भारतीय साहित्य और समाज में किन्नरों के
बढ़ते कदम
भारत पुरूष प्रधान समाज रहा हैं और पुरुषों ने अपनी सत्ता
को बरकरार रखने के लिए धार्मिक और राजनैतिक चाल चलकर सामाजिक स्तर पर सर्वोच्चता
हासिल कर ली । समाज में महिलाओं की स्थिति अतिदयनीय रही उन्हें सिर्फ मंनोरजन का
साधन समझा गया। सदियों से महिलाएं शोषित होती रही और पुरुष सत्ता बेबाक होकर शोषण
करती रही। लेकिन वक्त के साथ जागरुक होकर महिलाओं ने अपनी अस्मिता को पहचान करके
अपने वजूद को बनाए रखने के लिए संघर्षशील होकर लम्बी लड़ाई लड़ी और आज संघर्ष से
शिखर तक का सफर तय कर रही हैं। इसी प्रकार भारतीय समाज में किन्नरों की स्थिति का
जिक्र करने से पूर्व आँखों के सामने कमर मटकाते हुए चटकदार वस्त्रों के साथ
खुरदरें चहेरे पर जरूरत से कहीं अधिक मेकअप में बेबाक हंसी के पीछे दर्द छुपाए हुए
दरियादिली इंसान का चेहरा नजर आता है। यह इंसान सामान्य मां की कोख से पैदा हुआ
लेकिन मां की कोख से बाहर आते ही उसे दुनिया में उपहास का पात्र बनना पङता है। भारतीय
समाज और साहित्य में किन्नरों की स्थिति अति दयनीय है। उन्हें
घृणामयी,अचम्भित,आश्चर्यचकित दृष्टि से देखा जाता है।
किन्नरों
का सामाजिक स्तर पर जीवन अत्यंत पिछड़ा हुआ हैं। इनको अपनी आजीविका चलाने के लिए
भीख मांगने के साथ-साथ सेक्स वर्क का काम करके गुजारा करना पड़ता हैं। अधिकांश
किन्नर ट्रेन और सिंग्नल पर भीख मांगने व घरों में शुभकार्य पर बधाई देने का काम
वर्षों से करते आ रहे है। परन्तु वर्तमान समय में बधाई के कार्य में काफी रूझान
दिखाई दे रहा है । क्योंकि लोग आधुनिक होते जा रहे है पुरानी परम्पराओं के प्रति
इतना लगाव नहीं रख रहे। दुसरी तरफ पुत्र प्राप्ति या विवाह के अवसर पर किन्नरों
द्वारा नेग में अधिक राशि की मांग करना । यह लोग कभी-कभी अपनी पसन्द की नेग राशि
बधाई में लेने के लिए भीड़ जाते हैं,तब लोग इनकी हरकतों से परेशान होकर इनके साथ
मार-पिटाई करते हैं।किन्नर लोग असभ्य हरकतें क्यों करते है इसका कारण जानने का कोई
प्रयास किए बिना ही मार-पीट करने में देर नहीं करते। ईश्वर ने इनकी देह संरचना को
गढ़ते समय अधुरापन रखा जिससे यह समाज में शोषित और दण्डित जीवनयापन कर
रहे हैं।
किन्नर जिस
घर में जन्म लेता उसे समाज कलंकित मानता है उस बच्चे के मां-बाप स्वयं लैंगिक
विकृति वाले को सामान्य औलाद न समझते हुए उसे कलंक मानते है।उस बालक को अपने घर
में रखना उचित नहीं मानते है वे कुड़े-कचरे में फेंक देते या किन्नरों के हाथ सौंप
देते हैं। जो जीवन भर सभ्य मानी जाने वाली समाज से धक्का और धिक्कार सहने को मजबूर
हो जाते। लेकिन भारतीय समाज की विडम्बना रही है कि वे दोहरा जीवन जीते है एक तरफ जीव
मात्र की रक्षा करना मानव धर्म मानते है। खासकर मैं धार्मिक दृष्टिकोण से बात करना चाहती हूँ कि भारत
में नारी को देवी मानते वहीं समाज भ्रूण हत्या,अत्याचार,शोषण,दहेज प्रताड़ना के
केस में हमेशा मारने-जलाने की घटना सुनने और पढ़ने को मिलती है। ऐसे ही हाशिए की
चौखट पर खड़े किन्नर समुदाय की है। पौराणिक काल में महाभारत में किन्नरों का
उल्लेख किए बिना अपनी बात पूरी नहीं कर सकते। वहां दैवीय शक्ति के रूप में माना
गया। जिसमें शिखण्डी, बृहन्नला, कृष्ण का मोहिनी रूप आदि उदाहरण देखने को मिलते
हैं। महाभारत के अलावा रामायण, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्र में किन्नर जीवन
दिखाई देता है।
21 वीं सदी
के साहित्य में किन्नर समाज की दशा और दिशाओं पर साहित्यकारों का ध्यान काफी
लम्बें समय बाद गया फिर भी इन दिनों साहित्यकार किन्नरों की सामाजिक,आर्थिक और
राजनैतिक स्तर की समस्याओं को उजागर कर रहे हैं। 2014 में कानूनी रूप किन्नर
समुदाय को थर्डजेंडर का दर्जा मिलने के साथ-साथ इनकी स्थिति में सुधार की संभावना
बढ़ रही है। कड़वा सच तो यह भी है कि किन्नर रूप में औलाद को नहीं स्वीकार करते
है।बल्कि वे बेटे रूप में जरूनंर अपनाते है। लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी हिजड़ा रूप
स्वीकार करती है लेकिन उसके माता-पिता कभी स्वीकार नहीं करते।लक्ष्मी को राजू के
रूप में पढ़ाया-लिखाया । जब हिजड़ा कम्यूनिटी का हिस्सा बनकर आंदोलनों में सक्रिय
रूप से किन्नर समाज का साथ देने लगी तब उनके माँ-बाप की पहली प्रतिक्रिया थी-“अपनी चौदह पीढियों में ऐसा किसी ने नहीं किया
होगा । हमारा खानदान ब्राह्मण का है...उसके मान-सम्मान के बारे में तो कम से कम
सोचना चाहिए था। तुम्हारी बहन की शादी हो गयी है।....................क्यों ऐसा
बर्ताव करते हो तुम ? तुम्हें क्या प्रॉब्लम है? सब अच्छा तो चल रहा है? पढ़ाई की है,अपने पसंदीदा
क्षेत्र में, डांस में कैरियर बना रहे हो। डांस की तरफ ध्यान दो । चाहिए तो पैसे
ले लो और नया बिजनेस शुरुश करो । तुमने जो कुछ किया है, इस वजह से मुँह दिखाने लायक
नहीं रहे। पर अपने बारे में सोचो, सामाजिक तौर पर भी यह अच्छा नहीं । इसमें से
बाहर निकलो।”(मैं हिजड़ा...मैं लक्ष्मी 54) उपरोक्त कथन के
अनुसार लक्ष्मी के माता-पिता जैसे बाकि किन्नरों के सौभाग्य में नहीं है। उन्हें
घर से निकालने के पश्चात वे नाच-गान,बधाई दुआ देकर, सेक्स वर्क करके अपना गुजारा
करते है। अपनी कमाई का हिस्सा गुरू को भी देते है क्योंकि हिजड़ो को मां-बाप का
प्यार गुरू के द्वारा ही मिलता हैं। इसी प्रकार लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा
में किन्नर जीवन से जुङे सभी पहलुओं से संवेदनात्मक रूप से समाज को जोङने का
प्रयास करती है।
हिन्दी साहित्य में एक और अनुदित आत्मकथा ‘पुरूष तन में फंसा मेरा नारी मन’ मानोबी बदोपध्याय ने अपने जीवन की दर्दनाक घटनाओं को पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। सोमनाथ से
मानोबी का संघर्ष शोषण के काँटो से भरा हुआ था। लेकिन माता-पिता के साथ से उच्च
शिक्षा प्राप्त करके अपने अधिकारों का सदुपयोग किया। मानोबी ने इतिहास में अपना
नाम पहली ट्रांसजेंडर बंदोपध्याय प्रिंसीपल
के रूप में दर्ज करवाया। आज भारत भर के ट्रांसजेंडरो की रोल मॉडल के रूप में जानी
जाती है। आत्मकथाओं के अलावा कथा साहित्य कहानी और उपन्यास लिखे गये है जिनमें आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक,
मनोवैज्ञानिक,शैक्षणिक स्तर पर किन्नरों की समस्या और संघर्ष को पात्रों के माध्यम
साहित्य में चित्रांकन और शब्दाकंन किया
हैं। कथासाहित्य में लगभग 11 उपन्यास और 85
से अधिक कहांनियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन सभी रचनाओं में किन्नर वर्ग सामान्य
समाज के पितृसत्तात्मक सत्ता से उपेक्षित,शोषित औऱ जलील होते दिखाया गया है।
वर्तमान समय में भारत के विभिन्न विश्वविधद्यालयों में किन्नर विमर्श पर शोध कराया
जा रहा है। हिन्दी साहित्य में यह विमर्श नीरजा माधव कृत उपन्यास ‘यमदीप’ से शुरूआत मानी जाती है। इस उपन्यास में किन्नरों के आतंरिक और बाह्य जीवन
का यथार्थपरक विश्लेषण किया है।किन्नरों की भाषा एवं रीति-रिवाज के बारें में भी
लिखा गया। ‘मैं भी औरत हूँ’ डॉ अनसूया
त्यागी कृत उपन्यास के कथानक के केन्द्र में मंजुला और रोशनी है। उपन्यास की
नायिका के माध्यम से लेखिका संदेश देना चाहती है कि लैंगिक कमियों के कारण कुंठित रहने की किन्नरों
को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया जाए। कथाकार महेन्द्र भीष्म कृत दो उपन्यास ‘किन्नर कथा’ और ‘मैं पायल’ पाठकों को यर्थाथपरक घटना से जोड़कर रखता है। राजपुत घराने में सोना का
जन्म किन्नर के रुप में होता है लेकिन महाराजा को जिस दिन पता चलता है कि सोना
किन्नर है तब अपने सैनिक के हाथों मारने को सौंप दिया जाता है, लेकिन सोना की मासूमियत पंचमसिंह का दिल पिघाल देती
है। पंचमसिंह सोना को किन्नर गुरू सोना के हाथ सौंप देते है । ‘मैं पायल’ जीवनीपरक उपन्यास है जो पायल के जीवन
संघर्ष आधारित लिखा गया है। हाल ही में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत उपन्यास ‘नाला सोपारा पो. बॉक्स नं.203’उपन्यास पत्रात्मक
शैली में लिखा गया है। जिसमें किन्नर बेटे और मां के बीच संवाद को बताया गया।
जिन्दगी 50-50, गुलाममंडी, आधा आदमी, तीसरी ताली उपन्यास भी किन्नर जीवन की
समस्याओं के आधारित लिखे गये है।
मिलन बिश्नोई
स्वतंन्त्र लेखन/शोधार्थी
हिंदी विभाग
तमिलनाडू केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरूवारूर
ई-मेल milanbishnoi@gmail.com
Mob. 638056864
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