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पर्यावरण
प्रेमी अध्यक्ष देवेन्द्र बिश्नोई की संकल्प यात्रा:
भारत
की प्रसिद्ध संकल्प यात्राएँ
भारतीय सनातन धर्म,
इतिहास और राजनीति में पदयात्राओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । ऐतिहासिक
परिदृश्य में यदि पद यात्राओं को देखा जाए तो सत्ता पलटने में कारगार सिद्ध हुई है
। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की औपनिवेशिक सत्ता का तख्त़
पलटने में गांधी जी दांडी मार्च का अहम योगदान माना जाता है । इस आंदोलन के माध्यम
महात्मा गांधी ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का परिचय कराया । 1930 को लॉर्ड इरविन
को पत्र में लिखते हैं-“राजनीतिक दृष्टि से हमारी स्थिति
गुलामों से अच्छी नहीं है, हमारी संस्कृति की जड़ ही खोखली कर दी गई है। हमारा
हथियार छीनकर हमारा सारा पौरुष अपहरण कर लिया है ।” इस
प्रकार गाँधीजी का कार्यक्रम 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी मार्च
प्रारंभ हुआ । ठीक साढ़े छः बजे अपने 79 अनुयायियों के साथ आश्रम छोड़ा और मार्च
यात्रा आरंभ करते हैं। दांडी तक की 241 मील की दूरी उन्होंने 24 दिन तक की पूरी की ।इस दौरान गांधी जी
जहां-जहां विश्राम किया वहां जनसमुदाय को संबोधित करते थे । अतः इस दांडी यात्रा
से गांधीजी ने अंग्रेजों की जड़े हिला दी थी ।
हमारे भारतीय इतिहास में राजनैतिक, सामाजिक,
धार्मिक संकल्प यात्राएं की गई है । इन यात्राओं में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक
सुधार हेतु संकल्प लिए जाते हैं । 1982 में एनटी रामाराव की ‘चैतन्य रथम यात्रा’, 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की ‘राम रथयात्रा’, 2004 वाईएस राजशेखर रेड्डी की ‘पैदलयात्रा’, 2017 में जगनमोहन रेड्डी की ‘प्रजा संकल्प यात्रा’ और 2023 में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ये सभी चर्चित यात्राएं मानी
जाती है ।
बिश्नोई
समाज में संकल्प यात्रा
“मेरे खून का
एक-एक कतरा युवाओं के लिए हैं”- अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा
अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी बुड़िया
हाल ही में अखिल भारतीय
बिश्नोई महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवेन्द्र बुड़िया ने समाज को एकता के सूत्र
में बाँधने के लिए संकल्प यात्रा की शुरुआत की है । वे 30 मार्च 2023 को अखिल
भारतीय बिश्नोई महासभा से एक नोटिस जारी करते हुए लिखते हैं “मैं इस सर्वजनाय कल्याण भावना के संकल्प में पवित्र धाम जाम्भा पीठ के
दर्शन यात्रा पर निकल रहा हूँ । ताकि हम समाज के युवाओं में एक संदेश दे सके कि तीर्थ
धाम, परमार्थ यात्रा आदर्श जीवन का दिव्य रूप है । इसी संकल्प में मैं सुबह
मथानिया बाईपास रेलवे क्रॉसिंग माणकलाव जोधपुर से पैदल यात्रा शुरू करके जाम्भालाव
धाम तक यात्रा करूंगा। ” अर्थात् वे दूसरे दिन ‘चलो जाम्भाधाम’ के नारे के साथ अपने सहयोगी श्रीमान
पतराम बिश्नोई, कल्पेश बिश्नोई और कुछ युवाओं के साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं ।
संकल्प
यात्रा और परिणाम
इस यात्रा के माध्यम से
कई परिणाम सकारात्मक दिखाई दे रहे हैं । जिसमें खासकर युवा पीढ़ी और बड़े
-बुजुर्गों का अपार प्रेम । जो अकल्पनीय, अविश्वसनीय, अदृश्यवान था । यात्रा में
अपार प्रेम मिलने का कारण यह भी है कि अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी ने बारम्बार
समाजोत्थान के लिए सदैव सराहनीय प्रयास किए है । वे पहले अध्यक्ष होंगे जिनके हर
कदम में समाज का साहित्य, संस्कार, शिक्षा को वैश्विक परिदृश्य में पहचान दिलाने
की कोशिश नज़र आती है । हमारे पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज को शिक्षा, साहित्य,
वाणिज्य, व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में शीर्षस्थ स्थानों नैरन्तर्य प्रयासरत
होने के कारण ही जनता उनके साथ नजर आती है। समाज की युवा टोली और बड़े-बुजुर्ग देवेंद्र जी
की पैदल संकल्प यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे । सूरज ढ़लने के साथ-साथ
संध्या के समय उनकी तबीयत खराब हो जाती है । तब ऐसा मन में संशय जरूर हुआ कि
यात्रा कहीं अधूरी नहीं रह जाएगी ? डॉक्टरों ने भी
उन्हें संकल्प यात्रा करने की अनुमति नहीं दी किंतु उन्होंने अपनी हठधर्मिता के
आगे किसी की नहीं सुनी । शायद ईश्वरीय ताकत ही थी कि राजस्थान की इस धुप और गर्मी
में वे निरन्तर अपने बिश्नोई बंधुओं के साथ संकल्प सिद्धि की ओर चलते रहे । इस
यात्रा में प्रतिदिन युवाओं और बुजुर्गों तथा महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी देखने
को मिली । संभवतः संकल्प यात्रा की शुरूआत से पहले तो अध्यक्ष साहब को भी विश्वास
नहीं हुआ होगा कि जनता उनसे इतना अपार और अथाह प्रेम करती है । किंतु रास्ते में
गुरु महाराज जम्भेश्वर के भजनों के साथ नाचते-झूमते युवा और बुजुर्ग उन्हें अहसास
ही करवा रहे थे कि हमें आप जैसे अध्यक्ष ही पसंद है । लेकिन जितना हमने सोशल
मीडिया के माध्यम से इस यात्रा के दौरान अध्यक्ष को देखा तो उनमें कोई वैर-विरोध
और आक्रोश की भावना दिखायी नहीं दी । वे अपनी धीरता और गंभीरता के साथ
संगी-साथियों के साथ सकारात्मक भाव और गुरु महाराज के विश्वास पर आगे बढ़ रहे थे ।
अर्थात् कह सकते है ‘यह संकल्प यात्रा उम्मीदों और
विश्वासों, दृढ़ संकल्पों और समाज के प्रति ईमानदारी और निष्ठावान बने रहने की थी
।’ यानि ‘यह यात्रा युवा पीढ़ी
के विश्वास और उम्मीद और प्रगतिशीलता की प्रतीक के रूप में साबित हुई है ।’ यात्रा के आरम्भ में जम्भसार मीडिया के बीराराम जी ने श्री देवेन्द्र जी
से सवाल किया गया था- इस यात्रा को करने के पीछे कौनसे संकल्प छुपे हैं ? तब देवेंद्रजी बताते है कि यह यात्रा सामाजिक एकता और नशे की प्रवृत्ति
से समाज को मुक्त रखने तथा समाज के प्रति कल्याण की भावना तथा साधु-संतों के चरणों
में जाने और सोशलमीडिया पर फैलाई गई अफवाह को दूर करने की यात्रा है । उन्होंने यह
भी बताया कि वर्तमान समय आधुनिकता की करवट ले रहा है,अभी रूढ़िवादिता के पथ पर आगे
बढ़ना असंभव है ।
संकल्प
यात्रा के दौरान सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष
सकारात्मक परिणाम और
सामाजिक बदलाव लाने के दृष्टिकोण से ही संकल्प यात्रा शुरुआत की जाती है ।
लोकतांत्रिक देश में किसी के प्रति स्वतंत्र विचार रखने की आजादी भी है । इस आजादी
को बरकरार रखते हुए या कहें बौद्धिक कुशाग्रता से इन्होंने सोशल मीडिया का सहारा
लिया । वहां सकारात्मक और नकारात्मक कमेंट के लिए स्वीकार्यता थी । यदि उन कमेंट्स
के माध्यम से लेखा-जोखा किया जाए तो अधिकांश जनता ने अध्यक्ष की समाज के प्रति
लग्न और उनके द्वारा किए जाने वाले समस्त सहयोग और कार्यों को सराहनीय माना है ।
जनता सदैव उनके साथ रहने का वादा भी करती दिखाई दी । यह विश्वास केवल और केवल उनके
द्वारा अपनी सच्ची निष्ठा और ईमानदारी और सेवाभाव के कारण इन्हें प्राप्त हुआ ।
वहीं उन्होंने संत समाज के आक्रोश और शंका को मीडिया के माध्यम से स्पष्ट भी किया
था कि उन्होंने कहा कि संतो के लिए कभी निम्नस्तर के शब्द इस्तेमाल नहीं किया ।
फिर भी कहा ‘आटा खानी जबान से कुछ शब्द ऐसे निकले तो माफी
मांगने में कोई हर्ज नहीं है ।’ इस विनम्र व्यववहार में उदारता और सौम्यता तथा सम्मान के भाव स्पष्ट दिखायी
देता हैं ।
तीन दिन तो जगह-जगह से
यात्रा में लोग जुड़े ही थे । किंतु चौथे दिन की संध्या में संपूर्ण राजस्थान सहित
अन्य प्रांतों के भारी संख्या में बिश्नोई समाज को लोग स्व-इच्छा से अध्यक्ष का
समर्थन करने आए वह सबसे अधिक रोचक था । संध्या के समय बिश्नोई समाज के सम्मानित और
परम पूज्य भागीरथ दासजी आचार्य स्वयं उन्हें आशीर्वाद देते हुए जाम्भा में उनका
स्वागत कर रहे थे वहीं जनता को सबसे अधिक भरोसा दिलाने वाला क्षण था । आदरणीय महंत
भगवानदास, आचार्य कृपाचार्य, संत राजूराम महाराज इत्यादि संतगण उन्हें आशीर्वाद दे
रहे थे और रात्रि जागरण करने के साथ समाज
को एकता के सूत्र में बनाएं रखने का संदेश भी दिया । आचार्य भागीरथ दास जी ने श्री
देवेंद्र जी के व्यक्तित्व की सराहना भी मीडिया के सामने की । यह संतो का संदेश और
आशीर्वाद इस यात्रा की सफलता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था । अतः समाज के समस्त लोगों
को आचार्य भागीरथदास के कथनों से प्रेरणा लेनी चाहिए ।
वहीं हमने संतों को सदैव अपना आदर्श और सर्वोपरि
माना है । यदि संत सामाजिक मंच पर अभद्रता के साथ असभ्य भाषा इस्तेमाल करें तो वास्तव
में पढ़ा-लिखा और सजग व्यक्ति शायद ही कोई आने वाले समय में ऐसे संत-महात्मा पर
भरोसा करेगा । संतो को गुरु परम्परा और हमारी सनातनी संस्कृति में कहीं ऐसी वाणी
का इस्तेमाल करने इजाजत नहीं देती है । क्या संत लालदास जी समाज में आदर्श बनने के लिए कहीं
सनातनी मर्यादा को पार नहीं कर रहे थे ? वे गर्मजोशी
भाषण के माध्यम से ईर्ष्या भाव प्रकट कर रहे थे । जनता सोशल मीडिया के माध्यम से
उनके भाषण का विरोध भी कर रही थी । उनके भाषण से ही उनकी अज्ञानता और संस्कारविहिन
धारणा दिखायी दे रही थी। एक तरफ विश्नोई धर्म और नियम तथा कानून कायदों की बात कर
रहे थे वहीं फूहड़ भाषा में तुच्छ(नावटियां) शब्दों का बार-बार प्रयोग भी कर रहे
थे। जब वे अपना भाषण दे रहे थे तब श्री फगलू राम जी गलत शब्दों का प्रयोग करने से
भी रोक भी रहे थे । जब संत लालदास गुरु जम्भेश्वर के 29 नियमों की बात कर रहे है
तब वे क्यों भूल जाते हैं? गुरुदेव जम्भेश्वर महाराज ने उनके
अनुयायियों को अपनी वाणी का संयमित और सहज ढ़ग से प्रयोग करने का उपदेश दिया है।
अध्यक्ष श्री देवेंद्र
बुङिया की चार दिवसीय यात्रा शांति, अहिंसा और प्रेम व विश्वास की यात्रा थी। उनकी
यात्रा में कहीं रोष प्रकट करते हुए कोई नहीं दिखायी दिया । मीडिया उनसे तरह-तरह
के सवाल पूछ रही थी तब उनके संबोधन में केवल शिक्षा और सामाजिक विकास के बारे में ही
सुनने को मिल रहा था । दिन भर की थकान के पश्चात रात्रि विश्राम और जागरण में आम
गायक और गायणों के द्वारा जागरण करवाना समाजहितैषी कार्य था । आजकल ग्रामीण इलाकों
में जागरण और चल्लू-पाहल के कार्य में काफी उदासीनता दिखाई देने लगी है । अमीर लोग
जागरण में बड़े-बड़े साधु और गायक कलाकारों को आमंत्रित करते हैं किंतु पहले
प्रत्येक गांव-ढ़ाणी में गायणे चल्लु-पाहल करते थे । आज भी समाज को पुनः स्मरण
करने की आवश्यकता भी महसूस हुई है।
यात्रा के दौरान सवाल
अंतरजातीय विवाह से संबंधित भी किया गया था ।उन्होंने बताया अंतरजातीय विवाह
स्वीकार्य नहीं है तो एक सिस्टम के तहत् वे अपनी राय रख सकते थे । सोशल मीडिया का
सहारा लेने की बजाय चार बड़े लोग उनसे सीधे बात कर
सकते थे । किंतु व्यापक स्तर पर देखा जाए तो आज 21 वीं सदी का दौर चल रहा है ।
हमें व्यापक दृष्टिकोण से भी सोचने की आवश्यकता है । आज केवल बिश्नोई ही नहीं बल्कि
अन्य समाज के माता-पिता भी अंतरजातीय विवाह को स्वीकृती प्रदान नहीं करते किंतु
कुछ शहरी युवा पीढ़ी इन सब बातों को मान रही है? क्योंकि
जो अच्छी स्कूल और शिक्षण संस्थानों या विदेशी शिक्षण संस्थानों, हॉस्टलों
पले-बढ़े और पढ़े है उन्होंने वहाँ कभी जातिवाद का माहौल नहीं देखा । वैसे देखा
जाए तो उस माहौल में जातिवाद का विरोध करना सिखाया जाता है। केंद्रीय शिक्षण
संस्थानों में सर्वप्रथम हमारे संविधान को ध्यान में रखते हुए पढ़ाया जाता है ।
ऐसे परिवेश में रहते हुए वहां जाति से अधिक राष्ट्रीयता की भावना जागृत करना
सिखाया जाता है । दूसरा मुख्य कारण यह भी है कि हमारे प्रांत और जाति के लोग
सहपाठी भी न के बराबर होते हैं ।वहां इंसान अपनी प्रतिभा और शिक्षा के बल पर आगे
बढ़ रहा है । और जब वह पढ़ाई करके अपना करियर बना लेता है तब अपनी पसंद की शादी
करने की सोचता है । ऐसा परिणाम हाल ही में हमें देखने को मिला है । यह कटु सत्य है
कि आज कल मां-बाप का ठोर अपनी संतान पर चलता नहीं है । चाहे समाज विरोध करें या कोई
और ...मैंने स्वयं समाज के ऐसे माँ-बाप को देखा जिन्होंने अपने बेटे के अंतरजातीय
विवाह का विरोध भी किया उनके बेटों ने लौटकर भी माँ-बाप का मुँह तक नहीं देखा ।
आज संवैधानिक दृष्टि से भी जातिवाद के आधार पर
भेदभाव कानूनी अपराध माना जाता है। वहीं यदि हमारे बिश्नोई समाज के पंथ निर्माण की
अवधारणा देखी जाए तो गुरुदेव ने समस्त जातियों का आदर किया है । जब हम जांभाणी
साहित्य पढ़ते हैं तब भी उसमें जातिवाद का भेदभाव तो कहीं दिखाई नहीं देता । किंतु
सच्चाई यह भी है कि हम जातिवाद का पुरजोर समर्थन भी कर रहे हैं । मुझे आज भी याद
है हमारी स्कूलों में भील-मेघवाल के छात्रों को मटके में से पानी नहीं पीने दिया
जाता था तो ऐसे सामाजिक भेदभाव हमें शैक्षणिक स्तर पर खत्म करने की आवश्यकता है।
आज जब हम मानवाधिकार और वन्यजीव रक्षा की बात करते हैं तो मानवीय जाति का भेदभाव
करना कहाँ उचित होगा ? हमने विश्व स्तर पर
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी करके सफलता प्राप्त की है तो ऐसे सामाजिक भेदभावों के
खिलाफ भी हमें आवाज उठाने की आवश्यकता है ।
बिश्नोई का अर्थ यह तो
कतई नहीं है कि केवल बिश्नोई समाज में पैदा होने से ही बिश्नोई होगा । जो कुछ लोग व्याभिचार,नशा,चोरी और अपराध की प्रवृत्तियों में लिप्त है क्या उन्हें समाज
बिश्नोई कहना चाहिए ? संत-महात्मा और समाज के बड़े लोगों के ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता है । और यदि कोई गुरु जम्भेश्वर
महाराज की शिक्षा और संस्कार से प्रभावित होकर वह गुरुदेव का अनुयायी बनना चाहें
तो उनका हमें सदैव आदर करना चाहिए । यदि समाज के लोग असमर्थता प्रकट करते है तो मुझे नहीं लगता ऐसा
करने से हम समाज का उद्धार कर रहे हैं । एक तरफ केंद्र सरकार हिंदूओं के लिए घर
वापसी के रास्ते खोल रही है । राजस्थान सरकार अंतरजातीय विवाह के लिए 10 लाख की
योजना चला रही है । ऐसे माहौल में यदि हम अत्यधिक कट्टर होते जाएं और जातिवाद का
समर्थन करते रहेंगे तो सामाजिक और राजनैतिक दोनों दृष्टिकोण से नुकसानदेही होगा । आज
समाज को शिक्षा, राजनीति, व्यापार, कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, सिनेमा, उद्योग धंधों
के प्रति सोचने और युवाओं को अधिक से अधिक बिश्नोई समाज की संवेदना और पर्यावरण
प्रेम की शिक्षाओं के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की
आवश्यकता है । तुच्छ राजनीति और आपसी स्वार्थ भाव से समाज को गुमराह करने की बजाय
समाज को संगठित होकर समाज में नशा प्रवृत्ति और चोरी-डकैती जैसी प्रवृत्तियों के
खिलाफ लड़ने की आवश्यकता है । समाज को विकसित और सुदृढ़ कैसे बनाएं इस विषय पर
संत-महात्माओं और प्रबुद्ध समाज सेवकों को सोचने की आवश्यकता है ।
सामाजिक मंचों पर बोलने
वाले संत-महात्माओं और समाज सेवकों को आज पूरा देश सोशल मीडिया के माध्यम से सुनता
है और देखता भी है । यदि वे आक्रोशित, अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहें हैं जो
निंदनीय है ।
आजकल अमर्यादित भाषा और
अमर्यादित शब्द चयन को लेकर संसद भी कई बार कारवाई हुई हैं । हाल ही में राहुल गांधी के द्वारा
इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों का परिणाम उन्हें भोगना ही पड़ा । नेता और संत समाज
के सर्वोच्च सत्ता में विराजमान होते है यदि वे ही अपने प्रवचनों में ईर्ष्या भाव
की आग उगलेगें तो हम सामान्य इंसान से क्या उम्मीद रखेंगे ?
एक तरफ अखिल भारतीय
बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष का विरोध भी केवल ‘तथाकथित’ शब्द के प्रयोग को लेकर ही हुआ था । तो फिर इन्हें किसने सर्वाधिकार दिया? ऐसे भाषणबाजी से केवल आपसी राजनीति और स्वार्थपरक भावना ही दिखायी देती
है ।
संकल्प
यात्रा और अध्यक्ष से प्रेरणा
श्री देवेंद्र जी एक
ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े और अत्यधिक पढ़े-लिखे भी नहीं है । दूध की डेयरी
चलाने से लेकर ट्रक चलाने के काम किया। और आज बहुत बड़े उद्यमी के रूप में अपनी
पहचान स्थापित की है और वर्तमान में अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा अध्यक्ष है । वे
अपने भाषण में बार-बार कहते हैं कि जैसे मेरी किस्मत ने पलटी मारी वैसी शायद हर
किसी की किस्मत नहीं चमक सकती इसलिए शिक्षा के प्रति अधिक ध्यान दें । वे अपने आप
को सौभाग्यशाली मानते है कि उन्हें समाज के बड़े लोगों का आशीर्वाद सदैव मिला । आज
अपने अध्यक्ष पद पर स्थापित होने का श्रेय सदैव चौ. बिश्नोई रतन कुलदीप जी को देते
हैं । अर्थात् उनकी समाज के प्रति और जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाने में सहयोग किया
उनके अहसान को कभी नहीं भूलें । यह उनकी विनम्रता और कर्त्तव्य निष्ठता तथा
ईमानदारी ही संकल्प यात्रा की सफलता का कारण बनी है। वे शिक्षा को लेकर और समाज के संस्कार को लेकर अधिक सजग है ।
हमारे अखिल भारतीय
बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष को समाज को पहली बार प्रत्येक युवा,बड़े-बुजुर्ग सम्मान
भाव से देखते हैं । अध्यक्ष पद पर आने के पश्चात उन्होंने अनेक सराहनीय काम किए
हैं जिनमें दुबई में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शिखर सम्मेलन की परिकल्पना शायद ही
कोई अध्यक्ष कर पाया हो । हमारे समाज में युवा तो देश-विदेशों में काम-काज और
रोजगार के लिए अवश्य ही गये है और जाएंगे भी । किंतु साढ़े-पाँच सौ लोगों को एक
साथ दुबई में समाज को एकता के सूत्र में बांधकर सम्मेलन में आमंत्रित करने कोई साहस
कर पाया होगा? हमारे बिश्नोई समाज के बड़े-बुजुर्गों और
महिलाओं को एक साथ विदेश यात्रा करवाने का सफल काम किया । और यह जानकर बड़ा गर्व
होगा कि बिश्नोई समाज का ही नहीं बल्कि भारत की तरफ से पहला पर्यावरण शिखर सम्मेलन
जिसमें किसान,संत-महात्मा, साहित्यकार, अभिनेता, शोधार्थी, प्रोफेसर,दुकानदार, व्यवसायी,
उद्योगपति,व्यापारी,शिक्षक, पटवारी, राजनेता,आईपीएस. वकील, पुलिस यानि सभी को
एकता के सूत्र में बाँधकर बिश्नोई समाज और भारत का प्रतिनिधित्व विश्वस्तर पर करने
का सफल प्रयास हिम्मत और साहस केवल देवेंद्र बुड़िया अपने संरक्षक चौ. बिश्नोई
रत्न श्री कुलदीप जी के साथ मिलकर पाएँ हैं । उन्होंने अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा,
जाम्भाणी साहित्य अकादमी बीकानेर, गुरु जम्भेश्वर पर्यावरण शोधपीठ जय नारायण व्यास
विश्वविद्यालय को साथ लेकर चलने का काम किया है इसे समाज ने सराहनीय माना । स्पष्ट
है ऐसा रणनीतिपूर्वक कार्यक्रम कभी भारत सरकार भी नहीं कर पायी किंतु प्रत्येक
बिश्नोई से जुड़ने का प्रयास देवेंद्र जी ने लाइव आकर किया तथा समाज को मानसिक रूप से तैयार किया इसलिए
समाज स्वयं के खर्च से उनके साथ चलने को तैयार हो गई।
बिश्नोई समाज में
अध्यक्ष तो कई बनें होगें किंतु आज तक ऐसा अकल्पनीय काम कोई नहीं कर पाया है ।
देवेंद्र जी से प्रेरणा युवावर्ग को लेने की आवश्यकता है । आज राजनीति, शिक्षा,
चिकित्सा तथा व्यवसाय के हर क्षेत्र में युवा अपनी अस्मिता प्राप्त कर चुके है किंतु
उनकी तरह समाज को साथ लेकर एक-दूसरे के सहयोगी बनने और सार्वजनिक मंचों पर
राजनेताओं तथा उग्योगपतियों से बिश्नोई युवा वर्ग के लिए नौकरी, व्यवसाय तथा रोजगार
के लिए किसी आह्वान करना व निवेदन करने का काम बहुत कम लोग कर पाएँ है। वे जहाँ भी
जाते है अपने माँ अमृता देवी और गुरु देव जम्भेश्वर की नियमावली सुनाकर सामने
वालों को बिश्नोई समाज की परिभाषा देते हैं यह हमें उनसे सिखने की आवश्यकता है ।
उन्होंने अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के संरक्षक चौ. कुलदीप जी बिश्नोई के मार्गदर्शन
में सराहनीय कार्य किया है इसलिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति उन्हें मान-सम्मान दे
रहें है । जैसा कि हम सब जानते है गुरुदेव जम्भेश्वर भगवान ने बिश्नोई पंथ की
स्थापना की है और उनकी शिक्षा का प्रचार-प्रसार और बिश्नोई समाज का मान-सम्मान स्वर्गीय
चौ. भजनलाल जी बिश्नोई किया । उनके लक्ष्य
कदमों पर चलते हुए अध्यक्ष श्री देवेंद्र जी ने मात्र कुछ महिनों में बिश्नोई समाज
को आगे बढ़ाने के लिए अनेकानेक प्रयास किए जो सदैव स्मरणीय रहेंगे । आज भी वे
बिश्नोई समाज को आरक्षण दिलाने के लिए प्रयासरत है । धर्मशालाओं का निर्माण,
मंदिरों का सौन्दर्यकरण करवाना, सड़क निर्माण, गुरु जम्भेश्वर भगवान के नाम पर पशु
चिकित्सा और युनिवर्सिटी के लिए सरकार से माँग पूरी करवाने का काम इन्होंने करवाया
। मध्यप्रदेश में शहीद अमृतादेवी उद्यान बनाने की माँग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
से करना इत्यादि ।
अतः निष्कर्ष में कहें तो
उनकी धड़कन और सांसों में बिश्नोई समाज और
समाजोत्थान के अपार स्वप्न, उत्साह और उमंग है । उन्होंने तन-मन और धन से स्वयं को
समाज में समर्पित किया है, इसमें कोई दोहराय नहीं है । उनमें कभी पद और पैसों का
लालच भाव देखने को नहीं मिला । ऐसा अध्यक्ष समाज को आजादी के अमृतमहोत्सव बड़े
नसीबों से मिला है ।
अखिल
भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष देवेंद्र
जी बुड़िया के स्मरणीय कथन-
1.
समाज, भगवान और साधुओं से कोई
बड़ा नहीं है उनके आगे जो झुकता है वही सदैव प्रोग्रेस करता है।
2.
लोकसभा में हमारी एक भी सीट
नहीं है हमें संगठित होने की आवश्यकता है । अभी बिश्नोई समाज संगठित होकर चुनाव
लड़ना होगा । तब हम राजनैतिक स्तर पर आगे बढ़ेगें और हमारा राष्ट्रीय नेता बना
सकते हैं।
3.
जब तक नीति बनाने वाला हमारे
समाज का नहीं होगा तब तक हम पीछे रहेंगे । संगठित होने की अति आवश्यकता है तुच्छ
राजनीति में पड़कर समाज को तोड़ने का काम नहीं करना है । समाज में किसी से भूल
होती है तो चार बड़े लोग सीधे जाकर समझाना चाहिए ना कि सोशल मीडिया पर फालतू की
राजनीति करें ।
4.
मैं युवा पीढ़ी के लिए हूँ
मेरे खून का एक-एक कतरा बिश्नोई समाज और युवाओं के लिए है ।
5.
मेरा तन-मन और धन बिश्नोई समाज
के लिए है और इन्हें लगना चाहिए हमारा अध्यक्ष कुछ काम कर रहा है ।
6.
अब हम अच्छा काम करेगें और
लड़ेगें नहीं और भिड़ेगें नहीं ।
7.
समाज में मैं किसी से लड़ने
में विश्वास नहीं रखता हूँ । मेरे लिए
समाज और समाज की सेवा सर्वोपरि है ।
8.
मेरी संकल्प यात्रा में आए और
मुझसे जुड़े उनकी जगह मेरे दिल में हैं । मैं ऐसा कभी काम नहीं करूँगा जिसके कारण
वे मेरे दिल से बाहर निकले ।
9.
यह समाज मेरे लिए सर्वोपरि है
। यह संकल्प यात्रा मेरे संकल्पों की है मेरे लिए संत सदैव आदरणीय रहे हैं । मैं
उनके लिए कभी निम्नस्तर के शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता और न ही करूँगा । इसलिए
ईश्वर की शक्ति के वरदान से मैं एक -दम दौड़ते-दौड़ते इतनी पैदल यात्रा संपन्न कर
पाया हूँ । मेरे साथ यूथ और समाज है उनके साथ मैं सदैव रहूँगा ।
10. मुझ
जैसे देवलो को गुड़ा बिश्नोई का देवेंद्र बिश्नोई जिससे अध्यक्ष बनने का सौभाग्य
मिला । जिसे समाज, संत और साधुजनों का आशीर्वाद से अपार प्रेम मिला मैं बहुत गुड
महसूस करता हूँ । और उन विरोधियों का आभार है जिन्होंने मुझे यह संकल्प यात्रा तय
करवाने का सौभाग्य दिया ।
11. समाज
के आगे झूक जाऊँगा लेकिन समाज में गद्दारी को होने नहीं दूँगा ।
12. समाज के लिए सदैव संकल्पबद्ध हूँ ।
लेखिका- डॉ. मिलन बिश्नोई (सहायक आचार्य)
मोबाइल नंबर- 6380568643