बिश्नोई समाज की जीवन
पद्धति और पर्यावरण संरक्षण
भारत देश चिंतन-दर्शन और आध्यात्मिक शक्तियों के रूप में जाना
जाता हैं। राम और कृष्ण की तपोभूमि में कई संत उनके कई संत-महात्मा अनुयायी बने, कई संत महात्माओं
ने निर्गुण पंथ को अपना कर जातिवाद,छुआछूत,धार्मिक भेदभाव,पाखण्डता से ऊपर उठकर
शांति,शील-सहिष्णुता और परोपकार का मार्ग अपनाया।15 वीं सदी के इतिहास को साहित्य के
इतिहास में लिखा गया। तब निर्गुण पंथ के प्रवर्त्तक कबीर को बताया गया वह ठीक भी
है, लेकिन साहित्यकार द्वारा कबीर और नानक के समकालीन गुरू जांभोजी (1451-1536) को
इतिहास के पन्नों से गायब ही कर देना उनकी भूल कहें या समझदारी ? गुरु जांभोजी को कौन नहीं जानता हैं... यह
कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं। लगभग 500 साल पहले पर्यावरण और मानवीय मूल्यों को बचाने की पहल
करने वाले प्रसिद्ध संत एकमात्र जांभोजी थे। आगे चलकर उन्होंने धार्मिक भेदभाव से
ऊपर उठकर बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की थी। इस सम्प्रदाय को जांभोजी ने
पाखण्डता,मूर्तिपूजा,बहूदेवताओं की पूजा से दूर रखकर निराकार
स्वयंभू,अहिंसा,जीवदया और पर्यावरण की रक्षा,जलसंरक्षण करना सीखाया।
आज वर्त्तमान समय में देश में व्यापत पर्यावरण
प्रदूषण,अत्याचार,लुटपाट,हिंसा,धार्मिक दंगे जो हो रहे हैं उन्हें रोकना अतिआवश्य
भी है तो असंभव भी हैं। सदगुरु जांभोजी ने हिंदू-मुस्लिम के वाद- विवाद से ऊपर
उठकर एकता की मिसाल कायम रखी हैं। आज बिश्नोई सम्प्रदाय अपनी संस्कृति को देश भर में यानि पर्यावरण और जीवसंरक्षण करके यह संदेश फैलाने का काम कर रहा हैं। लेकिन हम
युवा पीढ़ी स्वयं को अतिआधुनिक मानने के साथ भारतीय चिंतन-दर्शन से कोसों दूर चले
गये हैं। आज बिश्नोई सम्प्रदाय की होने के बावजूद जब मुझे बिश्नोई समाज की जीवन
पद्धति के बारें में लिखने को कहा गया लेकिन मेरे लिए यह काफी मुश्किल भरा कार्य
हैं। अर्थात् गुरुदेव के बताये गये 29 नियम ही हमारे समग्र जीवन का विकास कर सकते
हैं लेकिन जब हम इन नियमों का पालन करने की कोशिश करेंगे तब बिश्नोई कहलाने के
हकदार हैं।
खैर जैसा कि गुरुदेव जांभोजी ने बताया – “विष्णु- विष्णु तू भण रे प्राणी,पैखे लाख
उपाजूं।
रतन काया बैकुंठे वासो तेरा जरा मरण भय भांजू ।।”
यहाँ कबीर के निर्गुण राम की भांति निर्गुण विष्णु का स्मरण
करके सहिष्णुता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है। बिश्नोई सम्प्रदाय में गुरु
को अधिक महत्व दिया गया है। इसलिए गुरु के ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता
हैं अन्यथा आत्मा यहीं भटकती रहेगी।बिश्नोई समाज में निर्गुण-निराकार की विष्णु
उपासना की जाती हैं और गुरुदेव जम्भेश्वर ने गुरु को महत्व दिया है। गुरु ही ज्ञान प्राप्ति
के द्वारा मोक्ष की ओर ले जा सकते है। लेकिन सही गुरु की पहचान करना भी हमारा
कर्तव्य हैं “ गुरु चिन्हों गुरु
चिन्ह पुरोहित,गुरुमुख धरम बखांणी”-(श्रीजम्भवाणीः टीका पृष्ठ-1 )अर्थात् गुरु के अनुकूल गुण-लक्षण
पहचान कर गुरु को धारण करो।उनसे मुक्ति अर्थात् ज्ञान मार्ग की और जाकर सद्गति
प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं
अब अगर बिश्नोई सम्प्रदाय की पद्धति के बारे में बात करें
तो जीवन पद्धति मानवकल्याणात्मक और जीवकल्याणात्मक हैं अर्थात् 29 नियम ही उनके
जीवन सूत्र है। इसके साथ जांभोजी की शब्दवाणी सम्पूर्ण समाज का उद्धार करने वाली
एक अमृतवाणी है। लेकिन याद रहे कि मनुष्य इस शब्दवाणी को सिर्फ पढ़कर बोझात्मक
जीवन नैया पार नहीं कर सकता, अगर वह शब्दवाणी का अध्ययन-चिंतन-मनन करता हैं अपने
जीवन में उन शब्दों को लागू करता हैं तो शत-प्रतिशत अपने जीवन का उद्धार कर सकता
हैं। यानि बिश्नोई सम्प्रदाय सत्य,सहिष्णुता,शील,क्षमा अंहिसा,और जीव दया,प्रेम
में विश्वास करते हैं ना कि शोषण,जातिवाद,धर्मांधता और हिंसा इन इत्यादि
गतिविधियों में... ।जो पर्यावरण व प्रकृति
की रक्षा करने के साथ में गुरुदेव के बताए हुए 29 नियमों का पालन करता हैं वह ही
बिश्नोई कहलाने का हकदार हैं ना कि बिश्नोई समाज में जन्म से कोई बिश्नोई नहीं बन
सकता। इस सम्प्रदाय को जांभोजी ने 15 वीं
सदी में स्थापित किया गया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी वर्तमान में भारत भर बस रहे
हैं। वे अपने सम्प्रदाय को गौरवान्वित करते हुए देश में शांति और अनेकता में एकता
का संदेश देने में कामयाब रहे हैं।
तीस दिन सूतक,पांच ऋतुवन्ती न्यारो।
सेरो करो स्नान,शील संतोष शुचि प्यारो।।
द्विकाल संध्या करो,सांझ आरती गुण गावो।।
होम हित चित्त प्रीत सूं होय,बास बैकुण्ठे पावो।।
इस सम्प्रदाय का पहला नियम नारी शक्ति के लिए बनाया गया,जब
कोई महिला मां बनती है तो उसे तीस दिन तक आराम करने को कहा गया । उसे दैनिक
कार्यों को करने से दूर रखा गया ताकि जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ बन सके। पुराने
जमानों में महिलाओं को घर-खेती का सारा काम करना पड़ता था, अगर धात्री महिला धूप
और सर्दी में इस अवस्था में काम करेगी तो उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं,
इसलिए उसे पूरे तीस दिन तक उन्हें आराम करने को कहा गया। उसके पश्चात् तीस दिन बाद
यज्ञ करके पाहल देकर बच्चें का संस्कार किया जाता है,आज भी इस नियम का पूरी तरह पालन होता है। इसलिए वर्तमान समाज में बिश्नोई महिला और बच्चा कुपोषण का शिकार कभी नहीं होता हैं चाहे कितना भी गरीब परिवार क्यों न हो फिर भी 30 दिन जच्चा और बच्चा दोनों की अच्छी तरह देखभाल करेगा।दूसरा नियम भी महिलाओं के लिए है वर्तमान समय
में इस नियम को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दृष्टिकोण से देख सकते हैं।
सकारात्मक पहलू यह है कि माहवारी के समय महिलाओं को आराम देना चाहिए । अनेकों बीमारियां
इस समय पनपने की संभावना रहती है ।क्योंकि हमारी महिलाएं राजस्थान में कृषि और
पशुपालन का काम करती है।पहले के जमानों में पानी वर्तमान की भांति अपने घरों में
नहीं होता था । वे घड़ों से उठाकर दूर से लाती थी। ऐसे में माहवारी के दौरान भार
उठाना भी हानिकारक था दूसरी तरफ उन्हें अपनी साफ सफाई की चीजें भी उपलब्ध नहीं
होती थी। इसलिए बिश्नोई समाज की महिलाएं रसोईघर का काम नहीं करती थी। वर्तमान में
सरकार भी सार्वजनिक स्थानों पर फ्री स्टेपरी-पैड वितरण कर रही है और महिलाओं के
लिए उचित कदम उठा रही हैं।लेकिन आज कुछ लोग रूढ़िवादी मानसिकता के कारण महिलाओं के साथ अछूत की भांति व्यवहार करते हैं
और महिलाएं अपने पीरियड्स के दिन स्वंय को शर्मसार महसूस करती हैं। कुछ भी
होने पर अपने पिता और भाई या माता के साथ
बात करने में हिचकिचाती हैं। हमारे गुरूदेव ने ऐसा करना नहीं बताया लेकिन लोग इसे
कट्टरता और अंधविश्वास की भांति अपनाने लगे। वैज्ञानिक दृष्टि से यह अति
महत्वपूर्ण नियम है और होना ही चाहिए। लेकिन अनैतिकता की दृष्टिकोण से इसको
हानिकारक साबित कर देते हैं। वर्तमान समाज में अधिकांश लोग व्यवसाय और नौकरी में
होने के कारण अलग-अलग रह रहे हैं और उस समय काम से आकर कब कोई महिला खाना खिलाएंगा
और कब तक इंतजार करती रहेगी? आज
इलेक्ट्रानिक बर्तन उपलब्ध है और रसोई घर
के बाहर स्वयं के लिए कहीं स्वीच में लगाकर खाना बना सकती है।कई बार हमारे पाखंड
साधु महिलाओं को रजोस्वला के पांच दिन घर-आंगन में प्रवेश नहीं करने की हिदायत
देते हैं क्या वर्तमान समय में संभव हैं?इस प्रकार जांभोजी
ने कई महत्वपूर्ण नियम बताएं जिसमें होम-जप और तप को सबसे महत्वपूर्ण माना गया।
स्वच्छता अभियान हमारी सरकार आज चला रही है लेकिन गांधीजी से पहले गुरूदेव ने
स्वच्छ पर्यावरण के साथ स्वच्छ समाज का निर्माण करने के लिए विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रखकर स्वच्छ
मन से प्रकृति को बचाने की पहल की।
इसके अलावा मनुष्य का व्यक्तित्व विकास किस तरह के वातावरण
में रहने से होता है और कैसे साथियों के साथ रहना चाहिए यह भी बताया हैं।आजकल हम
अंधभक्ति की भीड़ में अपने आप को कब मिटा देते है, यह स्वयं को भी पता नहीं चलता
हैं आदर्श गुरु जांभोजी ने अपनी शब्दवाणी में बताया हैं -
“उतिम संग सु संगू,उतिम रंग सु रंगूं
उतिम लंग सु लंगूं,उतिम ढंग सु ढंगूं
उतिम जंग सु जंगूं,तांथै सहज सु लीलूं
संजम सुपंथू,मरतकि मोख दवारूं”(सबद-37) वर्तमान में संगति में अपने भविष्य
और राष्ट्र निर्माण के लिए अपने आप के बनाएं रखना अति आवश्यक है। अपने आप को
विभिन्न प्रकार की प्रदूषित विपदाओं से तब ही बचा सकते हैं जब हमारी संगत् किसी
उत्तम और चरित्रवान व्यक्ति की है। हमारे आस-पास के बिश्नोई और अन्य युवा वर्ग एक
तरफ तरक्की करते देख रहे हैं,वहीं दूसरे ओजस्वी और तेजस्वी युवा अपना और समाज का
विनाश किस तरह करने लगे हैं जैसे- चोरी-डकैती,नशे की लत में
ड्रग्स,शराब,अफीम,तम्बाकु इत्यादि बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। बिश्नोई समाज
पर्यावरण रक्षक,शुद्ध शाकाहारी और जीव-दया और अहिंसा में विश्वास और सहयोग करने के
नाम से जाना जाता है।वहीं राजस्थान के कुछ जिलों के बिश्नोई समाज के युवा पीढ़ी
दिन-ब-दिन गलत संगति के कारण आज खुंखार लुटेरे,शराबी और ड्रग्स लेने की लत में पड़
गए/ पड़ रहे हैं और इन सब शौक़ को पूरा करने के लिए अमानवीय
और हिंसात्मक रवैया अपनाते हैं। अर्थात् (मैं इस आलेख और मंच के माध्यम से जांभाणी
साहित्य की अकादमी से अनुरोध करूंगी कि बिश्नोई समाज के मूल्य और संस्कृति को
बनाएं रखने के लिए जांभाणी साहित्य के माध्यम से इस पीढ़ी को सुधारने का प्रयास
अधिक से अधिक किया जाएं ताकि हमारी युवा पीढ़ी को समय रहते काल के मुंह से बचा
सकें।) गुरुदेव जांभोजी ना सिर्फ एक साधारण संत थे बल्कि वे अंतर्यामी महापुरूष
थे। उन्होंने अपने काल और वातावरण में रहने वाले लोगों का ही सिर्फ मन नहीं पढ़ा
बल्कि भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए
भी उपदेशात्मक ज्ञानवर्धक संपत्ति छोङ कर गए हैं। अब तय हमारी वर्तमान समाज और
युवा पीढ़ी को करना है कि वे गुरूदेव की वाणी की गरिमा किस तरह बनाएं रखेगें...।
“हिंदू होय कै हरि क्यूं न जंप्यौ,
कांय दह दिस दिल पसरायौ?
सोम अमावस आदितवारी,
कांय काटी वंणरायौ
गहण गहंतै वहंणि वहंतै,
निरजळ गयारसि मूळि वहंतै
कांय रे मूरिखा पालंग सेज बिछायौ
जा दिन तेरै होम न जाप न तप न क्रिया....”(सबद-6, श्री जम्भवाणी : टीका, पेज29)सदर्भानुसार स्पष्ट रूप गुरुदेव ने धर्म के नाम पर खाने
वालों को चेतावनी देते हुए कई प्रश्न किये हैं। अर्थात् कहा हैं कि अगर स्वयं को
हिंदू मानते हो तो फिर ईश्वर का स्मरण क्यों नहीं किया?अपने
मन और इन्द्रियों को वश में नहीं रख सकते हो। अमावस्या और रविवार को कभी उपवास
नहीं किया । और गुरुदेव बार-बार प्रश्न करते हैं कि आप किस तरह के हिंदू हो ?पर्यावरण की चिंता किए बगैर वृक्षों को काटते हो,स्त्री को भोग की वस्तु
समझकर उसके शुभ-अशुभ घड़ी में भी अपनी तृप्त लिप्साओं में डूबे रहें।इस अमूल्य
जीवन को मोह,माया,ईर्ष्या-द्वेष में अपनी युवावस्था को व्यर्थ कर रहे हो। अर्थात् होम,जप-तप,ध्यान
करके अपने मनुष्य जीवन को अमूल्य बनाना चाहिए ना कि इस तरह जीवन को कलंकित करना चाहिए।
अतःहमें गुरुदेव की वाणी को कालजयी ना कहकर इसे प्रासंगिक कहना चाहिए क्योंकि 1500
साल पहले की वाणी आज भी हिंदू और मुस्लिम धर्म की आड़ में छुपकर अपना और समाज का
विनाश करने वाले पाखंड,युवा और ढ़ोगियों पर लागू होती हैं।
“सुण रे काजी सुंणि रे मुल्ला सुणि रे बकर
कसाई।
किण री थरपी छाळी रोसो किण री गाडर गाई?
कांढै भागै करक दुहेली जायौ जीव न घाई।
थेतुरकी छुरकी भिसती दावौ खायबा खाज अखाजूं।
चरि फिरि आवै सहजि दुहावै तिंहका खीर हलाली।
तिंहकै गळै करद क्यौं सा’रो थे पढि गुंणि रहिया खाली।”(सबद-7,श्री जम्भवाणी :
टीका,पेज नं.33) गुरुदेव जांभोजी ने केवल हिंदूओं को ही नहीं बल्कि
धर्म के नाम गाय-बकरियों का कत्ल करने वाले मुसलमानों को भी धिक्कारा हैं।उन्होंने
मूक प्राणियों को मार कर बलि देने वालों की मुर्खता पर कबीरदास की भांति सवाल किया
हैं।उन्होंने कहा कि गाय बकरी का दुध पीना जायज हैं लेकिन इनके गले पर सुरी चलाना
कौनसा उचित कर्म है? अर्थात् पढे-लिखे लोग भी इस पंथ को
अपनाते है फिर उनका ज्ञान कहां है?अर्थात् आज भी राजस्थान
में अन्य राज्य की तुलना में काफी ज्यादा लोग शाकाहारी है। उनमें बिश्नोई शुद्ध शाकाहारी होते हैं उनमें भी अधिकांश लोग होटल और बाहर खाना नहीं खाते हैं। अर्थात् इसके साथ हर घर में गाय और
अन्य जानवरों के साथ पालतू जानवर भी देखने को मिलेगें। बिश्नोई समाज में
भेड़-बकरियां,मुर्गी का पालन नहीं किया जाता हैं,क्योंकि उनको अधिकांश रूप से कसाईखाने में बेचा जाता हैं। इसलिए ग्रामीण लोग गांव की आवारा पशुओं के लिए गोशाला बनवाते हैं उनमें सभी समाज के लोग मिलकर चारे-पानी की व्यवस्था करते है। अन्य वन्य जीवों का भी बिश्नोई संप्रदाय संरक्षण करता है।
इस सम्प्रदाय में पशु पालन अधिकांश रूप से दुग्ध उत्पादन के लिए
करेंगे लेकिन कसाईखाने में ले जाने वाले व्यापारियों को पशुओं कभी नहीं बेचेंगे।
राजस्थान में गाय और वृक्षों के लिए समाज के लोगों ने अपने प्राणों की बलि दी हैं।
गुरूदेव की भांति राजस्थान के कई ऐसे लोकदेवता हुए जिन्होंने गायों के लिए अपना
बलिदान दिया। जैसे-वीर तेजाजी,पाबूजी,रामदेव आदि। खेजड़ली आंदोलन में अमृतादेवी
सबसे पहले पेड़ों के यह कहते हुए चिपक गई- “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण”। अर्थात् क्षण भर
में उनकी गर्दन काटकर कर सिर धड़ से अलग कर दिया फिर उनकी पर्यावरण के लिए तीन
बेटियां और अमृता देवी के साथ 363 लोगों
ने अपना जीवन बलिदान देकर वृक्षों की रक्षा की थी । आज यह अमर गाथा देशभर
के स्कुलों मे पढ़ाई जाती हैं और वर्त्तमान राजस्थान सरकार ने बिश्नोई हुतात्माओं
के सम्मान के लिए खेजड़ली शहीद दिवस को अवकाश घोषित किया हैं। अर्थात् अपने आप में
कई प्रकार की बुराईयों और कुरीतियों से ऊपर उठकर अच्छाई धारण करना ही बिश्नोई धर्म
हैं। वर्तमान परिस्थियों के अनुसार समझदार और शिक्षित वर्ग को गुरुदेव जम्भेश्वर
के मूल्यों पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता हैं।वरना राजनीति के गंदे किचड़ को
जाने-समझे बिना ही अपनी-अपनी बीन बजाकर देश में एक-दूसरे अराजकता का माहौल बनाते
रहेंगे ओर उनके चगुंल में सामान्य समाज दिग्भ्रमित होकर अपना विनाश करती रहेगी।
Milan Bishnoi (PhD Scholar)
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