Impact factor : 3.478 साहित्य,समाज और किन्नर विशेषांक ISSN:2395-7115
Bohal Sodh Manjusha
an international Multi Disciplinary &
Mulitipe Languages Quaterly Refereed Reserch journal,page no.11-12
Bohal Sodh Manjusha
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Mulitipe Languages Quaterly Refereed Reserch journal,page no.11-12
21वीं सदी के भारत में आधुनिक सोच,
शिक्षा, नई संस्कृति-परिवेश-परम्परा व तकनीकि गतिविधियों के सहारे इंसान सफलता के
शिखर तक अपनी यात्रा पूरी कर रहा हैं। वहीं आधुनिक भारत में मां की कोख से पैदा
हुए बच्चों को घर से धक्का मार कर निकाल देते हैं। अगर कोई मां-बाप आगिंक विकृति
वाले बच्चों को अपना भी लेते है लेकिन उनके असली वजूद को कभी नहीं स्वीकार करते
नहीं करते और आस-पास के लोग भी इन्हें छक्का,
मामू, हिजङा, किन्नर, ख्वाजा,दरमियाना,मंगलमुखी इत्यादि नामों बुलाते हैं।इस
असंवेदनशील दुनिया की भीङ में ट्रांसजेंडर स्वयं को धागे से कटी हुई पतंग की तरह
महसूस करते हैं। लेकिन सरकार ने 15 अप्रेल
2014 को इनके अधिकारों की रक्षा करते हुए सकारात्मक कदम उठाया। थर्डजेंडर का दर्जा
देते हुए शिक्षा,रोजगार में आरक्षण देने का प्रावधान किया। तब से किन्नर वर्ग के
युवा संघर्ष करके अपनी अस्मिता को पहचान दिला रहे हैं। ऐसे कई थर्डजेंडर,जो समाज
का उदाहरण बनकर पिछङे वर्ग को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करके उन्हें
मुख्यधारा से जोङने की पुरजोर कोशिश कर रहे है।
जैसे लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का जन्म 13 दिसंबर 1978 को महाराष्ट्र के ठाणे
में मारुति बाई हॉस्पिटल में ब्राह्मण परिवार में हुआ । लेकिन लक्ष्मी को उनके माता-पिता ने बङे बेटे
राजू के रूप में स्वीकार किया । उन्हें पढ़ा-लिखाकर शादी करके बङे बेटे के रूप में
घर की सौंपना चाहते थे। लेकिन राजू ने यह रूप सर्वोपरि न मानते हुए अपने असली हिजङा
वजूद को स्वीकार कर लिया ।तब घरवालों ने कहा-“क्यों ऐसा बर्ताव करते हो तुम्हें
प्रॉब्लम क्या है? सब अच्छा तो चल रहा है ? पढ़ाई की है,अपने पसंदीदा क्षेत्र
में कैरियर बना रहे। डांस की तरफ ध्यान दो,अपनी खुद की जिंदगी की तरफ ध्यान दो,चाहिए
तो पैसे ले लो और नया बिजनेस शुरू करो।तुमने जो कुछ किया है,इस वजह से हम तो किसी
को मुँह दिखाने के लायक ही नहीं रहे। पर अपने बारे में सोचो सामाजिक तौर पर भी यह
अच्छा नहीं। इससे बाहर निकलो...।”पेज नं.(62)भरतनाट्यम में पोस्ट
ग्रेजुएशन करके नृत्य कला में नाम कमाया और माता-पिता भी इस क्षेत्र में साथ दे
रहे थे लेकिन ‘हिजङा’के रूप में लक्ष्मी कभी स्वीकार
नहीं था। लक्ष्मी ने दो नावों में पैर
रखकर सफलता के शिखर को पार किया। उन्होंने ने ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लिए खुलकर
काम किया।एड्स रोकथाम के लिए उनके घर-घर जाकर सेक्सवर्क करने वाले ट्रांसजेंडरों
को जागरूक करते हुए उन्हें कंडोम वितरण करती थी। शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार जोङने
जैसे महत्वपूर्ण काम किए। डांसबार में डांस करके चंद पैसे कमाने की शरूआत से
धीरे-धीरे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के तिरंगे को लक्ष्मी ने लहराया। सन् 2002
में वह दक्षिण एशिया में ट्रांसजेंडर के लिए पहली पंजीकृत और कार्यरत संगठन NGO DAI वेलफेयर सोसायटी की अध्यक्ष बनी। सन्
2008 में ‘संयुक्तराष्ट्र में एशिया पैसिफिक’ का प्रतिनिधित्व करने पहली
ट्रांसजेंडर थी। सोनी चैनल ‘दस का दम’ में प्रतिभागी बनी। 2016 में
किन्नर अखाङे की ‘महामंडलेश्वर’ अध्यक्ष बनी। इस सफलता के संदर्भ
में “मुझे प्रोग्रसिव हिजङा होना है...और
सिर्फ मैं ही नहीं अपनी पूरी कम्यूनिटी को मुझे प्रोग्रेसिव बनाना हैं।” लक्ष्मी की जीवनयात्रा दोधारी
तलवार के समान होते हो हुए भी उन्होंने चलना तय किया । लक्ष्मी का सफर समाज और देश
में बदलाव पूर्वक सिद्ध हुआ। अर्थात् ताली बजाने वाली के लिए समाज को गर्व के साथ
ताली बजाने को मजबूर होना पङा।
वर्तमान समय में सरकार एवं समाज दोनों किन्नरों की मुहिम धीरे
ही सही लेकिन हो रही हैं अब किन्नर लोगों को भी बदतमीज़ और बदसलूकी के अलावा
जिम्मेदारी के साथ समाज में कंधों से कंधे मिलाकर चलने की पहल करनी होगी। हाल ही
में 26 जनवरी 2019 को तमिलनाडू की भारतनाट्यम ‘नर्तकी नटराज’ को ‘पद्मश्री
अवार्ड’ से नवाजा गया ।यह देश में पहली बार हुआ है कि किसी
ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्य को हिन्दुस्तान का सबसे बङा चौथा अवार्ड मिला। लैंगिक विकृति के कारण बचपन में ही घर छोङना
पङा।इस संदर्भ में- “बचपन से ही नर्तकी को डांस का काफी शौक था।उनको तलाश थी एक गुरू की जो उनको
डांस सिखा सकें 1984 में उनकी तलाश पूरी हुई। उनको मिले श्रीकेपी किटप्पा पिल्लई ।
पिल्लई ने नर्तकी और शक्ति को अपने गुरूकुल में एक साल रहने की इजाज़त दे दी साथ ही उनको भरतनाट्यम भी सिखाया।सालों
की मेहनत रंग लाई ।” इस प्रकार कई ऐसे किन्नर हैं
जिन्होंने समाज से बाहर निकाला लेकिन किन्नरों ने अपने संघर्ष से करके लोगों के मुंह
पर सफलता का तमाचा लगाया।
पश्चिम बंगाल से
मानोबी बंद्दोपाध्याय कॉलेज प्रिंसिपल के पद तक पहुंचने वाली पहली ट्रांसजेंडर है।
उनकी अनुदित आत्मकथा ‘पुरूष तन में
फँसा मेरा नारी मन’ में उनके
संघर्ष की कहानी लिखी गई। मां-बाप ने एक होनहार सोमनाथ बेटे के रूप में सदैव
स्वीकार किया और गर्व से आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करते थे। लेकिन उन्हें हिजङो की
संगत में जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। मानोबी ने अन्तर्मन की आवाज को सुना और सेक्स
परिवर्तन करवा लिया। इस परिवर्तन की लङाई में संघर्षशील होकर विजयी बनी। “अपनी शर्तों पर जीवन जीने की आजादी
और जो मैं हूँ,उसी में रहने की आज़ादी। मैं अपने लिए यही आजादी और स्वीकृति चाहती
हूँ। मेरा बाहरी कठोर रूप तथा उदासीनता ऐसा कवच है जिसे मैंने अपनी संवेदनशीलता को
जीवित रखने के लिए पहनना सीखा है। आज,सौभाग्य के बल पर,मैंने ऐसी अद्भुत सफलता कर
ली है जो प्राय:
मेरे जैसे लोगों के लिए नहीं होती।
लेकिन यदि मेरा सफ़र कुछ और हुआ होता ?” इस कथन से स्पष्ट संकेत मिलते हैं क्योंकि हर किसी
ट्रांसजेंडर को घरवालों का साथ कहां मिलता उन्हें पेट की भूख मिटाने के लिए
ट्रेनों और सङकों पर भीख मांगना पङता हैं। इसके अलावा बधाई देने का काम जमानों से
कर रहे है लेकिन अब इस धंधे में समय के साथ रूझान बढ़ रहा हैं। सेक्स वर्क का काम
आजकल अधिक देखने को मिल रहा हैं तकनीकि के सहारे जैसे ‘टिन्डर’ और ‘डेल्टा’ ऐप के माध्यम से अपनी सुविधा
अनुसार बात कर सकते।इस ऐप पर LGBT कोई भी मित्रता अपने जैसे लोगों से कर सकते हैं।
राजस्थान के कुछ किन्नरों ने सचेत होकर अपने अधिकारों की
लङाई लङी और युवा किन्नरों जागरूक करके शिक्षा और रोजगार से जोङने के लिए प्रयासरत
हैं। “राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.ए और
इलाहबाद विश्वविद्यालय से संगीत में एम.ए करने वाले प्रदीप ने 2005 में तय कर लिया
की अब और नही” प्रदीप से पुष्पा बन किन्नर
समुदाय को अपने परिवार की तरह माना और इस हाशियाकृत वर्ग के लिए भोर संस्था की
शुरुआत की । राजस्थान सरकार से 2015 में ट्रांसजेंडर के मानव अधिकारों की रक्षा और
उनके कल्याण बोर्ड गठन की मांग की और सरकार ने उनकी मांग को मान लिया।
राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में गंगा कुमारी ने पढ़ाई कर
राजस्थान पुलिस भर्ती की परीक्षा में सफलता प्राप्त की । “राजस्थान के जालोर जिले की किन्नर
गंगा कुमारी का वर्ष 2014 में पुलिस पदपर
चयन हुआ पर गृह विभाग द्वारा उनका नियुक्ति–पत्र इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि
वह किन्नर हैं।”
जिसके विरोध में गंगा कुमारी लम्बी
न्यायिक संघर्षशील लङाई लङी। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा याचिका स्वीकार करते
हुए नियुक्ति-पत्र देने का आदेश दिया। राजस्थान में गंगा पहली किन्नर पुलिस बनी ।
यह फैसला समाज एवं सरकार में बदलाव पूर्वक सिद्ध होगा। आज ऐसे कई नाम है जिन्होंने
वास्तविक संघर्ष की लङाई में सफल हुए । जैसे- शबनम मौसी, पायल सिंह, मंहत मनीषा,मीरा,धन्ञजय
चौहान आदि।
संन्दर्भ ग्रंथ-
1.
मैं हिजङा...मैं लक्ष्मी में किन्नर विमर्श, बिश्नोई मिलन,
विद्या प्रकाशन,
2.
पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन, बंद्योपाध्याय
मानोबी,अनुवाद-रचना भोला ‘यामिनी’,राजपाल
3.
किन्नर विमर्श साहित्य और समाज,सं. बिश्नोई मिलन, विद्या
प्रकाशन
.
मिलन जी किन्नर समाज को लेकर आपकी समझ और लेखन कौशल हमेशा प्रभावित करता रहा है । यह एक ऐसा विषय है जिसके संबंध में अभी समाज के नज़रिए में बदलाव आना बाकी है । कानून पारित कर दिए जाने भर से ही किन्नर को यह समाज एक मनुष्य के तौर पर नहीं अपना पा रहा है, जब तक उन्हें स्त्री एवं पुरुष की भांति ही मनुष्य होने के नाते सम्मान नहीं मिलता है तब तक हमें(जो साहित्य और समाज से जुड़े हुए हैं) इस दिशा में प्रयास करते रहना है ।संक्षिप्त किन्तु महत्त्वपूर्ण जानकारियों से भरपूर लेख के लिए बधाई आपको 💐💐💐💐
जवाब देंहटाएंआप इसी तरह आगे बढ़ती रहें इस मंगल कामना सहित पुनः बधाई💐💐💐💐