मंगलवार, 8 सितंबर 2020

योग को देखा नहीं जाता...बल्कि महसूस किया जा सकता है।

योग के काम को आसानी से नहीं देखा जा सकता है, लेकिन इसे महसूस किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अकेले नहीं देख सकता है कि आंतरिक स्थिति वास्तव में क्या है। यदि आप विराम देते हैं, तो अपनी आँखें बंद करें और किसी की ऊर्जा में ट्यून करें, आप यह महसूस कर सकते हैं कि वे वास्तव में कौन हैं और उनके मन और हृदय में क्या है। योग का डोमेन भीतर शांत जगह है। योग के परिणाम हमेशा पोज़ के आकार द्वारा नहीं दिखाए जाते हैं। योग के परिणाम अक्सर आपके जीवन की स्थिति से प्रकट होते हैं, जो आपके भीतर खुशी और प्रेम के द्वारा होता है। अपने लिए अभ्यास करें, इसलिए आपकी दुनिया बदलती है और आप गहरी और पारलौकिक शांति की स्थिति में रहते हैं। #hindiseyoga #yogasemila#Milanseyoga :) copyright-milan Bishnoi

सोमवार, 20 जुलाई 2020

बिश्नोई समाज और अमावस्या

सोमती/हरियाली अमावस्या की हार्दिक मंगलकामनाएं ❤️ 
#Positivity with spiritual strength.
# आध्यात्मिक इंसान बनना मुझे लगता है सबसे कठिन परीक्षा है। आजकल  'मुंह में राम बगल में छुरी' लेकर चलने वाले हर कदम पर मिल ही जाएंगे। लेकिन सच्चा आध्यात्मिक इंसान और उसकी शक्ति को ढूंढना असंभव है। पिछले कई सालों से पूजा-पाठ/यज्ञ से काफी दूरी बना ली थी बेशक जब किसी तकलीफ़ में होती थी तो ईश्वर को जरूर पुकार लगाती और वह मेरी सहायता भी शायद बिना सोचे समझे कर ही देता है। मुझे नहीं पता कि भगवान है या नहीं... लेकिन इतने सालों बाद मैंने यज्ञ(जोत) किया तो अंदर से एक सुकून आहट/शक्ति मिली उसको मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती।
# पिछले कई सालों से हास्टल ही अपना घर बन गया है इसलिए काफी फक्कड़/गैरजिम्मेदार बन गई थी । तो  मेरे पंथ के उन्नतीस नियमों का पालन करने में शायद  मैंने काफी भूल की है यह मैं कहने में संकोच भी महसूस कर रही हूं। आज सोचती हूं अगर मैं गुरुदेव जम्भेश्वर के बताए गए नियमों का पालन करती तो शायद आज जो हूं, उससे भी कई  गुना अधिक अच्छी इंसान बनी रहती।आज तक मैं पर्यावरण/पशु-पक्षियों के लिए शायद बहुत कुछ कर सकती थी। क्योंकि हम भगवान का रूप प्रकृति/पर्यावरण/जीव-जानवर में ही देखते हैं। हमारे लिए वही राम/रहीम/खुदा है ।खैर लाकडाउन का वक्त चल रहा है जिससे सबके जीवन के काफी उतार चढ़ाव के अनुभवों को देखने/महसूस करने का अवसर मिला है। लाकडाउन के दौर में ही आज हरियाली/सोमती अमावस्या का आना अपने आप संयोग है। 
#बिश्नोई समाज के लिए अमावस्या सबसे पवित्र दिन है ।इस दिन हम लोग गुरुदेव जम्भेश्वर की सबदवाणी का पाठ करते हुए यज्ञ करते हैं फिर खीर का भोग लगाते हैं। राजस्थान में प्रत्येक अमावस्या को बिश्नोई परिवारों में  गेहूं के आटे की खीर बनती है।इस दिन विशेष रूप से जल्दी स्नान करके गाय के घी,छणा(गाय के सूखे गोबर), खेजड़ी के सूखे छाल, नारियल से मिट्टी की तापनी(कुंड) में हवन/यज्ञ (जोत) करते हुए सृष्टि के लिए मंगलकामना करते हैं।इस दिन हम गायों/पशु-पक्षियों को दाना-पानी देते हैं। वैसे यह हमारे जीवन के नित्य कर्म में हर दिन सुबह को सबसे पहले नहा-धोकर पक्षियों को दाना/पानी देकर यज्ञ(हवन)करना होता ही है। और फिर खाना बनाते है तो पहली रोटी गाय को/ दूसरी रोटी कुत्ते को देते हैं। लेकिन अमावस्या/पूर्णिमा को विशेष रूप गुड़/बाजरा और लड्डू बनाकर खिलाया जाता है। अमावस्या के दिन कोई भी खेत में खरपतवार नहीं करते। ना ही हम लोग इस दिन खेत की जुताई करते क्योंकि जमीन में बहुत सारे जीव है जो खुदाई /जुताई करने से मर जाते है।इस दिन हम वृक्ष लगाते हैं लेकिन हरे वृक्षों को भूलकर भी काटते नहीं ।और अमावस्या के दिन साबुन से कपड़े भी नहीं धोते ताकि चींटियां/कीड़े-मकोड़े ना मरे।खासकर अमावस्या के दिन कन्याओं को भोजन कराते हैं और उन्हें अंगवस्त्र भी भेंट करते हैं। अमावस्या हमारे लिए सबसे अच्छा और पावन दिन है अगर  बाकी दिन उपवास करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अमावस्या के दिन उपवास हम लोग जरूर रखते हैं। यह दिन पूरी तरह हमारा  जीव/जन्तु/पर्यावरण(पारिस्थितिकी) को समर्पित होता है। चलो आज से मैं भी एक सच्ची बिश्नोई बनने की शुरुआत करती हूं।-#MilanBishnoi

बुधवार, 24 जून 2020

डॉ.रमेश पोखरियाल‘निशंक’ के साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति

डॉ.रमेश पोखरियाल‘निशंक’ के साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति
राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ साहित्य को दिन-रात दिलों-दिमाग में बसाएं रखना और उसे पल्लवित/फलित करना मुश्किल ही नहीं बल्कि काफी जटिल है।जैसा कि हम सब जानते है,साहित्य में साहित्यकार की जितनी भावनात्मक/संवेदनात्मक रूप से कोमलता होती है,ऐसी राजनीति में राजनेता से उम्मीद करना पागलपन ही होगा।हमें हालातों को देखकर लगता है कि राजनेता निष्ठुर स्वाभाव के होते होगें ।लेकिन मुझ से अपनी संपादकीय पुस्तक के लिए आदरणीय गुरुदेव प्रो.ऋषभदेव शर्माजी ने हमारे वर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री माननीय डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक पर शोधालेख लिखने का आदेश दिया,तब मैंने डॉ निशंक के साहित्य को पढ़ना शुरू किया। उनके कहानियों को पढ़कर यकीन नहीं हो रहा था कि एक राजनेता के दिल में इतनी संवेदनाएं?खैर मुझे भी भ्रमित और शक निगाहों से किसी राजनेता को नहीं देखना चाहिए फिर भी वर्तमान राजनीति ओर राजनेताओं की स्वार्थता,अमानवीयता,भ्रष्टाचार,जनता को गुमराह करने वाले चौंचलें रवैयों से अनभिज्ञ भी नहीं हूँ। डॉ निशंक के साहित्य को पढ़ने से अनुभव होता है कि लेखक ने राजनीति की गंदगी में गहराई से गरीब मजदूरों,महिलाओं की करूण कहानी को गढ़ा है।डॉ निशंक जितने अच्छे साहित्कार बने उतनी ही गहराई में उतरकर राजनीति के माध्यम से समाज सेवा करगें तो शायद भारत में उनके जैसा कोई और नहीं होगा। उनके उपन्यास,कहानियाँ और कविता संग्रह भारत भर के पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है तो बेशक वर्तमान युवाओं को उनसे मानव संसाधन एवं विकासमंत्री के नाते उम्मीदें काफी ज्यादा ही है। वर्तमान भारत की शिक्षा व्यवस्था की डोर थामे हुए हैं इसलिए बेरोजगारी मुक्त भारत बनाने की आशा सभी वर्ग समुदाय को रहती है।क्योंकि डॉ निशंक मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुए और बचपन गरीबी में गुजरा है। उन्होंने अपनी आजीविका के लिए उन्होंने कई क्षेत्रों में कदम रखे/रखने पड़े। उनकी रोजी-रोटी की शुरुआत एक शिक्षक के रुप में होती है आगे चलकर साहित्य,पत्रकारिता और फिर राजनीति में कदम रखते हुए सफलता की सीढ़ियों का सफर शुरू करते है। ऐसे में वर्तमान समय पाठक वर्ग उनके साहित्य को पढ़ते है और उनके संघर्षो से रूबरू होते तब आशाएं और आंकक्षाएं बढ़ जाती है।डॉ निशंक ने धरातलीय स्तर पर घटित समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाई है। उनके साहित्य में पर्यावरण की विलुप्तता,बाजारीकरण,आधुनिकता की होड़,गरीबी,पूँजीवादियों का मजदूर महिलाओं का शोषण,छल-कपट,बालविवाह,बेमेल विवाह,पहाड़ी लोगों की व्यथा जैसी समस्याएं देखने को मिलती है। उन्होंने समर्पण,नवांकुर,मुझे विधाता बनना है,तुम भी मेरे साथ चलो,मातृभूमि के लिए,जीवन पथ में,कोई मुश्किल नहीं,प्रतीक्षा,ए वतन तेरे लिए इन कविता संग्रहों में प्रेरणा,हौंसला,जोश-जुनून के साथ युवाओं को आगे बढ़ने का आह्वान कर रहे हैं। वर्तमान में पूरा विश्व कोरोना जैसी भंयकर महामारी का सामना कर रहा है।सालों पहले लोग गांव से शहर की तरफ पलायन करते थे और अब शहर से गाँव लौटने को तरस रहे है। पलायन करने के पीछे मुख्य कारण बेरोजगारी और आधुनिकीकरण है। समाज एक तरफ आड़म्बर की आड़ में अपना प्राकृतिक अस्तित्व खोते जा रहे है इस संदर्भ में कवि ‘आ अब गाँव चल’ कविता के माध्यम समाज के युवाओं संवाद को स्थापित करने की कोशिश करते है- “बाट तुम्हारी राह जोहती,नदियाँ हैं अकुलाई, पवन के झोंके तो ठहरे हैं,कलियाँ भी मुरझाई। ईर्ष्या की लपटों से बचकर तरु की छाँव चलें छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-आ अब –गाँव-चले) कवि प्रवासियों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि आज समय के साथ पलायन करने वालों की संख्या बढ़ते जा रही है।वहीं दूसरी तरफ वे लोग अपनी अस्मिता,संस्कृति,सभ्यता रिश्ते-नाते सब को खो रहे हैं। इस संदर्भ में-“आज तो रिश्ते नाते टूटे,स्वार्थों में क्यों व्यक्ति खड़ा, लक्ष्य शिखर पा जाने वाला,क्यों धूल-धूसरित आज पड़ा। छला बहुत तुझको स्वार्थों ने,सोच ले तेरा कल न छले, छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-आ अब –गाँव-चले) कवि इंसान को अपने लक्ष्य के प्रति अटल और समर्पित रहने हिदायत देते हैं। कवि दिन-ब-दिन इंसान को जड़-जमीन,प्रकृति,आदर्श,संस्कृति,सत्यता,प्रेम-समर्पण,रिश्तों से कहीं दूर इंसान जटिलता और मायावी दुनिया में भटकते देखकर चिंता व्यक्त करते है- “लक्ष्य उसका क्या निहित,गंतव्य उसका कहाँ है, आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है। सोच कोरी रह गई हर श्वास दूषित हो गई, आज तो बस हर कदम पर मनुजता भी रो रही आज तो सब छोड़ कर इनसान ढूँढ़ो कहाँ है? आज ढूँढ़ों व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-इनसान-ढूँढ़ो-कहाँ है) कवि ने समाज में आधुनिकता के आडम्बर में इंसानियत खोने की चिंता व्यक्त की है। भागदौड़ भरी दुनिया में रिश्तों का भी बाजारीकरण हो रहा है। अपनी लालसा और स्वार्थता के खातिर लक्ष्य से इंसान भटक रहा है। कोरोना काल ने खैर सबको अपनी असलियत बताई वरना पता नहीं आने वाले कुछ सालों तक प्रकृति-पर्यावरण और आमजन गरीबों का क्या हाल होता ।वर्तमान में गरीबी,बेरोजगारी और भूखमरी के कारण इंसान एक तरफ कुकर्मों को भी अपनाता रहा है।दूसरी तरफ मध्यम वर्ग की इच्छाएं और आकांक्षाएं बढ़ने के कारण एकाकीपन,अलगाव,स्वार्थतता,पलायनवादी नीति अधिक देखने को मिल रही है। "बंधु-बांधव को समझना अब दिखावा रह गया प्रेम था वह है कहाँ स्वार्थ में सब बह गया। कहाँ है आत्मीयता बंधुत्व खोया कहाँ है?" (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-इनसान-ढूँढ़ो-कहाँ है) कवि के अर्न्तमन की व्यथा साफ झलकती हैं वे अपने आस-पास के बदलते बदलाव से प्रेम,अपनापन,बंधुत्व खोते हुए नजर आ रहे और कहीं ना कहीं कवि का जीवन कविताओं में दिखाई देता हैं। कवि का जीवन संघर्षों भरा रहा है उन्होंने बड़े-बड़े संघर्षों के पहाड़ों को पार करके सफर तय किया था। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष से पाठकों प्रेरणा देने की कोशिश की है। जिंदगी को संतरंगी बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करके यश,कीर्ति,नाम कमाया है।लेकिन चारों और व्याप्त गरीबी,अपराध,चापलूसी के घेरे से अलग अपने आप के स्थापित किया है- “बहुत ही नजदीक मेरे,रह रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ कह रही है जिंदगी कुछ हकीकत है अगर इक बुलबुला है जिंदगी, बूँद सागर बन स्वयं हँसाती-रुलाती जिंदगी आज अपनों में पराई सी रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ,कह रही है जिंदगी।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-कह रही है जिंदगी) कवि के कविताओं के शीर्षक भी उनके वास्तविक जीवन को व्यक्त कर रहे है। उनकी कविता में यथार्थ का चित्रण देखने को मिलता है वहीं कवि शब्दों के आडम्बर से मुक्त रहे है।उनकी कविता को पढ़ते हुए अपने जीवन को यथास्वरूप देखता है। “हर तरफ भीड़ है देखो यहाँ भगदड़ मची, खो रहा तूफान में सब एक श्वास तक भी ना बची। तूफान के सारे थपेड़े सह रही है जिंदगी मैं अनोखी दास्ताँ हूँ कह रही है जिंदगी। जिंदगी फूलों की बगिया कंटकों का घेर भी कसमसाहट से भरा है जिंदगी का फेर भी। एक बूँद आशा का समुंदर बन रही है जिंदगी , मैं अनोखी दास्ताँ हूँ,कह रही है जिंदगी।“ (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-कह रही है जिंदगी)अर्थात् कवि यहाँ अन्तर्मन से परेशान हैं अपनी जिंदगी अनोखी दास्ताँ से संवाद करते है।वे भीड़ में अकेलापन और गुमसुदा महसूस कर रहे हैं फिर उनकी हिम्मत,आशाएं,आकांक्षाएं उनके अन्तर्मन को झंकझोरते हुए प्रेरित करती हैं।कवि भीड़ में अकेले और अकेले में भीड़ समाते हुए आगे बढ़ते हैं। ‘कोई मुश्किल नहीं’ कवि की कविता कालजयी और प्रेरणादायक है। इस कविता का पाठ करने के पश्चात हर किसी को मन में एक नयी उमंग और उर्जा के साथ बढ़ने की प्रेरणा देती है। “तूफान आने पर भी बुझे न तुम्हें तो दिया आज ऐसा जलाना, संकल्प लेकर बढ़ो तो सही कोई मुश्किल नहीं स्वर्ग धरती पर पाना । दुखों का जहर भी पीकर स्वयं ही खुशियों की रिमझिम वर्षा बहाना, पूरी दुनिया को दिल में बसा तो सही कोई मुश्किल नहीं है,क्षितिज को भी पाना।” कवि की कविता में निराशा देखने को नहीं मिलती है क्योंकि उनके जीवन में संघर्षों के तूफान से बिना खबराएं हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहे।आज वे जिस क्षेत्र में काम कर रहे है,उसमें संघर्ष ही संघर्ष और प्रतिस्पर्धा,नफरत है।लेकिन कवि ने साहित्यकार से एक सफल राजनेता तक का सफर तय किया।उन्होंने किसान,मजदूर,बेरोजगार युवाओं में नयी स्फूर्ति/उमंग जगायी है। कोरोना काल,चक्रवात,तूफान जैसी भयंकर त्रासदी से जूझ रहे हर भारतीयों को सकारात्मक शक्ति और सोच के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित किया है।किसी ने सोचा नहीं भी था कि पूरा विश्व इस तरह माहमारी के चपेट में आ जाएगा और इंसान से इंसान डरने लग जाएगा।खैर साहित्य को अपने युग के समाज,संस्कृति,दर्शन,धर्म को अतीत की पम्पराओं के आधार पर प्रतिष्ठित करके,वर्तमान जीवन के आधारित लिखा जाता है इसलिए साहित्यकार आने वाले समय के बारें में निश्चित रूप से लिखते है।इसी तरह डॉ निशंक ने भी कालजयी रचनाओं में समाज के विभिन्न पहलुओं को उतारा है। डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ प्रखर राष्ट्रवादी कवि के रूप में माने जाते हैं । उनकी कविता में राष्ट्रीयता के साथ-साथ जीवन मूल्यों/सामाजिक यथार्थ का चित्रण मिलता है।– “इस छोर से उस छोर तक सभी को परखते रहे, कितुं पग-पग में मिला छल जिसके सभी गम भी सहे कौन जाने कब ढहेगा,घोर दुख का ये किला है, कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।“(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) अर्थात् कवि ने शब्दों के जाल बिना बांधे पाठक को यथार्थ से जोड़कर रखा।कवि मानते है कि जीवन की राहें संघर्षों से भरी हुई है। समाज के हर क्षेत्र में छल-कपट ओर तकलीफें है लेकिन एक दिन दुःख के कहर को ढहना ही होगा। आस की नन्हीं किरण झेलती तम को रही, कभी तो तूफान कभी बयार विष की भी बही सफल कैसे हो सफर यह,जिंदगी का जो मिला है, कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।“(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) कवि की कविता में राष्ट्र के प्रति चिंता बारम्बार दिखाई देती है।खैर कवि ने कविता के माध्यम से अपने जीवन की त्रासदी को बताने की कोशिश कर रहे है, वही उनकी कविताओँ में राष्ट्रीयता की झलक भी अन्यास ही दिखती है।क्योंकि कवि रचना कर रहे थे उस समय वे एक तरफ जीवन जीने के लिए विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे होगें ऐसा महसूस होता है। “जिंदगी की श्वास में मंजिलों की आस में कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है। प्यार की एक बूँद को हर पल तरसते किंतु बदले में मिले पत्थर बरसते कुछ ना पूछो जिंदगी से,गम सहित क्या-क्या मिला है कारवाँ बन बढ़ रहा,दर्द का यह सिलसिला है।”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-सिलसिला) कवि अपने साथ-साथ युवा और संघर्षरत वर्ग की समस्याओं की तरफ ध्यान आकर्षित करवा रहे हैं। वाकई कहने को लोग कहते है जीवन जीने के लिए कोई विशेष ख्याति की जरूरत नहीं है लेकिन जीने के लिए आज रोजी और रोटी दोनों की अतिआवश्यकता है।इन दोनों को पाने के लिए इंसान कई बार संघर्ष करते-करते थक जाता है।आज सरकारी क्षेत्र में नौकरी पाना सात समुद्र पार करने जैसा है। दूसरी तरफ आत्मनिर्भर बनने का ख्वाब...लेकिन हाँ असंभव को संभव बनाने के लिए विभिन्न परिस्थियों से जूझना पड़ता है। इसलिए यहाँ इन कविताओं में स्वंय कवि का संघर्ष से शिखऱ तक सफऱ दिखायी दिखाई देता है। “हर दुख लगा जग में मेरा है, इस तरह दर्दों का घेरा है। कभी अपना भी दूर जाता रहा मैं अकेला स्वयं को भुलाता रहा यहाँ सुख के संग संग ही दुख का बसेरा है इस तरह दर्दों का घेरा है।” (hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-घेरा) कवि की हर एक कविता में संघर्ष,दर्द,उम्मीद,आशा,एकाकीपन और जिंदगी को जीतने की लड़ाई है।जीवन में एक सफल इंसान बनने के लिए उसे हर कदम पर लड़ना होता है,प्रतिस्पर्धा के दौर में बिना लड़ाई आज कुछ भी नहीं कर सकते। प्रतिस्पर्धा के कारण इंसान में अपनापन भाईचारे की भावना में भी निरसता ही दिखाई देती है।यहाँ कवि अपने आप को संक़टों घिरा हुआ पाया और जीवन की डगर में अकेला पाया है। उन्होंने जीवन में सुख की छाया में दुःख का पहरा बराबर देखा है। “मैं तो तिल-तिल ही निज को जलाता रहा, ठोकरें हर कदम पर भी खाता रहा। मेरे दर्दों का लगा आज मेला है, इस तरह दर्दों का घेरा है। जिंदगी-मौत दोनों ही संग संग रहे, जाने जीवन में कितने थपेड़े सहे। इस तरह दर्दों का घेरा है।”(hindisamy.com/content10669रमेश-पोखरियाल-निशंक-कविताएं-दर्द-का-घेरा) अर्थात् कवि की रचनाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जीवन के हर पड़ाव में संघर्षों का थपेड़ा झेल कर आगे बढ़े।कवि रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी ने अपने जीवन में कई प्रकार संकटों का सामना किया है। आज बेशक वे बहुत अच्छे पद पर प्रतिष्ठित है लेकिन यहाँ तक पहुँचने के लिए जो संघर्ष करना पड़ा वह सराहनीय होने के साथ-साथ प्रेरणादायी है। अब डॉ रमेश पोखरियाल जी की कहनियों को देखा जाए तो मैं कहूँगी कविताओं से एकदम अलग लगती है।कहानियों में लेखक पात्रों को जो दर्शाते है वे समाज के निम्नवर्ग की महिलाओं,मजदूर वर्ग,बेरोजगार युवाओं,पलायनवादी वर्ग का यथास्वरूप वर्णन करते है।जो पात्र उनकी कहानियों में जन्म लेते है कहीं ना कहीं लेखक के आस-पास के समाज से उभरकर आते है। जैसे ‘कतरा-कतरा मौत’ में कुंती और मंगसीरू का जीवन दिखाया और उसी के साथ पहाड़ी क्षेत्र में पूँजीवादी वर्ग और निम्नवर्ग का अंतर बताते हुए लेखक कहानी में वास्तविक समाज का मोड़ देते है। मंगसीरू निम्न वर्ग में जन्म लेता है और जमीदारों के खेत में काम करके अपने पत्नी और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करता है ।लेकिन एक दिन जब शहर चला जाता है अपने मित्र के साथ और वहाँ कोठी में नौकरी करने लगता है ।परन्तु उसकी पत्नी को उसके बदलते व्यवहार के कारण शक होने के साथ डर भी लगता है।“छह माह बाद मंगसीरू आया तो बिल्कुल ही बदला हुआ इनसान था। पैंट, कमीज, आँखों में काला चश्मा, पैरों में महँगे जूते, उसकी तो हर अदा ही निराली थी। और उसके सामने चूल्हा फूँक रही थी, मैली-कुचौली धोती पहने कुंती।” (www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-कतरा-कतरा-मौत.) मंगसीरू पर शहरीकरण का भूत सवार हो गया उसके साथ ही वह गलत लोगों साथ पाकर कुकर्म करने लगा और उसका परिणाम यह हुआ कि उसे फांसी पर लटका दिया।यहां लेखक बताना चाहते है कि गाँव के भोले-भाले लोग शहरी गिरोह के हाथ पैसों के लालच में पड़कर स्वयं की अस्मिता और परिवार को भूला देते है।कुंती जैसी महिलाओं को फिर सामाजिक शोषण का शिकार बना दिया जाता है।“'मेरे बच्चे भूखे मर जाएँगे। मेरे पति ने जो किया उसकी सजा मेरे बच्चों को क्यों?' उसके आँसू निकल आए।”मंगसीरू को फंसाकर उसका सेठ बच जाता है और अदालत मंगसीरू को अपराधी घोषित कर देती है। इसके कारण कुंती और बच्चें कतरा-कतरा मौत का शिकार बन जाते है। ‘गेहूँ के दाने’कहानीमे लेखक सरकार और ठेकेदारों का पर्दाफाश विनायक जैसे पात्र के माधयम से करवाते है।इस कहानी में बाढ़ से ग्रसित गरीबों की पीड़ा को बताया है।वहीं सरकार दो-चार दिन फ्री में बिस्केट बाँटकर वाहवाही का लुफ्त उठाते है,दूसरी तरफ विनायक जैसे हजारों गरीब भूख .से मरते है.।विनायक गेहूँ के गोदान में काम करता है वहाँ देखता है अमीर किस तरह अनाज का अपमान करते है,और उनके जैसे लोग दाने-दाने को मोहताज है।अमीरों की गोदान में हजारों क्विटल गेहूँ सड़ जाने के बाद भी गरीबों को नहीं मिलता है।ठेकेदार शराब बनाने की फैक्ट्ररी में बेच देते है और विनायक जैसे मजदूर उनका विरोध करते है तो उन्हें पुलिस उसे अपराधी घोषित करके मार पीटकर जेल में डाल देती है।“विनायक के सामने एक और नंगा सच खड़ा था। अमीरों के न खाने लायक जिस गेहूँ को सरकार गरीबों में बाँटने जा रही थी उससे अब शराब बनेगी। सड़ा गेहूँ भी अमीरों के ही काम आएगा। गरीब फिर भूखे ही रहेंगे”।((www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-गेहूँ के दाने) इसी तरह डॉ निशक ने आधुनिक समय को ध्यान में रखते हुए ‘कैसे संबंध’ कहानी लिखी। यह कहानी मध्यम वर्ग परिवार में पले-बढ़े पलक और पुलकित की है। पलक के पढ़-लिखकर जब कम्पनी में काम करने आती है तब उन्हें सिद्धार्थ नाम के लड़के प्यार हो जाता है और वे दोनों लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते है लेकिन सिद्धार्थ जब कुछ दिन बाद पलक को छोड़कर शादी करने जाता है तब पलक को गहरा आघात पहुंचता है और आत्महत्या करने का प्रयास करती है। “सिद्धार्थ और पलक पिछले कई वर्षों से साथ रह रहे थे। सुवर्णा के शब्दों में कहें तो 'लिव इन रिलेशनशिप'। सब लोग यही समझते थे कि दोनों निकट भविष्य में वैवाहिक बंधन में बंध जाएँगे। लेकिन एक हफ्ता पहले ही सिद्धार्थ ने बताया कि उसका विवाह निश्चित हो गया है। पलक और वह सिर्फ अच्छे दोस्त हैं और आगे भी बने रहेंगे। उसने पलक को कभी इस नजर से नहीं देखा, वगैरह-वगैरह”।(www.hindisamay.com/content/11002/1/रमेश-पोखरियाल-निशंक-कहानियाँ-कैसेसंबंध)मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे बड़ी यही समस्या है । पलक की मां पहले ही अपनी बेटी की शादी करवाने के लिए लड़के बार-बार देख रही थी लेकिन पलक ने कभी हां नहीं किया।जब उसे सिद्धार्थ से इस तरह धक्का लगा तो वह स्वयं को मिटाने का सोचती है।इसके पीछे समाज और परिवार,प़ड़ौसियों का डर छिपा हुआ है।क्योंकि समाज की नजर में हमेशा लड़कियां को दोषी ठहराया गया है।पलक का भाई विदेशी लड़की से शादी करता है यह बात उसकी मां को पता चलने पर वह विचलित हो जाती है।अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए कहती है पाश्चात्य संस्कृति में जो हो रहा वह सब निंदनीय है।उधर सिद्धार्थ की पहली पत्नी की मौत हो जाती है तब पलक के घर रिश्ता मांगने आता है । पलक द्वारा उसे अस्वीकार करने पर उसकी मां फिर से सवाल करती है कि शादी क्यों नहीं करती...। लेकिन पलक के पिता उसका साथ देते है।इसी तरह उनकी अंतहीन,अतीत की परछाइयां,अनजान रिश्ता,एक थी जूही,फिर फिदा कैसे,बदल गई जिंदगी,रामकली,संपत्ति इत्यादि प्रसिद्ध रचनाएं है। उनकी कहानियों को पढ़ते समय कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा है कि प्रेमचन्द की कहानियाँ पढ़ रही हूँ। लेखक ने हर कहानी में अलग-अलग किरदारों में विभिन्न क्षेत्रों से पात्रों को गढ़ा है। इनकी कहानियों में मां का ममत्व,किसान का जड़ और जमीन से प्रेम,बिचौलियों का छल-कपट और शोषण,शिक्षा प्राप्त करने की ललक,संघर्ष के साथ आत्मसम्मान की लड़ाई,संस्कृति और सभ्यता के प्रति लगाव आदि देखने को मिलता है।ऐसा लगता है कि लेखक राजनीति में होने के कारण ही इन पात्रों को ढूँढ पाये और यथार्थपरक लेखन करने में सफल माने गये। Milan Bishnoi(Rajasthan) PhD Scholar Central university of TamilNadu,Thiruvarur Mob-6380568643

रविवार, 8 मार्च 2020

Woman and revolution

नारी और क्रांति
कोरोनवाइरस आक्रांत देश चीन में हजारों वर्ष तक यह माना जाता रहा कि स्त्रियों के भीतर कोई आत्मा नहीं होती | यदि किसी पति ने अपनी पत्नी की हत्या भी कर दी तो उसे दंड नहीं दिया जाता था क्योंकि पत्नी उसकी संपदा थी | हाल ही में 'थप्पड़' फिल्म में भी पति की इसी मनोवृत्ति को दर्शाया गया है | इसमें भी पति ने बिना किसी को पूछे स्वंय को श्रेष्ठ मान लिया और पत्नी जो कि घर-बार संभालती है उसे समाज के सामने 'थप्पड़' मारकर यह दिखाने की चेष्टा की कि पत्नी उसकी संपदा है | उसे श्रेष्ठता देने का कोई कारण नहीं | पर आज की स्त्रियाँ अपने अस्तित्व के बारे में सचेतन है | वह हजारों वर्षो से चला आ रहा अत्याचार-अनाचार को सहने के लिए कतई तैयार नहीं है | कानून भी उनके साथ है | नीत्से ने कुछ ही बी सी पहले घोषणा की थी कि बुद्ध और क्राइस्ट स्त्रैण होंगे क्योंकि इन्होंने करुणा और प्रेम कि इतनी बातें की है जो नारी के ही गुण है अर्थात् माधूर्य से भरे सौन्दर्य, शिवत्व की कल्पना और भावना नारी का अनिवार्य स्वभाव है | इन्हीं गुणों से भरपूर आज वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है | इतने वर्षों की गुलामी के बाद एक विद्रोह, प्रतिक्रिया शुरू हुआ जिसे वह व्यक्त मधुरता के साथ कर रही है कई वर्ष पहले स्त्री ने यह घोषणा की थी कि वे पुरुषों के समान है पर मैं समझती हूँ न वह पुरुषों के समान है और न ही हीन है | उसकी भाषा की अपनी भिन्नता है, उसके व्यक्तित्व के एक अलग आयाम है | यदि वह पुरुषों के समान बन जाए तो परिणाम घातक होगा ही | क्योंकि नक़ल में स्त्रियाँ हमेशा द्वितीय कोटि की होंगी | नक़ल करना हास्यास्पद भी है | रानी लक्ष्मीबाई या जॉन ऑफ़ आर्क ने पुरुषों की नक़ल की थी तो कम से कम उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिली पर पुरुष यदि स्त्रियों की नक़ल करते हैं तो उनकी मूर्तियाँ चौराहे पर खड़ी नहीं की जाती है |
​वास्तव में पुरुष और स्त्रियों के चित्त की बुनियादी भिन्नता अर्थपूर्ण है और सारा आकर्षण इसी भिन्नता पर निर्भर है | उनमें जितनी भिन्नता, दूरी और पोलैरिटी हो उतना ही आकर्षण होंगा | यह भिन्नता से ही वे एक दूसरे की परिपूरक-कम्पीमेंटरी बनेंगे | पुरुष गणित जानता हो और स्त्री संगीत, काव्य नृत्य जानती हो तो ही वे एक दूसरे के गहरे मायने में सहायक-साथी होंगे |
​पश्चिम के विचारक सी एम जोड ने लिखा था -जब मैं पैदा हुआ था तब मेरे देश में घर थे, होम्स थे पर आज जब मैं बूढ़ा होकर मर रहा हूँ तो केवल मकान और हाउसेस रह गए हैं | घर और मकान में होम और हाउसेस में जो अंतर है वह स्त्री पर ही निर्भर है, पर स्त्री यदि पुरुष जैसे बन जाए तो साथ रहने पर भी पति-पत्नी नहीं होते ! बच्चे पैदा होते हैं लेकिन नर्स और बच्चे का संबंध होता है | हमारी शिक्षा प्रणाली, कवायद आदि भी स्त्रियों के लिए भिन्न नहीं है | यदि स्त्री जिम या एन.सी.सी.में भाग ले रही है तो उसके भीतर किसी बुनियादी तत्व का विघटन हो रहा है | इसलिए अतीत के विशेषज्ञों ने पुरुषों के लिए व्यायाम सोचा था और स्त्रियों के लिए नृत्य खोजा था | क्योंकि नृत्य में एक लय होती है जो शरीर के हार्मोन्स को ठीक कर एक गतिमयता और संगीत भरते हैं | कवायद से हिंसा, क्रोध, लड़ने की प्रवृत्ति तीव्र होती है | हमारे वस्रों का भी शरीर पर प्रभाव पड़ता है | चुस्त कपड़े आदमी को लड़ने के लिए तत्पर बनाते हैं तो ढीला कपड़ा व्यक्तित्व में एक शिथिलता और शांति प्रदान कर देता है | इसलिए मुझे लगता है घर को शांतिमय वातावरण प्रदान करने के लिए चुस्त कपड़ो की अपेक्षा ढ़ीले कपड़े पहनना आवश्यक है | पर आज संसार की आवश्यकता देखते हुए वस्त्र संबंधी यह तर्क कुछ स्वाभाविक नहीं लगता है |
​शिक्षा के संबंध में भी यही बात लागू होती है | स्त्री गणित या विज्ञान आवश्यकतानुसार सीखें पर कला, संगीत, काव्य से अपना संबंध न तोड़े | क्योंकि संगीत व काव्य में जो मनुष्य दीक्षित होता है उसकी जीवन के प्रति पकड़ भी दूसरी होती है | गांधी जी के आश्राम में एक शराबी का आना-जाना आरंभ हुआ | गांधी जी के समर्थकों ने जब उनसे शिकायत की कि यह बुरा आदमी दूकान में शराब पीता हुआ दिखाई दिया तो गांधीजी की आंखों में प्रसन्नता के आंसू थे | उन्होंने कहा था- मैं आनंदित इसलिए हूँ कि अच्छे दिन आ गए हैं| शराब पीने वाले भी खादी पहनने लगे हैं | यह उदाहरण दृष्टि की भिन्नता है | एक स्त्री की दृष्टि है| बुद्ध, क्राइस्ट के समान गांधी जी में भी स्त्रियों के समान करुणा थी तभी मनुबेन गांधी ने 'गांधी : माइ मदर' पुस्तक लिखी थी | इस दृष्टि-भिन्नता के लिए स्त्रियों की शिक्षा-भाषा आदि में भी भिन्नता होनी चाहिए | आज जब स्त्रियाँ पुरुषों के समान पत्थरबाजी करने में पीछे नहीं हैं तो क्या हम उनकी प्रशंसा कर पद्मश्री, भारतभूषण, महावीर चक्र से विभूषित कर रहें हैं? इसके विपरीत मज़ाक उड़ाया जा रहा है कि वे नकाब पहनकर पत्थरबाजी; कोरोनावाइरस को भगाने के लिए कर रही है |
​वर्तमान  समय में इस संसार को शक्तिशाली बनाने में स्त्रियों का योगदान बहुत सराहनीय है | पर इससे भी अधिक शक्ति उसके पास है | एक बार वह शक्ति यदि  जागृत हो जाए तो प्रेम का संसार निर्मित होगा, जहाँ हिंसा, राजनीति, बीमारियां नहीं होंगी | क्योंकि स्त्री प्रेम:दया, करुणा की खान है | पर सर्वप्रथम वह यह सोच लें कि उसे पुरुष जैसा नहीं बनना है |
​दूसरी बात उसे यह अनुभव करना होगा कि वह पुरुषों से भिन्न हैं | उसका व्यक्तित्व, शरीर, मन, चेतना किन्हीं अलग रास्तों से जीवन को गति प्रदान करते हैं | तीसरी बात उसकी शिक्षा, वस्त्र, चिंतन, दीक्षा व विचार सब भिन्न होना चाहिए तभी वह अपनी शक्ति का प्रयोग मनुष्य संस्कृति को आगे बढ़ने में कर सकती हैं | उपाय की खोज उसे स्वंय करनी होगी | यदि वह अभी भी अपना महत्त्व, उत्तरदायित्व नहीं समझ पा रही है तो अपराधी है | जिनके हाथ में इतनी शक्ति, सामर्थ्य व अवसर हो वे यदि जीवन के लिए कुछ नहीं करती हो तो निश्चित अपराधी है |
​ईश्वर करें कि स्त्री अपने दान, प्रेम, आंनद, काव्य व संगीत से मनुष्य की संस्कृति को पूर्णता प्रदान करें | यह संसार जिसे गणित, भौतिक, रसायन ने खड़ा किया है उसे अपनी प्रार्थना से वे जोड़ने में सक्षम हो जाएँ | जिस क्रोध और युद्ध के आवेश में पुरुष अकेला तनता रहा है, उसमें थोड़े से गीतों की पंक्तियाँ जोड़ दें| तभी एक सर्वांगीण, एकता से पूर्ण, अखंड सभ्यता का निर्माण हो सकता है |

  लेखक -  प्रो. शीला मिश्र
हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
संपर्क-+91 92461 05809
प्रस्तुतकर्ता-मिलन बिश्नोई

गुरुवार, 5 मार्च 2020

The biggest sin is to exploit elderly parents.

 हमें आस्थावान होना चाहिए इसमें कोई बुराई नहीं है । मंदिर में पूजा-अर्चना करना कोई गुनाह भी नहीं है । लेकिन मां-बाप रूपी ईश्वर को घर से निकाल देंगे तो भगवान ना मंदिर में मिलेगा ना ही इस लोक में । ऐसे न जाने कितने लोग सड़कों पर भीख मांगते हुए हमें दिखते है । यह भीख क्यों मांगते इसका कारण हम नहीं जानते है क्योंकि हमने कभी प्रयास भी नहीं किया । यह बुढ़ी दादी कल मेरा हाथ पकड़ रोने लग गई । उन्हें इतनी जोर से भूख लगी थी।उनको ना पहनने को चप्पल है ना कोई झोला । बस पेट रूपी झोले को भरने के लिए पता नहीं कितनी बार सड़क पर हाथ फैलाने से इनको भोजन की कीमत मिलती होगी । खैर मैं कोई बड़ी  हस्तियों में से तो नहीं हूं जो इन लोगों की समस्याओं का समाधान कर सकूं । बस इनको रेस्टोरेंट में ले गई और चाय वाय पिलाई और कुछ पैसे दिए तो यह मुझे पूछने लगी तुम्हें चाय नहीं पीना ? मैंने कहा नहीं अम्मा । तब तक मुझे कोई कहने लगा "इनको मुंह मत लगाओ यह लोग ऐसे ही करते है।" पर सच कहूं तो यह ऐसे ही भीख मांगते नहीं इनकी भी मजबूरी है । हां कुछ लोग ऐसे भी करते होंगे । लेकिन बस एक ही गुजारिश है कि बुजुर्ग माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी का ख्याल रखें । क्योंकि इनकी कमाई हम खा लेते हैं और फिर इनका हाथ काटकर छोड़ देते तो यह भीख नहीं मांगेंगे तो क्या करेंगे। गांव और शहरों में 500 रू की पेंशन तक बेटे और बहू इनकी छीन लेते हैं । हर रोज लड़ाई-झगडा करते इसलिए इन्हें मजबूर होकर भीख मांगना पड़ता है। इनके दुःख दर्द को हम समझने की आज कोशिश नहीं करते हैं।यह भूल जाते है कि आज हम जवान भले ही है आने वाला कल हमारा भी यही होगा। जैसा आज हम कर रहे वैसा ही हमारी संतान करेंगी। कोई मायने नहीं रखता कि आज आप किस पद और प्रतिष्ठा पर स्थापित है ।बुढापा सबका समान है उसमें आपकी पद-प्रतिष्ठा नहीं देखी जाती है क्योंकि स्वार्थी संतान दिन ब दिन राक्षसी प्रवृत्ति अपना रही है। बेशक आज भी हर घरों में बुजुर्ग शोषित नहीं हो रहे । लेकिन गांव और शहरों में संख्या लगातार बढ़ रही है इसलिए सोचिएगा और निस्वार्थ सेवा भाव से अपनाएं।
 नोट - मैं ना समाज सेविका हूं ना ही कोई बड़ी राजनेता,लेखक या ओहदेदारों में से.... इत्यादि लेकिन मुझे ऐसे बुजुर्ग और असहाय लोगों की छोटी-छोटी मदद करना अच्छा लगता है ।
-मिलन बिश्नोई
 4/3/2019

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

My society is getting clouded

मेरा समाज धूमिल हो रहा-
आज अपने प्रांत से मीलों दूर बैठी हूं, यहां के युवाओं को आगे बढ़ते देख रही हूं और उनसे कुछ  प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने की कोशिश भी कर रही हूं । फिर भी मन बड़ा चंचल है, यह हमेशा मुझे अपने अतीत की ओर ले चला जाता है। जब मैं अपने अतीत में जाती हूं तो राजस्थान के इतिहास और संस्कृति के पन्नों को पलटते हुए भविष्य की और भी झांकती हूं। तब मुझे अपने इतिहास में दादू,मीरा,राणाप्रताप,वीरदुर्गादास, पृथ्वीराज चौहान,वीर तेजाजी,अमृता देवी, पन्नाधाय,हाडी़ रानी,गुरु जम्भेश्वर, गुरु जसनाथ, रैदास,बाबा रामदेव इत्यादि महान नर-नारी और महापुरुष दिखाई देते हैं। वे सिर्फ दिखाई ही नहीं देते बल्कि उनके संघर्ष और बलिदान की गाथा सुनाई देती है। प्राय: हम अपने आप को उन्हीं महापुरुषों की संतान मानते है, तो फिर हमारा फ़र्ज क्या बनता है? महापुरुषों की औलाद आज किस दिशा में जा रही हैं? इसकी चिंता मुझे भविष्य के पन्नों में दिखाई दे रही है। यह चिंता पिछले चार-पांच सालों से परेशान भी कर रही है। फिर भी अपने प्रांत से बाहर निकलकर शिक्षा प्राप्त करने चली आई हूं तो कई बार उसे इग्नोर भी करने लगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम मनुष्य की स्मरण शक्ति और लगाव शक्ति इतनी कमजोर नहीं है कि इन्हें आसानी भूला दिया जाए। बस इस कशमकश में अपने आप को ढालती चल रही हूं। लेकिन आजकल सोशल मीडिया से कौन दूर है । सोशल मीडिया ने हम सबको जोड़कर/ जकड़कर रखा है कि उससे कोई अछूता नहीं रहा। अगर सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करना आए तो यह जकड़न हमारी जिंदगी बना देती है। लेकिन रोना इस बात का है कि मेरे समाज में इस सोशल मीडिया का कुछ लोग सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों कर रहे है।सच कहूं तो ग्रामीण स्तर पर इसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग भी हो रहा है। महिलाओं के साथ इसका बड़ा अन्याय भी हो रहा है। पढ़ें लिखे युवा लोग मां-बहनों के फोटोज का इतना नीचे स्तर पर गिर कर गलत इस्तेमाल करने लगे है। मुझे यह समझ नहीं आ रहा । फिर भी उनके पास क्या यही काम बचा? जो महिलाओं के फोटोज का छेड़छाड़ करके वायरल कर रहे। उनके अपने घर में भी बहन-बेटी है फिर यह तुच्छ हरकतें क्यों ? दूसरी तरफ मेरे समाज की महिलाओं में लगभग यह पहली पीढ़ी है जो व्हाटसेप, फेसबुक, इंस्टाग्राम का इस्तेमाल कर रही है। महिलाएं भी कई बार फ्री phone call और कैमरे का गलत इस्तेमाल करती दिखाई दे रही है। इससे अपने आप की और खानदान की बदनामी मोल ले रही है ...ऐसा करने की क्या आवश्यकता है? अपने ही पतियों को धोखा देकर अन्य पुरूषों और साधुओं के साथ गंदी बातें/व्यवहार करने लग जाती है ।इसके पीछे की मानसिकता समझना फिलहाल मेरे वश में नहीं है। फिर भी मैं कहूंगी कि हमें समाज और परिवार की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए । हमें अपनी स्वतंत्रता का सही सदुपयोग करना चाहिए। अपनी स्वतंत्रता को देशहित,समाज हित और स्वयं के हित में लगा दो। दूसरी बात पर आपका ध्यान गया होगा गैंगस्टर आज शादियों और सामाजिक स्थल पर बंदूक लेकर नाच रहे हैं और सोशल मीडिया पर उनके वीडियो वायरल हो रहे है यह सब क्या शुरू हो गया? और उनके ग्रुप में स्मेकिंग, चोरी-डकैती, लड़ाई-झगडे़ वाले विडियोज खूब धमाल मचा रहे हैं। सोचने वाली बात है हमारे समाज में आज से 40-50 पहले बहुत कम पढ़े लिखे और नौकरी में एक-दूके लोग मिलते थे। फिर भी यकीन मानिए समाज में भाईचारा, एकता, सहनशीलता, समर्पण,त्याग और सम्मान की भावनाएं कूट-कूटकर भरी हुई थी।अर्थात् वीर तेजाजी, रामदेव,जांभोजी और जसनाथजी के अनुयायी पर्यावरण प्रेमी और वन्यजीवों के रक्षक माने जाते है। वाकई उनके बलिदान की गाथा सुनकर हर कोई अचम्भित रह जाते है। लेकिन उनके अनुयायियों को देखकर गर्व भी होता वहीं वर्तमान में दुःख भी... दुःख इस बात का होता है कि ऐसे महापुरुषों के अनुयायियों में कुछ लोग  को पर्यावरण प्रेमी बनने/कहलाने की बजाय गेंगस्टार, मास्टरमाइंड, डकैत और लूटेरा बनाना/कहलाना पसंद कर रहे है। हमारे पढ़ें- लिखे युवा भी ऐसे लोगों का धड़ल्ले से स्वागत-सत्कार भी करते हैं ।वे आज स्मेकिंग,दारू,एमडी,ड्रग्स इत्यादि नशीली आदतों के शिकार हो रहे हैं।क्या लगता नहीं ऐसे अराजक तत्व (लोग) हमारे समाज को धूमिल कर रहे हैं।वे लगातार अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं। इससे सबसे बड़ा नुक़सान समाज- संस्कृति और मां-बेटियों को हो रहा है। इससे दिन ब दिन हमारे समाज की बदनामी हो रही है । समाज में लगातार अराजक तत्व पैदा हो रहे जिससे तलाक और संबंध विच्छेद होने के आंकड़ों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। कभी लगता नहीं कि पुराने जमानों में हमारे पास संसाधनों की कमी थी फिर भी हर एक इंसान अपनी जीविका ईमानदारी पूर्वक बिताता था। आज जमीन जायदाद और अन्य संसाधन और शिक्षा की उपलब्धता के बावजूद भी युवा गुमराह हो रहे हैं । खैर आज बस.....
क्रमशः
@ मिलन बिश्नोई
10.02.2020

शनिवार, 25 जनवरी 2020

Life style and environmental protection of Bishnoi society


      बिश्नोई समाज की जीवन पद्धति और पर्यावरण संरक्षण
भारत देश चिंतन-दर्शन और आध्यात्मिक शक्तियों के रूप में जाना जाता हैं। राम और कृष्ण की तपोभूमि में कई संत उनके  कई संत-महात्मा अनुयायी बने, कई संत महात्माओं ने निर्गुण पंथ को अपना कर जातिवाद,छुआछूत,धार्मिक भेदभाव,पाखण्डता से ऊपर उठकर शांति,शील-सहिष्णुता और परोपकार का मार्ग अपनाया।15 वीं सदी के इतिहास को साहित्य के इतिहास में लिखा गया। तब निर्गुण पंथ के प्रवर्त्तक कबीर को बताया गया वह ठीक भी है, लेकिन साहित्यकार द्वारा कबीर और नानक के समकालीन गुरू जांभोजी (1451-1536) को इतिहास के पन्नों से गायब ही कर देना उनकी भूल कहें या समझदारी ? गुरु जांभोजी को कौन नहीं जानता हैं... यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं। लगभग 500 साल पहले  पर्यावरण और मानवीय मूल्यों को बचाने की पहल करने वाले प्रसिद्ध संत एकमात्र जांभोजी थे। आगे चलकर उन्होंने धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की थी। इस सम्प्रदाय को जांभोजी ने पाखण्डता,मूर्तिपूजा,बहूदेवताओं की पूजा से दूर रखकर निराकार स्वयंभू,अहिंसा,जीवदया और पर्यावरण की रक्षा,जलसंरक्षण करना सीखाया।
आज वर्त्तमान समय में देश में व्यापत पर्यावरण प्रदूषण,अत्याचार,लुटपाट,हिंसा,धार्मिक दंगे जो हो रहे हैं उन्हें रोकना अतिआवश्य भी है तो असंभव भी हैं। सदगुरु जांभोजी ने हिंदू-मुस्लिम के वाद- विवाद से ऊपर उठकर एकता की मिसाल कायम रखी हैं। आज बिश्नोई सम्प्रदाय अपनी संस्कृति को देश भर में यानि पर्यावरण और जीवसंरक्षण करके यह संदेश फैलाने का काम कर रहा हैं। लेकिन हम युवा पीढ़ी स्वयं को अतिआधुनिक मानने के साथ भारतीय चिंतन-दर्शन से कोसों दूर चले गये हैं। आज बिश्नोई सम्प्रदाय की होने के बावजूद जब मुझे बिश्नोई समाज की जीवन पद्धति के बारें में लिखने को कहा गया लेकिन मेरे लिए यह काफी मुश्किल भरा कार्य हैं। अर्थात् गुरुदेव के बताये गये 29 नियम ही हमारे समग्र जीवन का विकास कर सकते हैं लेकिन जब हम इन नियमों का पालन करने की कोशिश करेंगे तब बिश्नोई कहलाने के हकदार हैं।
खैर जैसा कि गुरुदेव जांभोजी ने बताया – विष्णु- विष्णु तू भण रे प्राणी,पैखे लाख उपाजूं।
रतन काया बैकुंठे वासो तेरा जरा मरण भय भांजू ।।
यहाँ कबीर के  निर्गुण राम की भांति निर्गुण विष्णु का स्मरण करके सहिष्णुता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है। बिश्नोई सम्प्रदाय में गुरु को अधिक महत्व दिया गया है। इसलिए गुरु के ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता हैं अन्यथा आत्मा यहीं भटकती रहेगी।बिश्नोई समाज में निर्गुण-निराकार की विष्णु उपासना की जाती हैं और गुरुदेव जम्भेश्वर ने  गुरु को महत्व दिया है। गुरु ही ज्ञान प्राप्ति के द्वारा मोक्ष की ओर ले जा सकते है। लेकिन सही गुरु की पहचान करना भी हमारा कर्तव्य हैं गुरु चिन्हों गुरु चिन्ह पुरोहित,गुरुमुख धरम बखांणी-(श्रीजम्भवाणीः टीका  पृष्ठ-1 )अर्थात् गुरु के अनुकूल गुण-लक्षण पहचान कर गुरु को धारण करो।उनसे मुक्ति अर्थात् ज्ञान मार्ग की और जाकर सद्गति प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं
अब अगर बिश्नोई सम्प्रदाय की पद्धति के बारे में बात करें तो जीवन पद्धति मानवकल्याणात्मक और जीवकल्याणात्मक हैं अर्थात् 29 नियम ही उनके जीवन सूत्र है। इसके साथ जांभोजी की शब्दवाणी सम्पूर्ण समाज का उद्धार करने वाली एक अमृतवाणी है। लेकिन याद रहे कि मनुष्य इस शब्दवाणी को सिर्फ पढ़कर बोझात्मक जीवन नैया पार नहीं कर सकता, अगर वह शब्दवाणी का अध्ययन-चिंतन-मनन करता हैं अपने जीवन में उन शब्दों को लागू करता हैं तो शत-प्रतिशत अपने जीवन का उद्धार कर सकता हैं। यानि बिश्नोई सम्प्रदाय सत्य,सहिष्णुता,शील,क्षमा अंहिसा,और जीव दया,प्रेम में विश्वास करते हैं ना कि शोषण,जातिवाद,धर्मांधता और हिंसा इन इत्यादि गतिविधियों में...  ।जो पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा करने के साथ में गुरुदेव के बताए हुए 29 नियमों का पालन करता हैं वह ही बिश्नोई कहलाने का हकदार हैं ना कि बिश्नोई समाज में जन्म से कोई बिश्नोई नहीं बन सकता।  इस सम्प्रदाय को जांभोजी ने 15 वीं सदी में स्थापित किया गया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी वर्तमान में भारत भर बस रहे हैं। वे अपने सम्प्रदाय को गौरवान्वित करते हुए देश में शांति और अनेकता में एकता का संदेश देने में कामयाब रहे हैं।
तीस दिन सूतक,पांच ऋतुवन्ती न्यारो।
सेरो करो स्नान,शील संतोष शुचि प्यारो।।
द्विकाल संध्या करो,सांझ आरती गुण गावो।।
होम हित चित्त प्रीत सूं होय,बास बैकुण्ठे पावो।।
इस सम्प्रदाय का पहला नियम नारी शक्ति के लिए बनाया गया,जब कोई महिला मां बनती है तो उसे तीस दिन तक आराम करने को कहा गया । उसे दैनिक कार्यों को करने से दूर रखा गया ताकि जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ बन सके। पुराने जमानों में महिलाओं को घर-खेती का सारा काम करना पड़ता था, अगर धात्री महिला धूप और सर्दी में इस अवस्था में काम करेगी तो उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, इसलिए उसे पूरे तीस दिन तक उन्हें आराम करने को कहा गया। उसके पश्चात् तीस दिन बाद यज्ञ करके पाहल देकर बच्चें का संस्कार किया जाता है,आज भी इस नियम का पूरी तरह पालन होता है।  इसलिए वर्तमान समाज में बिश्नोई महिला और बच्चा कुपोषण का शिकार कभी नहीं होता हैं चाहे कितना भी गरीब परिवार क्यों न हो फिर भी 30 दिन जच्चा और बच्चा दोनों की अच्छी तरह देखभाल करेगा।दूसरा नियम भी महिलाओं के लिए है वर्तमान समय में इस नियम को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दृष्टिकोण से देख सकते हैं। सकारात्मक पहलू यह है कि माहवारी के समय महिलाओं को आराम देना चाहिए । अनेकों बीमारियां इस समय पनपने की संभावना रहती है ।क्योंकि हमारी महिलाएं राजस्थान में कृषि और पशुपालन का काम करती है।पहले के जमानों में पानी वर्तमान की भांति अपने घरों में नहीं होता था । वे घड़ों से उठाकर दूर से लाती थी। ऐसे में माहवारी के दौरान भार उठाना भी हानिकारक था दूसरी तरफ उन्हें अपनी साफ सफाई की चीजें भी उपलब्ध नहीं होती थी। इसलिए बिश्नोई समाज की महिलाएं रसोईघर का काम नहीं करती थी। वर्तमान में सरकार भी सार्वजनिक स्थानों पर फ्री स्टेपरी-पैड वितरण कर रही है और महिलाओं के लिए उचित कदम उठा रही हैं।लेकिन आज कुछ लोग रूढ़िवादी मानसिकता के कारण  महिलाओं के साथ अछूत की भांति व्यवहार करते हैं और महिलाएं अपने पीरियड्स के दिन स्वंय को शर्मसार महसूस करती हैं। कुछ भी होने  पर अपने पिता और भाई या माता के साथ बात करने में हिचकिचाती हैं। हमारे गुरूदेव ने ऐसा करना नहीं बताया लेकिन लोग इसे कट्टरता और अंधविश्वास की भांति अपनाने लगे। वैज्ञानिक दृष्टि से यह अति महत्वपूर्ण नियम है और होना ही चाहिए। लेकिन अनैतिकता की दृष्टिकोण से इसको हानिकारक साबित कर देते हैं। वर्तमान समाज में अधिकांश लोग व्यवसाय और नौकरी में होने के कारण अलग-अलग रह रहे हैं और उस समय काम से आकर कब कोई महिला खाना खिलाएंगा और कब तक इंतजार करती रहेगी? आज इलेक्ट्रानिक बर्तन उपलब्ध है  और रसोई घर के बाहर स्वयं के लिए कहीं स्वीच में लगाकर खाना बना सकती है।कई बार हमारे पाखंड साधु महिलाओं को रजोस्वला के पांच दिन घर-आंगन में प्रवेश नहीं करने की हिदायत देते हैं क्या वर्तमान समय में संभव हैं?इस प्रकार जांभोजी ने कई महत्वपूर्ण नियम बताएं जिसमें होम-जप और तप को सबसे महत्वपूर्ण माना गया। स्वच्छता अभियान हमारी सरकार आज चला रही है लेकिन गांधीजी से पहले गुरूदेव ने स्वच्छ पर्यावरण के साथ स्वच्छ समाज का निर्माण करने के लिए  विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रखकर स्वच्छ मन से प्रकृति को बचाने की पहल की।
इसके अलावा मनुष्य का व्यक्तित्व विकास किस तरह के वातावरण में रहने से होता है और कैसे साथियों के साथ रहना चाहिए यह भी बताया हैं।आजकल हम अंधभक्ति की भीड़ में अपने आप को कब मिटा देते है, यह स्वयं को भी पता नहीं चलता हैं आदर्श गुरु जांभोजी ने अपनी शब्दवाणी में बताया हैं  - 
 उतिम संग सु संगू,उतिम रंग सु रंगूं
उतिम लंग सु लंगूं,उतिम ढंग सु ढंगूं
उतिम जंग सु जंगूं,तांथै सहज सु लीलूं
संजम सुपंथू,मरतकि मोख दवारूं(सबद-37) वर्तमान में संगति में अपने भविष्य और राष्ट्र निर्माण के लिए अपने आप के बनाएं रखना अति आवश्यक है। अपने आप को विभिन्न प्रकार की प्रदूषित विपदाओं से तब ही बचा सकते हैं जब हमारी संगत् किसी उत्तम और चरित्रवान व्यक्ति की है। हमारे आस-पास के बिश्नोई और अन्य युवा वर्ग एक तरफ तरक्की करते देख रहे हैं,वहीं दूसरे ओजस्वी और तेजस्वी युवा अपना और समाज का विनाश किस तरह करने लगे हैं जैसे- चोरी-डकैती,नशे की लत में ड्रग्स,शराब,अफीम,तम्बाकु इत्यादि बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। बिश्नोई समाज पर्यावरण रक्षक,शुद्ध शाकाहारी और जीव-दया और अहिंसा में विश्वास और सहयोग करने के नाम से जाना जाता है।वहीं राजस्थान के कुछ जिलों के बिश्नोई समाज के युवा पीढ़ी दिन-ब-दिन गलत संगति के कारण आज खुंखार लुटेरे,शराबी और ड्रग्स लेने की लत में पड़ गए/ पड़ रहे हैं और इन सब शौक़ को पूरा करने के लिए अमानवीय और हिंसात्मक रवैया अपनाते हैं। अर्थात् (मैं इस आलेख और मंच के माध्यम से जांभाणी साहित्य की अकादमी से अनुरोध करूंगी कि बिश्नोई समाज के मूल्य और संस्कृति को बनाएं रखने के लिए जांभाणी साहित्य के माध्यम से इस पीढ़ी को सुधारने का प्रयास

अधिक से अधिक किया जाएं ताकि हमारी युवा पीढ़ी को समय रहते काल के मुंह से बचा सकें।) गुरुदेव जांभोजी ना सिर्फ एक साधारण संत थे बल्कि वे अंतर्यामी महापुरूष थे। उन्होंने अपने काल और वातावरण में रहने वाले लोगों का ही सिर्फ मन नहीं पढ़ा बल्कि भविष्य में आने  वाली पीढ़ी के लिए भी उपदेशात्मक ज्ञानवर्धक संपत्ति छोङ कर गए हैं। अब तय हमारी वर्तमान समाज और युवा पीढ़ी को करना है कि वे गुरूदेव की वाणी की गरिमा किस तरह बनाएं रखेगें...।
हिंदू होय कै हरि क्यूं न जंप्यौ,
कांय दह दिस दिल पसरायौ?
सोम अमावस आदितवारी,
कांय काटी वंणरायौ
गहण गहंतै वहंणि वहंतै,
निरजळ गयारसि मूळि वहंतै
कांय रे मूरिखा पालंग सेज बिछायौ
जा दिन तेरै होम न जाप न तप न क्रिया....(सबद-6, श्री जम्भवाणी : टीका, पेज29)सदर्भानुसार स्पष्ट रूप गुरुदेव ने धर्म के नाम पर खाने वालों को चेतावनी देते हुए कई प्रश्न किये हैं। अर्थात् कहा हैं कि अगर स्वयं को हिंदू मानते हो तो फिर ईश्वर का स्मरण क्यों नहीं किया?अपने मन और इन्द्रियों को वश में नहीं रख सकते हो। अमावस्या और रविवार को कभी उपवास नहीं किया । और गुरुदेव बार-बार प्रश्न करते हैं कि आप किस तरह के हिंदू हो ?पर्यावरण की चिंता किए बगैर वृक्षों को काटते हो,स्त्री को भोग की वस्तु समझकर उसके शुभ-अशुभ घड़ी में भी अपनी तृप्त लिप्साओं में डूबे रहें।इस अमूल्य जीवन को मोह,माया,ईर्ष्या-द्वेष में अपनी युवावस्था को व्यर्थ कर रहे हो। अर्थात् होम,जप-तप,ध्यान करके अपने मनुष्य जीवन को अमूल्य बनाना चाहिए ना कि इस तरह जीवन को कलंकित करना चाहिए। अतःहमें गुरुदेव की वाणी को कालजयी ना कहकर इसे प्रासंगिक कहना चाहिए क्योंकि 1500 साल पहले की वाणी आज भी हिंदू और मुस्लिम धर्म की आड़ में छुपकर अपना और समाज का विनाश करने वाले पाखंड,युवा और ढ़ोगियों पर लागू होती हैं।
सुण रे काजी सुंणि रे मुल्ला सुणि रे बकर कसाई।
किण री थरपी छाळी रोसो किण री गाडर गाई?
कांढै भागै करक दुहेली जायौ जीव न घाई।
थेतुरकी छुरकी भिसती दावौ खायबा खाज अखाजूं।
चरि फिरि आवै सहजि दुहावै तिंहका खीर हलाली।
तिंहकै गळै करद क्यौं सारो थे पढि गुंणि रहिया खाली।(सबद-7,श्री जम्भवाणी : टीका,पेज नं.33) गुरुदेव जांभोजी ने केवल हिंदूओं को ही नहीं बल्कि धर्म के नाम गाय-बकरियों का कत्ल करने वाले मुसलमानों को भी धिक्कारा हैं।उन्होंने मूक प्राणियों को मार कर बलि देने वालों की मुर्खता पर कबीरदास की भांति सवाल किया हैं।उन्होंने कहा कि गाय बकरी का दुध पीना जायज हैं लेकिन इनके गले पर सुरी चलाना कौनसा उचित कर्म है? अर्थात् पढे-लिखे लोग भी इस पंथ को अपनाते है फिर उनका ज्ञान कहां है?अर्थात् आज भी राजस्थान में अन्य राज्य की तुलना में काफी ज्यादा लोग शाकाहारी है। उनमें बिश्नोई शुद्ध शाकाहारी होते हैं उनमें भी अधिकांश लोग होटल और बाहर खाना नहीं खाते हैं। अर्थात् इसके साथ हर घर में गाय और अन्य जानवरों के साथ पालतू जानवर भी देखने को मिलेगें। बिश्नोई समाज में भेड़-बकरियां,मुर्गी का पालन नहीं किया जाता हैं,क्योंकि उनको अधिकांश रूप से कसाईखाने में बेचा जाता हैं। इसलिए ग्रामीण लोग गांव की आवारा  पशुओं के लिए गोशाला बनवाते हैं उनमें सभी समाज के लोग मिलकर चारे-पानी की व्यवस्था करते है। अन्य वन्य जीवों का भी बिश्नोई संप्रदाय संरक्षण करता है।
इस सम्प्रदाय में पशु पालन अधिकांश रूप से दुग्ध उत्पादन के लिए करेंगे लेकिन कसाईखाने में ले जाने वाले व्यापारियों को  पशुओं कभी नहीं बेचेंगे। राजस्थान में गाय और वृक्षों के लिए समाज के लोगों ने अपने प्राणों की बलि दी हैं। गुरूदेव की भांति राजस्थान के कई ऐसे लोकदेवता हुए जिन्होंने गायों के लिए अपना बलिदान दिया। जैसे-वीर तेजाजी,पाबूजी,रामदेव आदि। खेजड़ली आंदोलन में अमृतादेवी सबसे पहले पेड़ों के यह कहते हुए चिपक गई- सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण। अर्थात् क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर कर सिर धड़ से अलग कर दिया फिर उनकी पर्यावरण के लिए तीन बेटियां और अमृता देवी के साथ 363 लोगों  ने अपना जीवन बलिदान देकर वृक्षों की रक्षा की थी । आज यह अमर गाथा देशभर के स्कुलों मे पढ़ाई जाती हैं और वर्त्तमान राजस्थान सरकार ने बिश्नोई हुतात्माओं के सम्मान के लिए खेजड़ली शहीद दिवस को अवकाश घोषित किया हैं। अर्थात् अपने आप में कई प्रकार की बुराईयों और कुरीतियों से ऊपर उठकर अच्छाई धारण करना ही बिश्नोई धर्म हैं। वर्तमान परिस्थियों के अनुसार समझदार और शिक्षित वर्ग को गुरुदेव जम्भेश्वर के मूल्यों पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता हैं।वरना राजनीति के गंदे किचड़ को जाने-समझे बिना ही अपनी-अपनी बीन बजाकर देश में एक-दूसरे अराजकता का माहौल बनाते रहेंगे ओर उनके चगुंल में सामान्य समाज दिग्भ्रमित होकर अपना विनाश करती रहेगी।  
Milan Bishnoi (PhD Scholar)
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गुरुवार, 9 जनवरी 2020

A talk With Mai Manisha Mehent


Milan Bishnoi
Research Scholar, Department of Hindi
Central University of Tamilnadu.
Gmail- milanbishnoi@gmail.com

A talk With 'Transgender welfare Board Haryana's President Mai Manisha Mehent'  (10th May 2019)


1. Milan Bishnoi- I have heard a lot about you but I wish to know from you about your birth place, family and education? 
Mai Manisha Mehent- My life is purely indigenous. However, my birth and elementary education is from city Karnal of Haryana but in the later years of my life due to adverse circumstances I moved to village Bhunna in Guhla-chikka of Kethal district located in Haryana. Thus, I am positioned and live here as Guru Mangalmukhi of transgender society. Other than my 
parents in my family I have four siblings as well in Karnal. I belong to a middle class family. 
2. Milan Bishnoi- Sister (Didi) you frequently mention your mother but then why had you to stay away from her? 
Mai Manisha Mehent- on one hand, I believe that physical distance is painful on the other hand, the spiritual or inward union is satisfactory and pleasurable and with my family I share this kind of experience. And as far as my mother is concerned in terms of distance I would say it is quite a detesting custom which is now dying off. I believe that in near future no one should go through such experiences. 
3. Milan Bishnoi- Yourself as a mother is raising two daughters how was your experience? Did you face any challenge in the society or from the government while adopting them? 
Mai Manisha Mehent- Yes! By the grace of Goddess I am a mother of two daughters and as a transgender it is a privilege and a heavenly experience for me. Apart from couple of people having poor mentality if I talk about others I got a positive response from everyone. They expressed their happiness towards this action and cooperated with me. Of course, legally I had to face many problems but everything is fine. In fact, now I am preparing to go to court regarding the matter of transgender’ adopting child so that the problems and hurdles which I faced in future no one should face. 
 4. Milan Bishnoi- How many siblings are you and how often do you meet them? 
Mai Manisha Mehent- We are five siblings and now we do not share the same connectivity. Now we don’t meet frequently if someone needs help or if we feel like sharing something we try to meet. We use to share strong bonding before my younger sister got married but after her marriage we could not meet or perhaps she is busy in her domestic life. What else one can do than think in this way.
 5. Milan Bishnoi- You became chairperson of transgender board in such a young age… I wish to know more about your success journey? 
Mai Manisha Mehent- I do not take the chairmanship of transgender board as my success rather I take it as a responsibility which is on my shoulder. It will be success only when I will be able to bring my community in the mainstream which will no more be identified only by clapping or playing anklets instead, when (transgender) people will be educated and will be appointed on reputed positions it will be a real success.
 6. Milan Bishnoi- What is your opinion on article 377? 
Mai Manisha Mehent- I do not wish to discuss article 377. I believe those who have struggled for it have done wonderful job but I don’t want to hurt anyone by passing any kind of harsh comments judgment. 
7. Milan Bishnoi- Nowadays, there are transgender amphitheater and superior monks how are they going to benefit the transgender community? 
Mai Manisha Mehent- Of course, it is beneficial transgender arena and monks will help us to get back our lost identity and thus, the transgender community will be able to reconnect with religious beliefs and will be able to pursue and progress towards righteousness. Although, we are monks, saints since birth and we do not need a certificate. Our actual identity is eternal therefore, it is a good initiative.
 8. Milan Bishnoi- It is observed that transgender are not much educated so what are the provisions for their employment? 
Mai Manisha Mahent- Definitely 99.9 transgender are not educated. Government has to introduce several schemes so that the next generation’s future will be secured and also the government should facilitate several educational, political and social rights to them. This will definitely help them to have a secure life and common people will not be able to torture them. 
 9. Milan Bishnoi- How and what have you decided for the coming generation in terms of their secure future, what are you thinking and planned regarding the transgender education … Did you demand anything from the government? 
Mai Manisha Mehent- Of course we wish to have the next transgender generation should be completely educated and employed. I have read Dr. Bhimrao Ambedkar and I understood that if minority to be brought in the mainstream than it should be offered some special rights. Otherwise already developed castes will continue to exploit and insult them. Unless, the transgender are not provided reservation in politics, education and employment they will remain minors only. Currently without much disturbing the transgender persuasion of job if the new generation is connected with education than it will be a success as much as bringing the Kohinoor diamond back from Britain. This is not possible without having special rights because people’s mentality is badly affected in regard with transgender.
 10. Milan Bishnoi- In Literature transgender considerately has become more prominent how do you look at it? 
 Mai Manisha Mehent- Literature is such a platform which can give life to even dead people. A serious consideration on transgender is an indication that we are on right path. But if transgender community gets connected with Literature than it will be icing on the cake. Through the literature people have started keeping positive approach and are now able to understand them. Above all, those who are working in the favour of transgender their efforts and practice is commendable. 
11. Milan Bishnoi- You also write stories and poems than why did not you think of writing an autobiography? If you write people will get to learn and understand about you? 
Mai Manisha Mehent- I am fond of writing stories and poems since my childhood. My feelings and emotions which I do not like to share with anyone I use to write that in form of story and poems and I use to feel light by doing such practice. I did not think about autobiography as you have mentioned I will definitely think about it. 
 12. Milan Bishnoi- I would like to understand the definition of term like transgender because it has always been controversial and term like eunuch I do not find appropriate to use. 
Mai Manisha Mehent- There are too many illusions attached with the term transgender and the etymology of term eunuch begins from Latin and Greek. Third gender is a word which is indicative word which specifies the person about whom you are discussing is different from the other two genders which is masculine gender and feminine gender. However, in Indian scriptures the term transgender is used and addressed as mentioned but with the passage of time unintentionally the term eunuch markets prominence. Eventually, if one looks into history will find if the person is mentioned as partially as man than obviously it is in regard with the transgender. 
 13. Milan Bishnoi- In this competitive world how far is the mental grow of transgender children gets affected? How do these children keep themselves strong enough after facing such hardships?
 Mai Manisha Mehent- The hardships of life do affect the mentality of transgender children because of which they become hardhearted and even sometimes fail to understand others’ feelings. In order to change the situation the common public need to behave normal irrespective of prejudices so that they equally become emotional and normal people. We need to work together to change transgender from hard to emotional and all this is possible not by treating them badly and taunting them instead we need to show humanity. 
 14. Milan Bishnoi- Due to incessant unemployment we can see that the youth is not able to maintain mental balance and quite a few are even committing suicide therefore, what is the status of transgender youth and how do they maintain mental balance? 
Mai Manisha Mehent- Similar to unemployed youth the transgender are also committing suicide and its ratio is quite shocking but due to certain social scenario such issues are suppressed and society does not allow these issues to come into notice. One starts facing this since his/her childhood and results into mental tension, loneliness and usual treatment of taunting and torture given by family members. I would never say that transgender society is strong enough to handle such situation. 
15. Milan Bishnoi- In literature the transgender Gurus are usually mentioned as a part of your culture. I would like to know from you that how and on what basis a disciple is made or chosen? 
Mai Manisha Mehent- I feel proud to say that transgender society has a culture of Guru and disciple and in today’s world the culture is still followed honestly. In a transgender society the one who is eligible as a disciple must follow and abide certain custom and culture of that particular (leader house). Keeping all this in consideration that nominee is asked to follow certain customs and rituals to become the disciple. This practice is similar to the bridal ceremony before appointing one as disciple the nominee is given different treatments. The person is treated with turmeric paste than she is dressed as a bride and taken to different temples for worship and everybody gifts her with different presents and the Guru also gives gift and accepts her as his disciple. 
16. Milan Bishnoi- I would like to know more about the transgender society its culture and customs? Mai Manisha Mehent- There are too many religion, sect and perceptions in transgender society. These are wide and different in all the states. For instance, we belong to the transgender Kings of Haryana- Punjab and there we were the courtier transgender therefore, we have all the old documents with us which were prepared by the Kings. Thus, many of our cultural practices are royal in nature. Every state has its own belief and cultural system. Alone Haryana-Punjab follow a Sufi culture rest everyone follows and abide the dharma and culture that one belongs to and believe in. Although the transgender are converted into Islam as well which is affected due to the formation of transgender arena. 
17.Milan Bishnoi- I learned this from the literature regarding the ‘death rituals’ that after the death of a transgender the body is beaten badly and its funeral pyre is conducted in the night. Is it ture?
Mai Manisha Mehent- I don’t know who is spreading such rumours that transgender commences the death funeral in the night. This is so uncivilized to even listen that the dead body is beaten badly so how one can even do such thing. When a transgender dies all his family members are neighbours are called for the funeral ceremony and all those who have spent years with such a person can never allow such thing to happen with its body that too when you are part of a democratic country like India where constitution is the supreme lord. This is just a rumour which is spread by writer, storyteller and Filmmakers.
 18.Milan Bishnoi- Generally one notices caste-ism. Is there anything like in transgender community? 
 Mai Manish Mahent- Definitely, transgender do have caste-ism and discrimination is equally evident in the community. But this thing is different that due to Guru – disciple culture one cannot raise voice and if someone raises voice against this and knocks the law for justice than police does not cooperate for proper investigation. I cannot ignore the truth this has always happened even if the transgender community pretends to ignore this. 
19.Milan Bishnoi- How is the work such as demanding money on the birth of child, begging for money on railway stations, rituals are divided? 
Mai Manisha Mehent- There is no such thing like distribution of tasks of course, it is divided under the Guru-disciple culture. This distribution is based on the similar attitude where a son is given the property of his father. The religious practices are based on ones beliefs.
 20. Milan Bishnoi- How is the property of transgender gets distributed?
 Mai Manisha Mehent- The transgender’s property is distributed in a usual manner like that of a common man. Whatever property one possess is distributed equally to his children. Similarly, the distribution of property is based on the number of disciple a Guru has. Otherwise under the name of property the transgender has that particular area where he goes to demand money and this is equally divided among the disciples. 
 21. Milan Bishnoi- You often say I am going to demand (badhai) money from people. Do you offer your money to your Guru? 
Mai Manisha Mehent- Definitely! I give my share of money to my Guru but it’s completely my wish. A few Gurus forcefully take money from their disciple and it has come in notice that some Gurus demand more than they are offered. But I believe that sharing some money with Guru is paying respect to the Guru. Because in the old age the Guru depends on the money given by the disciple so that he can fulfil his needs such as medicines and all. 
22.Milan Bishnoi- Usually I see there are separate doctors for woman and man are you also facilitated with such kind of special treatment for transgender community when you visit hospitals? Mai Manisha Mehent- No! there is no as such special treatment given in the hospital and many a times doctor do not take us seriously and even hesitate to give us treatment. 
23.Milan Bishnoi- What kind of provision is fixed in issuing discipline and punishment in transgender community can you please throw some light on this? 
Mai Manisha Mehent- Discipline quite varies in all the different houses of transgender community and the situation and rules may also vary but the nature of punishment is similar only. Only it depends on the kind of punishment the culprit has done. In some cases the culprits are charged fine in terms of money. Whereas, in some cases the culprits are discarded from their community itself. 24.Milan Bishnoi- The way we have separate schools for girls don’t you wish to have a separate school for transgender children. Means what do you expect from the government regarding the education of transgender children’s education? 
Mai Manisha Mehent- We are quite serious regarding the future of transgender children in terms of education and safety, but we are against separate school and college. We wish to connect the transgender with the mainstream. But if you keep them separate from others and provide them education and other facilities than instead of connecting them you will seclude them mentally and physically from the mainstream which is already disconnected from the mainstream. Therefore, instead of making separate school and colleges the transgender children should be given education with the normal children so that they can develop better understanding. There is only one demand from the government that the transgender children should more and more be connected with the education. 
 25.Milan Bishnoi- With this last question what message would you like to give to the writers and scholars? 
Mai Manisha Mehent- To the writers and scholars I wish to say that do not limit yourself mere to the degree and projects or writing books instead, helps transgender in establishing and fighting their rights whether it is social or legal. I request them to cooperate and help transgender in terms of mental, social, physical and financial condition and make the government aware of it because more than transgender you know more the transgender community whom you have understood better through words and learn more about them through words.
                                                                                                              (Translation Credit-Ritu Sharma)