मिलन बिश्नोई
प्रकाशित आलेख- yugdhara.com
अस्तित्व में अस्तित्व की स्थापना
गिरिजा भारती कृत ‘अस्तित्व’ उपन्यास में अस्तित्व स्थापित
करने की पहल की गई है । उपन्यास में लेखिका ने परिवार की बदलती सोच के परिदृश्य को
समाज के सामने लाने का प्रयास किया है । इस उपन्यास की कथा में अन्य किन्नर आधारित
उपन्यासों से भिन्नता देखने को अवश्य मिलेगी । कथा की शुरूआत-समाज से भयभीत होते
हुए भी सुधा और वर्मा लैगिंक विकृति वाली बच्ची को अपनाने का फैसला करते हैं। लेकिन
कपङों से आधुनिक दिखने वाली समाज की सोच आज संपूर्ण रूप से परिपक्व नहीं दिखाई
देती । वर्तमान भारत 21वीं सदी यानि सपनों के भारत में रूढिवादिता, अंधविश्वास, भेदभाव,
छुआछूत,जातिवाद की भावना से मुक्त होकर सोचना काफी कठिन है । आज की कङवी सच्चाई है
कि विधवा, दलित, असहाय,तलाकशुदा नारी, वेश्या महिलाओं का समाज में कोई स्थान नहीं
है । ऐसे में लैगिंक विकृति (किन्नर) वाले बच्चों के बारें में अंदाजा लगा ही सकते
हैं कि क्या समाज खुलकर इन्हें अपनाने की हिम्मत कर सकता है । समाज के साथ सरकार
की कितनी अहम भूमिका रही। ट्रांसजेंडर लोगों की शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार के लिए
कितने सक्रिय होकर काम कर रहे हैं । सामान्य जनता को जागरूक करने के लिए सरकार ने
अनेक अभियान चलाये जैसे– बेटीपढ़ाओ-बेटीबचाओ,नसबन्दी ऑपरेशन,साक्षरता अभियान,मतदान
जागरूकता अभियान इत्यादि । इसी प्रकार लैगिंक विकृति वाले बच्चों को अपनाने के लिए अभियान चलाने
के साथ किन्नर बालकों को जन्म देने वाले मां-बाप को समाज के समक्ष पुरस्कृत व
सम्मानित करें ताकि समाज की सोच में बदलाव लाया जा सके । वरना जो परिवार किन्नर को
अपनी संतान के रूप अपनाने के साथ समाज और परिवार के बङे-बुजुर्गों से भयभीत रहते
हैं कि कोई उनके बालक की लैंगिकता पर सवाल ना उठा ले।
जिस प्रकार
इस उपन्यास में सुधा और वर्मा ने प्रीत को बेशक अपनाया लेकिन समाज एवं उनके
रिश्तेदारों का भय उनके मन-मस्तिष्क पर सदैव बना रहा। जैसे-जैसे प्रीत बङी होने लगी वैसे ही सुधा और
वर्मा जी की चिन्ताओं के बादल उमङने लगे। सुधा का व्यवहार भी अपनी मां और सास के प्रति
बदल सा गया। “पता नहीं बहन जी जब से पोती का
जन्म हुआ है हमारी बहू का तो मानसिक संतुलन ही ठीक नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है
किसी के बस में है। यह मेरी बहू नहीं है। अजीब-अजीब हरकत करती रहती है। पोती मुझे
छूने नहीं देती। आजकल तो रट लगा रखी कि दिल्ली में या किसी शहर में ट्रांसफर करा
लो और तो बेटा भी उसी के इशारे पर है। ऑफिस में तबादले को अर्जी दे दी है”. सुधा के बदलाव का कारण सिर्फ
प्रीत का अधूरा शरीर है इसे छुपाने के लिए रिश्तेदारों से दूर जाना चाहती है। आस-पङौस
में अगर पता चल गया तो प्रीत व उसके माता-पिता का जीना मुश्किल हो जाएगा। लोग ताने
देने लग जाते कि घर में हिजङे को रख रहे इत्यादि कटु वचन सुनाते। वर्माजी और सुधा
हमेशा यही सोचते कि आने वाले समय में जरूर बदलाव आएगा लोग लिंगीय भेदभाव को महत्व
नहीं देगें। लेकिन सुधा की माँ को प्रीत के अधूरेपन का पता चलने पर उनके पैर से
जमीन खिसक जाती -“यह सब नहीं
जानती बेटा’ माँ ने कहा। पूर्वजों से चला आ
रहा है कि किन्नरों का अलग ही समुदाय होता है’। तुम इस समाज से कैसे जीत पाओगी .”सुधा अपनी मां से प्रीत का राज
किसी को ना बताने की याचना करती है । अपनी बेटी के लिए पूरे समाज से लङने का जज्ब़ा
रखती है वह अपनी प्रीत को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाना चाहती है। लेकिन यहां सुधा का
भय समाज के प्रति इसलिए बना कि सभ्य कहा
जाने वाला समाज आज भी संकीर्ण मानसिकता से घिरा हुआ है।
प्रीत के
अब दो भाई-बहन रीत और शुभम का जन्म हुआ इसलिए सुधा और वर्माजी खुश हैं । कुछ समय
पश्चात तीनों भाई स्कूल जाने लगते हैं और सुधा का ध्यान रीत और शुभम से प्रीत की
तरफ अधिक होने के कारण दादी को बुरा लगता है इस बात की शिकायत करती है। कुछ वर्ष
पश्चात उम्र बढने के साथ प्रीत को अपने वजूद का पता चलने पर निराश रहने लगती है
अपनी अधूरी देह से परेशान भी रहती कभी-कभी भगवान के मंदिर में मूर्तियों को देखती
फिर भगवान से शिकायत करती। कभी बगीचे में घंटो भर बैठे आते-जाते लोगों को देखती
फिर उठकर घर में चुपचाप चली जाती । इस तरह अपने मन की पहेली की उलझन को स्वयं
सुलझाती। शिक्षित होने के कारण प्रीत समझदार और स्वाभिमानी थी इसलिए अपनी मां को
कहती
“मां मैं अब
डर-डर नहीं जीना चाहती बहुत जी ली इस तरह की जिंदगी आप क्यों नहीं बता देती इस
समाज को कि मैं एक किन्नर हूं। ...............मां आज समाज बदल रहा है। हमें छिपकर
नहीं डटकर सामना करना चाहिए।” प्रीत स्वयं के वजूद को छुपाकर नहीं रखना चाहती वह अपनी मां को सफल किन्नरों
के उदाहरण के द्वारा समझाती है । समाज की वास्तविकता रही है कि पुरूषवादी सत्ता ने
महिलाओं,दलितों,पिछङे व निम्न वर्ग को भी कई सालों तक शोषित किया । आखिर में इन
सभी वर्ग ने एकजुट होकर आवाज उठाई तब जाकर राहत मिली। इस प्रकार किन्नर समाज में
कुछ चेहरे है जिन्होनें अपने वर्ग को असली पहचान संविधान और समाज में पहचान दिलाई
और आज भी संघर्षरत हैं। जैसे- लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, शबनममौसी, मानवी बंधोपध्याय
मधु,पायलसिंह,धन्जय इत्यादि।
उपन्यास की
मुख्य पात्र प्रीत की तरह ‘वर्तमान समाज में गंगा कुमारी (राजस्थान) को उसके माता-पिता ने पढाया-लिखाया ।उदाहरणार्थ-
“राजस्थान के जालोर जिले की किन्नर
गंगा कुमारी का वर्ष 2014 में पुलिस पद पर हुआ पर गृह विभाग द्वारा उनका
नियुक्ति-पत्र इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह किन्नर है। जिसके विरोध में
किन्नर गंगा कुमारी द्वारा लम्बी न्यायिक लङाई लङी गई। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा
गंगा कुमारी की याचिका स्वीकार कर सरकार को कङी फटकार लगाते हुए नियुक्ति देने का
आदेश दिया फलस्वरुप 4 वर्षों बाद फरवरी 2018 में उनका नियुक्ति-पत्र जारी हुआ|” इस प्रकार लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी,
मानवी बंधोपध्याय को उनके माता-पिता ने समाज के खिलाफ जाकर पढा-लिखाकर सक्षम बनाया
जो आज सबके मार्गदर्शक के रूप में जानी जाती है।
प्रीत ने
एम.ए तक की पढाई पूरी कर ली उम्र शादी
करने लायक हो गई। अब दादी की जिद है कि जल्दी से अब योग्य वर ढूंढकर शादी कर देनी
चाहिए । लेकिन प्रीत के मां-बाप समझदारी पूर्वक सबको बताते हुए शादी की बात को
टाले जा रहे । अपनी बेटी के कैरियर बनाने में जद्दोजहद साथ दे रहे है ताकि जीवन भर
प्रीत सुखी रह सके। और वे रीत व शुभम की शादी करने की सोच रहे हैं। कुछ दिन पश्चात
रीत के रिश्ते आना शुरू हुए फिर एक अच्छा रिश्ता तय हुआ और लङके वालों को पता चला
की बङी बेटी की शादी अभी तक नहीं हुई तो आशंकाओं के प्रश्नद्वार खुल गए । क्योंकि भारतीय
संस्कृति के अनुरूप सबसे बङी संतान की शादी पहले की जाती है,वर्मा के घर में इस
परिपाटी का खंडन किया गया । इसलिए होने वाले रीत के ससुराल वालों ने बिचौलिए के
माध्यम से अपनी आशंका को जाहिर किया “अम्मा जी मुझे लङके वालों ने भेजा है।उन्हें पता चला है कि
आप के दो पोतियां है और आपने जो मुझे रिश्ता भेजने को कहा वो छोटी पोती का है । वो
जानना चाहते हैं कि आप छोटी बेटी का रिश्ता पहले क्यों नहीं करना चाहती हो । आप
मेरी बात समझ रही हैं न अम्मा जी।” इस प्रकार के सवालों का उठना जायज है क्योंकि समाज में वर्मा जी नई धारणा को
स्थापित करने जा रहे हैं। साथ ही रीत की शादी तय कर दी जाती है। कुछ दिन पश्चात
शादी करवा दी जाती है शादी में प्रीत को लेकर सवालों की फुसफुसुहाट होते हुए भी
धूमधाम से कार्यक्रम संपन्न होता है।
प्रीत को
नौकरी मिल गई अब एक जिम्मेदार बहन के रूप में अपने भाई शुभम की ट्रेनिंग करवाने के
लिए फीस भरने की जिम्मेदारी उठाती है। फिर ट्रेनिंग खत्म होने के पश्चात भाई के
लिए लङकी पसंद करके शादी करने का फैसला करते हैं।अब भी कई तरह के सवाल प्रीत को
घेरकर प्रहार करते हैं और प्रीत को इस संकीर्ण मानसिकता वाले समाज से बेहद नफरत है
उनको अंदर से ऐसा लगता कि “इस समाज की सारी नैतिकता की लक्ष्मण रेखा तोङ दे। ऐसी नैतिकता किस काम की जो लैंगिकता के आधार
पर इंसान-इंसान के बीच भेदभाव करना सिखाए।” वास्विकता की तरफ गौर किया जाये तो
समाज में कुत्तों को स्थान इंसान की औलाद से कहीं अधिक मिल रहा है।
एड्स,कैंसर,विकलांग को घर में जगह दी जाती है फिर प्रीत जैसी विचारवान,
प्रतिभाशाली किन्नर को अपनाने में इतनी परेशानी क्यों ।
घर में
शुभम की शादी के पश्चात माहौल बदल-सा गया है क्योंकि रंजना प्रीत के प्रति
दिन-प्रतिदिन आक्रोशित व्यवहार करना शुरू कर दिया । अब प्रीत के मां-बाप अच्छा
योग्य वर ढूंढकर प्रीत की शादी करवाने में भलाई समझते हैं । क्योंकि रंजना प्रीत
की लैंगिकता पर सवाल करने लग गई “अरे, शादी कैसे होगी. मैं जानती हूं, मैं डॉक्टर हूं । मैं दावे के साथ कह
सकती हूं कि दीदी एक किन्नर हैं।” क्या डॉक्टर को ऐसी मानसिकता के साथ सोचने की
आवश्यकता है। या फिर यह कहें कि पढा-लिखा
द्विलिंगीय समाज पितृसत्तात्मक और रूढीवादी सोच के बंधन की जंजीरों से मुक्त नहीं
हुआ।
अंत में प्रीत को खोज-खबर करने से एक दिन नेट पर प्रीत की
तरह किन्नर लङका मिल जाता है। बातचीत के दौरान पता चला कि अमन कंपनी में काम करता
है औऱ उसका खानदान भी अच्छा होने के कारण दोनों की शादी करवा दी जाती है। संघर्ष
से संघर्षरत होकर प्रीत अपने जीवन में खुशहाली के पलों को आगमन का न्यौता देती है
। दोनों ने मिलकर अनाथालय से एक बच्चा गोद लेने की पहल की। शुरूआत में वही सुनने को मिला “क्लर्क बोला – अरे,आपको शर्म नहीं आती । हम आपको बच्चा गोद दे देगें। यहां
अनाथ बच्चे रहते हैं, किन्नर नहीं । अरे भाई सोच समझ कर आते लगते तो पढे-लिखे हो” अर्थात् मुख्यधारा का समाज बच्चों
को सङक पर भीख मांगने के लिए भेजने में शर्म महसूस नहीं करेगें लेकिन किन्नर के
हाथों सौपने में असहजता महसूस करते हैं। खैर बाद में प्रीत और अमन के परिवारों के
अनुरोध पर उन्हें बेटा गोद मिल गया। सांराशत् समाज में पात्र रंजना जैसे लोग किन्नरों के पैसे लेने में कतई परहेज
नहीं करेगें लेकिन उनके साथ रहन-सहन,उनका साथ कभी देने उन्हें सदैव ऐतराज
रहता।अर्थात् लेखिका ने कहानी को संघर्ष से सफलता की ओर पहुंचाने का सफल प्रयास
किया है । स्वार्थ से ऊपर उठने की सोच को विकसित करने की पुरजोर कोशिश को अपनी कलम
के माध्यम से की । रूढिवादिता की चुनी हुई दीवार को पात्र सुधा और वर्माजी ने
गिराने का काम किया। प्रीत जैसी पात्र आज भी कई मौजूद है समय के साथ उन्हें सजग
होकर बढने की आवश्यकता है वर्तमान में हम संघर्षरत किन्नरों को सफलता के शिखर
पर परिश्रम का धावा बोलते देख रहे हैं।
हाल ही में तमिलनाडू की किन्नर नर्तकी को 26 जनवरी2019 के दिन पद्मश्री से नवाजा
गया। इसी प्रकार कई सफल किन्नर है जो जज, प्रिंसीपल
,वकील, पुलिस, राजनेता, नर्तक, समाजसेविका, न्यूज एंकर इत्यादि। समाज को आत्मीयता
के साथ इन्हें अपनाने की आवश्यकता है।
अर्थात हिंदी साहित्य में कई लेखकों-शोधार्थीयों-संपादकों
की भी किन्नर-विमर्श के अस्तित्व को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही जिससे
समाज को नई दिशा अवश्य मिली और मिलती रहेगी ।
· संदर्भ ग्रंथ- 1.भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं.22
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 30
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 60
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 81
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 95
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 100
· भारती गिरिजा,अस्तित्व,उज्ज्वल
प्रेस,2017 पेज नं. 123
· बिश्नोई मिलन, किन्नर विमर्श
साहित्य और समाज, विध्या प्रकाशन
कानपुर,2018 पेज नं.202
पठनीय व ज्ञानवर्धक आलेख व साक्षात्कार बधाई मिलन
जवाब देंहटाएंमहेंद्र भीष्म
हटाएंउपेक्षित समुदाय को लेकर गम्भीरतापरक तरीके से चिंतन कर लिखा गया आलेख । हार्दिक बधाई
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