बुधवार, 21 सितंबर 2022

हम और हिंदी भाषी

 उत्तर भारत के विद्वान लोग अक्सर दक्षिण भारत के शोधार्थियों के बारे में टिप्पणी करते रहते हैं दक्षिण भारत में हिन्दी में शोध करना "अंधों में काना राजा बनने के समान है" उनसे मेरा विनम्र आग्रह है कि वे एक बार तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय/पांडिचेरी केन्द्रीय विश्वविद्यालय/उस्मानिया विश्वविधालय/दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा/हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के विद्वानों और शोधार्थियों को एक बार अवश्य सुनें। वरना आप हमेशा भ्रातियों में रहेंगे। खैर एक बात अवश्य ध्यान रखें हिंदुस्तान की मेरिट 1-10 तक और गिनती 1-100 तक की है उसमें देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालय का शोधार्थी प्रथम स्थान वाला भी मिलेगा और दसवें स्थान वाला भी। तो इस गरूर में ना रहे हम फलां विश्वविद्यालय के शोधार्थी है। हमेशा शोधार्थी और छात्र की बौद्धिक क्षमता पर निर्भर होता है कि वह कितना अपने विषय को सीख सकता है। उत्तर भारत की हूं आधी पढ़ाई उत्तर भारत में हुई है इसलिए जानती हूं वहां की स्थिती भी कि कितने हिंदी के विद्यार्थी और शोधार्थी क्लास में रहते हैं और कितना पढ़ते हैं। लेकिन बहुत ऐसे विद्यार्थी है जो अपनी मेहनत और लगन से अपना नाम कमा रहे । आप विश्व एक है कि बात करते हैं हिंदी है हम कहते... तब उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम कहां से आता? हमें बहुत दुःख होता है कि आप अपनी मानसिकताओं/पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हो सके अभी तक। दक्षिण भारत का हर कोई विद्यार्थी और शोधार्थी/शिक्षक कम से कम तीन भारतीय भाषा की समझ रखता है उत्तर भारतीय/मैं और आप कितने पानी में है हम और आप समझ सकते हैं। हम सेमिनारों में जाते तब हमसे प्रश्न करते हैं कि तमिलनाडु/केरल में क्या हिंदी पढ़ने गये । लेकिन आप आइए और देखिए आपके शिक्षण-प्रशिक्षण और तमिलनाडु और दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों में कितना फर्क है । अनुवाद/भाषाविज्ञान/काव्यशास्त्र के विद्वान आपको यहां मिलेंगे ।आप पिटते रहें ढिंढोरा और करते रहे। ऐसे ही मनाते रहिए हिंदी दिवस जिसमें हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी का भाषण देते रहे।खैर लंबा भाषण लिखना उचित नहीं समझती बस आप स्वयं समझदार है। -आपकी मिलन बिश्नोई/तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय (21/9/2019)