मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

'किन्नर कथा’ में संघर्ष और सफलता





Aayushi International Interdisciplinary Research Journal (ISSN 2349-638x) Impact Factor 5.707  Peer Reviewed Journal www.aiirjournal.com,page no. 78-81

                     किन्नर कथा में संघर्ष और सफलता
                                                                                  
       हिंदी कथा साहित्यकार महेन्द्र भीष्म द्वारा लिखित किन्नर कथाउपन्यास बेहद चर्चित और प्रासंगिक माना जाता है। इस उपन्यास ने आधुनिक समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में सफलता हासिल की इसमें कोई दोहराय नहीं हैं,लेखक ने पूरी शिद्दत के साथ किन्नर समाज के संघर्ष को कथा के अंत में मानवीयता का दर्जा दिलाने में सफलता प्राप्त की है। कथा की शुरुआत राजघराने में जन्मोंत्सव से और अंत विवाह उत्सव के साथ होता हैं,लेकिन कथा के बीच में कई ऐसे मोड़ आते है, जो पाठकों को झंकझोर देने वाली जिज्ञासा पैदा करते है। जगतराजसिंह जैतपुर के राजा रह चुके हैं उनके घर किलकारी गूंजने का वक्त करीब है, फिर भी वह चित्रकूट चले जाते हैं। जैतपुर की सिध्दहस्त दाई निरंजना को रानी की देखभाल के लिए रखा जाता हैं,जो पल-प्रतिपल रानी साहिबा का ध्यान रख रही थी। रानी आभासिंह का स्वभाव राजा जगतसिंह से बिल्कुल अलग था। रानी साहिबा रूप के अनुरूप गुणवती और दया की प्रतिमूर्ति तथा ईश्वर पर अगाध विश्वास रखने वाली रानी साहिबा लोगों में प्रशंसनीय थी। ईश्वर भक्ति और उनके सुकर्मों कारण ही दुष्ट और दम्भी स्वभाव के राजा जगतसिंह पर ईश्वर की कृपा रहती हैं । उसके सारे काम चुटकियों में बनते जाते है। शत्रु पक्ष कभी उस पर हावी नहीं हो पाता। रानी आभासिंह की ईश्वरीय आराधना और जगतराजसिंह मनौती के लिए प्रत्येक अमावस को कादमगिरि जाकर परिक्रमा  करना व निरंजना की निश्छल अंतर्मन की पुकार से वर्षों बाद रानी साहिबा की गोद भर गई । उन्होंने दो जुड़वां स्वस्थ कन्याओं को जन्म दिया।  लेकिन ईश्वर ने यह लीला कुछ अलग तरीके रची थी। यह बात निरंजना के अलावा किसी को पता नहीं था,लेकिन निरंजना के चालीस साल के अनुभव में  यह  पहली चौंक्काने वाली घटना थी। निरंजना को समझ नहीं आ रहा है कि वह रानी को किस तरह बताये। यह सब देखकर अवाक् रह गई उसके मुंह से कोई लफ्ज नहीं निकल रहे थे,कैसे कहे वह कि इन दोनों में से एक बच्चा न लड़की है और न ही लड़का है। वह हिजड़ा है,हिजड़ा... रानी जब निन्द्रा से जागती है तब निरंजना को ईनाम/भेंट लेने का आग्रह करती है तो निरंजना विन्रमता के साथ हाथ जोड़ती हुई रोने लगती है,तब निरंजना से रोने कारण पूछने पर दिल पर पत्थर रखकर कहती है, मालकिन, देखो ई...के ...मोय लगत जो हिजड़ा भओ है।... “क्या?” (किन्नर कथा 16)  एक साथ सैकड़ों बिजलियां आभा की आंखों के सामने कौंध गईं।  कभी वह अपने हिजड़े बच्चे को देखती तो कभी सामने खड़ी निरंजना का मुंह ताकती,क्या करें क्या न करे? आभा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था ...बाद भरे गले वह निरंजना से बोली, काकी अब हमाई सबकी लाज तुमाए हाथन है । तुम तो दायजू को सुभाव जानती हो,कितेक गुस्सैल हैं वे,जा खबर तो वे बरदाश्त न कर पेहें,दायजू भी...उने पतो परे तो वे ई नन्हीं-सी जान खां मरवा डारे,काकी तुमे  हमाई सौगंध...तुमे जो रुपइय्या पईसा चाऊने हो, मैं मौ मांगी करों, पर तुमें ई  बात हां एकदम गुप्त रखने ।(किन्नर कथा 16) आभा को आंगिक विकृति वाली संतान देखकर घबराहट जरूर हुई लेकिन जिस रूप में है उसे स्वीकार्य करती है,परन्तु पति के क्रुर स्वभाव के कारण डर रही है कि कहीं जगतराजसिंह को पता चलेगा कि उसकी  बेटी  हिजङा है तो वह अवश्य उसे मार देगा इसलिए निरंजना से प्रार्थना करती है कि सोना के अधूरेपन की भनक किसी को ना लगने दे । अगर यहां आभा की जगह आम स्त्री को भी जन्मदात्री के रूप देखें तो वह मां भी अपने पति से आंगिक रूप से विकलांग बच्चे को छुपाने की कोशिश करती,क्योंकि मां समाज के ताने सहन करके भी अपनी संतान को किसी भी रूप को स्वीकार कर लेती है,लेकिन पिता को समाज में इज्जत,सम्मान और संतान प्यारी लगती हैं परन्तु जिस संतान पर लोग अंगुली उठाए,खानदान को कंलकित करें, उस संतान को कभी स्वीकार करने कोशिश तक नहीं करते । इसी तरह जगतराजसिंह भी अपनी बुंदेला खानदान में सोना के हिजङापन को कभी नहीं अपनाएंगे इस बात का भय रानी आभासिंह को था,वह डर के कारण निरंजना से अनुनय-विनय कर रही थी।
          रानी आभा और निरंजना कई दिनों तक बच्ची के अधूरेपन की भनक तक जगतराजसिंह को लगने नहीं दी,परन्तु एक दिन सारा राज जगतरासिंह की आंखों के सामने खुल ही जाता हैं। जिस बात का आभा को डर रहता था,वैसा ही कुछ हुआ। क्योंकि विपरीत लिंगी संतान को स्वीकार करने की पहल राजघरानों में भी नहीं की गई इस बात को लेखक सांकेतिक भाषा में उपन्यास के माध्यम से बताने की कोशिश कर रहे है।
जगतराजसिंह रूपा और सोना को बारिश में क्रीङा करते हुए देखकर अतिप्रसन्न हो रहे थे,कुछ समय पश्चात जब जगतराजसिंह बेटियों को सीढ़ियों से नीचे ले आ रहे थे,तब सोना निरंजना को देखकर उनके पास जाने के लिए मचल रही थी और जगतराजसिंह उसे नीचे उतारने लगे उसी क्रम में सोना के अंगवस्त्र नीचे उतर गया उसी क्षण पिता की अकस्मात नजर सोना के जननांग पर पङ गयी । तब जगतराजसिंह की आंखों के सामने मानों बिजली गिर गई हो,निरंजना को क्रोधित लाल आंखों से घूरकर दहाङकर बोला, “विश्वासघातिनी! फिर दो कदम आगे बढ़ाकर निरंजना के चेहरे पर भरपुर झापङ जङ दिया। कृशकाय वृद्ध निरंजना कटे वृक्ष-सी गई। आभा की दाईं हथेली स्वत: अपने गाल पर जा पहुंची ।निरंजना को पङा तमचा उसे अपने गाल पर महसूस हुआ। उसे अपनी हृदयगति रूकती-सी महसूस हुई।तेज चक्कर आया और मूर्च्छित हो वहां गिर पङी,दोनों बच्चे एकाएक बदले दृश्य से घबरा उठे और रुदन करने लगे।पिता के रौद्र रूप उन्होंने अपने अल्प जीवन में पहली बार देखा... ”(किन्नर कथा 24) विवेच्यानुसार लेखक अपने  उपन्यास में  पात्रों के  माध्यम से समाज के राजशाही वर्ग का पर्दाफाश करने की जद्दोदहद कोशिश कर रहे हैं जैसा कि सोना के अविकसित जननांग देखकर गीदङ की तरह फङफङाकर निरंजना पर जगतराजसिंह झङप पङते हैं । निर्दोष,स्वामिभक्तिन निरंजना को अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह से गोली मरवाकर मगरमच्छ का भोजन बनवाने में देर नहीं करता। वैसे तो भारत देश भले ही लोकतांत्रिक देश है,लेकिन सत्ता में आए कुछ नाममात्र के शासकों ने सेवाभावी रक्षकों,मजदूरों का सदैव शोषण किया है। जगतराजसिंह के आदेश को पुरा करते हुए उनके स्वामिभक्त पंचमसिंह ने ना जाने निरंजना जैसे  कितने गरीब स्वामिभक्तों को मौत के घाट उतारा होगा।
दद्दा हम तुम्हें अपनों बङों भैया मानत हैं। तुमाए पुरखा जैतपुर रियासत के दीवान रहे,.....बुंदेला खानदान को नाम डुबा दें,क्षत्रियवंश में हिजङा,का ऊ हिजङा हां पाले-पोसे अरे आज नहीं तो कल,जब सबके सामने जा बात आ जेहे कि हमाई संतान हिजङा है,बुंदेला खून हिजङा पैदा करत तो का गत हुई हमाई, समझत काय नईय्या तुम इत्ती सी बात” (किन्नर कथा 27)  लेखक पात्र के माध्यम से समाज में पौरूषात्मक की अकङ,झूठी शान-इज्जत,पर्दे के पीछे छुपे क्रूर,निर्दयी जो समाज में स्वयं को रक्षक मानने वालों का कलम के माध्यम से दोगलेपन को बताना चाहते है। जैसाकि जगतराजसिंह सोना को बुंदेला खानदान का कंलक मानते हुए अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह द्वारा अपनी हिजङा औलाद को मारने का आदेश देते हैं खैर पंचमसिंह ने राजा का आदेश शिरोधार्य मानते हुए निरंजना को मौत के घाट उतार दिया किन्तु सोना को जंगल में मारने के लिए चाकू निकालते है उसी समय उनकी अंगुली कट गई तब सोना ने अरे कक्काजू तुमाई उंगली पे खून... (किन्नर कथा 35) ऐसा कहते हुए पंचमसिंह की घायल  उंगुली पर अपने बालों के सफेद फीते से पट्टी बाँधी दी । सोना के इस प्यार ने पंचमसिंह का पत्थर जैसा दिल पिघाल दिया। उसी क्षण सोना के प्रति मन बदल लिया और सारे किए गए पापों का पाश्चताप करने लगे । वहां से कुछ ही दूरी पर आश्रम था पंचमसिंह अविचलित मन से सोना लेकर वहां पहुंच गये,जाकर महंतजी के पास कुछ समय तक बैठे ओर सोना भी चबूतरे के पास खरगोश के साथ खेलने लग गई। कुछ समय पश्चात पंचमसिंह ने मंहतजी से सारी व्यथा बताते हुए सोना के आंगिक विकृति के बारे में बताया और जगतराजसिंह द्वारा सोना की हत्या करवाने के लिए भेजा गया लेकिन अब वह हत्या न करके निर्दोष सोना को बचाने के लिए महंतजी से मार्गदर्शन चाहता हैं।
 महंतजी अपने आश्रम आई  किन्नर गुरू तारा का परिचय पंचमसिंह से करवाते हुए उसे सोना को सौंपने का आग्रह करते हैं और पंचमसिह तारा को सोना सौंपते हुए चेतावनी देते हैं कि बुंदेला राजा ने हिजङा बच्चा समाप्त करने का आदेश सुनाया था,परन्तु काम तमाम करने से पहले हाथ थम गये थे ।  पर एक बात पक्की सुन लो तारा ,महंतजी आप गवाह हैं। इस बात का  पता किसी को नहीं चलना चाहिए कि ये मोङी दायजू सरकार की या उनके वंश की है। दूसरी बात मैं कुछ देर में इतना धन दे जाता हूं कि जिंदगी भर ई बिटिया के लालन-पालन के बाद भी कमी न हुए और आखिरी बात,जैतपुर से पच्चीस मील की दूरी बनाए रखियो,नहीं तो काल को मौ देखो। (किन्नर कथा 41)पंचमसिंह तारा को सोना सौंप देते है उधर आभासिंह का रो-रोकर बेहाल हो गया है। उसे निर्दोष निरंजना और सोना के प्रति चिंता काटे जा रही है उसे लग रहा है कि पंचमसिंह और जगतसिंह ने कुछ जालसाजिश की होगी ।लेकिन रानी के कष्टों को कोई समझ नहीं सका । अब तारा सोना को अपने साथ किन्नर डेरे में ले जाने के बाद मातिन को सौंपते हुए उसका अच्छे से पालन-पोषण करने की सलाह देती हैं । लेकिन रातभर सोना के भविष्य को लेकर चिंतित और परेशान होती रही कि लोग किन्नरों को क्यों अपनी संतान के रूप नहीं अपनाते हैं।  बच्चों का क्या दोष उन्हें द्विलिंगीय समाज के लोग मौत के मुंह पहुंचाने में देर नहीं करते। या फिर मंदिर की सीढियों,कुङेदान  इत्यादि जगहों पर फेंक देते है। कुछ माता-पिता ऐसे बच्चों को अपना भी लेते हैं। परन्तु समाज के लोग हिजङे बच्चे के बङे होने के साथ-साथ स्त्रेण भावनाओं का भद्दा मजाक उङाते हैं । उन बच्चों के साथ असंवेदनशील व्यवहार करते है जैसा कि तारा के साथ हुआ/होता रहा है ।
तारा उपन्यास की सबसे अधिक संघर्षशील पात्र रही है। तारा का संघर्ष केवल द्विलिंगीय समाज साथ ही नहीं बल्कि नकली किन्नरों के साथ अपने हक के लिए संघर्ष करते हुए प्राण गवाने पङे। तारा कभी व्यसायिक परिवार तारा चन्द्र अग्रवाल के रूप में जाने जाते थे,स्त्रैण भावनाओं के कारण उसके बङे भाई को कतई पसंद नहीं था फिर 17-18 वर्ष की उम्र में भाई के कारण घर छोङ दिया । जीवनभर संघर्ष किया और किन्नरों के साथ रहते हुए तारा गुरू के रूप अपने आप को स्थापित किया। धीरे-धीरे अतीत को भुलाते चली लेकिन मां-बाप की याद हमेशा सताती थी,परन्तु कर भी क्या सकती। घर के सारे द्वार उसके लिए सदा के लिए बंद थे ।लेकिन एकदिन मां की मौत का समाचार मिलने पर वह श्मशान घाट पर जाती हैं, अंतिम संस्कार करवाने के लिए। वहां तारा को अपनी मां का मुंह तक नहीं देखने देते। वहां उसके भाई-भतीजे फटकार लगाकर भगा देते है, अगर दो-तीन हिजङे साथ नहीं होते तो मार-पिटाई भी कर देते। तारा ईश्वर को कोसते हुए रो-धोकर वापस अपने चेलों के साथ डेरे में आ गई ।  
अब सोना को किन्नर समाज में सम्मलित कर लिया और सोना को अब सभी चंदा के नाम से जानने लगे है।  तारा चंदा को  बधाई के लिए कहीं नहीं भेजती है, वह घर में मातिन के साथ रसोईघर में ही सहयोग करती ।तारा ने चंदा के लिए घर में पढ़ाई-लिखाई और गायन कलाओं को सिखाने की व्यवस्था की और चंदा भी पूरी तरह इन सब में डूब चुकी है । कथा में आधुनिक और बदलाव का मोंड आता है, जब तारा का भतीज मनीष चंदा से प्यार करने लगता है और दुसरी तरफ मनीष के घरवालों ने तारा को घर बुलाकर चंदा को मनीष से दुर रखने की हिदायत देते हैं। तारा जब मनीष को सारी बात बताती हैं, उसके घर वालों के बारे में तब मनीष तारा से कहता है। यह प्यार शारीरिक प्यार नहीं है, मैं चंदा के साथ अपना जीवन शादी करके बिताना चाहता हूं। उपन्यास में लेखक मनीष के माध्यम से पढ़े-लिखे युवाओं परिवर्तित सोच को बताना चाह रहे हैं ।
उपन्यास के अंत में नकली किन्नर लंबू और उनके मित्र तारा की हत्या कर देते है ।लेकिन प्रशासन के लोग इस हत्याकांड के आरोपियों का गिरफ्तार कर लेते हैं।मनीष तारा की अन्तिम क्रिया सामान्य विधि- विधान से संपन्न करवाता है। उधर जगतरासिंह के घर में रूपा की शादी की तैयारी धूमधाम से चलती उसी शादी में चंदा को नर्तकी के रूप में बुलाते है चंदा को सारा अपना अतीत याद आ जाता और वह अन्दर ही अंदर बहुत रोती हैं, और उसी अपने घर के आंगन पिता के चरणों में जान अर्पित करने का मन बनाती है । वहां चंदा को पहचान लिया जाता है जगतराजसिंह फिर सोना को मारने का सोच रहे हैं और पंचमसिंह को विश्वासघाती समझकर उस पर  क्रोधित हो जाते हैं लेकिन अंत में चंदा को अपना लिया जाता है।  सोना का ऑपरेशन करवाने के लिए रूपा की सास अपने साथ कनाङा ले जाती हैं । मनीष भी सोना के साथ जाता हैं अर्थात् प्रेमी बनकर निस्वार्थ प्रेम करके चंदा का जीवन सफल बनाता हैं। चंदा को पाने के लिए मनीष ने  अपने घरवालों का विरोध करके चंदा के साथ खङा रहा। उपन्यास का अंत लेखक बेहद सुखद अनुभूति के साथ करते हैं । तारा के कठिन संघर्ष ने चंदा और मातिन दोनों की जिंदगी को सफल बनाया और मानवीयता का  हक दिलाते हुए पाठकों को रूढ़िवादिता से पूरी तरह उभारा हैं। उपन्यास पढ़ने के पश्चात बदलाव के भाव अवश्य उभर रहे हैं।
   मिलन बिश्नोई
शोधार्थी/स्वतंत्र लेखन
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय तिरूवारुर 610005
milanbishnoi@gmail.com

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