और कहानियों को देखा जा सकता है ।

          सेवेरो सरड्यू 1960-1970 वें दशक के लेखकों में से एक है । उन्होंने 1972 में कोबरानामक ट्रांसवेस्टाइट की कहानी लिखी है । इसमें जन्मजात तृतीयलिंगी देह में बदलाव करने का जुनून दिखाया गया है, जो विषमलिंगी पुरुष से समलैंगिक महिला बनने का सफर है । यह पुस्तक ट्रांसजेंडर के अनुभवों को समझने में मदद करती है ।

       Third Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in Culture And History - Gilbert Herdt विवेच्य पुस्तक थर्डजेंडर के अस्तित्व को समझने में सक्षम बनाती है ; साथ ही बीजानिटिन महल के किन्नरों और भारतीय तृतीयलिंग समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके मानदण्डों के बारे में लिखा गया ।थर्डजेंडर के अस्तित्व को समझने में सक्षम बनाती है ; साथ ही बीजानिटिन महल के किन्नरों और भारतीय तृतीयलिंगी समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके मानदण्डों के बारे में बताया गया है । जबकि ‘Gilbert Herdt’ की संपादित पुस्तक ‘Third Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in Culture And History’ है ।इस पुस्तक में बधियाकरण जैसी प्रथाओं की आवश्यकता और शुरुआती दिनों में डच सेदामाइटस के बीच अंतरंग और निषिद्ध इच्छाओं को व्यक्त किया गया । इसके अलावा 18 वीं सदी में इंग्लैण्ड के सैफिस्ट और उन्नसवीं सदी में यूरोप और अमेरिका के तथा कथित उभयलिंगी-समलैंगिक लोगों के बारे में विस्तृत रूप में लिखा गया ।

               यह नई दिल्ली की फोटोग्राफर दयनितासिंह की पहली किताब Myself Mona Ahmed’ है ।मोना अहमद समाज के हाशिये पर खड़े समुदाय का जीता-जागता उदाहरण है । मोना अहमद स्वयं किन्नर है जो सदियों से दरकिनार किये गए वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । इस आत्मकथा में दयनितासिंह मोना अहमद के बधियाकरण से लेकर उसके गोद लिए हुए बच्चे के खो जाने की कहानी को बयां करती हैं । अर्थात् मोना एक संवेदनशील इंसान होने के साथ वह अपने समाज की आवाज बुंलद करती है साथ ही लेखिका ने मोना की आवाज उठाने तथा उसकी आकांक्षा को संरक्षित करने का सफलतापूर्वक दायित्व निभाया है ।

          ‘I’m Vidya: A Transgender Journey’ ट्रांसजेंडर लिंविग विद्या की आत्मकथा है। जैसा कि विद्या के बारे में बताया गया है कि “Living Smile Vidya is Also known as Smiley is an Indian trans-women, actress, assistant director and writer from Chennai. She is a transgender activist and blogger. She holds a post-graduate degree from the Thanjavarur University in applied linguistics. She started her career as an electronic data processing assistant and thereby became the first trans-woman in India who worked in a mainstream job rather than working for NGOs.” तथाकथित मुख्यधारा के समाज में इंसान की कार्यशैली से अधिक उसकी लैंगिकता को महत्त्व दिया जाता है । लिंग के अनुसार उनकी जीवन शैली का मानदण्ड निर्धारित कर दिया जाता है ।

          विद्या की तरह प्रखर मेधा वाले किन्नरों को हाशियागत किया जाता है तो द्विलिंगीय समाज की निम्नस्तरीय सोच परिलक्षित होती है । विद्या के सदर्भ में एक शोधाध्ययन से स्पष्ट होता है कि- ‘I am Vidya : A Transgender Journey’ was written in Tamil and later Translated into Seven different languages including English. It is regarded as one of the most brilliant transgender memoris.it was first published in 2007.it is the transgender autobiography in india.it showcases the struggle of Sarvanan to become Vidya. The struggle includes a lot of physical and mental training in addition to her life the  autobiography also presents the plight of contemporary transgender like Vidya in  India.’ यह भारत की प्रथम आत्मकथाओं में से है जो ट्रांसजेंडर के जीवन पर आधारित है । इस आत्मकथा में सरवन्ना से विद्या बनने के सफर को दर्शाया गया है । इसमें आत्मकथाकार के संघर्ष से सफलता के शिखर तक पहुँचने और अस्तित्व की पहचान बनाने की प्रेरणादायी कहानी है । मुख्यधारा के समाज ने विद्या को लैंगिक असमानता के आधार पर समाज में उपेक्षित और तिरस्कृत निगाहों से देखा इतना ही नहीं उसके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया गया बावजूद इसके विद्या ने अपनी सफलता के माध्यम से मुख्यधारा के लोगों की सोच पर तमाचा लगाया है ।

A Gift of Goddess Lakshmi - Manobi Bandyopadhyay पत्रकार झिमली मुखर्जी ने भारत की प्रथम ट्रांसजेंडर प्रिंसीपल मानोबी बंद्योपाध्याय की जीवनी लिखी । यह जीवनी ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक प्रेरक की भांति मार्गदर्शन करती है । सोमनाथ से मानोबी बंद्योपाध्याय बनने का संघर्ष, संवेदना और समाज की प्रताड़ना को बताया गया है कि - “A Gift of Goddess Lakshmi is a candid biography of Manobi Bandyopadhyay written by Jhimili Mukherjee Pandey who is a Journalist. It is Called as a candid biographyof India’s first transgender principal by the writers as Manobi tell her story of transformation from a man into a woman with unflinching honesty and deep understand.” द्विलिंगीय समाज ने लैंगिक अस्पष्टता वाले इंसान की योग्यता और उसकी काबिलियत को महत्त्व ना देकर उनकी अधूरी देह के कारण हरेक पहलू से उन्हें प्रताड़ित किया है । ऐसे में किन्नर अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा नहीं कर पाते । खैर, मानोबी के परिवार ने उसे अपनाया और उसे सभ्य, शिक्षित, संस्कारी और आत्मनिर्भर बनाने में पूर्ण योगदान दिया है ।

       जैसा कि सर्वविदित है कि आज 21 वीं सदी में इंसान अंतरिक्ष और मंगलग्रह पर अपनी जगह बनाने में सफलता अर्जित कर रहा है । किन्तु आज भी निराशा होती है कि किन्नर समुदाय के लोग अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं - रोटी, कपड़ा और मकान के लिए आज भी संपूर्ण किन्नर वर्ग लड़ाई लड़ रहा है ।साहित्यकारों ने किन्नर समाज की समस्याओं को जानने की कोशिश लगातार की है लेकिन आज भी कई प्रकार की खामियां देखने को मिलती हैं । किन्नरों की समस्याएँ और संवेदनाओं तथा संघर्ष को पूरी तरह जानना असंभव भी है, क्योंकि इस समुदाय में शिक्षा की कमी के कारण कई प्रकार की रूढ़ मान्यताएं हैं । इन रूढ़िवादी मान्यताओं और परम्पराओं के कारण ये लोग रीति-रिवाज, आचार-विचार, रहन-सहन आदि को मुख्यधारा के लोगों के साथ साझा करने से डरते रहे हैं ।

      संदर्भ ग्रंथ सूची-

1.       किन्नर नहीं हिजड़ा समुदाय, नीरजा माधव,पृष्ठ संख्या- दो शब्द, ए.बी.एस पब्लिकेशन, आशापुर,सारनाथ, प्रथम संस्करण 2019

2.       मानस-किन्नर, मुरारी बापू , संतकृपा सनातन, पृष्ठ संख्या – 05 नाथद्वारा, राजस्थान,संस्करण 2017

3.       मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी (अनुवाद-शशिकला राय), लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी,पृष्ठ संख्या-157, वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015

4.       वही, पृष्ठ संख्या-157

5.       https://www.scptbzz.org,विमर्श का अर्थ एवं परिभाषा by Bandey 16 feb 2021

6.       किन्नर विमर्श साहित्य और समाज, सं. मिलन बिश्नोई, पृष्ठ संख्या-भूमिका(ऋषभदेव शर्मा) विद्या प्रकाशन, कानपुर , उत्तर प्रदेश,प्रथम संस्करण 2018

7.        Zonebooks.org.

8.        Press.princeton.edu/books/eBooks/third-sex-third gender

9.        Press.princeton.edu/books/eBooks/third-sex-third gender

10.   Gift of Goddess Lakshmi , Manobi Bandyopadhyay, Penguin Random House India, 2017

11.   Born in the third Gender -  Yulia Yu Sakurazawa, kindle Edition ,13 Jun 2015

12.   .Gender born gender made: Raising Healthy Gender-Nonconforming Children, Diane Ehrensaft, The Experiment LLC, 3rd Revised 2012

13.   Genderless Exile, Kindle, Yulia Yu Sakurazawa, Kindle Edition, 2 july 2015

14.   Governing Gender and Sexuality in Colonial India: The Hijra,Jecica Haichi, BC 1850-1900, Cambridge University press, April 2018

15.   I’m Vidya -A Transgender Journey- Living Smile Vidya,Rupa Publicati on, 15 July 2013

 लेखक- डॉ. मिलन बिश्नोई

संपर्क-avimili29@gmail.com

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