नारी और क्रांति
पश्चिम के विचारक सी एम जोड ने लिखा था -जब मैं पैदा हुआ था तब मेरे देश में घर थे, होम्स थे पर आज जब मैं बूढ़ा होकर मर रहा हूँ तो केवल मकान और हाउसेस रह गए हैं | घर और मकान में होम और हाउसेस में जो अंतर है वह स्त्री पर ही निर्भर है, पर स्त्री यदि पुरुष जैसे बन जाए तो साथ रहने पर भी पति-पत्नी नहीं होते ! बच्चे पैदा होते हैं लेकिन नर्स और बच्चे का संबंध होता है | हमारी शिक्षा प्रणाली, कवायद आदि भी स्त्रियों के लिए भिन्न नहीं है | यदि स्त्री जिम या एन.सी.सी.में भाग ले रही है तो उसके भीतर किसी बुनियादी तत्व का विघटन हो रहा है | इसलिए अतीत के विशेषज्ञों ने पुरुषों के लिए व्यायाम सोचा था और स्त्रियों के लिए नृत्य खोजा था | क्योंकि नृत्य में एक लय होती है जो शरीर के हार्मोन्स को ठीक कर एक गतिमयता और संगीत भरते हैं | कवायद से हिंसा, क्रोध, लड़ने की प्रवृत्ति तीव्र होती है | हमारे वस्रों का भी शरीर पर प्रभाव पड़ता है | चुस्त कपड़े आदमी को लड़ने के लिए तत्पर बनाते हैं तो ढीला कपड़ा व्यक्तित्व में एक शिथिलता और शांति प्रदान कर देता है | इसलिए मुझे लगता है घर को शांतिमय वातावरण प्रदान करने के लिए चुस्त कपड़ो की अपेक्षा ढ़ीले कपड़े पहनना आवश्यक है | पर आज संसार की आवश्यकता देखते हुए वस्त्र संबंधी यह तर्क कुछ स्वाभाविक नहीं लगता है |
शिक्षा के संबंध में भी यही बात लागू होती है | स्त्री गणित या विज्ञान आवश्यकतानुसार सीखें पर कला, संगीत, काव्य से अपना संबंध न तोड़े | क्योंकि संगीत व काव्य में जो मनुष्य दीक्षित होता है उसकी जीवन के प्रति पकड़ भी दूसरी होती है | गांधी जी के आश्राम में एक शराबी का आना-जाना आरंभ हुआ | गांधी जी के समर्थकों ने जब उनसे शिकायत की कि यह बुरा आदमी दूकान में शराब पीता हुआ दिखाई दिया तो गांधीजी की आंखों में प्रसन्नता के आंसू थे | उन्होंने कहा था- मैं आनंदित इसलिए हूँ कि अच्छे दिन आ गए हैं| शराब पीने वाले भी खादी पहनने लगे हैं | यह उदाहरण दृष्टि की भिन्नता है | एक स्त्री की दृष्टि है| बुद्ध, क्राइस्ट के समान गांधी जी में भी स्त्रियों के समान करुणा थी तभी मनुबेन गांधी ने 'गांधी : माइ मदर' पुस्तक लिखी थी | इस दृष्टि-भिन्नता के लिए स्त्रियों की शिक्षा-भाषा आदि में भी भिन्नता होनी चाहिए | आज जब स्त्रियाँ पुरुषों के समान पत्थरबाजी करने में पीछे नहीं हैं तो क्या हम उनकी प्रशंसा कर पद्मश्री, भारतभूषण, महावीर चक्र से विभूषित कर रहें हैं? इसके विपरीत मज़ाक उड़ाया जा रहा है कि वे नकाब पहनकर पत्थरबाजी; कोरोनावाइरस को भगाने के लिए कर रही है |
वर्तमान समय में इस संसार को शक्तिशाली बनाने में स्त्रियों का योगदान बहुत सराहनीय है | पर इससे भी अधिक शक्ति उसके पास है | एक बार वह शक्ति यदि जागृत हो जाए तो प्रेम का संसार निर्मित होगा, जहाँ हिंसा, राजनीति, बीमारियां नहीं होंगी | क्योंकि स्त्री प्रेम:दया, करुणा की खान है | पर सर्वप्रथम वह यह सोच लें कि उसे पुरुष जैसा नहीं बनना है |
दूसरी बात उसे यह अनुभव करना होगा कि वह पुरुषों से भिन्न हैं | उसका व्यक्तित्व, शरीर, मन, चेतना किन्हीं अलग रास्तों से जीवन को गति प्रदान करते हैं | तीसरी बात उसकी शिक्षा, वस्त्र, चिंतन, दीक्षा व विचार सब भिन्न होना चाहिए तभी वह अपनी शक्ति का प्रयोग मनुष्य संस्कृति को आगे बढ़ने में कर सकती हैं | उपाय की खोज उसे स्वंय करनी होगी | यदि वह अभी भी अपना महत्त्व, उत्तरदायित्व नहीं समझ पा रही है तो अपराधी है | जिनके हाथ में इतनी शक्ति, सामर्थ्य व अवसर हो वे यदि जीवन के लिए कुछ नहीं करती हो तो निश्चित अपराधी है |
ईश्वर करें कि स्त्री अपने दान, प्रेम, आंनद, काव्य व संगीत से मनुष्य की संस्कृति को पूर्णता प्रदान करें | यह संसार जिसे गणित, भौतिक, रसायन ने खड़ा किया है उसे अपनी प्रार्थना से वे जोड़ने में सक्षम हो जाएँ | जिस क्रोध और युद्ध के आवेश में पुरुष अकेला तनता रहा है, उसमें थोड़े से गीतों की पंक्तियाँ जोड़ दें| तभी एक सर्वांगीण, एकता से पूर्ण, अखंड सभ्यता का निर्माण हो सकता है |
लेखक - प्रो. शीला मिश्र
हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
संपर्क-+91 92461 05809
प्रस्तुतकर्ता-मिलन बिश्नोई
कोरोनवाइरस आक्रांत देश चीन में हजारों वर्ष तक यह माना जाता रहा कि स्त्रियों के भीतर कोई आत्मा नहीं होती | यदि किसी पति ने अपनी पत्नी की हत्या भी कर दी तो उसे दंड नहीं दिया जाता था क्योंकि पत्नी उसकी संपदा थी | हाल ही में 'थप्पड़' फिल्म में भी पति की इसी मनोवृत्ति को दर्शाया गया है | इसमें भी पति ने बिना किसी को पूछे स्वंय को श्रेष्ठ मान लिया और पत्नी जो कि घर-बार संभालती है उसे समाज के सामने 'थप्पड़' मारकर यह दिखाने की चेष्टा की कि पत्नी उसकी संपदा है | उसे श्रेष्ठता देने का कोई कारण नहीं | पर आज की स्त्रियाँ अपने अस्तित्व के बारे में सचेतन है | वह हजारों वर्षो से चला आ रहा अत्याचार-अनाचार को सहने के लिए कतई तैयार नहीं है | कानून भी उनके साथ है | नीत्से ने कुछ ही बी सी पहले घोषणा की थी कि बुद्ध और क्राइस्ट स्त्रैण होंगे क्योंकि इन्होंने करुणा और प्रेम कि इतनी बातें की है जो नारी के ही गुण है अर्थात् माधूर्य से भरे सौन्दर्य, शिवत्व की कल्पना और भावना नारी का अनिवार्य स्वभाव है | इन्हीं गुणों से भरपूर आज वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है | इतने वर्षों की गुलामी के बाद एक विद्रोह, प्रतिक्रिया शुरू हुआ जिसे वह व्यक्त मधुरता के साथ कर रही है कई वर्ष पहले स्त्री ने यह घोषणा की थी कि वे पुरुषों के समान है पर मैं समझती हूँ न वह पुरुषों के समान है और न ही हीन है | उसकी भाषा की अपनी भिन्नता है, उसके व्यक्तित्व के एक अलग आयाम है | यदि वह पुरुषों के समान बन जाए तो परिणाम घातक होगा ही | क्योंकि नक़ल में स्त्रियाँ हमेशा द्वितीय कोटि की होंगी | नक़ल करना हास्यास्पद भी है | रानी लक्ष्मीबाई या जॉन ऑफ़ आर्क ने पुरुषों की नक़ल की थी तो कम से कम उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिली पर पुरुष यदि स्त्रियों की नक़ल करते हैं तो उनकी मूर्तियाँ चौराहे पर खड़ी नहीं की जाती है |
वास्तव में पुरुष और स्त्रियों के चित्त की बुनियादी भिन्नता अर्थपूर्ण है और सारा आकर्षण इसी भिन्नता पर निर्भर है | उनमें जितनी भिन्नता, दूरी और पोलैरिटी हो उतना ही आकर्षण होंगा | यह भिन्नता से ही वे एक दूसरे की परिपूरक-कम्पीमेंटरी बनेंगे | पुरुष गणित जानता हो और स्त्री संगीत, काव्य नृत्य जानती हो तो ही वे एक दूसरे के गहरे मायने में सहायक-साथी होंगे |पश्चिम के विचारक सी एम जोड ने लिखा था -जब मैं पैदा हुआ था तब मेरे देश में घर थे, होम्स थे पर आज जब मैं बूढ़ा होकर मर रहा हूँ तो केवल मकान और हाउसेस रह गए हैं | घर और मकान में होम और हाउसेस में जो अंतर है वह स्त्री पर ही निर्भर है, पर स्त्री यदि पुरुष जैसे बन जाए तो साथ रहने पर भी पति-पत्नी नहीं होते ! बच्चे पैदा होते हैं लेकिन नर्स और बच्चे का संबंध होता है | हमारी शिक्षा प्रणाली, कवायद आदि भी स्त्रियों के लिए भिन्न नहीं है | यदि स्त्री जिम या एन.सी.सी.में भाग ले रही है तो उसके भीतर किसी बुनियादी तत्व का विघटन हो रहा है | इसलिए अतीत के विशेषज्ञों ने पुरुषों के लिए व्यायाम सोचा था और स्त्रियों के लिए नृत्य खोजा था | क्योंकि नृत्य में एक लय होती है जो शरीर के हार्मोन्स को ठीक कर एक गतिमयता और संगीत भरते हैं | कवायद से हिंसा, क्रोध, लड़ने की प्रवृत्ति तीव्र होती है | हमारे वस्रों का भी शरीर पर प्रभाव पड़ता है | चुस्त कपड़े आदमी को लड़ने के लिए तत्पर बनाते हैं तो ढीला कपड़ा व्यक्तित्व में एक शिथिलता और शांति प्रदान कर देता है | इसलिए मुझे लगता है घर को शांतिमय वातावरण प्रदान करने के लिए चुस्त कपड़ो की अपेक्षा ढ़ीले कपड़े पहनना आवश्यक है | पर आज संसार की आवश्यकता देखते हुए वस्त्र संबंधी यह तर्क कुछ स्वाभाविक नहीं लगता है |
शिक्षा के संबंध में भी यही बात लागू होती है | स्त्री गणित या विज्ञान आवश्यकतानुसार सीखें पर कला, संगीत, काव्य से अपना संबंध न तोड़े | क्योंकि संगीत व काव्य में जो मनुष्य दीक्षित होता है उसकी जीवन के प्रति पकड़ भी दूसरी होती है | गांधी जी के आश्राम में एक शराबी का आना-जाना आरंभ हुआ | गांधी जी के समर्थकों ने जब उनसे शिकायत की कि यह बुरा आदमी दूकान में शराब पीता हुआ दिखाई दिया तो गांधीजी की आंखों में प्रसन्नता के आंसू थे | उन्होंने कहा था- मैं आनंदित इसलिए हूँ कि अच्छे दिन आ गए हैं| शराब पीने वाले भी खादी पहनने लगे हैं | यह उदाहरण दृष्टि की भिन्नता है | एक स्त्री की दृष्टि है| बुद्ध, क्राइस्ट के समान गांधी जी में भी स्त्रियों के समान करुणा थी तभी मनुबेन गांधी ने 'गांधी : माइ मदर' पुस्तक लिखी थी | इस दृष्टि-भिन्नता के लिए स्त्रियों की शिक्षा-भाषा आदि में भी भिन्नता होनी चाहिए | आज जब स्त्रियाँ पुरुषों के समान पत्थरबाजी करने में पीछे नहीं हैं तो क्या हम उनकी प्रशंसा कर पद्मश्री, भारतभूषण, महावीर चक्र से विभूषित कर रहें हैं? इसके विपरीत मज़ाक उड़ाया जा रहा है कि वे नकाब पहनकर पत्थरबाजी; कोरोनावाइरस को भगाने के लिए कर रही है |
वर्तमान समय में इस संसार को शक्तिशाली बनाने में स्त्रियों का योगदान बहुत सराहनीय है | पर इससे भी अधिक शक्ति उसके पास है | एक बार वह शक्ति यदि जागृत हो जाए तो प्रेम का संसार निर्मित होगा, जहाँ हिंसा, राजनीति, बीमारियां नहीं होंगी | क्योंकि स्त्री प्रेम:दया, करुणा की खान है | पर सर्वप्रथम वह यह सोच लें कि उसे पुरुष जैसा नहीं बनना है |
दूसरी बात उसे यह अनुभव करना होगा कि वह पुरुषों से भिन्न हैं | उसका व्यक्तित्व, शरीर, मन, चेतना किन्हीं अलग रास्तों से जीवन को गति प्रदान करते हैं | तीसरी बात उसकी शिक्षा, वस्त्र, चिंतन, दीक्षा व विचार सब भिन्न होना चाहिए तभी वह अपनी शक्ति का प्रयोग मनुष्य संस्कृति को आगे बढ़ने में कर सकती हैं | उपाय की खोज उसे स्वंय करनी होगी | यदि वह अभी भी अपना महत्त्व, उत्तरदायित्व नहीं समझ पा रही है तो अपराधी है | जिनके हाथ में इतनी शक्ति, सामर्थ्य व अवसर हो वे यदि जीवन के लिए कुछ नहीं करती हो तो निश्चित अपराधी है |
ईश्वर करें कि स्त्री अपने दान, प्रेम, आंनद, काव्य व संगीत से मनुष्य की संस्कृति को पूर्णता प्रदान करें | यह संसार जिसे गणित, भौतिक, रसायन ने खड़ा किया है उसे अपनी प्रार्थना से वे जोड़ने में सक्षम हो जाएँ | जिस क्रोध और युद्ध के आवेश में पुरुष अकेला तनता रहा है, उसमें थोड़े से गीतों की पंक्तियाँ जोड़ दें| तभी एक सर्वांगीण, एकता से पूर्ण, अखंड सभ्यता का निर्माण हो सकता है |
लेखक - प्रो. शीला मिश्र
हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
संपर्क-+91 92461 05809
प्रस्तुतकर्ता-मिलन बिश्नोई


