संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में इस वर्ष 4 महिला प्रत्याशियों ने प्रथम 4 स्थानों पर कब्ज़ा जमा कर सचमुच इतिहास रच दिया है। इन्होंने इससे पहले का 3 स्थान का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जाती है और इन चारों बेटियों ने शिखर पर पहुँच कर कड़ी मेहनत और समर्पण का प्रमाण दिया है। शीर्ष रैंक पाने वाली इशिता किशोर, गरिमा लोहिया, उमा हरति एन. और स्मृति मिश्रा की यह उपलब्धि निजी हो सकती है, लेकिन यह भारतीय समाज की भी सार्वजनिक उपलब्धि है कि उसकी बेटियाँ हर क्षेत्र में नित्य नूतन कीर्तिमान रच रही हैं।
इस बार के परिणाम इसलिए और भी महत्वपूर्ण हैं कि घोषित परिणामों में 34 प्रतिशत स्थान महिलाओं को मिले हैं। कुल 933 स्थानों में से महिला उम्मीदवार 320 स्थानों पर सफल रही हैं। देश को अपनी इन सभी बेटियों पर नाज़ होना चाहिए। इनकी सफलता भारत में महिलाओं के लिए प्रगति का संकेत है। इससे पता चलता है कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में पुरुषों की तरह ही सक्षम हैं, यहाँ तक कि सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी भी। यह भी एक संकेत है कि समाज नेतृत्व की भूमिका में महिलाओं को अधिक स्वीकार कर रहा है। लेकिन इस सच से भी मुँह नहीं चुराया जा सकता कि भारत की कुल कार्यरत आबादी में महिलाओं का अनुपात आज भी 17 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इसका मतलब है कि अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है
। याद रहे कि किसी भी समाज के समग्र विकास की खरी कसौटी उस समाज में महिलाओं की हैसियत ही होती है अर्थात समाज उनका सम्मान किस तरह और किस रूप में करता है! खेद के साथ कहना पड़ता है कि भले ही देश के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर भारत की बेटियाँ तरह तरह से यह साबित कर चुकी/रही हैं कि स्त्री शक्ति सचमुच सर्वसमर्थ है, फिर भी यह महादेश अभी तक उन्हें उनके हिस्से का पूरा सम्मान देने में कोताही बरतता है, भेदभाव करता है। पुरुष-वर्चस्व की ग्रंथि अभी तक भी हमारे समाज को इस तरह जकड़े हुए है कि बेटियों की सारी उपलब्धियाँ उसके सामने निष्प्रभावी हो जाती हैं। यह कोई रहस्य नहीं है कि भारत में आज भी महिलाओं को जीवन के कई क्षेत्रों में लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, समान कार्य करने के लिए उन्हें अक्सर पुरुषों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है, और निर्णय लेने वाले पदों पर उनका प्रतिनिधित्व कम होता है।
ऐसे में यूपीएससी में इन महिलाओं की रिकॉर्ड सफलता इस बात की याद दिलाती है कि हमें लैंगिक समानता के लिए लड़ाई जारी रखनी होगी। हमें एक ऐसा समाज बनाने की जरूरत है जहाँ महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर मिलें और जहाँ उनके साथ भेदभाव न हो।
इन बेटियों की उपलब्धियाँ भारत की सभी बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। इनकी सफलता अन्य महिलाओं को भी अपने सपने पूरे करने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे पता चलता है कि अगर आप कड़ी मेहनत करते हैं और कभी हार नहीं मानते हैं तो कुछ भी संभव है। इससे एक अधिक सशक्त और उत्पादक समाज बन सकता है। इस उपलब्धि का भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ना चाहिए। इससे हम लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने और अधिक समान समाज बनाने की दिशा में प्रेरित हो सकते हैं।
असल में इन महिला प्रत्याशियों की सफलता भारत के विकास का एक सकारात्मक चरण है। यह भविष्य के लिए प्रगति और आशा का संकेत है।
अंततः यह भी कि जिस देश में स्वर्ण पदक लाने वाली विश्वविजेता महिला एथलीटों तक को यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता हो और न्याय के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता हो, जिस समाज में परिवार और सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने में अधिकांश महिलाओं का कोई स्थान न हो, वहाँ प्रशासन के क्षेत्र में इन बेटियों की उपलब्धियों का गहरा अर्थ है - व्यवहारपरक भी; और प्रतीकात्मक भी। इनकी सफलता भविष्य के लिए उम्मीद की निशानी भी है। इससे कम से कम इतना तो पता चलता ही है कि भारत में चीज़ें बदल रही हैं, और महिलाएँ धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से अधिक अधिकार और अवसर प्राप्त कर रही हैं। 000
