मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

कबीर,तुलसी और निराला के साहित्य में राम


                                 कबीर,तुलसी और निराला के साहित्य में राम
मिलन बिश्नोई
पीएचडी शोधार्थी/स्वतंत्र साहित्यकार
तमिलनाडु केन्द्रीयविश्वविद्यालय,तिरुवारूर 610005
Mob.9488246295
भारतीय समाज के हर घर में और मनुष्य के रग-रग में दशरथ पुत्र राम बसे हुए है । तुलसी के राम,वाल्मीकि रामायण के रघुपति और निराला के राम से कौन अनभिज्ञ रहा हैं। इसके अलावा हिंदी साहित्य में कई रामकाव्य लिखे गए  जिनमें प्रमुख हैं- तुलसीकृत रामचरितमानस,केशवदास कृत रामचन्द्रिका,मैथिलीशरणगुप्त द्वारा लिखित साकेत और सुर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित राम की शक्ति पूजा इत्यादि। साहित्यकारों ने राम को अवतारी राम की तुलना में साधारण मानव के रूप में पेश किया है। जिसमें राम असत्य के प्रति सत्य की लड़ाई लड़ रहे है। चाहे वे तुलसी के राम हो या फिर निराला के राम । राम का  संघर्ष ही समाज का आदर्श बना है। राम की भक्ति सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं में देखने को मिलती हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-सगुणोपासक भक्त भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों रूप ही स्वीकार करता है,पर भक्ति के लिए सगुण रूप ही स्वीकार करता है,निर्गुण रूप ज्ञानमार्गियों के लिए छोड़ देता है.”सगुण भक्ति में राम के लीलावतार और आराध्य रूप को माना गया है वहीं निर्गुण भक्ति में ब्रह्मज्ञान और योगसाधना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया। वे निर्गुण भक्ति ब्रह्मनुभूति पर बल देते हैं। अर्थात् कबीर के राम  दशरथ पुत्र के साकार रूप में भले नहीं रहे लेकिन वे ब्रह्म के पर्याय थे-
दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
  राम नाम का मरम है आना ।। अर्थात् उन्होंने जो हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञानमार्गीय पद्धति को स्वीकार किया है। भारतीय ब्रह्मवाद के साथ कबीर ने सूफियों के रहस्वाद,हठयोगियों की साधना का समर्थन किया है। कबीर ने निर्गुण राम के बारें में कहा है-
 निरगुन राम जपहु रे भाई,अविगत की गति लखी न जाई।
सेसनाग जाके गरूड़  समाना चरन कमल कमला नहिं जाना।।
कबीर ने यहां शेषनाग,गरूड़,कमला आदि का उल्लेख सगुण प्रसंगों के  रूप में किया हैं। अर्थात् स्पष्ट है कि निर्गुण और सगुण एक –दूसरे के विरोधी नहीं हैं हमें ज्ञान और भक्ति में भी कहीं विरोध नहीं दिखाई देता।कबीर ने यह स्वीकार करते है भवसागर से पार जाने का साधन भक्ति है।इस भक्ति के बिना मनुष्य भव-जल में डूबता है-
भगति बिन भौजलि डूबत है रे।
कबीर ने राम के सगुण रूप को स्वीकार अवश्य नहीं किया लेकिन एकाग्रचित होकर ईश्वर की नामस्मरण करके जप करने की और प्रेरित करते हैं । वे मन को दसों दिशाओं में भटकाते हुए ईश्वर का नाम स्मरण करने वालों का विरोध करते हैं।
माला तो कर मे  फिरै जीभ फिरै मुख मांहि।।
मनुवां तो दस दिसी फिरै सो तौ सुमिरन नांहि।।
कबीर माधूर्य भाव की भक्ति में आत्मा-परमात्मा के मिलन के आंनद का वर्णन विवाह के सांगरूपक में करते है –
 दुलहिनी गावहु मंगलाचार।
मोरे घर आए हो राजा राम भरतार।।
तन रत करि मैं मन रत करिहौं पंच तत्व बाराती।
रामदेव मोरे पाहुनैं आए मैं जोवन मैमाती।। कबीर की भक्ति में आत्मा का जीवात्मा के प्रति विरह भाव मनोयोगात्मक रूप से देखने को मिलता हैं। वे प्रियतमा की भांति परमात्मा रूपी प्रियतम का इंतजार करते-करते उन्हें पुकारते हैं।
आँखड़ियाँ झांई पड़ी पंथ निहारि निहारि।
जिभड़ियां में छाला पड्या राम पुकारि पुकारि।।
 दास्य भाव की भक्ति जिस प्रकार तुलसीदास में दिखाई देती हैं उसी प्रकार कबीर की भक्ति में दास्य भक्ति के गुण देखने को मिलते हैं । वे अपना स्वामी ईश्वर और स्वयं को दास ओर गुलाम मानते है-
मैं गुलाम मोहि बेचि गोसाईं कबीर को हिंदी के भक्तिकाल में निर्गुण धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते थे उसी प्रकार सगुण धारा के रूप में गोस्वामी तुलसीदास रामभक्त कवि माने जाते हैं। उनका अवधी में रचित महाकाव्य रामचरितमानस रामकथा आधारित हैं जिसमें सात काण्ड हैं। रामचरितमानस को तुलसीदास ने 2 वर्ष 7 माह की अवधि में पूरा किया । तुलसीदास के 12 प्रमाणिक ग्रंथ है- रामचरित मानस ,विनय पत्रिका,कवितावली,गीतावली और दोहावली इनके प्रसिद्ध ग्रंथ  है। तुलसीदास ने राम के सगुण और साकार रूप को अपनाया । वे राम को विष्णु के अवतारी मानते हैं तथा शक्ति,शील और सौंदर्य से व्याप्त हैं। तुलसी के राम अवतारी राम हैं धर्म की रक्षा करने एवं अन्यायी और दुराचारियों को अवतरित मिटाने के लिए अवतरित हुए। मर्यादा पुरूषोत्तम राम को समाज के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया हैं। राम का चरित्र ही सभी एक नयी शक्ति के रूप में जनता को ऊर्जावान बनाती हैं। वे एक आदर्श पुत्र,आदर्श भाई,आदर्श पति,आदर्श राजा के रूप में वे लोकमानस पर अमिट छाप छोड़ते हैं। इसलिए आज भी जनता आदर्श राम राज्य की चाहत रखती हैं।
तुलसीदास की भक्ति दास्य भाव की भक्ति है वे राम के प्रति समर्पित भाव रखते हैं। रामचरित मानस में वे कहते है- सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगरि। कबीरदास की तरह ही यहां उनकी दास्य भक्ति में दिखाई देता है कि सेवक-सेव्य के बिना कोई भी इस भवसागर को पार नहीं कर सकता ।उनकी भक्ति गोस्वामीजी की भक्ति पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी सर्वांगपूर्णता।जीवन के किसी पक्ष को सर्वथा छोड़कर वह नहीं चलती है।स्पष्ट है कि तुलसी की भक्ति में शास्त्रोक्त विधियों का समावेश है तो दुसरी तरफ लोकमंगल की भावना । उनकी कविता का मूल उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय है।उनके संपूर्ण काव्य में समन्वय की विराट चेष्टा देखने को मिलती हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें लोकनायक कहा है । उनके अनुसार- भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृति ,साधनाएं, जातियां,आचार,विचारऔर पद्धतियां प्रचलित है ।तुलसीदास स्वयं नाना प्रकार के सामाजिक स्तरों में रह चुके थे। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय है  नहीं अपितु गार्हस्थ और वैराग्य का भक्ति और ज्ञान का भाषा और संस्कृति का निर्गुण और सगुण का पुराण और काव्य भाववेग और अनासक्त चिंता का समन्वय रामचरितमानस के आदि से अंत तक दो छोरों पर जाने वाली  पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है। तुलसीदास की कविता में लोकमंगल की भावना जो विद्यमान है वह उनकी सामाजिक,सांस्कृतिक से अदभूत हैं।तुलसी,कबीर,सूर जैसे कवियों ने अपने काव्य के माध्यम से मानव मात्र की मनुष्यता को जगाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया हैं। तुलसी का काव्य जनकल्याणकारी है,अमंगल का विनाश करने वाला एवं मंगल का विधान करने वाला है।उनका प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरितमानस से अधिक क्या लोककल्याणकारी हो सकता । इस ग्रंथ के अखण्ड पाठ आज भी प्रत्येक हिंदू घरों में किएजाते है।
राम नाम के संबंध में नंददुलारे वाजपेयी का कथन है- उनके सम्मुख कोई बने बनाए आदर्श या नये-तुले प्रतिमान न थे,इसलिए जो कुछ भी उन्हें उदाहरणों में अच्छा उपयोगी दिखाई दिया उसी को वे नए साँचे में ढालने लगे। राम और कृष्ण उनके सर्वाधिक समीपी और परिचित नाम थे,अतएव इन्हीं चरित्रों को उन्होंने नए सामाजिक आदर्शों की अनुरूपता देने की ठानी। निराला के सम्मुख प्राचीन आदर्श प्रतिमानों को छोड़कर नवीन आदर्श रूप में कोई प्रतिमान नहीं आया इसलिए उन्होंने राम नाम का उद्धत किया है,किंतु नवीन रूप में क्योंकि ये अवतारी राम नहीं बल्कि संशय युक्त मानव,अपने साधारण मानव है जो अपने समय की परिस्थितियों से अवसाद हैं। हिंदी छायावादी कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला युगीन यथार्थ के प्रति सजग कवि माने जाते थे। उनका जीवन संघर्षों ले भरा हुआ था। उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा के कारण कभी भी किसी प्रकार के कष्ट और पीड़ा के सामने झुके नहीं।यथार्थ की विषम परिस्थितियों को पार करते हुए आजीवन संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते रहे। उनकी प्रसिद्ध रचना राम की शक्ति पूजा में निराला के स्वयं का चरित्र देखने को मिलता है। “ ‘राम की शक्ति पूजा निराला की नहीं, संपूर्ण छायावादी काव्य की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है। इसमें  कवि ने एक ऐतिहासिक प्रसंग के द्वारा धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का चित्रण किया है। राम धर्म के प्रतीक हैं और रावण अधर्म का । इस कविता में अधर्म का चित्रण एक प्रचंड शक्ति के रूप में हुआ है,जिसके सामने एक बार तो राम  का साहस भी कुंठितहोने लगता है।यह स्थिति एक ओर तो कवि के व्यक्तिगत जीवन के भयानक संघर्ष से संबद्ध हो जाती है और दूसरी ओर युगीन यथार्थ की विकरालता को भी व्यंजित करती है। अंत में राम की शक्ति की शक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं, उसकी आराधना करते हैं और अधर्म  के विनाश के लिए सक्षम होते हैं।अर्थात् यहां शक्ति की मौलिक उपासना भारतीय परम्परा में विश्वास रखते हुए सत्य की ओर आगे बढ़ने की ओर कवि संकेत करता हैं। दूसरी तरफ प्राचीन सांस्कृतिक आदर्शों का युगानुरूप संशोधन करने की ओर संकेत किया गया।
राम की शक्ति पूजाकी कथा बंगाल के कृतिवास रामायण से ली गई है, यह निराला की एक 1936 ई. में लिखित प्रबंधात्मक कविता है उनके समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शित कराती है। काव्य सौंदर्य की दृष्टि से यह  कविता आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी काव्य की प्रगति की सीमा मानी जा सकती है। इसमें राम और रावण के युद्ध के व्यक्ति के अंतद्वन्द्व का वर्णन मिलता है।
         रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
             रस गया राम-रावण का अपराजेय समर
              आज का तीक्ष्ण-शर-विधृत-शिप्र-कर,वेग-प्रखर
             शत-शेल-सम्बरण-शील,नील-नभ-गर्जित-स्वर,
            प्रति-पल –परिवर्तित व्यूह-भेद-कौशल-समूह-...लोहित-लोचन-
             रावण-मदमोचन महीयान...
निराला ने  तुलसी की भांति राम को पृथ्वी के भारों का विनाश करने के लिए अवतरित नहीं किया है,उन्होंने समस्त संघर्षों का सामना करके विजेता प्राप्त की है।निराला के राम की यही मानवीयता है कि कभी वे निराश हो जाते है अन्याय की तरफ शक्ति का झुकाव देखकर लेकिन फिर से अपने मित्र के कहने और अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए मौलिक कल्पना की दृढ आराधना करते हैं।
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान,रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण
हे पुरूषसिंह,तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधना का दृढ़ आराधना से दो उत्तर ।... राम केवल लोक नायक ही नहीं वे एक आदर्श पति भी हैं इसी कारण सीता  की मुक्ति का दायित्व अपने ऊपर समझते हुए इस दायित्व को निभाने की पूरी कोशिश करते है और पराक्रमी रावण से युद्ध जीत लेना चाहते हैं।इसके साथ यहां शक्ति आराधना का यह रूप मौलिक होने के साथ-साथ युगानुरूप भी है।  यहां राम अपने भक्त आज्ञाकारी हनुमान को इंदीवर लाने का आदेश देते हैं।
चाहिए हमें एक सौ आठ कपि इंदीवर
 कम से कम,अधिक और अधिक हो,अधिक और सुंदर
जाओ देवीदह,उष : काल होते,सत्वर
तोड़ो लाओ वे कमल,लौट कर  लड़ो समर
अवगत हो जाम्बवान से पथ,दूरत्वस्थान
 प्रभु पद रज सिर घर  चले हर्ष भर हनुमान।
राम की शक्ति की आराधना करने में लीन हो जाते है और नौ वें दिन शक्ति उनकी परीक्षा लेने के लिए अंतिम पुष्प छुपा देती है जैसे ही यह थाली में इंदीवर के लिए हाथ बढ़ाते है उन्हें पुष्प नहीं मिलता है । एक क्षण के लिए धिक्कार सा महसूस होता है। क्योंकि रावण रूपी वैष्मयों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रकार की साधना करने का प्रयास करते हैं।परंतु कोई न कोई बाधा समुपस्थित होकर समस्त साधनाओं को निष्फल करने का प्रयास करती हैं तब राम के शब्दों में कवि का अंतर्मन खिन हो जाता है-
 धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध
 धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। राम का यह धिक्कार ,वास्तव में कवि की अपनी ही नियति के प्रति धिक्कार है।परंतु राम स्वयं के नयन को आहुति देने को तत्पर हो जाते है । उन्हें माँ राजीव नयन कहकर बुलाने का स्मरण आया जिससे अपनी साधना पूरी करने की ठान लेते हैं। तब  श्रीराम की नियति तो निश्चित है  अंत में देवी आकर उन्हें साक्षात् रूप से मिलकर विजयीभव का आर्शीवचन देते  हुए लीन  हो जाती ।
संदर्भ ग्रंथ सूची- आचार्य रामचंद्र शुक्ल,हिंदी साहित्य का इतिहास
2.रामस्वरूप चतुर्वेदी ,हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास
3. डॉ नगेन्द्र,हिंदी साहित्य का इतिहास
4. सं. पुस्तक सुमन भाटी, लेख- आधुनिक रामकाव्य की प्रासंगिकता,कंचन शर्मा
5.कबीर ग्रंथावली
6. तुलसीदास की ग्रंथावली
7. सुर्यकांत त्रिपाठी निराला, राम की शक्ति पूजा
 




मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

'किन्नर कथा’ में संघर्ष और सफलता





Aayushi International Interdisciplinary Research Journal (ISSN 2349-638x) Impact Factor 5.707  Peer Reviewed Journal www.aiirjournal.com,page no. 78-81

                     किन्नर कथा में संघर्ष और सफलता
                                                                                  
       हिंदी कथा साहित्यकार महेन्द्र भीष्म द्वारा लिखित किन्नर कथाउपन्यास बेहद चर्चित और प्रासंगिक माना जाता है। इस उपन्यास ने आधुनिक समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में सफलता हासिल की इसमें कोई दोहराय नहीं हैं,लेखक ने पूरी शिद्दत के साथ किन्नर समाज के संघर्ष को कथा के अंत में मानवीयता का दर्जा दिलाने में सफलता प्राप्त की है। कथा की शुरुआत राजघराने में जन्मोंत्सव से और अंत विवाह उत्सव के साथ होता हैं,लेकिन कथा के बीच में कई ऐसे मोड़ आते है, जो पाठकों को झंकझोर देने वाली जिज्ञासा पैदा करते है। जगतराजसिंह जैतपुर के राजा रह चुके हैं उनके घर किलकारी गूंजने का वक्त करीब है, फिर भी वह चित्रकूट चले जाते हैं। जैतपुर की सिध्दहस्त दाई निरंजना को रानी की देखभाल के लिए रखा जाता हैं,जो पल-प्रतिपल रानी साहिबा का ध्यान रख रही थी। रानी आभासिंह का स्वभाव राजा जगतसिंह से बिल्कुल अलग था। रानी साहिबा रूप के अनुरूप गुणवती और दया की प्रतिमूर्ति तथा ईश्वर पर अगाध विश्वास रखने वाली रानी साहिबा लोगों में प्रशंसनीय थी। ईश्वर भक्ति और उनके सुकर्मों कारण ही दुष्ट और दम्भी स्वभाव के राजा जगतसिंह पर ईश्वर की कृपा रहती हैं । उसके सारे काम चुटकियों में बनते जाते है। शत्रु पक्ष कभी उस पर हावी नहीं हो पाता। रानी आभासिंह की ईश्वरीय आराधना और जगतराजसिंह मनौती के लिए प्रत्येक अमावस को कादमगिरि जाकर परिक्रमा  करना व निरंजना की निश्छल अंतर्मन की पुकार से वर्षों बाद रानी साहिबा की गोद भर गई । उन्होंने दो जुड़वां स्वस्थ कन्याओं को जन्म दिया।  लेकिन ईश्वर ने यह लीला कुछ अलग तरीके रची थी। यह बात निरंजना के अलावा किसी को पता नहीं था,लेकिन निरंजना के चालीस साल के अनुभव में  यह  पहली चौंक्काने वाली घटना थी। निरंजना को समझ नहीं आ रहा है कि वह रानी को किस तरह बताये। यह सब देखकर अवाक् रह गई उसके मुंह से कोई लफ्ज नहीं निकल रहे थे,कैसे कहे वह कि इन दोनों में से एक बच्चा न लड़की है और न ही लड़का है। वह हिजड़ा है,हिजड़ा... रानी जब निन्द्रा से जागती है तब निरंजना को ईनाम/भेंट लेने का आग्रह करती है तो निरंजना विन्रमता के साथ हाथ जोड़ती हुई रोने लगती है,तब निरंजना से रोने कारण पूछने पर दिल पर पत्थर रखकर कहती है, मालकिन, देखो ई...के ...मोय लगत जो हिजड़ा भओ है।... “क्या?” (किन्नर कथा 16)  एक साथ सैकड़ों बिजलियां आभा की आंखों के सामने कौंध गईं।  कभी वह अपने हिजड़े बच्चे को देखती तो कभी सामने खड़ी निरंजना का मुंह ताकती,क्या करें क्या न करे? आभा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था ...बाद भरे गले वह निरंजना से बोली, काकी अब हमाई सबकी लाज तुमाए हाथन है । तुम तो दायजू को सुभाव जानती हो,कितेक गुस्सैल हैं वे,जा खबर तो वे बरदाश्त न कर पेहें,दायजू भी...उने पतो परे तो वे ई नन्हीं-सी जान खां मरवा डारे,काकी तुमे  हमाई सौगंध...तुमे जो रुपइय्या पईसा चाऊने हो, मैं मौ मांगी करों, पर तुमें ई  बात हां एकदम गुप्त रखने ।(किन्नर कथा 16) आभा को आंगिक विकृति वाली संतान देखकर घबराहट जरूर हुई लेकिन जिस रूप में है उसे स्वीकार्य करती है,परन्तु पति के क्रुर स्वभाव के कारण डर रही है कि कहीं जगतराजसिंह को पता चलेगा कि उसकी  बेटी  हिजङा है तो वह अवश्य उसे मार देगा इसलिए निरंजना से प्रार्थना करती है कि सोना के अधूरेपन की भनक किसी को ना लगने दे । अगर यहां आभा की जगह आम स्त्री को भी जन्मदात्री के रूप देखें तो वह मां भी अपने पति से आंगिक रूप से विकलांग बच्चे को छुपाने की कोशिश करती,क्योंकि मां समाज के ताने सहन करके भी अपनी संतान को किसी भी रूप को स्वीकार कर लेती है,लेकिन पिता को समाज में इज्जत,सम्मान और संतान प्यारी लगती हैं परन्तु जिस संतान पर लोग अंगुली उठाए,खानदान को कंलकित करें, उस संतान को कभी स्वीकार करने कोशिश तक नहीं करते । इसी तरह जगतराजसिंह भी अपनी बुंदेला खानदान में सोना के हिजङापन को कभी नहीं अपनाएंगे इस बात का भय रानी आभासिंह को था,वह डर के कारण निरंजना से अनुनय-विनय कर रही थी।
          रानी आभा और निरंजना कई दिनों तक बच्ची के अधूरेपन की भनक तक जगतराजसिंह को लगने नहीं दी,परन्तु एक दिन सारा राज जगतरासिंह की आंखों के सामने खुल ही जाता हैं। जिस बात का आभा को डर रहता था,वैसा ही कुछ हुआ। क्योंकि विपरीत लिंगी संतान को स्वीकार करने की पहल राजघरानों में भी नहीं की गई इस बात को लेखक सांकेतिक भाषा में उपन्यास के माध्यम से बताने की कोशिश कर रहे है।
जगतराजसिंह रूपा और सोना को बारिश में क्रीङा करते हुए देखकर अतिप्रसन्न हो रहे थे,कुछ समय पश्चात जब जगतराजसिंह बेटियों को सीढ़ियों से नीचे ले आ रहे थे,तब सोना निरंजना को देखकर उनके पास जाने के लिए मचल रही थी और जगतराजसिंह उसे नीचे उतारने लगे उसी क्रम में सोना के अंगवस्त्र नीचे उतर गया उसी क्षण पिता की अकस्मात नजर सोना के जननांग पर पङ गयी । तब जगतराजसिंह की आंखों के सामने मानों बिजली गिर गई हो,निरंजना को क्रोधित लाल आंखों से घूरकर दहाङकर बोला, “विश्वासघातिनी! फिर दो कदम आगे बढ़ाकर निरंजना के चेहरे पर भरपुर झापङ जङ दिया। कृशकाय वृद्ध निरंजना कटे वृक्ष-सी गई। आभा की दाईं हथेली स्वत: अपने गाल पर जा पहुंची ।निरंजना को पङा तमचा उसे अपने गाल पर महसूस हुआ। उसे अपनी हृदयगति रूकती-सी महसूस हुई।तेज चक्कर आया और मूर्च्छित हो वहां गिर पङी,दोनों बच्चे एकाएक बदले दृश्य से घबरा उठे और रुदन करने लगे।पिता के रौद्र रूप उन्होंने अपने अल्प जीवन में पहली बार देखा... ”(किन्नर कथा 24) विवेच्यानुसार लेखक अपने  उपन्यास में  पात्रों के  माध्यम से समाज के राजशाही वर्ग का पर्दाफाश करने की जद्दोदहद कोशिश कर रहे हैं जैसा कि सोना के अविकसित जननांग देखकर गीदङ की तरह फङफङाकर निरंजना पर जगतराजसिंह झङप पङते हैं । निर्दोष,स्वामिभक्तिन निरंजना को अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह से गोली मरवाकर मगरमच्छ का भोजन बनवाने में देर नहीं करता। वैसे तो भारत देश भले ही लोकतांत्रिक देश है,लेकिन सत्ता में आए कुछ नाममात्र के शासकों ने सेवाभावी रक्षकों,मजदूरों का सदैव शोषण किया है। जगतराजसिंह के आदेश को पुरा करते हुए उनके स्वामिभक्त पंचमसिंह ने ना जाने निरंजना जैसे  कितने गरीब स्वामिभक्तों को मौत के घाट उतारा होगा।
दद्दा हम तुम्हें अपनों बङों भैया मानत हैं। तुमाए पुरखा जैतपुर रियासत के दीवान रहे,.....बुंदेला खानदान को नाम डुबा दें,क्षत्रियवंश में हिजङा,का ऊ हिजङा हां पाले-पोसे अरे आज नहीं तो कल,जब सबके सामने जा बात आ जेहे कि हमाई संतान हिजङा है,बुंदेला खून हिजङा पैदा करत तो का गत हुई हमाई, समझत काय नईय्या तुम इत्ती सी बात” (किन्नर कथा 27)  लेखक पात्र के माध्यम से समाज में पौरूषात्मक की अकङ,झूठी शान-इज्जत,पर्दे के पीछे छुपे क्रूर,निर्दयी जो समाज में स्वयं को रक्षक मानने वालों का कलम के माध्यम से दोगलेपन को बताना चाहते है। जैसाकि जगतराजसिंह सोना को बुंदेला खानदान का कंलक मानते हुए अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह द्वारा अपनी हिजङा औलाद को मारने का आदेश देते हैं खैर पंचमसिंह ने राजा का आदेश शिरोधार्य मानते हुए निरंजना को मौत के घाट उतार दिया किन्तु सोना को जंगल में मारने के लिए चाकू निकालते है उसी समय उनकी अंगुली कट गई तब सोना ने अरे कक्काजू तुमाई उंगली पे खून... (किन्नर कथा 35) ऐसा कहते हुए पंचमसिंह की घायल  उंगुली पर अपने बालों के सफेद फीते से पट्टी बाँधी दी । सोना के इस प्यार ने पंचमसिंह का पत्थर जैसा दिल पिघाल दिया। उसी क्षण सोना के प्रति मन बदल लिया और सारे किए गए पापों का पाश्चताप करने लगे । वहां से कुछ ही दूरी पर आश्रम था पंचमसिंह अविचलित मन से सोना लेकर वहां पहुंच गये,जाकर महंतजी के पास कुछ समय तक बैठे ओर सोना भी चबूतरे के पास खरगोश के साथ खेलने लग गई। कुछ समय पश्चात पंचमसिंह ने मंहतजी से सारी व्यथा बताते हुए सोना के आंगिक विकृति के बारे में बताया और जगतराजसिंह द्वारा सोना की हत्या करवाने के लिए भेजा गया लेकिन अब वह हत्या न करके निर्दोष सोना को बचाने के लिए महंतजी से मार्गदर्शन चाहता हैं।
 महंतजी अपने आश्रम आई  किन्नर गुरू तारा का परिचय पंचमसिंह से करवाते हुए उसे सोना को सौंपने का आग्रह करते हैं और पंचमसिह तारा को सोना सौंपते हुए चेतावनी देते हैं कि बुंदेला राजा ने हिजङा बच्चा समाप्त करने का आदेश सुनाया था,परन्तु काम तमाम करने से पहले हाथ थम गये थे ।  पर एक बात पक्की सुन लो तारा ,महंतजी आप गवाह हैं। इस बात का  पता किसी को नहीं चलना चाहिए कि ये मोङी दायजू सरकार की या उनके वंश की है। दूसरी बात मैं कुछ देर में इतना धन दे जाता हूं कि जिंदगी भर ई बिटिया के लालन-पालन के बाद भी कमी न हुए और आखिरी बात,जैतपुर से पच्चीस मील की दूरी बनाए रखियो,नहीं तो काल को मौ देखो। (किन्नर कथा 41)पंचमसिंह तारा को सोना सौंप देते है उधर आभासिंह का रो-रोकर बेहाल हो गया है। उसे निर्दोष निरंजना और सोना के प्रति चिंता काटे जा रही है उसे लग रहा है कि पंचमसिंह और जगतसिंह ने कुछ जालसाजिश की होगी ।लेकिन रानी के कष्टों को कोई समझ नहीं सका । अब तारा सोना को अपने साथ किन्नर डेरे में ले जाने के बाद मातिन को सौंपते हुए उसका अच्छे से पालन-पोषण करने की सलाह देती हैं । लेकिन रातभर सोना के भविष्य को लेकर चिंतित और परेशान होती रही कि लोग किन्नरों को क्यों अपनी संतान के रूप नहीं अपनाते हैं।  बच्चों का क्या दोष उन्हें द्विलिंगीय समाज के लोग मौत के मुंह पहुंचाने में देर नहीं करते। या फिर मंदिर की सीढियों,कुङेदान  इत्यादि जगहों पर फेंक देते है। कुछ माता-पिता ऐसे बच्चों को अपना भी लेते हैं। परन्तु समाज के लोग हिजङे बच्चे के बङे होने के साथ-साथ स्त्रेण भावनाओं का भद्दा मजाक उङाते हैं । उन बच्चों के साथ असंवेदनशील व्यवहार करते है जैसा कि तारा के साथ हुआ/होता रहा है ।
तारा उपन्यास की सबसे अधिक संघर्षशील पात्र रही है। तारा का संघर्ष केवल द्विलिंगीय समाज साथ ही नहीं बल्कि नकली किन्नरों के साथ अपने हक के लिए संघर्ष करते हुए प्राण गवाने पङे। तारा कभी व्यसायिक परिवार तारा चन्द्र अग्रवाल के रूप में जाने जाते थे,स्त्रैण भावनाओं के कारण उसके बङे भाई को कतई पसंद नहीं था फिर 17-18 वर्ष की उम्र में भाई के कारण घर छोङ दिया । जीवनभर संघर्ष किया और किन्नरों के साथ रहते हुए तारा गुरू के रूप अपने आप को स्थापित किया। धीरे-धीरे अतीत को भुलाते चली लेकिन मां-बाप की याद हमेशा सताती थी,परन्तु कर भी क्या सकती। घर के सारे द्वार उसके लिए सदा के लिए बंद थे ।लेकिन एकदिन मां की मौत का समाचार मिलने पर वह श्मशान घाट पर जाती हैं, अंतिम संस्कार करवाने के लिए। वहां तारा को अपनी मां का मुंह तक नहीं देखने देते। वहां उसके भाई-भतीजे फटकार लगाकर भगा देते है, अगर दो-तीन हिजङे साथ नहीं होते तो मार-पिटाई भी कर देते। तारा ईश्वर को कोसते हुए रो-धोकर वापस अपने चेलों के साथ डेरे में आ गई ।  
अब सोना को किन्नर समाज में सम्मलित कर लिया और सोना को अब सभी चंदा के नाम से जानने लगे है।  तारा चंदा को  बधाई के लिए कहीं नहीं भेजती है, वह घर में मातिन के साथ रसोईघर में ही सहयोग करती ।तारा ने चंदा के लिए घर में पढ़ाई-लिखाई और गायन कलाओं को सिखाने की व्यवस्था की और चंदा भी पूरी तरह इन सब में डूब चुकी है । कथा में आधुनिक और बदलाव का मोंड आता है, जब तारा का भतीज मनीष चंदा से प्यार करने लगता है और दुसरी तरफ मनीष के घरवालों ने तारा को घर बुलाकर चंदा को मनीष से दुर रखने की हिदायत देते हैं। तारा जब मनीष को सारी बात बताती हैं, उसके घर वालों के बारे में तब मनीष तारा से कहता है। यह प्यार शारीरिक प्यार नहीं है, मैं चंदा के साथ अपना जीवन शादी करके बिताना चाहता हूं। उपन्यास में लेखक मनीष के माध्यम से पढ़े-लिखे युवाओं परिवर्तित सोच को बताना चाह रहे हैं ।
उपन्यास के अंत में नकली किन्नर लंबू और उनके मित्र तारा की हत्या कर देते है ।लेकिन प्रशासन के लोग इस हत्याकांड के आरोपियों का गिरफ्तार कर लेते हैं।मनीष तारा की अन्तिम क्रिया सामान्य विधि- विधान से संपन्न करवाता है। उधर जगतरासिंह के घर में रूपा की शादी की तैयारी धूमधाम से चलती उसी शादी में चंदा को नर्तकी के रूप में बुलाते है चंदा को सारा अपना अतीत याद आ जाता और वह अन्दर ही अंदर बहुत रोती हैं, और उसी अपने घर के आंगन पिता के चरणों में जान अर्पित करने का मन बनाती है । वहां चंदा को पहचान लिया जाता है जगतराजसिंह फिर सोना को मारने का सोच रहे हैं और पंचमसिंह को विश्वासघाती समझकर उस पर  क्रोधित हो जाते हैं लेकिन अंत में चंदा को अपना लिया जाता है।  सोना का ऑपरेशन करवाने के लिए रूपा की सास अपने साथ कनाङा ले जाती हैं । मनीष भी सोना के साथ जाता हैं अर्थात् प्रेमी बनकर निस्वार्थ प्रेम करके चंदा का जीवन सफल बनाता हैं। चंदा को पाने के लिए मनीष ने  अपने घरवालों का विरोध करके चंदा के साथ खङा रहा। उपन्यास का अंत लेखक बेहद सुखद अनुभूति के साथ करते हैं । तारा के कठिन संघर्ष ने चंदा और मातिन दोनों की जिंदगी को सफल बनाया और मानवीयता का  हक दिलाते हुए पाठकों को रूढ़िवादिता से पूरी तरह उभारा हैं। उपन्यास पढ़ने के पश्चात बदलाव के भाव अवश्य उभर रहे हैं।
   मिलन बिश्नोई
शोधार्थी/स्वतंत्र लेखन
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय तिरूवारुर 610005
milanbishnoi@gmail.com