प्रकाशित आलेख- शोध-ऋतु peer Reviewed & Refereed Journal , Volume-2, ISSUE-29 ,ISSN-2454-6283,IMPACT FACOTOR-(IIJIF-7.312),SJIF-6.763,IIFS-4.125, Page no.-64-67,Single Author-Milan Bishnoi
‘तृतीयपंथी समुदाय’ के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्य
समाज के
अधिकांश लोग लैंगिक भिन्नता को ट्रांसजेंडर की श्रेणी में रखते हुए उन्हें
परिभाषित करते हैं । जबकि किसी भी इंसान की ‘लिंग’ को वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए परिभाषित करने की आवश्यकता
है । जिस प्रकार प्रकृति में सारे फूल-फल,पेड़-पौधे एक जैसे नहीं होते हैं,अर्थात्
प्रकृति-स्वरूप उन सबकी तमाम प्रजातियाँ होती हैं, इसी प्रकार मानव जाति में
उपस्थित लोगों में भी भिन्नता का होना स्वाभाविक है । जैसा कि ‘LGBTQ’ के रूप परिभाषित शब्दावली में अलग-अलग हाव-भाव और आन्तरिक अनुभूति महसूस
करने वाले लोग देखने को मिलते हैं । इस ‘गैर-बाइनरी’ में अधिकांश ट्रांसजेंडर लोग भी शामिल है ।
वे स्वयं को ‘पुरुष’
या ‘महिला’ मानते हैं, कई बार अपनी
जन्मजात ‘लैंगिक पहचान’ के विपरीत
चिकित्सा पद्धति के माध्यम से अपनी आंतरिक अनुभूति के आधार पर शारीरिक बदलाव करके वास्तविक
पहचान प्राप्त करते हैं ।
जबकि
कुछ लोग ‘स्त्री’ या ‘पुरुष’ के दायरे/करीने में
सहजता महसूस नहीं करते हैं । उदाहरण के लिए उन कुछ लोगों का एक लिंग होता है या
फिर कभी ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ दोनों के लैंगिक तत्व मौजूद रहते हैं । या
फिर ऐसा लिंग जो ‘अस्पष्ट लैंगिकता’ को
दर्शाता है । वे लोग अपनी पहचान किसी एक लिंग के अनुरुप स्पष्ट करने में कंफर्ट/सहज नहीं होते हैं । इनमें से कुछ लोगों का ‘लिंग’ समय के साथ बदलता रहता है खासकर शारीरिक बदलाव और आन्तरिक अनुभूति का
तालमेल नहीं बैठता है । अर्थात् जिन लोगों का लिंग ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ की तरह स्पष्ट
नहीं है । वे ‘स्त्री-पुरुष’ स्वयं की
पहचान-वर्णन में कई अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ।
उन “विशिष्ट शब्दों” में ‘गैर-बाइनरी’ (non-binary ) शब्द अधिक प्रचलित है । अन्य
शब्दों में ‘जेंडरक्यूर’, ‘एजेंडर’, ‘बिंजेडर’ इत्यादि शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है । वहीं इनके लिए हिंदी में
किन्नर, मंगलमुखी, छक्का और हिजड़ा जैसे शब्द प्रचलित है । किंतु समाज अपनी
अज्ञानता के कारण प्रत्येक ‘तृतीय प्रकृति/नपुंसक’ को ट्रांसजेंडर समझ लेता है । या फिर
प्रत्येक ट्रांसजेंडर को ‘तृतीय प्रकृतिय/नपुंसक’ समझ लेता है । और यह कहना या समझना भी
स्वाभाविक है क्योंकि आज भी शैक्षणिक स्तर पर ‘लैंगिक संरचना’ को व्यापकता के साथ समझाया नहीं जाता। आज भी ‘लैंगिक
संरचना’ और ‘विशिष्टलिंगीय’ लोगों पर शोधकार्य हो रहे है किंतु निराशाजनक परिणाम सर्वविद्यमान है । उनकी
पहचान के संदर्भ में राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर एकता केन्द्र ने स्पष्ट किया है कि “Most
people – including most transgender people – are either male or female. But
some people don't neatly fit into the categories of "man" or
"woman," or “male” or “female.” For example, some people have a
gender that blends elements of being a man or a woman, or a gender that is
different than either male or female. Some people don't identify with any
gender. Some people's gender changes over time. People whose gender is not male
or female use many different terms to describe themselves, with non-binary being
one of the most common. Other terms include genderqueer, agender, bigender, and more.
None of these terms mean exactly the same thing – but all speak to an
experience of gender that is not simply male or female.”
अर्थात् ध्यान रहे ये लोग अपनी पहचान को संदर्भित करने के लिए ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ दोनों की संज्ञा का भी इस्तेमाल करते हैं । स्पष्ट है कि समाज में केवल ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ की लिंग को मान्यता मिली थी,जबकि इन दो लिंगों से परे भी अपने आप को समझने
वाले लोग हैं । वर्तमान समय में समाज को उन्हें समझने की आवश्यकता है। हमें उन्हें
समझने के लिए किसी विशेष पद्धति या विचारधारा को अपनाने की आवश्यकता नहीं है । उन
लोगों को सामान्य इंसान की भांति ही समझा जाए और उनके साथ सामान्य व्यवहार किया
जाए तो बेहतर होगा ।
वास्तव में कुछ ऐसे तथ्य है जिसे सामान्य
समाज को ध्यान में रखने की आवश्यकता है । यदि इन तथ्यों को संज्ञान रखा जाए तो
असमानता और भेदभाव का नजरिया धीरे-धीरे अवश्य कम हो जाएगा । इससे संबंधित यह
महत्त्वपूर्ण तथ्य है-“Non-binary people are nothing new. Non-binary people aren’t confused about their gender identity or
following a new fad – non-binary identities have been recognized for millennia
by cultures and societies around the world.
Some, but not all, non-binary
people undergo medical procedures to make their bodies more congruent with
their gender identity. While not all non-binary people need
medical care to live a fulfilling life, it’s critical and even life-saving for
many.
Most transgender people are not
non-binary. While some transgender people are non-binary, most transgender
people have a gender identity that is either male or female, and should be
treated like any other man or woman.
Being non-binary is not the same
thing as being intersex. Intersex people have
anatomy or genes that don’t fit typical definitions of male and female. Most
intersex people identify as either men or women. Non-binary people are usually
not intersex: they’re usually born with bodies that may fit typical definitions
of male and female, but their innate gender identity is something other than
male or female.”
सामान्य
समाज का ‘विशिष्ट या अलैंगिक’ लोगों के
प्रति देखने और व्यवहार करने का रवैया काफी हद तक नकारात्मक व निराशाजनक रहा है । तथाकथित
मुख्यधारा का समाज अलिंगीय समुदाय को सदियों से हाशियागत करता आया है । इसके कारण
ये लोग घर-परिवार और समाज से अलग-थलग होकर विस्थापन का सामना कर रहे हैं । भारत ही
नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर तृतीयलिंगी अनेकानेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं । औपचारिक
रूप से 15 अप्रैल 2014 को भारत में ‘तीसरे लिंग’ की मान्यता प्रदान की गई । परंतु भारत में आज भी इनकी कोई औपचारिक परिभाषा
देखने को नहीं मिलती है । उन्हें आमतौर पर समाज छक्का, मामू, हिजड़ा, तृतीयलिंगी,
किन्नर, ट्रांसजेडर या थर्डजेंडर कहते हैं । सरकार ने इन्हें अंग्रेजी में ‘थर्ड़जेंडर’ और हिंदी में ‘अन्य’ की श्रेणी में रखा है । यह समुदाय अपनी लैंगिक पहचान के लिए उत्पीड़न और
भेदभाव का सामना कर रहा है । किन्नर समुदाय को अंग्रेजी शासनकाल से धारा 377 के
तहत निशाने पर लगाया गया है । इस कानून का इस्तेमाल ‘समलैंगिक’ के यौन कृत्यों को अपराधिक
ठहराते हुए बनाया गया था । जबकि इस धारा की सबसे अत्यधिक प्रताड़ना ‘तृतीयलिंगी
समुदाय’ को झेलनी पड़ी । ब्रिटिश औपनिवैशिक युग में बने इस
अधिनियम की अनुपालना के अंतर्गत ‘21 वीं सदी तक LGBTQ’ समुदाय को प्रताड़ित किया जा रहा है।
भारत
में ‘तृतीयलिंगी
समुदाय’ के इतिहास से कोई अनभिज्ञ नहीं है । हमारी सनातन
संस्कृति में किन्नर लोक की परिकल्पना की
गयी है । प्राचीन भारत में किन्नरों को दैवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाता था । यदि ‘चरक संहिता’ की चिकित्सा पद्धति की बात की जाए तो
उसमें तृतीयलिंगी समुदाय की चिकित्सा पद्धति का एक अलग अध्याय लिखा मिलता है । वेद और पुराणों में तृतीयपंथियों के लिए ‘क्लीव’ शब्द प्रचलित है । महाभारत में अर्जुन के ‘बृहन्नला’ बनने का एक प्रसंग प्रसिद्ध है । जब
पाडंवों को 12 वर्ष गुप्त वनवास में रहना पड़ा । उस समय अर्जुन अपने पिताश्री से
मिलने स्वर्ग में जाते है । तब अर्जुन के हाव-भाव के कारण देवताओं की अप्सरा
उर्वशी ने उसे ‘क्लीव’ बनने का श्राप
दिया । अर्जुन कृष्ण की सलाहनुसार इस श्राप का सदुपयोग गुप्तकाल में करते हैं ।
अर्थात् अर्जुन को राजा विराट के दरबार में नृत्य-गायन के लिए रखा जाता है । इस
संदर्भ में राजा विराट का कथन है-“बृहन्नला खानदानी है, वो
आम नृत्यागंना नहीं है । उसे रानी जैसा सम्मान दो । उसे अपने महल में ही ले जाओ।” इसी प्रकार महाभारत में शिखंडी का उल्लेख मिलता है । भीष्म पितामह से
बदला लेने के लिए अम्बा ने तपस्या करके शिखंडी के रूप रणभूमि में आयी । और भीष्म
पितामह औरतों पर अस्त्र नहीं उठाना चाहते थे,तब उन्होंने हथियार नीचे रख दिए थे ।
अर्थात् यहाँ शिखंडी का स्त्री से पुरुष में परिवर्तित होने का उल्लेख किया गया है
।
कुरुक्षेत्र में पाड़वों की जीत से पहले काली
मां को अरावन की बलि देने का प्रसंग भी महाभारत में मिलता है ।और माना जाता है
अपनी बलि देने से पूर्व अरावन ने एक रात के लिए शादी करने की इच्छा व्यक्त की थी ।
तब भगवान कृष्ण ने मोहिनी रूप धारण करके अरावन से विवाह किया । तब से तमिलनाडु के
विल्लुपूरम के कुवागम् गाँव में अरावन मंदिर में 18 दिन का धार्मिक उत्सव मानने की
परम्परा रही है । वर्तमान समय में भी किन्नर समुदाय के लोग इस मेले में आते हैं और
भगवान अरावन से एक रात के लिए विवाह करते हैं । रामायण में श्रीराम वनवास के लिए
जाते हैं तब से चौदह वर्ष तक नगर द्वार पर उनकी राह देखते हुए किन्नर लोग इंतजार
करते हैं । जब भगवान श्रीराम अयोध्या वापस आए तब इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर इनको
कलियुग में राज करने तथा बधाई देने और आशीर्वाद फल्लित होने का वरदान दिया ।
इसके अलावा प्राचीन काल भी किन्नरों को
मान-सम्मान के ओहदें प्राप्त थे । “बहुत से राजाओं के दरबार में हिजड़ों ने कूटनीति की है, ऐसा
उल्लेख है । मतलब राजनीति में भी हिजड़े साझीदार थे । संघराज्य के जागीदार हिजड़ो
से सलाह लेते थे । बाद में मुसलमान राजाओं ने हिजड़ों की ‘खोजे’ के रूप में जनानखाने पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त की । हिजड़ों की
ताकत,शौर्य का इन राजाओं का इल्म था और भरोसा भी था । राजशाही में हिजड़ों को
अलग-अलग रोजगार मिलता था, इसलिए गरीब लोग अपने परिवार के एक लड़के का लिंगछेद करके
उसे हिजड़ा बना देते थे और उसकी कमाई पूरे परिवार का गुजारा चलाते थे ।” इस प्रकार किन्नरों का इतिहास बताया गया है । लिंगछेद और बंधियाकरण की
परम्परा का प्रचलन मुगलशासन काल में रानियों के हरम में सुरक्षाकर्मी की तैनाती के
लिए किया जाता था । जो वास्तव अपराधिक और क्रूर व्यवहार को दर्शाता है ।
बंधियाकरण व लिंगछेद पर औरंगजेब के शासन काल
में प्रतिबंधता लगायी गयी । किंतु लोग ये काम चोरी-छुपे करते थे । माना जाता है कि
उस काल वर्ष में मुसलमान हिजड़ों
मान-सम्मान अधिक मिलता था और वे हिंदु हिजड़ों की तुलना में अमीर भी होते
थे । इसके कारण बहुत सारे हिजड़े धर्मांतरण करते थे । खैर धर्मांन्तरण की
प्रक्रिया आज भी जारी है । हिजड़ों की रहस्यात्मयी प्रवृत्ति के कारण धर्मांतरण का
कारण कोई जान नहीं पाया है ।
उल्लेखित भारतीय इतिहास में 1880 ईं में
बड़ौदा के महाराज गायकवाड़जी ने बंधियाकरण
पर प्रतिबंध लगाया था । इसका उल्लेख भारतीय संविधान की धारा 320 में मिलता है ।
किंतु अंग्रेजी हुकूमत के कारण किन्नरों की स्थिति अति दयनीय हो गई । अंग्रेजों ने
‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत भारतीय समाज को तोड़ने में सफल रहे । जो अलैंगिक लोगों के
प्रति पाश्चात्य लोगों की धारणा रही है, इसका उल्लेख लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने
किया हैं – “ब्रिटिशों की सोकॉल्ड संस्कृति में ‘हिजड़ा’ जाति की संकल्पना ही नहीं बैठती थी । हमारे
सभ्य सामाजिक जीवन में हिजड़े मुश्किलें पैदा कर रहे हैं, ऐसा ब्रिटिशों को लगा और
उन्होंने हिजड़ों के खिलाफ बहुत-से कानून बनाये । इस कानून के मुताबिक पुरुषों के
हिजड़ा बनने पर रोक लगा दी गयी । लेकिन भारत की जनता के जनता के मन में फिर भी एक
स्थान हमेशा रहा ।” वर्तमान समय में भी अंग्रेजी मानसिकता के
दबाव से समाज मुक्त नहीं हुआ है । तृतीय प्रकृति को संवैधानिक अधिकार मिलने के
बावजूद सामाजिक और पारिवारिक अधिकारों से वंचित किया जाता है । किंतु धार्मिक
दृष्टिकोण से जो एक संवेदना रही है, उस संवेदना ने परम्परा का स्थान ले लिया है ।
सदियों से किन्नर समुदाय के लोग परम्परानुसार नवजात शिशुओं और नवदम्पति को
आशीर्वाद देने और बदले में बधाई राशि प्राप्त करने का काम कर रहे हैं । समयानुसार
आधुनिकीकरण के कारण किन्नर समुदाय की आजीविका पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे हैं ।
अधिकांश किन्नर सम्मानजनक बधाई नहीं मिलने के कारण देह व्यापार में लिप्त हो रहे
हैं । देहव्यापार में लिप्त होने के कारण अनेकानेक बिमारियों से भी ग्रसित होकर
अकाल मृत्यु का सामना करते हैं ।
यदि देखा जाए तो ट्रांसजेंडर,किन्नर, हिजड़ा
या फिर कहें कि ‘LGBTQ’ की किसी भी श्रेणी में पैदा हुए बच्चे कोई बिमारी ग्रस्त नहीं है । जबकि
समाज ने उनके साथ छुआ-छूत की भावना से व्यावहार करने की शुरुआत की है । इस श्रेणी में यानि ‘तृतीय
प्रकृति’ में पैदा होने के पीछे भी वैज्ञानिक तथ्य है । 1.
जैसा कि सर्वविदित है कि ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ को अलग-अलग बनाने के लिए ‘X’ और ‘Y’ क्रोमोसोम (गुणसूत्र) के कम-ज्यादा प्रभाव के कारण अलिंगीय बच्चे पैदा
होते हैं । वास्तव में गर्भ में Male/ female संरचना बन जाती
है । यदि ‘XX’
गुणसूत्र मिलने से लड़की और ‘XY’ गुणसूत्र मिलने से लड़की
बनती है । यह सब होने के बावजूद 6 सप्ताह
तक दोनों लिंगों का स्वरूप एक ही जैसा दिखाई देता है । इसके पश्चात ‘Y’ गुणसूत्र में ‘Sry’
नामक जीन कार्यरत होता है । इसमें ‘जेननेंद्रियों’ का विकास के साथ हार्मोन्स तैयार बनने की शुरुआत होती है । ‘Male’ हार्मोन्स के ‘ऐंड्रोजन’ के
साथ ‘टेस्टास्टरॉन’ हार्मोन्स की बड़ी
मात्रा में उपलब्ध होते है । यह ‘टेस्टास्टरॉन’ हार्मोन्स ‘female’ के गर्भ में अल्पमात्रा में
उपलब्ध होता है । ‘female’ के गर्भ में इस्ट्रोजन और
प्रोजेस्टरॉन हार्मोंस बनते है । इसके बाद की ‘जननेंद्रियों’ का विकास होता है ।
2. ऐड्रोजन इन्सेन्सिटिव सिंड्रोम में टेस्टा
स्टरॉन हार्मोम को गर्भ में प्रत्युत्तर नहीं देता । यदि गर्भ में पुरुष ‘XY’ गुणसूत्र है तो इसकी वजह
से पुरुष जननेंद्रियों का विकास नहीं होता है । नवजात लड़की की जननेंद्रिय स्त्री की होती है और उसके अंडकोश,
गर्भाशय नहीं होते है । किन्तु उसके स्तनों का विकास होता है । उस लड़की को
महावारी नहीं होती है, वह संतान उत्पन्न नहीं कर सकती है । तो वह आनुवांशिकी रूप से ‘XY’
यानि Male होता है । 3. Male हार्मोन का
ऐंड्रोजन का स्तर अधिक बढ़ता है । गर्भ यदि Male का हो तो
कोई प्रश्न पैदा नहीं होता किंतु गर्भ लड़की का हो तो वह लड़की पुरुष, टॉमबॉइज की
भावना होती है । 4. Male हार्मोन, टेस्टास्टरॉन हार्मोन अल्प
मात्रा होते हैं । ‘female’ का गर्भ हो तो कोई समस्या नहीं
है, गर्भ पुरुष का हो तो जननेंद्रिय पुरुषों की होने के बावजूद उसमें मानसिक और
भावनात्मक रूप से स्त्रीत्व के गुण मिलते
हैं । उम्र के साथ स्त्री जैसा रहना, व्यवहार करना अच्छा लगता है । किशोरावस्था
में ये बच्चे लड़के पुरुषों की ओर आकर्षित होते हैं । किन्नरों के बारें में यह
चौथे प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जो किन्नर होता हैं उनका शरीर पुरुषों का होता
है और आन्तरिक प्रवृत्ति और आंतरिक भावना स्त्री की होती है । इस प्रकार की
चिकित्सा पद्धति के तथ्य मिलते हैं । जबकि इन सबके बावजूद भी किन्नरों को घर
प्रताड़ना मिलती है । इन्हें मानसिक और भावनात्मक रूप से समझने की आवश्यकता है ।
खासतौर से देखा जाए तो भारत में हिजड़ा बनना
एक प्रक्रिया लेकिन अधिकांश लोग समस्त तृतीय पंथियों को हिजड़ा नाम से संबोधित
करते है, जो वास्तव में गलत है । इस संदर्भ में लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने स्पष्ट
किया है- “हिजड़ा बनना बहुत बड़ी और
कठिन प्रक्रिया है । असल में वो मानसिक होती है और बाद में उसे आध्यात्मिक और
सामाजिक अधिष्ठान दिया जाता है । किसी पुरुष को, विशेष रूप से वो औरत है, ऐसा लगने
लगता है । पुरुष के रूप में उसका जीना मुश्किल हो जाता है और वो हिजड़ा होने का
फैसला करता है ।” अर्थात् हिजड़ा बनने का अर्थ गुरु-परम्परा
को अपनाना भी होता है । जिस प्रकार संत,नाथ और सूफी जनसमुदाय में गुरु को महत्त्व
दिया गया है,उसी प्रकार किन्नर समुदाय में गुरु का अत्यधिक महत्व होता है । जब
समाज और परिवार इन बच्चों को घर-परिवार से निष्कासित कर देता है, तब ये बच्चे अपने
जैसे अलिंगीय गुरु की शरण में जाते है । तथा गुरु बिना किसी भेदभाव के इन बच्चों
को शरण देता है । अपनी शिष्य-परम्परा में उन किन्नर बच्चों को गृह-प्रवेश कराने के
साथ रीति-रिवाज के साथ अपने समुदाय में शामिल करता है । और इन्हें किन्नर परम्परा
में शामिल करने के देश में अलग-अलग रीति-रिवाज प्रचलित है । जैसा कि “अगर किसी ने हिजड़ा बनने का निश्चय किया
तो वो गुरु को चुनता है और बाद में ‘रीत’ की जाती है । यह एक रस्म होती है । हिजड़ा समाज में उस व्यक्ति का वो
अधिकृत पंजीकरण होता है । गुरु-चेला के संबंध माँ-बेटी जैसे होते हैं । उस गुरु के
ज्येष्ठ चेले फिर उस हिजड़े की बड़ी बहनें बनती हैं और गुरु की ऐसी बहनें उनकी
मौसियाँ होती हैं । गुरु के नानी, यानी माँ की माँ...” जिस
प्रकार ‘रीत’ उल्लेख किया गया है, इसमें
गुरु अपने शिष्य को खानदानी ओढ़नी/दुपट्टा ओढ़ाते हैं ।
अपने शिष्य को खानदानी साड़ी भेंट करते हुए अपने खानदानी निशानी को दिखाते
हैं । और फिर किन्नर समुदाय की नियमावली
के अनुरूप जीवनयापन करने के लिए प्रशिक्षित भी करता है । अपने शिष्य को सामान्य
समाज और किन्नर समाज साथ व्यवहार करने की प्रक्रिया को सिखाया जाता है ।
‘रीत’
करने के पश्चात किन्नर अपने वास्तविक जीवन
की शुरुआत कर देता है । किंतु इनमें ‘निर्वाण’ करने की प्रथा भी प्रचलित है । परंतु यह सभी किन्नरों के लिए अनिवार्य
नहीं है । कुछ किन्नर ‘निर्वाण’ करने
से मोक्ष/पूर्णत्व की प्राप्ति होना मानते हैं । जबकि भारत
में अप्राकृतिक रूप से लिंगच्छेदन करना
प्रतिबंध/ कानूनी तौर से अपराधिक माना जाता है ।
वर्तमान में यदि कोई किन्नर अपने अवांछित अंग/ लिंग से
मुक्ति पाना चाहता है तो चिकित्सा परामर्श के अनुसार सर्जरी करवाने की सुविधा
उपलब्ध है । इस रिवाज के पीछे खासकर तथ्य यह उभर कर आया है कि किन्नरों के पास
अवांछित/अनुपयोगी लिंग है तो वे इससे मुक्ति चाहत रखते होंगे
। किंतु किन्नरों के लिए कहीं चिकित्सासुविधा उपलब्ध नहीं थी, तथा उनमें शिक्षा की
कमी/ रूढ़िवादी विचारकों के कारण अप्राकृतिक रूप से
लिंगच्छेदन को मुक्ति का मार्ग बताया होगा । इस संदर्भ में लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी
ने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट किया है- “‘निर्वाण’ कराए बिना हिजड़े को पूर्णत्व प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहा जाता है । ‘निर्वाण’ कराना है तो उसे विधिवत किया जाता है ।
वहाँ अधिकृत डॉक्टर नहीं होते है, क्योंकि लिंग काटना हमारे यहाँ कानूनन जुर्म माना
जाता है । फिर निर्वाण की प्रक्रिया आध्यात्मिक होती है, वहाँ डाक्टरों का क्या
काम? इस तरह के सवाल हिजड़े करते हैं । वहाँ होता है गुरु और
पुजारी । पुजारी एक प्रकार की पूजा करता है और फिर एक ही झटके में लिंग काटता है । कोई कहता है, ये ‘निर्वाण’ खड़े-खड़े कराना चाहिए , तो कोई कहता है, ऐसा कुछ नहीं है । उसे आड़ा
लिटा के किया गया तो भी चलता है । कुछ जगहों पर तो चोरी-छुपे ये ‘निर्वाण’ करने वाले ‘डॉक्टर्स’ हैं, उनके अस्पताल हैं । खास तौर पर दक्षिण भारत में । तंग गलियों में
बने इन अस्पतालों का हिजड़ों को ही पता होता है । कुछ भी हो, लेकिन ‘निर्वाण’ के लिए कोई किसी पर जबरदस्ती नहीं करता ।
वो ऐच्छिक है । हिजड़े अपने शरीर को काफी पवित्र मानते हैं , इसलिए अपनी मर्जी
के खिलाफ किसी को भी अपने शरीर को कुछ
करने नहीं देते ।” खैर यह ‘निर्वाण’ प्रक्रिया अत्यधिक कष्टदायी होती है । इसका घाव भरने में भी 40-45 दिन
लगते हैं । वनोषधियों का लेप लगाकर इसे ठीक किया जाता है । इस प्रकार किन्नरों में
भी उनके अपने अलग-अलग रीति-रिवाज और धार्मिक उत्सव का आयोजन किया जाता है । ये
प्रमुख रीति-रिवाज और धार्मिक उत्सव मनोरंजन
और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से मनाएँ जाते हैं ।
शिक्षा और रोजगार के दृष्टिकोण से किन्नर
समुदाय अत्यधिक पिछड़ा हुआ है । किंतु जिन तृतीयपंथियों को उनके माता-पिता अपने बच्चों की लैंगिकता को छिपाकर
साथ रखते हुए शिक्षित किया है, वे बच्चे आज संघर्ष करके सफलता अर्जित कर रहे हैं ।
उदाहरणस्वरूप आज किन्नर डॉक्टर, न्यायधीश, वकील, पुलिस, शोधार्थी,ज्योतिष, सोशल एक्टिविस्ट,
किन्नर महामंडलेश्वर, रेडियो जॉकी, पत्रकार, विधायक, प्रधानाचार्य,शिक्षक,
खिलाड़ी, अभिनेता इत्यादि क्षेत्र में उनकी उपस्थिति सीमित संख्या में देखने को
मिलती है ।
संदर्भ सूची-
3.
https://edition.cnn.com/interactive/2019/06/health/lgbtq-explainer
4.
लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी, अनुवाद-शशिकला राय,पृष्ठ संख्या-162
5.
वहीं, पृष्ठ संख्या-165
6.
वहीं, पृष्ठ संख्या-159
7.
वहीं, पृष्ठ संख्या-160
8.
वहीं, पृष्ठ संख्या-160