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सोमवार, 24 अक्टूबर 2022
साहित्य और इतिहास में किन्नर
Article Published - Akshara Multidiciplinary Research Journal Peer-Reviwed &Refreed International Research Journal, E-ISSN 2582-5429,July-September 2022, Volume-03, Issue V (B),Page No.-54-58, -#DrMilanBishnoi
शोध-सार
साहित्येतिहास में‘तृतीयलिंगी’ लोगों की उपस्थिति होने के बावजूद उनके ‘अस्तित्व’ के लिए प्रश्न उठाए जाते हैं । इस समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में ‘स्त्री’ के लिबास में ‘पुरुष के शव’ को दफनाने का प्रमाण मिलता है। ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है, किन्तु इस समुदाय को भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान,दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों में असमानता और अछूतेपन का शिकार होना पड़ा । बीते साठ-सत्तर वर्षों से विश्वस्तर पर सुनवाई होने लगी है । तृतीयलिंगी समुदाय को ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में लगभग 1965 ई. से जानने लगे हैं । जाहिर-सी बात है कि उन्हें ‘मर्द’ और ‘औरत’ के सामाजिक गुणों से जोड़कर देखने का षड़यंत्र मध्यवर्गीय लोगों ने ही किया था । अर्थात् उनमें दाढ़ी वाले पुरुष के अंदर और औरतपन का भाव होने के कारण ‘विशिष्ट लिंग’ वाली शब्दावली का प्रयोग किया जाने लगा । कुछ तृतीयपंथियों का जन्म शारीरिक रूप से तो सामान्य होता है, परंतु वह आंतरिक भाव से जन्मजात ‘लिंग’ के प्रति असहजता प्रकट करते हैं, इसलिए वे लोग विपरीत लिंगी वेशभूषा, व्यवहार, चाल-चलन के प्रति आकर्षित होते हुए स्वयं में उस ‘लिंग’ का रूपान्तरण करने में इच्छुक रहते हैं, इसलिए ‘अलैंगिक’ और ‘विपरीतलिंगियों’ को नकारा और धिक्कारा जाता है । जबकि इन लोगों ने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है जिसके कारण उनके साथ असामान्य व्यवहार किया जाए । वहीं तृतीय लिंगी समुदाय के अस्तित्व का संदर्भ वैश्विक और भारतीय साहित्येतिहास में अनेकानेक रूपों में देखने को मिलता है ।
खैर आमतौर पर सदियों से अपनी स्वार्थता के लिए इंसान को गोरे-काले, लिंग, जाति, धर्म और अर्थ के आधार पर बांटने का प्रयास किया गया/ जा रहा है । पितृसत्तात्मक सोच के शक्तिशाली लोगों ने शारीरिक और आंगिक क्षमतानुसार लैंगिकता के सांचे बनाये हैं । विश्वस्तरीय इतिहास में देखा जाए तो राजा वही बनता था, जिसके पास शौर्य और पराक्रम की शक्ति थी । उस शासनकाल के दौर में महिलाओं और किन्नरों को उपभोग की वस्तु समझा गया । और ऐसे शासकों के शासन काल में ‘कन्या का अपहरण’, ‘अनैतिक व्यवहार’, ‘अनैतिक तरीके से दूसरों की संपत्ति और क्षेत्र में कब्जा करना’ इत्यादि होता आया है ।
बीज शब्द- वैश्विक साहित्येतिहास, ट्रांसजेंडर, थर्डजेंडर, हिजड़ा, विशिष्ट लिंग, किन्नर, तृतीयलिंगी, पुरात्वविदों, कास्युगीन, मध्यमवर्गीय, परिदृश्य, समलैंगिक, अस्तित्व, सनातन संस्कृति इत्यादि।
मूल आलेख
साहित्येतिहास में ‘तृतीयलिंगी समुदाय’ की भिन्न-भिन्न अवधारणा देखने को मिलती है जैसे-नामोल्लेख,संस्कृति-सभ्यता । ‘तृतीयलिंगी/किन्नर’ समुदाय की उपस्थिति के अनेकानेक प्रमाण मौजूद है । इस जन समुदाय का अस्तित्व पुरातत्वविदों के अनुसार कांस्ययुगीन मूर्तियों और चित्रकलाओं में मौजूद हैं, इसके अलावा चेक गणराज्य के अवशेष में ‘स्त्री’ के लिबास में ‘पुरुष के शव’ को दफनाने की प्रथा के प्रमाण देखे जा सकते हैं । ऐतिहासिक काल में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता में भी तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलती है । थर्डजेंडर समुदाय को भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जापान, म्यामाँर, श्रीलंका, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों की संस्कृति और सभ्यता में उनकी उपस्थिति सामान्य और असामान्य दृष्टिकोण से देखने को मिलती है । ‘तृतीयलिंगी समुदाय’ की स्थिति और अस्तित्व से संबंधित जानकारी मिलती है कि “Before the advent of Europeans, Native Americans, embraced gender fluidity. There were no gender binaries. There were men and women, and then there were feminine men and manly women, and transgendered individuals. In native North American societies, these individuals were considered to be ‘normal’. In fact, those who adopted fluid gender roles were called Two Spirit female and Two Spirit male; and were considered supremely gifted, having the knowledge and ability to understand two opposing sides. There were no defined rules, no distinct binaries. In these societies, men and women frequently assumed opposite gender identities, occasionally cross-dressing, but almost always adopting the universal occupational roles assigned to each sex.”1 इससे यह विदित होता है कि युरोपीय लोगों के आने से पहले अमेरिका में भी लैंगिक भेदभाव देखने को नहीं मिलता है । वहाँ के प्राचीन इतिहास में ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ तथा ‘ट्रांसजेंडर’ सभी की समान स्थिति रही है । स्पष्ट है कि ऐतिहासिक, पौराणिक और प्राचीनकाल में हिजड़ा, ट्रांसजेंडर, समलैंगिक लोगों की उपस्थिति बराबर रही है।
मूल अमेरिकियों की तरह म्यांमार में भी समान स्थिति थी । जो जैविक रूप से ‘मर्द’ हैं, लेकिन ‘औरत’ के रूप में ‘क्रॉस-ड्रेस’ और समाज में ‘औरत’ की भूमिकाओं को निभाना अधिक पसंद करते हैं । बर्मी समाज में भी ‘हिजड़ों’ को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा गया, उन्हें 'प्रतिभाशाली' इंसान के रुप में जाना जाता है । जो अक्सर बाहर के लोगों को बर्मी संस्कृति के साथ जोड़ने का काम करते हैं ।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ‘मेडागास्कर’ और ‘समोआ’ में ‘सकलावास’ के जातिय समुदाय को देखा जाना चाहिए । जो ‘मेडागास्कर’ की कुल जनसंख्या का 6.2 प्रतिशत है, जो वहाँ के कुछ लड़कों को लड़कियों के रूप में देख सकते हैं, जो शारीरिक रुप से ‘स्त्रैण’ माने जाते हैं । इस समाज के अंतर्गत ‘अंतांड्रोय’ और ‘होवा’ जनजातियाँ में अपने बेटों का ‘बेटी’ की तरह संस्कार देते हुए साज-श्रृंगार, वेषभूषा पालन-पोषण किया जाता है, उसे महिला की आवाज में बात करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है । अर्थात् पूरी तरह से एक औरत के हाव-भाव सिखाए जाते हैं, ताकि सामाजिक स्तर पर औरत के साथ व्यवहार कर सके ।
इसी तरह समोआ में ‘तृतीय लिंगी’ को ‘ Fa'afafine’ (किन्नर) के नाम से जाना जाता है । ऐतिहासिक काल में यहाँ किन्नरों को समाज में मान्यता प्राप्त थी । सामोन संस्कृति में किन्नर को अभिन्न अंग के रूप में देखा गया । Fa'afafine’ (किन्नर) नवजात शिशु का जन्म एक ‘male’ शरीर के साथ होता है, लेकिन आयु बढ़ने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से ‘Female’ जैसा महसूस करता हैं, ऐसे बच्चों की पहचान उनके माता-पिता जल्दी ही कर लेते हैं । इसलिए माना जाता है कि उन बच्चों का पालन-पोषण लड़कियों की तरह किया जाता है अर्थात् उन्हें लिंगभेद का सामना नहीं करना पड़ा । भले ही ‘Fa'afafine’ (किन्नर) पुरुषों और महिलाओं के साथ यौन संबंध रखता है, लेकिन वहाँ पर fa'afine को 'समलैंगिक' नहीं माना गया है, वे हिजड़ा समुदाय के प्रति सहज है, वहीं 'समलैंगिकता' को पूरी तरह से यूरो-पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बतलाया गया । युरोपीय लोगों के आगमन से पहले समोआ में मातृ-सत्तात्मक शासन के कारण उनके आस-पास किन्नरों की मौजूदगी देखने को मिलती है । इसी कारण समोआ में महिलाओं और तृतीयपंथी के नेतृत्व में उनकी भूमिकाओं को महत्त्व दिया जाता था ।
‘मिस्र’ में 1200 से 1500 ई. के दौरान, ‘मामलुक काल’ के शासनकाल में अलैंगिक बच्चों को पुरुष की तरह माना जाता था । पुरुषों के रूप में होने के कारण उन्हें सारी सुख-सुविधाओं मिलती थी । पुरुष के रूप में परवरिश होने के कारण उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता था । “‘हवाई संयुक्त राज्य –अमेरिका’ के ‘प्रशान्त महासागर’ में स्थित है । वहाँ शारीरिक पहचान ‘थर्डजेंडर’ के रूप में होने बावजूद भी ‘स्त्री’ या ‘पुरुष’ की लैंगिकता में रहने के लिए बाध्य नहीं करते हैं, बल्कि हवाईयन की मूल संस्कृति में ‘महूओं’(तृतीयलिंगी) को प्राचीन परम्पराओं के प्रसार- प्रचार करने में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है ।”2 और उन्हें शिक्षकों के दृष्टिकोण से सम्मानित भी किया जाता था । जिस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासकों के द्वारा किन्नरों को अपराधिक श्रेणी में रखा गया उसी प्रकार हवाई पर यूरोपीय लोगों के आक्रमण के पश्चात किन्नर संस्कृति का विनाश हुआ । यूरोपीय मानसिकता से प्रभावित लोगों ने ही लैंगिक भेदभाव शुरुआत की है ।
थाईलैंड में किन्नरों को 'कैथोय' या 'काटोई' नाम से जाना जाता है । उनको ‘लेडीबॉय’ की तरह में माना जाता है । वहाँ देश में ‘ट्रांसजेंडर’ और ‘महिलाओं’ के समान अधिकार होते हैं । वास्तविक रूप से सामाजिक स्तर भेदभाव के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता है । जनसंख्या के अनुपात में ‘कैथोय’ (तृतीयलिंगी) की काफी अहम भागीदारी देखने को मिलती है । कैबरे और अन्य नृत्य शो करने का पेशा तृतीयलिंगियों ने अपनाया और पढें-लिखे किन्नर अच्छी नौकरी भी कर रहे हैं ।
विश्वस्तरीय इतिहास में यदि भारतीय संदर्भ में किन्नरों को देखा जाए तो अंग्रेजों की सोकॉल्ड पाश्चताय संस्कृति में किन्नर समुदाय की संकल्पना ही नहीं बैठती थी । किन्नरों के सभ्य सामाजिक जीवन में अंग्रेजों ने उन्हें गलत समझते हुए उनके खिलाफ अनेक धाराएँ लगाकर उन्हें प्रतिबंधित किया गया । पुरुषों के हिजड़ा बनने पर रोकथाम किया गया । दक्षिण एशियाई संस्कृतियों में किन्नरों के द्वारा प्रजनन करने वालों को आशीर्वाद या शाप देने की शक्ति प्राप्त थी । खासकर भारतीय जनता के मन किन्नरों के प्रति एक आध्यात्मिक और आस्था के दृष्टिकोण से स्थान हमेशा देखने को मिलता है । वे नवदम्पति और नवजात शिशु को आशीर्वाद देकर बधाई प्राप्त करते है । उनकी आजीविका चलाने का इतिहास मात्र बधाई माँगने का रहा है । भारतीय सनातन संस्कृति में तृतीयलिंगी और ‘ट्रांसजेंडरों’ की उपस्थिति के इतिहास में नयी नहीं है, उन्हें हमारे पौराणिक साहित्य और प्राचीन साहित्येतिहास में मान्यता प्राप्त थी । किन्नर समुदाय को अरवानी, जोगप्पा, हिजड़े, कोठी, शिव-शक्ति,अर्धनारीश्वर, शिखंडी आदि के रूपों में देखा जाता था । तृतीयलिंगी के रूप में हिंदू पौराणिक कथाओं और अन्य धार्मिक ग्रंथों तथा भारतीय संस्कृति में मजबूत ऐतिहासिक उपस्थिति रही है । प्राचीन सनातन संस्कृति में महर्षि वात्सायन द्वारा रचित ग्रंथ ‘कामसूत्र’ में 'तृतीय प्रकृति' के रूप में संदर्भ दिया गया ।“वात्स्यायन के कामसूत्र में तृतीयप्रकृति कहकर हिजड़ों का उल्लेख है । वो स्त्री अथवा पुरुष किसी के कपड़े पहन सकते हैं,ऐसा उसमें कहा गया है । वात्स्यायन ने और शेष बहुत से पंडितों ने उन हिजड़ों को नायिका कहा है । कोई राजकुमार या किसी सरदार का पुत्र काम-क्रीड़ा में कमजोर हो,तो उसे सिखाने के लिए हिजड़ों को नियुक्त की जाती है ।”3 प्राचीन वैदिक और पौराणिक साहित्य में तृतीयप्रकृति को लोगों का संस्कृति की विविधता बनाए रखने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है । भारतीय वैदिक संस्कृत भाषा के व्याकरण में ‘स्त्रीलिंग’,‘पुल्लिंग’ और 'नपुंसक' इन तीनों लिगों का प्रयोग किया जाता है । इसके अलावा ‘प्राकृत’ और ‘अपभ्रंश’ भाषा में भी उल्लेख मिलता है ।
सनातन संस्कृति में किन्नरों को दैवीय दृष्टि से देखा गया है । पौराणिक काल में अनेक मिथक कहानियों का उल्लेख मिलता है । महाभारत में ‘अरावन या अरवाण’ का उल्लेख किया गया, यहाँ वर्तमान समय में भी तमिलनाडु में हिजड़ा समुदाय का प्रति वर्ष मेला भरता है, जिसमें देशभर के किन्नर यहाँ आकर एक रात के लिए ‘अरावन से शादी’ करते हैं । जो शारीरिक रूप से ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ का मिला-जुला चेहरा स्वयं को ‘औरत’ मानते हुए अरवाण से शादी करने की इच्छा प्रकट करते हैं, तथा ये लोग शादी के दूसरे ही दिन विधवा बनकर विलाप करते हैं । अरावन को ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो वह बड़ा योद्धा था । इस संदर्भ ‘तीसरी ताली’ उपन्यास कौरवों और पांडवों के युद्ध में अरावन पांडव पक्ष की तरफ से युद्ध लड़ने के लिए स्वयं आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि “मैं अर्जुन का बेटा हूँ और अपने पिता की युद्ध जीत सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को इस बलिदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ ।”4 अर्जुन की पत्नी नागवंशी चित्रागंदा से अरवाण पुत्र की प्राप्ति हुई है । उसे अमरत्व प्राप्ति का वरदान प्राप्त था परंतु युद्ध में पाड़वों को काली माँ को बलि देने के लिए आवश्यकता होने पर अरावन ने कृष्ण को अपनी आखिरी इच्छा प्रकट करते हुए कहा कि “मैं कम से कम तीन सप्ताह पाण्डवों की तरफ से युद्ध लड़ना चाहता हूँ और युद्ध में जाने से पहले मेरा विवाह करना होगा ।”5 इस प्रकार अरावन की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए कृष्ण मोहिनी बनकर शादी कर लेते हैं और सुबह के होने पर अरवाण को युद्ध मैदान में लाया जाता है ।
मैं क्यों नहीं? उपन्यास में कथानायिका ऐतिहासिक प्रसंग को बताती है कि “सर, गुजरात में वड़ोदरा शहर में सयाजीराव महाराज ने बहरामपुरा इलाके में हिजड़ों के लिए तीन इमारतें बाँधी हैं । यहाँ करीब छह सौ से सात सौ हिजड़े सुख-चैन से जीवन बसर करते हैं । हम मुंबई में ऐसी जगह की याचना करते हैं तो इसमें बुरा क्या हैं ।”6 विवेच्य उपन्यास के अनुसार समाज में कुछ एक जगहों में ऐतिहासिक बदलाव लाते हुए राजा-महाराजाओं ने किन्नरों की सुरक्षा के प्रति ध्यान दिया होगा तो भी मीडिया और साहित्य में दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि जमीनी हकीकत जानने में कुछ कमियाँ रही होंगी ।
मुगलकाल में किन्नरों के संदर्भ में अनेकानेक उल्लेख मिलते है । उन्हें महारानियों के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में भी तैनात किया जाता था । इसके लिए कई बार ऐसे गरीब नवयुवकों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था । ऐसा माना जाता है कि मुगल शासक राजपूत लड़कों का भी लिंगच्छेदन करके उन्हें सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करते थे । अंततः लिगच्छेदन पर रोकथाम का उल्लेख मिलता है – “औरंगजेब के शासनकाल में लिंगछेद पर रोक लगायी गयी । फिर भी छुपकर वो काम होता था । उस समय मुसलमान हिजड़ों को आदर मिलता था । वो अमीर भी थे । उनकी संख्या में हिंदू हिजड़े गरीब थे । बहुत से हिंदू हिजड़ों ने उस समय धर्मान्तरण किया था।”7 आज भी किन्नर समुदाय के अधिकांश सदस्यों का जीवन रहस्यमयी बना हुआ है । शोधकार्य के दौरान कई लोगों से मिलने का प्रयास किया और उनके इतिहास जानने की कोशिश की लेकिन निराशा ही मिली । लेकिन समय के साथ पढ़े-लिखे किन्नर अपने समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष पर चिंतन मनन करते हुए आगे बढ़ने में प्रयासरत है ।
लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का मानना है कि हिजड़े बहुत मेहनत करने वाले और ईमानदार होते हैं और किसी प्रकार के काम के लिए आनाकान नहीं करते तथा काम में जी-जान लगा देते हैं । राजा-महाराओं को उनकी जरूरत महसूस होती थी इसके कारण लिंगच्छेदन किया जाता था । उनका मत है कि “अन्त में एक खास कानून बनाकर बड़ौदा के महाराज गायकवाड़जी ने खच्चीकरण (बधियाकरण) पर प्रतिबंध लगाया । भारतीय संविधान की धारा 320 में इसका उल्लेख है ।इसके अनुसार दूसरे का लिंग काटना कानून अपराध माना गया है ।”8 किन्नर समुदाय के लोगों के पास मुगलकाल में जीविकोपार्जन के रास्ते खुले थे किंतु ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में उनकी स्थिति अत्यधिक दयनीय हो गयी थी ।
हजारों साल के इतिहास में बदलाव पहली बार 21 वीं सदी में देखने को मिल रहा है । समयानुसार उनको देश के विभिन्न उच्च पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर ऐतिहासिक बदलाव लाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं । लेकिन इतिहास में पहली बार हिजड़ा समाज की तरफ से केस कोर्ट में दर्ज करवाया गया । उस समय उनके पक्ष के वकील, नेता और किन्नर अध्यक्ष को भारी कटाक्ष भरे शब्दों का सामना करना पड़ा था । वे समाज, सरकार, साहित्यकारों का ध्यान लगातार खींच रहे हैं । देश के विभिन्न राज्यों में लगातार ऐतिहासिक बदलाव लाने का प्रयास हो रहे हैं उसकी सराहना होनी भी चाहिए ।
भारत में मुगल शासनकाल में फिर भी उनकी स्थिति ठीक थी । अधिकांश मुगल शासकों के साम्राज्य में बेगमों के हरम में सुरक्षाकर्मी के रूप में हिजड़ों को नियुक्त किया जाता था, क्योंकि हिजड़ों की निगरानी में बेगमों की सुरक्षा से उन्हें कोई खतरा या शक नहीं चिंता नहीं थी । लेकिन यहाँ से ही नकली और लिंगच्छेदन करके हिजड़ा बनने का प्रचलन काफी हुआ । कई बार गरीबी के कारण अपना लिंगच्छेद करवाकर हिजड़ा भेष अपनाने को तैयार हो जाते थे । इसका उदाहरण प्रदीप सौरभ के तीसरी ताली में राजा के माध्यम से देख सकते हैं । किन्नर समुदाय को भारतीय नागरिक होने के बावजूद ब्रिटिश शासन के कार्यकाल में सामाजिक और आर्थिक स्तर के सारे अधिकार उनसे छीन लिए गये । उन्होंने किन्नरों को अछूत, भिखारी, चोर, समाज में अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर उन पर अनेक बंधन लगाकर समाज से निष्कासित करने का प्रयास किया गया । “Eunuchs were not allowed to wear female clothing and jewellery or perform in public and were threatened with fines or thrown into prison if they did not comply. Police would even cut off their long hair and strip them if they were female clothing and ornaments. They "experienced police intimidation and coercion, though the patterns of police violence are unclear", says Dr Hinchy”9 अंग्रेजों ने किन्नर समुदाय को बधाई से मिलने वाली रोजी-रोटी छीनकर उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय किया । बधाई और उनकी वेशभूषा ही उनकी पहचान थी । इन्होंने अनेक किन्नरों को मारा-पीटा और हत्याएँ की जिसमें 1871 में मैनपुरी की किन्नर गुरु भूरा की हत्या का उदाहरण देखने को मिलता है । किन्नर गुरु के साथ-साथ माना जाता है कि लगभग 2500 किन्नरों को मारा गया । इस हत्याकांड के तत्पश्चात अग्रेंजो ने कुछ नियमावली बनाकर उन्हें भगाने की कोशिश की थी । “Years after her murder, the provinces launched a campaign to reduce the number of eunuchs with the objective of gradually causing their "extinction". They were considered a "criminal tribe" under a controversial 1871 law which targeted caste groups considered to be hereditary criminals.”10 अंग्रेजों ने किन्नरों की जनसंख्या को कम करने के लिए एक कानून प्रस्ताव पास करके 1871 में आपराधिक जनजाति के तहत इन्हें हमेशा-हमेशा के लिए समाज से निकालने का काम कर लिया ।
भारतीय इतिहास में बिना किसी धार्मिक भेदभाव किए किन्नरों का एक समाज स्थापित है इस संदर्भ में किन्नर गुरु तारा बताती है कि “भले ही हम किसी भी धर्म से आए हों, हमारे नाम मुस्लिम हों या हिंदू, हम सब एक हिजड़ा समाज के होते हैं । हमारे सात घर होते हैं । प्रत्येक घर का एक मुखिया होता है, जिसे नायक कहते हैं, गुरु नियुक्त करता है । गुरु चेलो को बधाई, गाना-नाचना सिखाता है । गुरु के स्थान को गुरुधाम बोला जाता है, जहाँ धाम से जुड़े हिजड़े कमाई का एक हिस्सा जमा करते हैं । भारत वर्ष में कुल 450 धाम और इतने ही गुरुधाम हैं ।”11 तथ्यानुसार अलग-अलग प्रांत के किन्नर साल में एक बार बहुचरा माता के मंदिर में इकट्टे होते हैं और बहुचरा माता के मंदिर में भंडारे का आयोजन भी करते हैं । इससे संबंधित जानकारी ‘तीसरी ताली’ और ‘यमदीप’ उपन्यास में भी मिलती है।
उत्तर भारत में हिंदू सस्कृति को ठेस पहुँचाने का लगातार प्रयास मुगल शासकों ने किया था । आक्रमण के दौरान सर्वप्रथम हिंदू स्थापत्य कलाओं और मंदिरों को ध्वस्त करके लोगों की आस्था पर प्रहार किया । गुजरात में सोमनाथ मंदिर को लूटने और तोड़ने के साथ-साथ किन्नरों की कुल देवी बहुचर माता को भी विध्वंस किरने की घटना तारा गुरु बताती है कि “तो सुनिए, अलाउद्दीन खिलजी की सेना जब माँ बहुचर देवी के मंदिर को विध्वंस करने पहुंची, तब उसके तमाम सैनिकों ने मंदिर की मुर्गियाँ खा ली ।”12 इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश शासक किन्नर समुदाय के लोगों को अपराधी घोषित करके भारतीय लोगों में उनके प्रति नफरत और भेदभाव के भाव जगाने में सफल हुए । और मुगल साम्राज्य में औरंगजेब जैसे शासकों ने स्वार्थ-सिद्धि हेतु किन्नरों के लिए रोजी-रोटी का प्रबंध तो किया था, लेकिन उनके ईश्वरीय विश्वास और आस्था के मंदिर को विध्वंस करते हुए निराश और भयभीत करते हुए उनकी लैंगिकता को नकारा है ।
नाज मुगल काल में निजी स्वार्थ के लिए बच्चों को हिजड़ा बनाने की प्रक्रिया का जिक्र इस प्रकार करती है कि “ सुना है कि निजामशाही में तो दस-बारह साल से कम उम्र वाले लड़कों के माता पिता को इस बात का डर रहता कि पता नहीं कब निजाम के लोग आकर उनके बच्चों को भगा कर ले जाए । अधिकतर को तो उनकी मर्जी के विरुद्ध सौदा करना पड़ता था । दस-बारह साल के लड़कों को उठाना, उनका खस्सीकरण करना । अच्छी तरह से खिला-पिलाकर उन्हें तंदुरुस्त रखना । खोजा बनाना और रानी के महल में पहरेदार के रुप में बेझिझक तैनात करना । खस्सीकरण के बाद बनाया गया खोजा था तो आखिर हिजड़ा ना ! माँ, इन राजाओं ने निजी स्वार्थ के लिए कितना पाप किया था !”13 आलोच्य उपन्यास में लेखिका ने बताया है कि रानियाँ हरम में सुरक्षा के लिए बच्चों के लिंग काटकर सुरक्षाकर्मी के रूप में तैनात करने की घटना काफी प्रचलित भी है । ऐतिहासिक काल पर आधारित ‘जोधा-अकबर’ धारावाहिक और फिल्म में भी हिजड़ों को सुरक्षाकर्मी के रूप में दिखाया गया है ।
निष्कर्ष
निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो हिंदी साहित्येतिहास या उपन्यास विधा में 20 वीं सदी तक किन्नर समुदाय को आधार बनाकर या किसी उपन्यास में सशक्त किन्नर के रूप में पात्र नहीं देखने को मिलता है । कुछ उपन्यासों में समलैंगिकता के आधार पर उपन्यास जरूर लिखा गया है । LGBT के समूह के हिसाब से कुछ शुरुआत 20 वीं सदी के अन्तिम दशकों से देखी जा सकती है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य और समाज किन्नरों के प्रति बहुत पहले ही संवेदनशील था । किन्नर विमर्श वर्तमान समय में भी शैशवावस्था के दौर में है । अभी तक उपन्यास साहित्य इतिहास में मुश्किल से दो दर्जन उपन्यास लिखे गये हैं । शोध की दृष्टि से अगर तटस्थता के साथ बात की जाए तो कई उपन्यासों की कथाएँ एक समान देखने को मिलती हैं ।
उपन्यासों में राजनैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में बात न के बराबर हुई है । लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है, किन्नर जीवन पर आधारित लेखन का श्री गणेश करके इतिहास बदलने में 21वीं सदी के उपन्यासकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । उपन्यास ही वह विधा है जो जीवन के तमाम पहलुओं को बताने में सक्षम हो सकती है। उपन्यासकारों ने अवश्य ही किन्नर समुदाय से जुड़े शिक्षा, रोजगार, घर वापसी, संतान को सम्मान, मानवाधिकार के साथ स्वस्थ जीवन जीने और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने जैसे मुद्दों पर लेखन करके सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने का प्रयास किया है । उनमें यमदीप, किन्नर कथा, गुलाममंडी, मैं भी औरत हूँ, दरमियाना, जिंदगी 50-50, पोस्ट बॉक्स 204- नाला सोपारा, मेरे हिस्से की धूप, अस्तित्व की तलाश में सिमरन, मेरे होने में क्या बुराई, वह, आधा आदमी, हॉफ मैन, शिखंडी, शिखंडी स्त्री देह से परे, मुनिया मौसी, अस्तित्व इत्यादि उपन्यास लिखे गये जिन्होंने साहित्येतिहास में किन्नर-विमर्श चेतना को बल देने का कार्य किया । किन्नर समुदाय पर आधारित आधुनिक हिंदी उपन्यासों के माध्यम में कुछ किन्नरों से संबंधित विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख हुआ है । अधिकांश लेखकों ने ऐतिहासिक कथाओं के माध्यम से किन्नरों की वर्तमान परिस्थिति का सही अंकन करने लिए सफलतापूर्वक प्रयास किया है ।
संदर्भ सूची-
1.https://indianexpress.com/article/world/indigenous-tribes-embraced-gender-fluity-prior-to-colonisation-but-europeans-enforced-specific-gender-roles/
2. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-48442934
3.लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-164
4.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189
5. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी,मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी, वाणी प्रकाशन,दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या-165
7. वही,पृष्ठ संख्या-164
8. वही, पृष्ठ संख्या-165
9.प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, दरियागंज,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-189
10.पारू मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास),अनु.सुनीता परांजपे, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012,पृष्ठ संख्या-152
11. महेन्द्र भीष्म,किन्नर कथा, सामयिक बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011,पृष्ठ संख्या-92
12.वही, पृष्ठ संख्या-93
13. पारु मदन नाईक, मैं क्यों नहीं ? (अनुदित उपन्यास), अनुवाद- सुनीता परांजपे, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या-86
#ThirdGender #kinnar #Transgender #किन्नर विमर्श
शनिवार, 22 अक्टूबर 2022
ट्रांसजेंडर सोशल एक्टिविस्ट सिमरन सिंह के साथ डॉ. मिलन बिश्नोई की बातचीत
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022
साहित्य में किन्नर विमर्श : LGBTQ+ समुदाय
आलेख प्रकाशित- परिवर्तन पत्रिका, अप्रैल-सितंम्बर 2022, पेज नं.-154-161, ISSN-2455-5169
समाज में हाशिये की परिधि पर खड़े किए गये वर्ग
या समुदाय की उपस्थिति सदियों से बनी रही है । परंतु उन्हें निजी स्वार्थ के कारण
सामान्य या सभ्य कही जाने वाली जनता और जनसमुदाय ने कभी भी अपनाने की कोशिश नहीं
की । इस संदर्भ में वैश्विक परिदृश्य के दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है, तब भी
विस्तृत फलक में निराशाजनक परिणाम ही देखने को मिलते हैं । किसी भी देश का साहित्य
और इतिहास को देखा जाए तो ‘किन्नर
समुदाय’ यानि ‘थर्डजेंडर’ को दोयम दर्जे के दृष्टिकोण से ही देखा जाता है । उन्हें सामान्य इंसान
की श्रेणी से कोसों दूर रखा गया । वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि किन्नरों के
साथ अमानवीय व्यवहार ही किया जा रहा है ।
समाज
की बनी बनाई परम्परा में ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ यानि की ‘Male’ और ‘Female’ का ढांचा बना दिया गया है, जो सिर्फ
संतान पैदा करने की क्षमता रखता है, वे ही सामान्य समाज का सदस्य कहलाने और इस
समाज की संरचना को निर्धारित करने योग्य हैं । ‘स्त्री और
पुरुष’ के मध्य अपने आप को भिन्न समझने वाले या ‘लैंगिक विकृति’ और प्राकृतिक रूप से ‘लैंगिक कमजोरी’ वाले इंसान को सामाजिक रूप से
मानवीयता का दर्जा नहीं दिया गया । ‘संवैधानिक’ रूप से 21वीं सदी में कानून के द्वारा तो उन्हें उचित अधिकार मिल गए हैं
किन्तु आज भी उन्हें खोखले समाज में स्वीकृति नहीं मिली है ।
‘थर्डजेंडर’ की पहचान कोई आज और कल में नहीं हुई है, जो मुख्यधारा के लोग इन्हें
अजूबे की तरह देख रहे हैं । आज भी इन्हें अपने ही घर और परिवार तथा समाज से भगाया
और दुत्कारा जाता है । ये भी मानव समाज का ही अंग है, इन्हें धिक्कार, तिरस्कार,
उपेक्षित व्यवहार के बजाय सम्मान के साथ अपनाने की जरूरत है । समाज में उन्हें
विभिन्न नामों से जाना जाता है- अरावनी, जोगप्पा, छक्का, मामू, ख्वाजासरा,
थर्डजेंडर, पवैया, नपुंसक, तृतीयलिंगी, मंगलमुखी, किन्नर इत्यादि । विभिन्न नामों
से संबोधित किए जाने वाला समुदाय दर-दर की ठोकरें खा रहा है । कुछ लोग मंगलमुखी,
शिखण्डी,जोगप्पा या अर्धनारीश्वर के नामों से बुलाना सम्मानजनक मानते हैं लेकिन
वास्तविक सम्मान तो तब मिलेगा जब समाज इन्हें सामान्य संतान की भांति अपनाने की
पहल करेंगे ।
सामान्य समाज के द्वारा दुरदुराए और सहमें हुए अपने आप को हीनतर
समझने औरं कमतर आंकने वाले इस ‘किन्नर समुदाय’ ने ‘स्वयं का
समुदाय’ ही स्थापित किया है । स्वयं का समुदाय स्थापित करना
भी जरूरी था, क्योंकि परिवार और समाज ने किन्नर बच्चों को लावारिश बनाकर कचरे के
ढ़ेर में फेंकने का काम किया है । आज किन्नर स्वयं एक-दूसरे का सहारा बनकर अपने
अस्तित्व की जंग बिना किसी हथियार और हड़ताल के लड़ रहे हैं । विश्व के विभिन्न
देशों में अलग-अलग समय में इन्हें मान्यता और संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ ।
दक्षिण एशिया में ‘हिजड़ा’,थाइलैंड में
‘कैथोय’ और मैक्सिको में ‘मक्स’ नाम से इन्हें जाना जाता है । वर्तमान समय में
‘LGBTQ’ से ताल्लुक रखने वालों को लगभग 175 देशों में ‘थर्डजेंडर’ और ‘Transgender’
के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त है । समाज ने अपनी निगाहों में ‘थर्डजेंडर’ को एक अजूबे की भाँति या फिर डरावने
जंगली जानवर की तरह ही देखा है । ‘लैंगिक अपरिपक्वता’ और ‘अधूरापन’ ही उनके जीवन का
अभिशाप बन गया है, समाज उनसे नफरत तो करता है, साथ वह यह भी चाहता है कि तथाकथित
सभ्य समाज पर उनकी परछाई भी न पड़े । समाज के लोग जैविक दोष और यौन-अविकास वाले
बच्चों को परिवार में रखना कलंक तक मानते हैं । सामाजिक दबाव के कारण ही सही लेकिन
‘लिंग अस्पष्टता’ के कारण उनके माता-पिता भी अपनी संतान से पीछा छुड़ाने
में ही भलाई समझते हैं । इन बच्चों (नपुंसक) को तिरस्कृत करने तथा स्वयं को समाज के ठेकेदार समझने वाले विकृत,
विकलांग मानसिकता तो लिए हुए हैं ही साथ ही वे दंभी सोच से ग्रसित भी हैं । ये वे
लोग हैं जो अपनी दोहरी मानसिकता के कारण कैंसर पीड़ित, पोलियो, चर्म रोग, मानसिक
विकृति और विकलांग बच्चों का पालन-पोषण करने में असमर्थता प्रकट नहीं करते, लेकिन
मात्र कपड़ों में छुपी रहने वाली लैंगिक कमी के कारण ये लोग ‘तृतीयलिंगी’ बच्चों को स्वीकार नहीं कर पाते ।
शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद भी ‘थर्डजेंडर’ बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है ।
कहने को तो हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’
जैसी आदर्श बातों में विश्वास रखते हैं परंतु वास्तविक जीवन में हम अपनी ही संतान
को समाज से विस्थापित करने पर तुले रहते हैं । तब क्या भारतीय प्रतिष्ठा और
नैतिकता पर आंच नहीं आती? भारतीय समाज में ‘स्त्री’ को ‘शक्ति’ का दर्जा देकर भी उनके साथ शोषण करने से नहीं चूकते । स्त्रियों को भी
अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए हजारों साल लड़ना पड़ा है । उसी प्रकार किन्नरों
को समाज एक तरफ दैवीय शक्ति से कम नहीं समझता है , दूसरी तरफ इन्हें हिकारत व
कलंकित समझता है । समाज के लोग इनका शुभ अवसर में आशीर्वाद मिलने पर खुद को
सौभाग्यशाली समझते हैं, तो फिर इनका तिरस्कार और शोषण क्यों किया जा रहा है? थर्डजेंडर का साहित्य और इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, इसके
बावजूद भी द्विलिंगीय समाज ने इनका सिर्फ ‘Use’ (उपयोग) व ‘उपभोग’ किया है ।
पौराणिक काल से लेकर
पाश्चात्य साहित्य तक किन्नरों ने विभिन्न प्रकार की सेवाओं में अपना योगदान दिया
है । ‘380-85 ई.पू.’ से लेकर आज तक इस समुदाय के अनेकानेक संदर्भ देखने को मिलते हैं, फिर भी
साहित्य और समाज में इनको सम्मानजनक स्थान से रखा गया । आज भी किन्नर अपने
अस्तित्व की तलाश में भटक रहे हैं । मूलभूत सुविधाओं से वंचित आज भी यह समुदाय हर
क्षेत्र में आखिरी छोर पर खड़ा दिखाई देता है । खैर 21 वीं सदी में ‘नवीन और चर्चित विमर्शों’ में से ‘किन्नर विमर्श’ भी चर्चा का विषय बना और
साहित्यकारों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित होने लगा है । साहित्य में इस ‘नव्य
विमर्श’ को ‘तृतीयलिंगी विमर्श’ व ‘किन्नर विमर्श’ के नाम से
प्रचलित करने का प्रयास किया गया है ।
अर्थात् यहाँ ‘किन्नर’ शब्द का अभिप्राय हाशियागत समुदाय से है ।
जो ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ से इतर अथवा ‘तृतीय लिंग’ के
अन्तर्गत परिगणित होते हैं ।
साहित्य और समाज में ‘किन्नर’ शब्द को लेकर
कई बार आपत्तिजनक बहसबाजी होती रही है, ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’, और ‘थर्डजेंडर’ के प्रयोग पर विभिन्न मत देखने को मिलते हैं । कुछ साहित्यकार ‘किन्नर’ को हिजड़ा नाम से संबोधित करने की सलाह देते
हैं । अधिकांश साहित्यकार पौराणिक/प्राचीन ग्रंथों के अनुसार
‘किन्नर’ शब्द से बुलाना उचित मानते हैं, वहीं
कुछ साहित्यकार ‘मंगलमुखी’ शब्द से
संबोधित करना उत्तम समझते हैं, क्योंकि ‘भारतीय हिंदू परम्परा’ में ‘किन्नरों
से आशीर्वाद’ लेकर उन्हें
‘बधाई’ (नेग) देकर मंगलकार्य की शुरुआत करते हैं इसलिए इन्हें ‘मंगलमुखी’ कहा जाता है ।
यद्यपि समाज और साहित्य के
पुरोधाओं ने ‘किन्नरों’ को ‘हिजड़ा’ या ‘थर्डजेंडर’ कहना ही उचित
समझा । तब मन में कहीं ना कहीं सवाल उभर कर आ ही जाता है कि फिर इनके हिसाब से ‘प्रथम जेंडर’ किसे माना जाए? यदि
माना भी जाए तो ‘पहला’, ‘दूसरा’ और ‘तीसरा’ दर्जा किसी को किस हिसाब से देना उचित होगा? अगर ‘थर्डजेंडर’ संबोधन के संदर्भ में स्वयं उस समुदाय से
जुड़े लोगों की बात करें तो स्पष्ट होता है कि वे स्वयं को ‘तीसरे
दर्जे’ का इंसान मानने को राजी नहीं हैं । भला मानेंगे भी
क्यों? खैर वर्तमान में संवैधानिक स्तर पर ‘थर्डजेंडर’ शब्द मान्यता प्राप्त है । लेकिन ‘हिजड़ा’
शब्द कहना और सुनना गाली देने जैसा प्रतीत होता है ।
‘किन्नर’ और ‘हिजड़ा’ शब्द-प्रयोग के
संदर्भ में नीरजा माधव का कहना है कि “एक तथाकथित प्रचलित-सा
नाम ‘किन्नर’ कहीं से क्या उछला कि सभी
लेखक, आलोचक, प्रोफेसर और शोध छात्र देखा-देखी उसका प्रयोग हिजड़ा समुदाय के लिए
करने लगे । बिना किन्नर शब्द का वास्तविक अर्थ शब्दकोशों में ढूँढे एक ताना-बाना
बुना जाने लगा किन्नर विमर्श । जबकि शब्दकोशों के अनुसार किन्नर एक जाति विशेष के
लोगों का संबोधन है जो देव योनि के माने जाते हैं । उनके भीतर हिजड़ों की भाँति
कोई लैंगिक विकृति नहीं पाई जाती है ।” नीरजा माधव ने अपने उपन्यास में बार-बार ‘हिजड़ा’ शब्द प्रयोग किया है । जैसा कि उन्होंने
आलोचकों, शोधार्थियों,
प्रोफेसरों पर भी आरोप लगाया कि ‘बिना अर्थ जाने-समझे ‘किन्नर’ शब्द का प्रचलन शुरू कर दिया ।’ यह कहना भी साहित्य और किन्नर समुदाय के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है।
उक्त भ्रम किन्नोर प्रदेश (हिमाचल) की एक
क्षेत्रीय जाति के कारण उत्पन्न हुआ है । यह तर्क जब ‘किन्नर विमर्श’ में
किन्नर शब्द-प्रयोग के विरुद्ध कहा जाता है तो हास्यास्पद
स्थिति बन जाती है । किन्नर शब्द को संस्कृत भाषाकारों ने अश्वमुखी कहकर संबोधित
किया जिसका सीधा अर्थ ‘न स्त्री और न पुरुष’ होता है, इतना ही नहीं ‘किन्नर’ शब्द का एक पर्याय ‘किंपुरुष’
शब्द भी माना जाता है । ‘किन्नर जाति’
के गुण-धर्म (संगीत,नृत्यादि) की समानता ‘तृतीयलिंगी’ से मिलती-जुलती है, महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप एक नृत्यांगना के
तौर पर उल्लेखनीय है जिन्हें नपुंसक होने का श्राप मिलने की कथा भी प्रचलित है ।
वर्तमान में भारतीय पौराणिकता को मद्देनज़र रखते हुए ही कुंभ जैसे मेलों में ‘अखाड़ा पद्धति’ के अंतर्गत तृतीयलिंगी समुदाय का
अखाड़ा भी ‘किन्नर अखाड़ा’ नाम से प्रसिद्ध तथा मान्यता प्राप्त है । किन्नर समुदाय
पौराणिक परम्परानुसार सदियों से नाच-गान व
आशीर्वाद देकर जीविकोपार्जन भी करता रहा है।
‘तृतीयलिंगी
समुदाय’ स्वयं ‘किन्नर’ शब्द को सहर्ष स्वीकार करता है । हमारे ‘पौराणिक
धर्म ग्रंथों’ में भी ‘किन्नरों’ का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा ‘मानस-किन्नर’ शीर्षक से ‘मुरारी बापू’ की
एक कृति देखने को मिलती है । ‘रामायण’
में ‘किन्नर’ शब्द का उल्लेख किया गया
है, ‘मानस किन्नर’ पुस्तक में ‘किन्नर’ शब्द से संबंधित विस्तार से चर्चा की गई है
। इस संदर्भ में मुरारी बापू कहते है कि “जिन किन्नरों के
बारें में मेरे गोस्वामी ने मैदान में...डिम-डिम-डिम घोष करते हुए सोलह बार
रामचरितमानस में ‘किन्नर’ शब्द का
प्रयोग किया । और गोस्वामी के अन्य संदर्भ-ग्रंथों का यदि विवरण आपको दूँ तो और
किन्नर शब्द आपको मिलेंगे । कुल मिलाकर छब्बीस बार तुलसी ने किन्नर को साधु हृदय
से याद किया है ।” संदर्भ से दृष्टिगत होता है कि ‘लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी’ ने अपनी आत्मकथा में ‘हिजड़ा’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए ‘किन्नर’ शब्द को स्वीकार किया है- “ ‘हिजड़ा’ मूल उर्दू भाषा का
शब्द है । वो भी ‘हिजर’ इस अरेबिक शब्द
से आया हुआ । ‘हिजर’ यानि अपना समुदाय
छोड़ा हुआ, उस समुदाय से बाहर निकला हुआ । मतलब स्त्री-पुरुष के हमेशा समाज से
बाहर निकलकर स्वतंत्र समाज बनाकर रहने वाला।” यहाँ ‘हिजड़ा’ शब्द को परिभाषित किया है । इसी प्रकार
विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है । इसके साथ उन्होंने इस
आत्मकथा में यह भी बताया है कि ‘हिजड़ा’ शब्द को वर्तमान में गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।’
‘लक्ष्मीनारायण
त्रिपाठी’ के अनुसार- “उर्दू और हिंदी
में ‘हिजड़ा’ शब्द है । इसके साथ ही
उर्दू में ‘ख्वाजासरा’ भी कहा जाता है
। हिजड़ों को अपने प्राचीन धर्म ग्रंथों में ‘किन्नर’ शब्द की संकल्पना है । इस वजह से हिजड़ों को हिन्दी में ‘किन्नर’ भी कहते हैं । मराठी में ‘हिजड़ा’ और ‘छक्का’, पंजाबी में ‘जनखा’। तेलुगु
में ‘नपुंसक्कुडु’, ‘कोज्जा’, ‘मादा’ कहा जाता है तो तमिल में ‘थिरूरनागाई’, ‘अली’, ‘अरवन्नी’, ‘अरावनी’, ‘अरूवनी’ इत्यादि शब्दों का
इस्तेमाल किया जाता है ।”
अर्थात् यहां ‘नीरजा माधव’ के
अनुसार ‘हिजड़ा’ शब्द को स्वीकारने के
बावजूद भी ‘किन्नर’ शब्द को नकारा भी
नहीं जा सकता । क्योंकि जब स्वयं ‘किन्नर अखाड़े की
महामंडलेश्वर’ ‘किन्नर’ शब्द को स्वीकृत करते हुए सहज दिखाई दे रही हैं तो अन्य लोगों को इसे बहस
का विषय नहीं बनाना चाहिए । विवेच्य अर्थों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि -
किसी ‘इंसान’ को ‘छक्का’, ‘मामू’, ‘हिजड़ा’ कहने की बजाय
उन्हें ‘स्वस्थ मानसिकता’ के साथ
बुलाना अधिक उचित समझा जाए । उन्हें उनके नाम से बुलाने में एतराज नहीं होना चाहिए । किसी आदमी को यदि
बार-बार ‘मर्द’ शब्द संबोधन के साथ
बुलाया जाएगा तो वह सहजता महसूस करेगा ? खैर किन्नरों को
बहसबाजी, तिरस्कार, धिक्कार और शोषण का सामना करने की हिम्मत 21 वीं सदी में मिल
रही है ।
‘स्वाभिमान
और अस्तित्व की पहचान’ की कीमत देर-सवेर ‘किन्नर समुदाय’ स्वयं ही समझ रहा है । जब यह समुदाय
अपने ‘अस्तित्व’ के लिए आवाज उठानी
शुरू करते हैं, तो हिंदी साहित्यकार भी संवेदनशील होकर ‘प्रासंगिक
किन्नर विमर्श’ का ‘नवसृजन और नवअध्याय’ लेखन में अपनी सहभागिता की उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ-साथ उनके जीवन
में मिले सामाजिक स्तर के गहरे घावों पर मरहम लगाने का सकारात्मक प्रयास कर रहे
हैं।
हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श
विमर्श को अंग्रेजी में ‘DISCOURSE’ कहा जाता है, उसे ‘हिंदी
में किसी विषय का गहन अध्ययन करना’, ‘चिंतन-मनन
करना’, ‘तर्क-विर्तक करना’ तथा उस से संबंधित विषय के विभिन्न पहलुओं को जानना और सभी पक्षों की
तटस्थता से पड़ताल करना’ ही विमर्श है । हिंदी कोश में
विमर्श का अर्थ – “सोच-विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता
लगाना, किसी बात या विषय पर कुछ सोचना, समझना, विचार करना, गुण-दोष आदि की आलोचना
या मीमांसा करना, जाँचना और परखना, किसी से परामर्श या सलाह करना ।” हिंदी साहित्य में विमर्शों की शुरुआत ‘स्त्री-विमर्श’ से माना जा सकती है, साथ ही मुख्यधारा में पीड़ित-शोषित वर्ग की आवाज ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ तक सीमित न होकर अपने देश के
वातावरण में स्वतंत्र होकर समानाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले मानवीय
बुद्धिजीवियों के लिए ‘नव चिंतन-मनन’
की आवश्यकता महसूस हुई ।
विमर्शों की शुरुआती आहट
अधिक पुरानी नहीं है । ‘स्त्री विमर्श’
से शुरू होकर ‘दलित विमर्श’, ‘आदिवासी विमर्श’, ‘समलैंगिक
विमर्श’, ‘कृषक विमर्श’, ‘पर्यावरण विमर्श’, ‘पुरुष
विमर्श’, ‘ब्राह्मण विमर्श’ और ‘किन्नर विमर्श’ तक हलचल
होने लगी है । अवलोकनकर्ताओं ने ‘विमर्श’ का उद्देश्य मुख्यधारा के समाज व सत्ता के नेतृत्वकर्ताओं को अपनी
सम्पूर्ण समस्याओं से परिचित करवाते हुए
अपने मानवोचित अधिकार मांगने के साथ इंसानियत का दर्जा प्राप्त करना बताया
है । ‘स्त्री विमर्श’ की शुरुआत सदियों
से स्त्रियों को चारदीवारी में रखने तथा ‘पर्दा प्रथा’, ‘सती प्रथा’, ‘बालविवाह’ जैसी तमाम कुरीतियों से मुक्ति पाने के
लिए हुई है । इसी प्रकार ‘दलित विमर्श’ में छुआछूत और भेदभाव का सामना करने के
साथ-साथ शोषित-पीड़ित होने वाले समाज ने अपनी आवाज बुलंद कर अधिकारों की माँग की ।
जल- जंगल और जमीन के रक्षक आदिवासियों ने समय की माँग के अनुरूप अपनी समस्याओं के
प्रति सजग होकर अपने अधिकारों की मांग की है । इसी प्रकार 21वीं सदी में दबे-कुचले
और पिछड़े वर्गों ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के प्रति जागरूक होकर मुख्यधारा से
जुड़ने की पहल की है । इन तमाम हाशियागत वर्ग-समुदायों की आवाज और ‘जन आंदोलन’ के साथ-साथ ‘विविध
विमर्शों’ में ‘किन्नर अस्तित्व’ की तरफ देखना भी जरूरी है ।
‘किन्नर विमर्श’ की बात की
जाए तो इस समुदाय की जटिल समस्याओं और मूलभूत आवश्यकताओं को सामान्य स्तर पर समझना
होगा । सदियों से अर्थात् मानव सभ्यता के आरम्भिक दौर से लेकर समाज के विकसित होने
तक किन्नरों की उपस्थिति लगातार बनी रही है, इसके बावजूद भी मुख्यधारा के लोगों ने
इन्हें हाशिये के कठघरे में खड़ा रखा है । प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा के अनुसार-“हिंदी के
आधुनिक काल के साहित्य में ‘निराला’ के
‘कुल्लीभाट’ का चरित्र यदि समलैंगिक व्यक्ति
का चरित्र है तो शिवप्रसादसिंह की ‘बहाववृति’ तथा ‘बिंदा महाराज’ जैसी
कहानियों के चरित्र में तृतीयलिंगी विमर्श की आरम्भिक आहट देने वाले किन्नर चरित्र
है जो समाज की मूलकथा में पुनर्वास के लिए जूझ रहे हैं । वृंदावनलाल वर्मा की
एकांकी ‘नीलकंठ’ का भी इस श्रेणी में
उल्लेख किया जा सकता है ।” इसी कड़ी में सुभाष अखिल की ‘दरमियाना’ कहानी 1980 में ‘सारिका
पत्रिका’ में प्रकाशित हुई इन्होंने 2018 में इस कहानी को विस्तृत रूप देकर उपन्यास में
तब्दिल किया । वैसे तो किन्नरों के जीवन से संबंधित कुछ गिनी-चुनी रचनाएं हिंदी
साहित्य में पहले से मौजूद थी, 1980 के दौर से पहले ही कुछ अंश में नाटक और अन्य
विधाओं में दिखाई देती है, लेकिन हिंदी साहित्य में इस दौर के पश्चात लंबा ठहराव
देखने को मिलता है जो आगे चलकर 2002 में तृतीयलिंगी विमर्श के रूप में उभरकर सामने
आता है ।
आलोच्य 21 वीं सदी में ‘किन्नर विमर्श’ यानि ‘तृतीयलिंगी समुदाय’ को
साहित्य के केंद्र में लाने का काफी प्रयास किया जा रहा है । इस समुदाय की
सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को साहित्य के माध्यम से
समाज को रू-ब-रू करवाने में उपन्यासकार और कहानीकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा
है । जिनमें नीरजा माधव ‘यमदीप’,
महेन्द्र भीष्म ‘किन्नर-कथा’,’मैं पायल’, प्रदीप सौरभ ‘तीसरी
ताली’, निर्मला भुराड़िया ‘गुलाममंडी’, मैं भी औरत हूँ ‘अनुसूया त्यागी’, सुभाष अखिल’ दरमियाना’,
चित्रामुद्गल ‘पोस्ट बॉक्स नं.203’,
राजेश मल्लिक ‘आधा आदमी’, डॉ विमला
मल्होत्रा ‘किन्नर मुनिया मौसी’, भंगवत
अनमोल ‘जिंदगी 50-50’, गिरिजाभारती ‘अस्तित्व’, हरभजनसिंह मेहरोत्रा ‘ऐ जिंदगी तुझे सलाम’, भुवनेश्वर उपाध्याय ‘हॉफमैन’, नरेन्द्र कोहली ‘शिखण्डी’, डॉ मोनिका शर्मा ‘अस्तित्व की तलाश में सिमरन’, रेनू बहल ‘मेरे होने में क्या बुराई’, डॉ लता अग्रवाल ’मंगलमुखी’, शरदसिंह
‘शिखण्डी स्त्री देह से परे’, ड़ॉ मुक्ति
शर्मा ‘श्रापित किन्नर’, अर्चना कोचर ‘किन्नर कथा-एक अंतहीन सफर’ इत्यादि । 20 वीं सदी के छठे-सातवें दशक में विमर्शों को आधार बनाकर उपन्यासकारों ने
समाज के शोषित वर्ग को तथाकथित समाज के केन्द्र में लाने का प्रयास किया है । जिनमें
नारी विमर्श को आधार बनाकर उपन्यास लिखे गये और समय के साथ-साथ दलित विमर्श,
अल्पसंख्यक विमर्श, किसान विमर्श, सत्ता विमर्श, आदिवासी विमर्श और किन्नर पर भी
कलम चलाने की शुरुआत हुई ।
अंग्रेजी
साहित्य में किन्नर समुदाय/थर्डजेंडर समुदाय
विवेच्य साहित्य के परिदृश्य में देखा
जाए तो अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी साहित्य में ‘LGBTQ’ समुदाय पर अधिक लेखन किया गया ।
अंग्रेजी भाषा में विभिन्न देशों के साहित्यकारों ने ट्रांसजेडर और थर्डजेंडर
समुदाय के जीवन पर विस्तृत रूप से लिखा है । भारतीय भाषा में भी उनकी उपस्थिति
मनुस्मृति, कामसूत्र, महाभारत और रामायण में देखने को मिलती है । अंग्रेजी
साहित्यकारों के संस्मरण के रूप में ‘ट्रांस-आइडेंटिफाइड’, ‘ट्रांसजेंडर’,’समलैंगिकता’ पर अनेकानेक संस्मरण पढ़ने को मिलते हैं
‘लिली एल्बे’ की पुस्तक ‘The Danish Girl’ ‘सेक्स री असाइनमेंट’ पर यानि सर्जरी करवाने वाली
लड़की के जीवन को आधार बनाकर लिखी गई है । जिनकी देखरेख ‘सेक्सोलॉजिस्ट
मैग्नस हिर्शफेल्ड’ ने की थी । 1931 में ऑपरेशन के बाद लिली
एल्बे की मृत्यु हो जाती है, उसके दो साल बाद ‘मैन इन टू
वुमन’ नाम से संस्मरण प्रकाशित होता है, जिसे ‘अर्स्ट लुडविग जैकबसन’ में नील्स होयर द्वारा
संपादित किया गया । यह पुस्तक ट्रांसजेडर, ट्रांस- सेक्सुअलिटी वाले लोगों के
प्रति सामान्य जनता, प्रशासन और मीडिया का ध्यान आकर्षित करवाती है ।
ट्रांस जूलियट जैक्स द्वारा संस्मरण समीक्षा लिखी गई ‘An Honest Account Of Gender Transition’ इस
में 1980 के दशक के अंत तक लेखक इन सस्मरणों पर सम्मेलनों में सवाल उठा रहे थे ।
विशेष रूप से उन्होंने सवाल उठाया ‘पुरुष’ और ‘महिला’ के बीच की जगह का
प्रतिनिधित्व कैसे किया जाए? ‘स्त्री-पुरुष’ के अलावा ‘तीसरे लिंग’ की
पहचान करने वाले डॉक्टर्स के खिलाफ बात की गई और नारीवाद के भीतर ‘ट्रांसफोबिया’ होने के बारे में बताया गया ।‘सैडी स्टोन’ ने ‘द एम्पायर
स्ट्राइक्स बैक: ए पोस्ट-ट्रांस सेक्सुअल’ को मेनिफेस्टो के
रूप में ऑनलाईन के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदायों में प्रसारित किया ।
संस्मरणों का अनुसंधान करने
पर ज्ञात होता है कि अधिकांश संस्मरण में ट्रांस और जेंडर को एक पहचान और एक भाषा
देने की मांग की गई है । उन्हें अपनी आइडेंटिटी स्वयं निर्धारित करने की बात की गई
है । उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय को संगठित करने और उनके भीतरी सवालों पर चर्चा
करने के लिए प्रोत्साहित किया है । यह संस्मरण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बाहरी
लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया । यह संस्मरण आत्मकथाओं के दौर में
लिखा हुआ है । अस्तु अंग्रेजी साहित्य में ‘समलैंगिक’, ‘विषमलैंगिक’, ‘होमोसेक्सुअल’, ‘थर्डजेंडर’ और ट्रांसजेंडर जीवन के बारे में जानने के लिए आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास और कहानियों को देखा जा सकता है ।
‘सेवेरो सरड्यू’ 1960-1970 वें दशक के लेखकों में से
एक है । उन्होंने 1972 में ‘कोबरा’ नामक
‘ट्रांसवेस्टाइट’ की कहानी लिखी है । इसमें
जन्मजात तृतीयलिंगी देह में बदलाव करने का जुनून दिखाया गया है, जो ‘विषमलिंगी’ पुरुष से ‘समलैंगिक’ महिला बनने का सफर है । यह पुस्तक ‘ट्रांसजेंडर’ के अनुभवों को समझने में मदद करती है ।
Third
Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in Culture And History - Gilbert Herdt विवेच्य
पुस्तक ‘थर्डजेंडर’ के अस्तित्व को
समझने में सक्षम बनाती है ; साथ ही ‘बीजानिटिन
महल’ के किन्नरों और ‘भारतीय तृतीयलिंग’ समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके मानदण्डों के बारे में लिखा गया ।
‘थर्डजेंडर’ के अस्तित्व को समझने में सक्षम
बनाती है ; साथ ही ‘बीजानिटिन महल’ के किन्नरों और भारतीय तृतीयलिंगी समुदाय की सामाजिक भूमिकाओं और उनके
मानदण्डों के बारे में बताया गया है । जबकि ‘Gilbert Herdt’ की
संपादित पुस्तक ‘Third Sex, Third Gender: Beyond Sexual Dilimorphism in
Culture And History’ है ।इस पुस्तक में ‘बधियाकरण
जैसी प्रथाओं’ की आवश्यकता और शुरुआती दिनों में ‘डच सेदामाइटस’ के बीच अंतरंग और निषिद्ध इच्छाओं को
व्यक्त किया गया । इसके अलावा 18 वीं सदी में इंग्लैण्ड के ‘सैफिस्ट’ और उन्नसवीं सदी में ‘यूरोप और अमेरिका’ के तथा कथित ‘उभयलिंगी-समलैंगिक’ लोगों के बारे में विस्तृत रूप में लिखा गया ।
यह नई दिल्ली की फोटोग्राफर ‘दयनितासिंह’ की पहली किताब ‘Myself Mona Ahmed’ है ।
‘मोना अहमद’ समाज के हाशिये पर खड़े समुदाय का
जीता-जागता उदाहरण है । मोना अहमद स्वयं किन्नर है जो सदियों से दरकिनार किये गए
वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । इस आत्मकथा में ‘दयनितासिंह’ मोना अहमद के ‘बधियाकरण’ से
लेकर उसके गोद लिए हुए बच्चे के खो जाने की कहानी को बयां करती हैं । अर्थात् मोना
एक संवेदनशील इंसान होने के साथ वह अपने समाज की आवाज बुंलद करती है साथ ही लेखिका
ने मोना की आवाज उठाने तथा उसकी आकांक्षा को संरक्षित करने का सफलतापूर्वक दायित्व
निभाया है ।
‘I’m Vidya: A Transgender Journey’
ट्रांसजेंडर लिंविग विद्या की आत्मकथा है। जैसा कि विद्या के बारे में बताया गया
है कि “Living Smile Vidya is Also known as Smiley is an Indian
trans-women, actress, assistant director and writer from Chennai. She is a
transgender activist and blogger. She holds a post-graduate degree from the
Thanjavarur University in applied linguistics. She started her career as an
electronic data processing assistant and thereby became the first trans-woman
in India who worked in a mainstream job rather than working for NGOs.” तथाकथित मुख्यधारा के समाज में इंसान की कार्यशैली से अधिक उसकी ‘लैंगिकता’ को महत्त्व दिया जाता है । ‘लिंग’ के अनुसार उनकी जीवन शैली का मानदण्ड
निर्धारित कर दिया जाता है ।
विद्या की तरह प्रखर मेधा वाले किन्नरों को हाशियागत किया जाता है तो
द्विलिंगीय समाज की निम्नस्तरीय सोच परिलक्षित होती है । विद्या के सदर्भ में एक
शोधाध्ययन से स्पष्ट होता है कि- ‘I am Vidya : A Transgender Journey’ was
written in Tamil and later Translated into Seven different languages including
English. It is regarded as one of the most brilliant transgender memoris.it was
first published in 2007.it is the transgender autobiography in india.it
showcases the struggle of Sarvanan to become Vidya. The struggle includes a lot
of physical and mental training in addition to her life the autobiography also presents the plight of
contemporary transgender like Vidya in
India.’ यह भारत की प्रथम आत्मकथाओं में से है जो
ट्रांसजेंडर के जीवन पर आधारित है । इस आत्मकथा में ‘सरवन्ना’ से ‘विद्या’ बनने के सफर को
दर्शाया गया है । इसमें आत्मकथाकार के संघर्ष से सफलता के शिखर तक पहुँचने और
अस्तित्व की पहचान बनाने की प्रेरणादायी कहानी है । मुख्यधारा के समाज ने विद्या
को ‘लैंगिक’ असमानता के आधार पर समाज
में उपेक्षित और तिरस्कृत निगाहों से देखा इतना ही नहीं उसके साथ अमानवीय व्यवहार
भी किया गया बावजूद इसके विद्या ने अपनी सफलता के माध्यम से मुख्यधारा के लोगों की
सोच पर तमाचा लगाया है ।
A Gift of Goddess
Lakshmi - Manobi Bandyopadhyay पत्रकार ‘झिमली मुखर्जी’ ने
भारत की प्रथम ‘ट्रांसजेंडर’ प्रिंसीपल
‘मानोबी बंद्योपाध्याय’ की जीवनी लिखी
। यह जीवनी ‘ट्रांसजेंडर’ समुदाय के
लिए एक प्रेरक की भांति मार्गदर्शन करती है । ‘सोमनाथ’
से ‘मानोबी
बंद्योपाध्याय’ बनने का संघर्ष, संवेदना और समाज की
प्रताड़ना को बताया गया है कि - “A Gift of Goddess Lakshmi is a candid
biography of Manobi Bandyopadhyay written by Jhimili Mukherjee Pandey who is a
Journalist. It is Called as a candid biographyof India’s first transgender
principal by the writers as Manobi tell her story of transformation from a man
into a woman with unflinching honesty and deep understand.” द्विलिंगीय
समाज ने ‘लैंगिक अस्पष्टता’ वाले इंसान
की योग्यता और उसकी काबिलियत को महत्त्व ना देकर उनकी अधूरी देह के कारण हरेक पहलू
से उन्हें प्रताड़ित किया है । ऐसे में किन्नर अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा नहीं
कर पाते । खैर, मानोबी के परिवार ने उसे अपनाया और उसे सभ्य, शिक्षित, संस्कारी और
आत्मनिर्भर बनाने में पूर्ण योगदान दिया है ।
जैसा कि सर्वविदित है कि आज 21 वीं सदी में
इंसान अंतरिक्ष और मंगलग्रह पर अपनी जगह बनाने में सफलता अर्जित कर रहा है । किन्तु
आज भी निराशा होती है कि किन्नर समुदाय के लोग अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष
कर रहे हैं - रोटी, कपड़ा और मकान के लिए आज भी संपूर्ण किन्नर वर्ग लड़ाई लड़ रहा
है ।साहित्यकारों ने किन्नर समाज की समस्याओं को जानने की कोशिश लगातार की है
लेकिन आज भी कई प्रकार की खामियां देखने को मिलती हैं । किन्नरों की समस्याएँ और
संवेदनाओं तथा संघर्ष को पूरी तरह जानना असंभव भी है, क्योंकि इस समुदाय में
शिक्षा की कमी के कारण कई प्रकार की रूढ़ मान्यताएं हैं । इन रूढ़िवादी मान्यताओं
और परम्पराओं के कारण ये लोग रीति-रिवाज, आचार-विचार, रहन-सहन आदि को मुख्यधारा के
लोगों के साथ साझा करने से डरते रहे हैं ।
संदर्भ ग्रंथ सूची-
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3. मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी (अनुवाद-शशिकला राय), लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी,पृष्ठ संख्या-157, वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई
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प्रथम संस्करण 2015
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6. किन्नर विमर्श साहित्य और समाज, सं. मिलन बिश्नोई, पृष्ठ संख्या-भूमिका(ऋषभदेव शर्मा) विद्या प्रकाशन, कानपुर , उत्तर
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Genderless Exile, Kindle,
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Governing Gender and
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I’m Vidya -A Transgender
Journey- Living Smile Vidya,Rupa Publicati on, 15 July
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संपर्क-avimili29@gmail.com
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