मंगलवार, 24 सितंबर 2019

‘मैं पायल’ उपन्यास की समीक्षा :लिंगभेद की कसौटी पर



Milan Bishno
PhD Scholar
Department of hindi
Central University of tamil nadu ,610005
mail- milanbishnoi@gmail.com
mob-9488246295
                                                                                                                                                      
                             मैं पायल उपन्यास की समीक्षा :लिंगभेद की कसौटी पर
 मानव समाज की सरंचना तीन प्रकार से बनी हैं- नर, नारी एवं नपुसंकलिंगी। सोचनीय बात यह है कि नर और नारी को समाज में आदर सत्कार मिलता है। लेकिन तृतीयलिंगी/ नपुसंकलिंगी को समाज में आदर सत्कार के बजाय उपेक्षित और तिरस्कृत निगाहों से देखा जाता है। लैगिंक विकलांगता के कारण उन्हें उपेक्षित, शोषित होने का दंश झेलने को मजबूर किया जाता है। लैंगिक विकृति वाले इंसान के साथ हो रहे भेदभावों को कथाकार श्री महेंद्र भीष्मजी ने मैं पायल उपन्यास के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उपन्यास की मुख्य पात्रा पायल के किन्नर जीवन में संघर्ष और उनके  परिवार से मिली कष्टदायी पीड़ा को लेखक ने समाज के सामने रखा हैं। इस उपन्यास में लेखक ने किन्नर पायल की वेदना, पीड़ा, संघर्ष के साथ-साथ किन्नर गुरु की अय्याशी का चित्रण किया है, साथ ही साथ पायल जैसे कई लोगों को किस प्रकार जबरदस्ती किन्नर बना दिया जाता है,उन सभी का पर्दाफाश किया गया है। इसमें एक ऐसे किन्नर गुरु का वर्णन किया गया है जो अपने निजी स्वार्थ के लिए पायल जैसी मासूम किशोरी को अपने कुनबे में शामिल करने हेतु जबरन किन्नर बनाने से पीछे नहीं हटते। लेखक ने पितृसत्ता की संकीर्ण मानसिकता का यथार्थ चित्रण किया है। इस बात को उपन्यास में पात्रों के माध्यम से भी बताने की कोशिश की है। दूसरी ओर लेखक ने यह भी दिखाया है कि किस प्रकार समाज अपनी उच्च वर्ण व्यवस्था के घमंड में तृतीय लिंगी औलाद के साथ असहनीय व्यवहार करता रहा ।
            सामान्य समाज के लोग नपुसंकलिंगी सन्तान का पालन-पोषण करने में स्वयं को कलंकित होना मानते है, जबकि  समाज विकलांग, मंदबुद्धि, रोगग्रसित बच्चों का पालन-पोषण प्यार से करता हैं। इस प्रकार अगर तृतीयलिंगी बच्चों की परवरिश भी सही तरीके से की जाए, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज में सक्षम होकर समाज के लिए ही एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हो सकते हैं। इसके विपरीत समाज उन्हें अपनाने से दूर भागते हैं, फिर वे दर-दर की ठोकर खाते हैं। इस संदर्भ में शबनम मौसी किन्नर समाज के प्रति अपना मत प्रकट करती हैं-“लोग कुत्ते को पालते हैं, उनको इज्जत देते हैं, कितने प्यार से उसको खाना खिलाते हैं, अपनी गाड़ियों में बिठाते हैं, बिस्तर पर सुलाते हैं, वह एक कुत्ता है, जब आप उसे जीने का अधिकार देते हो तो किन्नर को क्यों नही?” कथन से स्पष्ट होता हैं कि समाज तृतीयलिंगी लोगों के प्रति कितना असंवेदनशील हैं। आज किन्नर भले ही कहीं लम्बी कतार में दिखाई दे रहे है, परन्तु उनका स्थान हमेशा ही आखिरी छोर रहा है।
            उपन्यास में माँ अपनी बेटी पायल के शरीर को लेकर चिंता जाहिर करती हैं, परन्तु वह हमेशा से ही पायल के प्रति समर्पित रही है, यानि पायल को माँ के प्यार में कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई “ईश्वर को पता नहीं क्या मंजूर था अच्छी खासी लड़की जैसी लड़की लगती है।” इस कथन से स्पष्ट होता कि माँ अपनी सन्तान के प्रति भेदभाव नहीं रखती फिर भी उन्हें समाज का भय सताता है। उपन्यास को पढ़ते हुए लगता है कि किस प्रकार लोग समाज में अपने आप को ऊँचा दिखाने के लिए अपनी कोख से पैदा हुए तृतीय लिंगी संतान के प्रति दोहरा व्यवहार करते हैं। यह भी किसी से नहीं छिपा है कि समाज में अधिकतर लोगों को पुत्र मोह अधिक रहा है। मैं समाज से यह प्रश्न करना चाहूंगी कि क्या छोटे बच्चे का लिंग पूर्ण रूप से विकसित होना उसके वश में होता है? कदापि, नही यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है इस समस्या का विज्ञान भी पूर्ण रूप से समाधान नहीं खोज पायी है, यह फिर समाज जानते हुए भी अनजान क्यों है?
        उपन्यास की पात्रा पायल का जब जन्म होता है तब उसके पिता उसका मुँह तक नहीं देखता हैं क्योंकि उनको एक बेटे की अपेक्षा थी, जो पैदा नहीं हुआ और पायल ने भी विकृत लिंग के साथ जन्म लिया । कुछ दिनों बाद जब पायल स्कूल जाने लायक हो जाती है तब उसे बाहर भेजने से पहले उसके कपड़ो को लेकर बहुत सावधानी बरतते हैं, कि किसी को शक ना हो कि ये हिजड़ा है, इस दौरान पिता का गुस्सा भी साथ ही साथ बढ़ता जाता है, वे पायल को अपने वंश का कलंक मानने लग जाते हैं-“ये जुगनी! हम क्षत्रिय वंश में कलंक हुई हैं, साली हिजड़ा है...आदि न जाने क्या-क्या बकते रहते हैं।” प्रस्तुत उदाहरण से स्पष्ट है कि अगर पिता ही अपनी संतान के साथ इस तरह व्यवहार करेगा तो समाज के अन्य लोग उसे किस दृष्टि से देखेंगे? भले ही पायल के लिए हिजड़ा शब्द अबोधित हैं, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ उसे यही शब्द घृणित करते हैं। पायल के पिताजी काम पर जाते समय उसकी माँ से कहते हैं कि पायल को लड़के की वेशभूषा में ही रखना, लड़की के वेशभूषा में नहीं, किन्तु जब वे शाम को लौटकर आते हैं तब पायल को लड़की की पोशाक में देख कर आग-बबूला हो जाते हैं और पायल को  बेरहमी से पीटते हैं। “मैं हिजड़ा हूँ, मैं एक हिजड़े का बच्चा हूँ ...।” अपने साथ इस तरह से अमानवीय व्यवहार होता देख वह मानसिक रूप से कुंठित होकर घर से भाग जाने की तरकीब सोचती है और अंततः भाग जाती है।
            इस उपन्यास की पात्रा पायल ने अपने पिता की असहनीय मार और तकलीफ सहन किया तो वहीं समाज के कष्टों को भी झेला। बड़े भाई राकेश को लोग भड़काते हैं, वे ताने मारते है कि तुम हिजड़े के भाई हो तब राकेश का मन उठ जाता हैं “साला मादर...छक्के का भाई, भाई बड़ा रौब दिखाता है। सब घुसेड़ दूंगा, सारी दादागिरी धरी की धरी रह जाएगी।”  ये शब्द राकेश नशे में बोलता हैं, उन्हें उनके मित्रों ने इस प्रकार ताने दिए, वाकई में समाज के लोग किस तरह की सोच रखते हैं यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है। अगर किसी के घर में किन्नर का जन्म होता है तो समाज के अन्य लोगों को लगता हैं कि जैसे उसके भाई-बहन ही अपराधी हैं, एवं उनके साथ अछूतों की भांति व्यवहार किया जाता है। एक समय के लिए राकेश ने भले पायल को भला-बुरा कहा हो, लेकिन फिर भी वह अपनी माँ से पायल को पढ़ाने के लिए कहता है तथा पायल की माँ भी अपनी बड़ी बेटियों की तरह ही उसका पालन-पोषण करती हैं, फिर भी कहीं न कहीं असामान्य शरीर को देख कर वह ईश्वर को कोसती हैं-“ईश्वर को पता नहीं क्या मंजूर था अच्छी खासी लड़की जैसे लगती है। मैं सुनती तो सोचती कि लड़की ही तो हूँ मैं , .ये लड़की जैसी क्या बला है?” यहाँ साधारण रूप से एक माँ की संवेदना दिखाई देती है जो कि एक बच्चे के प्रति होती हैं, पायल इससे बिल्कुल ना समझ है वह स्वयं के अंदर स्त्रीत्व की अनुभूति करती है परन्तु  माँ के विपरीत पिता का व्यवहार पायल के लिए नकारात्मक और कष्टदायी सिद्ध होता है। वे पायल के बाहर जाने को लेकर अति चिंतित हैं क्योंकि उन्हें इस बात का भय है कि समाज को इस सच्चाई पता ना चल जाए कि उनके घर पायल के रूप में एक बेटी नहीं हिजड़ा है। समाज को सर्वोपरि मानकर अपने बच्चों से अमानवीय व्यवहार करना यह निंदनीय है। समाज हम मनुष्यों से ही बनता है जिसमें सबका समान अधिकार है। चाहे वह किसी भी लिंग/जाति/धर्म से संबंध रखता हो। इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना आवश्यक है  कि समाज में सर्वप्रथम मनुष्य को मनुष्य के रूप में ही देखना चाहिए ना कि किसी लिंग से जोड़कर। एक दिन रामबहादुर अपनी पत्नी से कहते हैं-“शांति! जुगनी को लड़के की आदत सिखाओ, उसको लड़का बनाकर रखो... वह हिजड़े के रूप में बड़ी होने पर समाज के लोग उसकी शादी-रिश्ते कि बात करेगें, जबकि लड़के के रूप में कोई कुछ नहीं कहेगा...” इस कथन से स्पष्ट होता है कि उनके पिता की चिंता क्या है? और किसलिए? यहाँ उनके मन में समाज का भय बैठा हुआ है, समाज में पितृसत्तामक गुण कूट-कूटकर भरे हुए हैं, जिसके कारण उनकी मानसिकता भी खंडित हो चुकी है और वे  समाज के खिलाफ आवाज उठाने की सोच भी नहीं सकते । जब वे पहली बार पायल को लड़के के पहनावे में देखते हैं, तो अपनी पत्नी से कहते हैं-“देखा शांति, अब तो ये पूरा लड़का लग रहा है, काश! ये हमारा बेटा ही होता।” यहाँ रामबहादुर के कथन से पता चलता है कि एक तो वे पायल की शारीरिक विकृति कपड़ो के माध्यम से छिपाना चाहते हैं और साथ ही उन्हें पितृमोह भी है। स्कूल भेजने की सलाह राकेश देता है, वहीं उनकी माँ को अपने पति के स्वर सुनाई देते हैं-“कान खोलकर सुन ले कमलेश की अम्मा अगली बार में आऊँ और यह साला हिजड़ा लड़की के कपड़े में मिला तो इसे घर से निकाल दूँगा, अपने हाथों से इस साले हिजड़े का खून कर दूँगा।” स्पष्ट होता है कि पिता के मन में अपनी असामान्य औलाद के  प्रति कितना आक्रोश है, वे अच्छे संस्कार देने कि बजाय सिर्फ मारने को तैयार होते है। पिता की तृतीयलिंगी संतान के प्रति सहानुभूति का तो नामों निशान तक नहीं फिर बाहर के लोगों से क्या उम्मीद रखी जाए? प्रत्येक दिन की मार और पिता द्वारा बोले गये ‘हिजड़ा शब्द एक दिन पायल को घर से भागने को मजबूर कर देते हैं। वह स्वयं का विनाश करने का मन बनाती है “न रहेगी यह हिजड़ा न रहेंगे वे ताने जो मुझे और मेरे कारण मेरे परिवार को मिल रहे थे।” इस कथन से स्पष्ट होता हैं हिजड़ा जीवन कितना कष्टदायी होता है, वह अपने परिवार के लिए कुएं में गिरने का सोचती, वह सम्भव नहीं हुआ। आगे जाकर ट्रेन के सामने कूदने का विचार आता हैं वह भी सफल नहीं होता, फिर वह घर की दुनिया छोड़ असली दुनिया में पहला कदम रखती हैं तब ही एक अधेड़ उम्र के मर्द से उनका सामना होता हैं वह उनको बेटा शब्द से सम्बोधित करता है। वह आदमी पायल के पिता की उम्र का है और वह उनकी पिंडली पर हाथ फेरता है कभी जांघ पर और मौके का फायदा उठाकर ट्रेन में उसे पकड़कर चूमता है। यहाँ समाज के लोंगो की वास्तविकता का पता चलता है कि एक तरफ परिवार के लोग हिजड़ो को घर से उठाकर फेंकना चाहते हैं क्योंकि वह हिजड़ा है, वही दूसरे क्षण में दूसरे पुरुष को देखते हैं तो वे भेड़िये की तरह स्त्री देह को नोचना चाहते हैं। पैसे के बल पर शोषण करना व यौन संबंध बनाना चाहते है। “मेरी और बीस रूपये का नोट बढ़ाते हुए कहा, ले रख बाथरुम में आ जाना, पायल के नहीं जाने पर आकर फिर “क्यों री तू आई नहीं...ले पचास का पकड़ आ जल्दी।” स्पष्ट होता हैं कि एक तरफ जब घर में  किन्नर पैदा होता है तब कलंक माना जाता है और पिता और घरवाले कचरे की भांति फेंकने को तैयार होते हैं, जैसे पायल के पिता उसका खून कर रहे थे, फाँसी पर लटकाया दूसरी ओर पुरुष हिजड़े के साथ भूख मिटाना चाहता है तब कलंक, इज्जत कुछ नजर नहीं आती हैं। वहाँ से वह बच जाती हैं, ट्रेन की यात्रा करके दूसरे प्लेटफार्म पर पहुँचती, तब भी जैसे कि आसमान से गिरी और खजूर पर लटकी वाली कहावत यहाँ प्रतीत होती हैं। पायल बेंच पर बैठती तब सिपाही आता और उससे कहता  है कि भाग कर आई हैं? इस तरह की धमकी देते हुए कानून का डर बताता और अपने डंडे के बल पर शारीरिक संबंध बनाकर भूख मिटाना चाहता हैं। अगर बात करें कि देश की समाजसेवा प्रशासन और पुलिस के हाथ में होती है, तो कहना होगा कि यदि इस तरह के पुलिस बैठा दिये जाए तो महिलाओं और किन्नरों के साथ न्याय कहाँ से होगा? जिम्मेदारी को भुलाकर एक सिपाही बेरहमी से अत्याचार करता हैं “ देख थोड़ा मोटा हैं... पर तुझे तकलीफ नही होगी।” क्या यहाँ प्रतीत नहीं होता हिजड़ा किसे कहा जाना चाहिए? किसे तिरस्कृत और उपेक्षित किया जाना चाहिए? हिजड़े वे होते हैं जो गलत काम में हस्तक्षेप करते हैं।
        पायल फिर से बच जाती हैं लेकिन सिपाही के द्वारा उसके साथ अभद्र और निंदनीय व्यवहार हद से ज्यादा किया , लेकिन वह अपनी जिन्दगी की रेस शुरू करने का हौंसला रखते हुए आगे बढ़ती है। घर न जाने का निर्णय लेते हुए भूख-प्यास से पीड़ित हैं, बेघर होकर भिखारियों के साथ, तो कभी किसी के सामने हाथ फैलाकर भूख मिटाती हैं। फिर एक दिन जुगनू बनकर दाँतुन बेचने का काम शुरू करती हैं, बाद में चाय की दुकान पर रहकर तो कभी कैंटीन में रहकर। फिर संतोष सिह के अप्सरा टॉकीज में अच्छा काम शुरू होता है, वहाँ भी समाज में भक्षण भोगी पुरुषों की कमी नहीं है, एक दिन प्रमोद नाम का लड़का पायल का शोषण करता है। उसको वह काम भी छोड़ना पड़ा वहाँ से निकलकर नई राह की तलाश में जुट जाती हैं, तब तक वह एक दिन हाथ किन्नरों के लग जाती हैं। वे कहते है कि अपनी गुरुमाई बहुत खुश होगी। इस प्रकार वे पायल के बारे में कहते हैं कि तुम्हारी दुनिया हमारे साथ हैं, और उसको जबरदस्ती के साथ वहाँ  से ले जाते हैं और चेलों के साथ गुरुमाई पायल को देख स्वागत करती है, किन्नर दुनिया से अवगत कराती है। पायल को किन्नर बनाकर ढोलक की थाँप पर थिरकने की सलाह देते हुए यह पेशा ही अपनाने पर ज़ोर देती है उसके ना मानने पर पायल के प्रति रवैया बदलते हुए पेश आते हैं।
              पायल के लिए वह दुनिया बहुत ही अजीब थी क्योंकि वह किसी के सामने हाथ फैलाना नहीं चाहती थी वह स्वयं को आत्मनिर्भर लड़की के रूप बताते हुए किन्नर गुरु के समक्ष अनुनय-विनय करती हैं, परन्तु गुरुमाई सुनने को तैयार बिल्कुल नही। “मैं हिजड़ा नहीं हूँ तुम लोगों की तरह, मैं एकदम सही लड़की हूँ।” यहाँ किन्नर समाज की असलियत सामने आती हैं, कि जो चेले अपनी गुरु को खुश करने के लिए पायल जैसे कई बच्चों को जबरदस्ती  उठाते हैं, जहाँ गुरुमाताई अपनी कमाई के लिए उन पर दबाव डालती हैं। गुरु स्वयं गलत आदतों की शिकार है और एशो आराम से पैसे लूट रही हैं, उस वर्ग में कुछ हिजड़े न होकर भी किन्नर समूह के साथ वह गुरुमाता के आस-पास मंडराते हैं, जिसमें पप्पू नाम का युवक जो पायल के साथ बदसलूकी करता हैं अर्थात् एक दिन तो हद पार कर लेता है वह पायल को मारता-पीटता है, उसके वस्त्र फाड़कर नग्न  कर देता है। बाकी लोग चुप होकर देखते रहते हैं, पायल घायल होने के बाद खुद को देखती है तब पाती है कि उसके वस्त्र सब फाड़ दिए गये, तब वह कहती है-हिजड़े हम नही हिजड़े वो लोग हैं जो अन्याय को देखते रहे और अपराध करे। पायल की गुरु कई दिनों बाद अस्पताल में उसे देखने जाती तब चेलों से कहती है इसकी अच्छी देखभाल करों क्योंकि इससे अच्छी कमाई होगी। वास्तव में समाज कैसा हैं? यह प्रश्न उठता है, एक तरफ द्विलिंगीय लोग किन्नरों को अपनाते नहीं दूसरी ओर किन्नर भी अपने ही लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार कर अपने ही समुदाय में उसका शोषण करते हैं। वहाँ से पायल ठीक होकर फिर से संघर्ष को जारी रखते हुए काम की तलाश में जुट जाती हैं। उसे आकाशवाणी में काम मिलता है, तब पायल पप्पू और गुरुमाई से बदला लेने की ठान लेती है। आखिर पप्पू को वह पकड़कर मित्र की सहायता से मारती हैं।यह बात पीछे क्षत्रिय समाज के कलंक की जो उसके पिता कर रहे थे, वही पायल उनको सक्षम होकर गलत साबित करती है। वह अच्छी नौकरी करती हैं और अपने परिवार के प्रति समर्पण भाव रखते हुए माँ से चोरी-छिपे मिलती भी हैं। पैसों के द्वारा उनकी सहायता भी करती है जिससे भाई-बहनों की शादी में उनकी कुछ मदद हो जाए। पायल के लिए फिर भी घर जाना सम्भव नहीं था, खुद को तकलीफ में पाकर भी वह अपने आपको सम्भालती है। वह धीरे-धीरे किन्नर का पेशा अपनाती है और एक सफल किन्नर गुरु भी बनती हैं।
            इस उपन्यास के माध्यम से हमें ना सिर्फ पायल की समस्याएँ देखने को मिलती हैं बल्कि इसमें तृतीयलिंगी औलाद के प्रति एक माँ की ममता और पिता का पितृसत्तामक आक्रोश देखने को भी मिलता है। किन्नर को सर्वप्रथम घर से तिरस्कृत, उपेक्षित किया जाता है, अगर वहीं अच्छी शिक्षा दी जाए तो वे ताली बजाने का पेशा शायद ही अपनाएंगे। सामान्य समाज के लोगों ने अपने स्वार्थ के खातिर इन लोगों को हाशिये की परिधि पर धकेल दिया तथा कई सालों से इनके साथ अमानवीय व्यवहार करते नज़र आ रहे हैं। लेकिन पायल जैसी संघर्षशील पात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इस प्रकार कह सकते है कि आज किन्नरों को समाज में अपनाने की शुरूआत किन्नर के पैदाइशी परिवार को करनी चाहिए ।  उनको शारीरिक और मानसिक रूप से  प्रताड़ित करके विस्थापित ना करे। यदि घर में ही उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा तो फिर समाज के अन्य लोग उन्हें परेशान करेंगे ही। इसलिए हम सभी तृतीयलिंगी वर्ग को उपेक्षित और तिस्कृत करने की बजाय उन्हें समानता की दृष्टि से देखें । ताकि वें भी अपना जीवन हमारी ही तरह सामान्य जीवन जीने हौंसला और जज्बा रख सके ।  
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-
1.        मैं पायल उपन्यास, महेद्र भीष्म , अमन प्रकाशन 2017
2.        भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीयलिंगी विमर्श ,अमन प्रकाशन 2017
3.        मनमीत पत्रिका (किन्नर विशेषांक )
                                                                                                                                                                


3 टिप्‍पणियां:

  1. पूरा पढ़ा दी।
    वास्तव में तो पूर्ण अनभिज्ञ हूँ इस विषय से, पर अगर सच में इस वर्ग के साथ ऐसा हैं तो हमारे समाज को इस विकृति का शमन कर फेंकना चाहिए।
    जब सब मनुष्य हैं तो फिर किसी भी तरह का भेदभाव क्यों।

    आपने अच्छी समीक्षा की हैं दीदी।

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