बुधवार, 24 जून 2020

डॉ.रमेश पोखरियाल‘निशंक’ के साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति

डॉ.रमेश पोखरियाल‘निशंक’ के साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति
राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ साहित्य को दिन-रात दिलों-दिमाग में बसाएं रखना और उसे पल्लवित/फलित करना मुश्किल ही नहीं बल्कि काफी जटिल है।जैसा कि हम सब जानते है,साहित्य में साहित्यकार की जितनी भावनात्मक/संवेदनात्मक रूप से कोमलता होती है,ऐसी राजनीति में राजनेता से उम्मीद करना पागलपन ही होगा।हमें हालातों को देखकर लगता है कि राजनेता निष्ठुर स्वाभाव के होते होगें ।लेकिन मुझ से अपनी संपादकीय पुस्तक के लिए आदरणीय गुरुदेव प्रो.ऋषभदेव शर्माजी ने हमारे वर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री माननीय डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक पर शोधालेख लिखने का आदेश दिया,तब मैंने डॉ निशंक के साहित्य को पढ़ना शुरू किया। उनके कहानियों को पढ़कर यकीन नहीं हो रहा था कि एक राजनेता के दिल में इतनी संवेदनाएं?खैर मुझे भी भ्रमित और शक निगाहों से किसी राजनेता को नहीं देखना चाहिए फिर भी वर्तमान राजनीति ओर राजनेताओं की स्वार्थता,अमानवीयता,भ्रष्टाचार,जनता को गुमराह करने वाले चौंचलें रवैयों से अनभिज्ञ भी नहीं हूँ। डॉ निशंक के साहित्य को पढ़ने से अनुभव होता है कि लेखक ने राजनीति की गंदगी में गहराई से गरीब मजदूरों,महिलाओं की करूण कहानी को गढ़ा है।डॉ निशंक जितने अच्छे साहित्कार बने उतनी ही गहराई में उतरकर राजनीति के माध्यम से समाज सेवा करगें तो शायद भारत में उनके जैसा कोई और नहीं होगा। उनके उपन्यास,कहानियाँ और कविता संग्रह भारत भर के पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है तो बेशक वर्तमान युवाओं को उनसे मानव संसाधन एवं विकासमंत्री के नाते उम्मीदें काफी ज्यादा ही है। वर्तमान भारत की शिक्षा व्यवस्था की डोर थामे हुए हैं इसलिए बेरोजगारी मुक्त भारत बनाने की आशा सभी वर्ग समुदाय को रहती है।क्योंकि डॉ निशंक मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुए और बचपन गरीबी में गुजरा है। उन्होंने अपनी आजीविका के लिए उन्होंने कई क्षेत्रों में कदम रखे/रखने पड़े। उनकी रोजी-रोटी की शुरुआत एक शिक्षक के रुप में होती है आगे चलकर साहित्य,पत्रकारिता और फिर राजनीति में कदम रखते हुए सफलता की सीढ़ियों का सफर शुरू करते है। ऐसे में वर्तमान समय पाठक वर्ग उनके साहित्य को पढ़ते है और उनके संघर्षो से रूबरू होते तब आशाएं और आंकक्षाएं बढ़ जाती है।डॉ निशंक ने धरातलीय स्तर पर घटित समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाई है। उनके साहित्य में पर्यावरण की विलुप्तता,बाजारीकरण,आधुनिकता की होड़,गरीबी,पूँजीवादियों का मजदूर महिलाओं का शोषण,छल-कपट,बालविवाह,बेमेल विवाह,पहाड़ी लोगों की व्यथा जैसी समस्याएं देखने को मिलती है। उन्होंने समर्पण,नवांकुर,मुझे विधाता बनना है,तुम भी मेरे साथ चलो,मातृभूमि के लिए,जीवन पथ में,कोई मुश्किल नहीं,प्रतीक्षा,ए वतन तेरे लिए इन कविता संग्रहों में प्रेरणा,हौंसला,जोश-जुनून के साथ युवाओं को आगे बढ़ने का आह्वान कर रहे हैं। वर्तमान में पूरा विश्व कोरोना जैसी भंयकर महामारी का सामना कर रहा है।सालों पहले लोग गांव से शहर की तरफ पलायन करते थे और अब शहर से गाँव लौटने को तरस रहे है। पलायन करने के पीछे मुख्य कारण बेरोजगारी और आधुनिकीकरण है। समाज एक तरफ आड़म्बर की आड़ में अपना प्राकृतिक अस्तित्व खोते जा रहे है इस संदर्भ में कवि ‘आ अब गाँव चल’ कविता के माध्यम समाज के युवाओं संवाद को स्थापित करने की कोशिश करते है- “बाट तुम्हारी राह जोहती,नदियाँ हैं अकुलाई, पवन के झोंके तो ठहरे हैं,कलियाँ भी मुरझाई। ईर्ष्या की लपटों से बचकर तरु की छाँव चलें छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-आ अब –गाँव-चले) कवि प्रवासियों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि आज समय के साथ पलायन करने वालों की संख्या बढ़ते जा रही है।वहीं दूसरी तरफ वे लोग अपनी अस्मिता,संस्कृति,सभ्यता रिश्ते-नाते सब को खो रहे हैं। इस संदर्भ में-“आज तो रिश्ते नाते टूटे,स्वार्थों में क्यों व्यक्ति खड़ा, लक्ष्य शिखर पा जाने वाला,क्यों धूल-धूसरित आज पड़ा। छला बहुत तुझको स्वार्थों ने,सोच ले तेरा कल न छले, छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-आ अब –गाँव-चले) कवि इंसान को अपने लक्ष्य के प्रति अटल और समर्पित रहने हिदायत देते हैं। कवि दिन-ब-दिन इंसान को जड़-जमीन,प्रकृति,आदर्श,संस्कृति,सत्यता,प्रेम-समर्पण,रिश्तों से कहीं दूर इंसान जटिलता और मायावी दुनिया में भटकते देखकर चिंता व्यक्त करते है- “लक्ष्य उसका क्या निहित,गंतव्य उसका कहाँ है, आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है। सोच कोरी रह गई हर श्वास दूषित हो गई, आज तो बस हर कदम पर मनुजता भी रो रही आज तो सब छोड़ कर इनसान ढूँढ़ो कहाँ है? आज ढूँढ़ों व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-इनसान-ढूँढ़ो-कहाँ है) कवि ने समाज में आधुनिकता के आडम्बर में इंसानियत खोने की चिंता व्यक्त की है। भागदौड़ भरी दुनिया में रिश्तों का भी बाजारीकरण हो रहा है। अपनी लालसा और स्वार्थता के खातिर लक्ष्य से इंसान भटक रहा है। कोरोना काल ने खैर सबको अपनी असलियत बताई वरना पता नहीं आने वाले कुछ सालों तक प्रकृति-पर्यावरण और आमजन गरीबों का क्या हाल होता ।वर्तमान में गरीबी,बेरोजगारी और भूखमरी के कारण इंसान एक तरफ कुकर्मों को भी अपनाता रहा है।दूसरी तरफ मध्यम वर्ग की इच्छाएं और आकांक्षाएं बढ़ने के कारण एकाकीपन,अलगाव,स्वार्थतता,पलायनवादी नीति अधिक देखने को मिल रही है। "बंधु-बांधव को समझना अब दिखावा रह गया प्रेम था वह है कहाँ स्वार्थ में सब बह गया। कहाँ है आत्मीयता बंधुत्व खोया कहाँ है?" (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-इनसान-ढूँढ़ो-कहाँ है) कवि के अर्न्तमन की व्यथा साफ झलकती हैं वे अपने आस-पास के बदलते बदलाव से प्रेम,अपनापन,बंधुत्व खोते हुए नजर आ रहे और कहीं ना कहीं कवि का जीवन कविताओं में दिखाई देता हैं। कवि का जीवन संघर्षों भरा रहा है उन्होंने बड़े-बड़े संघर्षों के पहाड़ों को पार करके सफर तय किया था। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष से पाठकों प्रेरणा देने की कोशिश की है। जिंदगी को संतरंगी बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करके यश,कीर्ति,नाम कमाया है।लेकिन चारों और व्याप्त गरीबी,अपराध,चापलूसी के घेरे से अलग अपने आप के स्थापित किया है- “बहुत ही नजदीक मेरे,रह रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ कह रही है जिंदगी कुछ हकीकत है अगर इक बुलबुला है जिंदगी, बूँद सागर बन स्वयं हँसाती-रुलाती जिंदगी आज अपनों में पराई सी रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ,कह रही है जिंदगी।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-कह रही है जिंदगी) कवि के कविताओं के शीर्षक भी उनके वास्तविक जीवन को व्यक्त कर रहे है। उनकी कविता में यथार्थ का चित्रण देखने को मिलता है वहीं कवि शब्दों के आडम्बर से मुक्त रहे है।उनकी कविता को पढ़ते हुए अपने जीवन को यथास्वरूप देखता है। “हर तरफ भीड़ है देखो यहाँ भगदड़ मची, खो रहा तूफान में सब एक श्वास तक भी ना बची। तूफान के सारे थपेड़े सह रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ कह रही है जिंदगी। जिंदगी फूलों की बगिया कंटकों का घेर भी कसमसाहट से भरा है जिंदगी का फेर भी। एक बूँद आशा का समुंदर बन रही है जिंदगी , मैं अनोखी दास्ताँ हूँ,कह रही है जिंदगी।“ (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-कह रही है जिंदगी)अर्थात् कवि यहाँ अन्तर्मन से परेशान हैं अपनी जिंदगी अनोखी दास्ताँ से संवाद करते है।वे भीड़ में अकेलापन और गुमसुदा महसूस कर रहे हैं फिर उनकी हिम्मत,आशाएं,आकांक्षाएं उनके अन्तर्मन को झंकझोरते हुए प्रेरित करती हैं।कवि भीड़ में अकेले और अकेले में भीड़ समाते हुए आगे बढ़ते हैं। ‘कोई मुश्किल नहीं’ कवि की कविता कालजयी और प्रेरणादायक है। इस कविता का पाठ करने के पश्चात हर किसी को मन में एक नयी उमंग और उर्जा के साथ बढ़ने की प्रेरणा देती है। “तूफान आने पर भी बुझे न तुम्हें तो दिया आज ऐसा जलाना, संकल्प लेकर बढ़ो तो सही कोई मुश्किल नहीं स्वर्ग धरती पर पाना । दुखों का जहर भी पीकर स्वयं ही खुशियों की रिमझिम वर्षा बहाना, पूरी दुनिया को दिल में बसा तो सही कोई मुश्किल नहीं है,क्षितिज को भी पाना।” कवि की कविता में निराशा देखने को नहीं मिलती है क्योंकि उनके जीवन में संघर्षों के तूफान से बिना खबराएं हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहे।आज वे जिस क्षेत्र में काम कर रहे है,उसमें संघर्ष ही संघर्ष और प्रतिस्पर्धा,नफरत है।लेकिन कवि ने साहित्यकार से एक सफल राजनेता तक का सफर तय किया।उन्होंने किसान,मजदूर,बेरोजगार युवाओं में नयी स्फूर्ति/उमंग जगायी है। कोरोना काल,चक्रवात,तूफान जैसी भयंकर त्रासदी से जूझ रहे हर भारतीयों को सकारात्मक शक्ति और सोच के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित किया है।किसी ने सोचा नहीं भी था कि पूरा विश्व इस तरह माहमारी के चपेट में आ जाएगा और इंसान से इंसान डरने लग जाएगा।खैर साहित्य को अपने युग के समाज,संस्कृति,दर्शन,धर्म को अतीत की पम्पराओं के आधार पर प्रतिष्ठित करके,वर्तमान जीवन के आधारित लिखा जाता है इसलिए साहित्यकार आने वाले समय के बारें में निश्चित रूप से लिखते है।इसी तरह डॉ निशंक ने भी कालजयी रचनाओं में समाज के विभिन्न पहलुओं को उतारा है। डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ प्रखर राष्ट्रवादी कवि के रूप में माने जाते हैं । उनकी कविता में राष्ट्रीयता के साथ-साथ जीवन मूल्यों/सामाजिक यथार्थ का चित्रण मिलता है।– “इस छोर से उस छोर तक सभी को परखते रहे, कितुं पग-पग में मिला छल जिसके सभी गम भी सहे कौन जाने कब ढहेगा,घोर दुख का ये किला है, कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।“(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) अर्थात् कवि ने शब्दों के जाल बिना बांधे पाठक को यथार्थ से जोड़कर रखा।कवि मानते है कि जीवन की राहें संघर्षों से भरी हुई है। समाज के हर क्षेत्र में छल-कपट ओर तकलीफें है लेकिन एक दिन दुःख के कहर को ढहना ही होगा। आस की नन्हीं किरण झेलती तम को रही, कभी तो तूफान कभी बयार विष की भी बही सफल कैसे हो सफर यह,जिंदगी का जो मिला है, कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।“(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) कवि की कविता में राष्ट्र के प्रति चिंता बारम्बार दिखाई देती है।खैर कवि ने कविता के माध्यम से अपने जीवन की त्रासदी को बताने की कोशिश कर रहे है, वही उनकी कविताओँ में राष्ट्रीयता की झलक भी अन्यास ही दिखती है।क्योंकि कवि रचना कर रहे थे उस समय वे एक तरफ जीवन जीने के लिए विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे होगें ऐसा महसूस होता है। “जिंदगी की श्वास में मंजिलों की आस में कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है। प्यार की एक बूँद को हर पल तरसते किंतु बदले में मिले पत्थर बरसते कुछ ना पूछो जिंदगी से,गम सहित क्या-क्या मिला है कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) कवि अपने साथ-साथ युवा और संघर्षरत वर्ग की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षित करवा रहे हैं। वाकई कहने को लोग कहते है जीवन जीने के लिए कोई विशेष ख्याति की जरूरत नहीं है लेकिन जीने के लिए आज रोजी और रोटी दोनों की अतिआवश्यकता है।इन दोनों को पाने के लिए इंसान कई बार संघर्ष करते-करते थक जाता है।आज सरकारी क्षेत्र में नौकरी पाना सात समुद्र पार करने जैसा है। दूसरी तरफ आत्मनिर्भर बनने का ख्वाब...लेकिन हाँ असंभव को संभव बनाने के लिए विभिन्न परिस्थियों से जूझना पड़ता है। इसलिए यहाँ इन कविताओं में स्वंय कवि का संघर्ष से शिखऱ तक सफऱ दिखायी दिखाई देता है। “हर दुख लगा जग में मेरा है, इस तरह दर्दों का घेरा है। कभी अपना भी दूर जाता रहा मैं अकेला स्वयं को भुलाता रहा यहाँ सुख के संग संग ही दुख का बसेरा है इस तरह दर्दों का घेरा है।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-घेरा) कवि की हर एक कविता में संघर्ष,दर्द,उम्मीद,आशा,एकाकीपन और जिंदगी को जीतने की लड़ाई है।जीवन में एक सफल इंसान बनने के लिए उसे हर कदम पर लड़ना होता है,प्रतिस्पर्धा के दौर में बिना लड़ाई आज कुछ भी नहीं कर सकते। प्रतिस्पर्धा के कारण इंसान में अपनापन भाईचारे की भावना में भी निरसता ही दिखाई देती है।यहाँ कवि अपने आप को संक़टों घिरा हुआ पाया और जीवन की डगर में अकेला पाया है। उन्होंने जीवन में सुख की छाया में दुःख का पहरा बराबर देखा है। “मैं तो तिल-तिल ही निज को जलाता रहा, ठोकरें हर कदम पर भी खाता रहा। मेरे दर्दों का लगा आज मेला है, इस तरह दर्दों का घेरा है। जिंदगी-मौत दोनों ही संग संग रहे, जाने जीवन में कितने थपेड़े सहे। इस तरह दर्दों का घेरा है।”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-घेरा) अर्थात् कवि की रचनाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जीवन के हर पड़ाव में संघर्षों का थपेड़ा झेल कर आगे बढ़े।कवि रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी ने अपने जीवन में कई प्रकार संकटों का सामना किया है। आज बेशक वे बहुत अच्छे पद पर प्रतिष्ठित है लेकिन यहाँ तक पहुँचने के लिए जो संघर्ष करना पड़ा वह सराहनीय होने के साथ-साथ प्रेरणादायी है। अब डॉ रमेश पोखरियाल जी की कहनियों को देखा जाए तो मैं कहूँगी कविताओं से एकदम अलग लगती है।कहानियों में लेखक पात्रों को जो दर्शाते है वे समाज के निम्नवर्ग की महिलाओं,मजदूर वर्ग,बेरोजगार युवाओं,पलायनवादी वर्ग का यथास्वरूप वर्णन करते है।जो पात्र उनकी कहानियों में जन्म लेते है कहीं ना कहीं लेखक के आस-पास के समाज से उभरकर आते है। जैसे ‘कतरा-कतरा मौत’ में कुंती और मंगसीरू का जीवन दिखाया और उसी के साथ पहाड़ी क्षेत्र में पूँजीवादी वर्ग और निम्नवर्ग का अंतर बताते हुए लेखक कहानी में वास्तविक समाज का मोड़ देते है। मंगसीरू निम्न वर्ग में जन्म लेता है और जमीदारों के खेत में काम करके अपने पत्नी और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करता है ।लेकिन एक दिन जब शहर चला जाता है अपने मित्र के साथ और वहाँ कोठी में नौकरी करने लगता है ।परन्तु उसकी पत्नी को उसके बदलते व्यवहार के कारण शक होने के साथ डर भी लगता है।“छह माह बाद मंगसीरू आया तो बिल्कुल ही बदला हुआ इनसान था। पैंट, कमीज, आँखों में काला चश्मा, पैरों में महँगे जूते, उसकी तो हर अदा ही निराली थी। और उसके सामने चूल्हा फूँक रही थी, मैली-कुचौली धोती पहने कुंती।” (www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-कतरा-कतरा-मौत.) मंगसीरू पर शहरीकरण का भूत सवार हो गया उसके साथ ही वह गलत लोगों साथ पाकर कुकर्म करने लगा और उसका परिणाम यह हुआ कि उसे फांसी पर लटका दिया।यहां लेखक बताना चाहते है कि गाँव के भोले-भाले लोग शहरी गिरोह के हाथ पैसों के लालच में पड़कर स्वयं की अस्मिता और परिवार को भूला देते है।कुंती जैसी महिलाओं को फिर सामाजिक शोषण का शिकार बना दिया जाता है।“'मेरे बच्चे भूखे मर जाएँगे। मेरे पति ने जो किया उसकी सजा मेरे बच्चों को क्यों?' उसके आँसू निकल आए।”मंगसीरू को फंसाकर उसका सेठ बच जाता है और अदालत मंगसीरू को अपराधी घोषित कर देती है। इसके कारण कुंती और बच्चें कतरा-कतरा मौत का शिकार बन जाते है। ‘गेहूँ के दाने’कहानीमे लेखक सरकार और ठेकेदारों का पर्दाफाश विनायक जैसे पात्र के माधयम से करवाते है।इस कहानी में बाढ़ से ग्रसित गरीबों की पीड़ा को बताया है।वहीं सरकार दो-चार दिन फ्री में बिस्केट बाँटकर वाहवाही का लुफ्त उठाते है,दूसरी तरफ विनायक जैसे हजारों गरीब भूख .से मरते है.।विनायक गेहूँ के गोदान में काम करता है वहाँ देखता है अमीर किस तरह अनाज का अपमान करते है,और उनके जैसे लोग दाने-दाने को मोहताज है।अमीरों की गोदान में हजारों क्विटल गेहूँ सड़ जाने के बाद भी गरीबों को नहीं मिलता है।ठेकेदार शराब बनाने की फैक्ट्ररी में बेच देते है और विनायक जैसे मजदूर उनका विरोध करते है तो उन्हें पुलिस उसे अपराधी घोषित करके मार पीटकर जेल में डाल देती है।“विनायक के सामने एक और नंगा सच खड़ा था। अमीरों के न खाने लायक जिस गेहूँ को सरकार गरीबों में बाँटने जा रही थी उससे अब शराब बनेगी। सड़ा गेहूँ भी अमीरों के ही काम आएगा। गरीब फिर भूखे ही रहेंगे”।((www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-गेहूँ के दाने) इसी तरह डॉ निशक ने आधुनिक समय को ध्यान में रखते हुए ‘कैसे संबंध’ कहानी लिखी। यह कहानी मध्यम वर्ग परिवार में पले-बढ़े पलक और पुलकित की है। पलक के पढ़-लिखकर जब कम्पनी में काम करने आती है तब उन्हें सिद्धार्थ नाम के लड़के प्यार हो जाता है और वे दोनों लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते है लेकिन सिद्धार्थ जब कुछ दिन बाद पलक को छोड़कर शादी करने जाता है तब पलक को गहरा आघात पहुंचता है और आत्महत्या करने का प्रयास करती है। “सिद्धार्थ और पलक पिछले कई वर्षों से साथ रह रहे थे। सुवर्णा के शब्दों में कहें तो 'लिव इन रिलेशनशिप'। सब लोग यही समझते थे कि दोनों निकट भविष्य में वैवाहिक बंधन में बंध जाएँगे। लेकिन एक हफ्ता पहले ही सिद्धार्थ ने बताया कि उसका विवाह निश्चित हो गया है। पलक और वह सिर्फ अच्छे दोस्त हैं और आगे भी बने रहेंगे। उसने पलक को कभी इस नजर से नहीं देखा, वगैरह-वगैरह”।(www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-कैसेसंबंध)मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे बड़ी यही समस्या है । पलक की मां पहले ही अपनी बेटी की शादी करवाने के लिए लड़के बार-बार देख रही थी लेकिन पलक ने कभी हां नहीं किया।जब उसे सिद्धार्थ से इस तरह धक्का लगा तो वह स्वयं को मिटाने का सोचती है।इसके पीछे समाज और परिवार,प़ड़ौसियों का डर छिपा हुआ है।क्योंकि समाज की नजर में हमेशा लड़कियां को दोषी ठहराया गया है।पलक का भाई विदेशी लड़की से शादी करता है यह बात उसकी मां को पता चलने पर वह विचलित हो जाती है।अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए कहती है पाश्चात्य संस्कृति में जो हो रहा वह सब निंदनीय है।उधर सिद्धार्थ की पहली पत्नी की मौत हो जाती है तब पलक के घर रिश्ता मांगने आता है । पलक द्वारा उसे अस्वीकार करने पर उसकी मां फिर से सवाल करती है कि शादी क्यों नहीं करती...। लेकिन पलक के पिता उसका साथ देते है।इसी तरह उनकी अंतहीन,अतीत की परछाइयां,अनजान रिश्ता,एक थी जूही,फिर फिदा कैसे,बदल गई जिंदगी,रामकली,संपत्ति इत्यादि प्रसिद्ध रचनाएं है। उनकी कहानियों को पढ़ते समय कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा है कि प्रेमचन्द की कहानियाँ पढ़ रही हूँ। लेखक ने हर कहानी में अलग-अलग किरदारों में विभिन्न क्षेत्रों से पात्रों को गढ़ा है। इनकी कहानियों में मां का ममत्व,किसान का जड़ और जमीन से प्रेम,बिचौलियों का छल-कपट और शोषण,शिक्षा प्राप्त करने की ललक,संघर्ष के साथ आत्मसम्मान की लड़ाई,संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव आदि देखने को मिलता है।ऐसा लगता है कि लेखक राजनीति में होने के कारण ही इन पात्रों को ढूँढ पाये और यथार्थपरक लेखन करने में सफल माने गये। Milan Bishnoi(Rajasthan) PhD Scholar Central university of TamilNadu,Thiruvarur Mob-6380568643

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