मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

कबीर,तुलसी और निराला के साहित्य में राम


                                 कबीर,तुलसी और निराला के साहित्य में राम
मिलन बिश्नोई
पीएचडी शोधार्थी/स्वतंत्र साहित्यकार
तमिलनाडु केन्द्रीयविश्वविद्यालय,तिरुवारूर 610005
Mob.9488246295
भारतीय समाज के हर घर में और मनुष्य के रग-रग में दशरथ पुत्र राम बसे हुए है । तुलसी के राम,वाल्मीकि रामायण के रघुपति और निराला के राम से कौन अनभिज्ञ रहा हैं। इसके अलावा हिंदी साहित्य में कई रामकाव्य लिखे गए  जिनमें प्रमुख हैं- तुलसीकृत रामचरितमानस,केशवदास कृत रामचन्द्रिका,मैथिलीशरणगुप्त द्वारा लिखित साकेत और सुर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित राम की शक्ति पूजा इत्यादि। साहित्यकारों ने राम को अवतारी राम की तुलना में साधारण मानव के रूप में पेश किया है। जिसमें राम असत्य के प्रति सत्य की लड़ाई लड़ रहे है। चाहे वे तुलसी के राम हो या फिर निराला के राम । राम का  संघर्ष ही समाज का आदर्श बना है। राम की भक्ति सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं में देखने को मिलती हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-सगुणोपासक भक्त भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों रूप ही स्वीकार करता है,पर भक्ति के लिए सगुण रूप ही स्वीकार करता है,निर्गुण रूप ज्ञानमार्गियों के लिए छोड़ देता है.”सगुण भक्ति में राम के लीलावतार और आराध्य रूप को माना गया है वहीं निर्गुण भक्ति में ब्रह्मज्ञान और योगसाधना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया। वे निर्गुण भक्ति ब्रह्मनुभूति पर बल देते हैं। अर्थात् कबीर के राम  दशरथ पुत्र के साकार रूप में भले नहीं रहे लेकिन वे ब्रह्म के पर्याय थे-
दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
  राम नाम का मरम है आना ।। अर्थात् उन्होंने जो हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञानमार्गीय पद्धति को स्वीकार किया है। भारतीय ब्रह्मवाद के साथ कबीर ने सूफियों के रहस्वाद,हठयोगियों की साधना का समर्थन किया है। कबीर ने निर्गुण राम के बारें में कहा है-
 निरगुन राम जपहु रे भाई,अविगत की गति लखी न जाई।
सेसनाग जाके गरूड़  समाना चरन कमल कमला नहिं जाना।।
कबीर ने यहां शेषनाग,गरूड़,कमला आदि का उल्लेख सगुण प्रसंगों के  रूप में किया हैं। अर्थात् स्पष्ट है कि निर्गुण और सगुण एक –दूसरे के विरोधी नहीं हैं हमें ज्ञान और भक्ति में भी कहीं विरोध नहीं दिखाई देता।कबीर ने यह स्वीकार करते है भवसागर से पार जाने का साधन भक्ति है।इस भक्ति के बिना मनुष्य भव-जल में डूबता है-
भगति बिन भौजलि डूबत है रे।
कबीर ने राम के सगुण रूप को स्वीकार अवश्य नहीं किया लेकिन एकाग्रचित होकर ईश्वर की नामस्मरण करके जप करने की और प्रेरित करते हैं । वे मन को दसों दिशाओं में भटकाते हुए ईश्वर का नाम स्मरण करने वालों का विरोध करते हैं।
माला तो कर मे  फिरै जीभ फिरै मुख मांहि।।
मनुवां तो दस दिसी फिरै सो तौ सुमिरन नांहि।।
कबीर माधूर्य भाव की भक्ति में आत्मा-परमात्मा के मिलन के आंनद का वर्णन विवाह के सांगरूपक में करते है –
 दुलहिनी गावहु मंगलाचार।
मोरे घर आए हो राजा राम भरतार।।
तन रत करि मैं मन रत करिहौं पंच तत्व बाराती।
रामदेव मोरे पाहुनैं आए मैं जोवन मैमाती।। कबीर की भक्ति में आत्मा का जीवात्मा के प्रति विरह भाव मनोयोगात्मक रूप से देखने को मिलता हैं। वे प्रियतमा की भांति परमात्मा रूपी प्रियतम का इंतजार करते-करते उन्हें पुकारते हैं।
आँखड़ियाँ झांई पड़ी पंथ निहारि निहारि।
जिभड़ियां में छाला पड्या राम पुकारि पुकारि।।
 दास्य भाव की भक्ति जिस प्रकार तुलसीदास में दिखाई देती हैं उसी प्रकार कबीर की भक्ति में दास्य भक्ति के गुण देखने को मिलते हैं । वे अपना स्वामी ईश्वर और स्वयं को दास ओर गुलाम मानते है-
मैं गुलाम मोहि बेचि गोसाईं कबीर को हिंदी के भक्तिकाल में निर्गुण धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते थे उसी प्रकार सगुण धारा के रूप में गोस्वामी तुलसीदास रामभक्त कवि माने जाते हैं। उनका अवधी में रचित महाकाव्य रामचरितमानस रामकथा आधारित हैं जिसमें सात काण्ड हैं। रामचरितमानस को तुलसीदास ने 2 वर्ष 7 माह की अवधि में पूरा किया । तुलसीदास के 12 प्रमाणिक ग्रंथ है- रामचरित मानस ,विनय पत्रिका,कवितावली,गीतावली और दोहावली इनके प्रसिद्ध ग्रंथ  है। तुलसीदास ने राम के सगुण और साकार रूप को अपनाया । वे राम को विष्णु के अवतारी मानते हैं तथा शक्ति,शील और सौंदर्य से व्याप्त हैं। तुलसी के राम अवतारी राम हैं धर्म की रक्षा करने एवं अन्यायी और दुराचारियों को अवतरित मिटाने के लिए अवतरित हुए। मर्यादा पुरूषोत्तम राम को समाज के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया हैं। राम का चरित्र ही सभी एक नयी शक्ति के रूप में जनता को ऊर्जावान बनाती हैं। वे एक आदर्श पुत्र,आदर्श भाई,आदर्श पति,आदर्श राजा के रूप में वे लोकमानस पर अमिट छाप छोड़ते हैं। इसलिए आज भी जनता आदर्श राम राज्य की चाहत रखती हैं।
तुलसीदास की भक्ति दास्य भाव की भक्ति है वे राम के प्रति समर्पित भाव रखते हैं। रामचरित मानस में वे कहते है- सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगरि। कबीरदास की तरह ही यहां उनकी दास्य भक्ति में दिखाई देता है कि सेवक-सेव्य के बिना कोई भी इस भवसागर को पार नहीं कर सकता ।उनकी भक्ति गोस्वामीजी की भक्ति पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी सर्वांगपूर्णता।जीवन के किसी पक्ष को सर्वथा छोड़कर वह नहीं चलती है।स्पष्ट है कि तुलसी की भक्ति में शास्त्रोक्त विधियों का समावेश है तो दुसरी तरफ लोकमंगल की भावना । उनकी कविता का मूल उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय है।उनके संपूर्ण काव्य में समन्वय की विराट चेष्टा देखने को मिलती हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें लोकनायक कहा है । उनके अनुसार- भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृति ,साधनाएं, जातियां,आचार,विचारऔर पद्धतियां प्रचलित है ।तुलसीदास स्वयं नाना प्रकार के सामाजिक स्तरों में रह चुके थे। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय है  नहीं अपितु गार्हस्थ और वैराग्य का भक्ति और ज्ञान का भाषा और संस्कृति का निर्गुण और सगुण का पुराण और काव्य भाववेग और अनासक्त चिंता का समन्वय रामचरितमानस के आदि से अंत तक दो छोरों पर जाने वाली  पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है। तुलसीदास की कविता में लोकमंगल की भावना जो विद्यमान है वह उनकी सामाजिक,सांस्कृतिक से अदभूत हैं।तुलसी,कबीर,सूर जैसे कवियों ने अपने काव्य के माध्यम से मानव मात्र की मनुष्यता को जगाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया हैं। तुलसी का काव्य जनकल्याणकारी है,अमंगल का विनाश करने वाला एवं मंगल का विधान करने वाला है।उनका प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरितमानस से अधिक क्या लोककल्याणकारी हो सकता । इस ग्रंथ के अखण्ड पाठ आज भी प्रत्येक हिंदू घरों में किएजाते है।
राम नाम के संबंध में नंददुलारे वाजपेयी का कथन है- उनके सम्मुख कोई बने बनाए आदर्श या नये-तुले प्रतिमान न थे,इसलिए जो कुछ भी उन्हें उदाहरणों में अच्छा उपयोगी दिखाई दिया उसी को वे नए साँचे में ढालने लगे। राम और कृष्ण उनके सर्वाधिक समीपी और परिचित नाम थे,अतएव इन्हीं चरित्रों को उन्होंने नए सामाजिक आदर्शों की अनुरूपता देने की ठानी। निराला के सम्मुख प्राचीन आदर्श प्रतिमानों को छोड़कर नवीन आदर्श रूप में कोई प्रतिमान नहीं आया इसलिए उन्होंने राम नाम का उद्धत किया है,किंतु नवीन रूप में क्योंकि ये अवतारी राम नहीं बल्कि संशय युक्त मानव,अपने साधारण मानव है जो अपने समय की परिस्थितियों से अवसाद हैं। हिंदी छायावादी कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला युगीन यथार्थ के प्रति सजग कवि माने जाते थे। उनका जीवन संघर्षों ले भरा हुआ था। उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा के कारण कभी भी किसी प्रकार के कष्ट और पीड़ा के सामने झुके नहीं।यथार्थ की विषम परिस्थितियों को पार करते हुए आजीवन संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते रहे। उनकी प्रसिद्ध रचना राम की शक्ति पूजा में निराला के स्वयं का चरित्र देखने को मिलता है। “ ‘राम की शक्ति पूजा निराला की नहीं, संपूर्ण छायावादी काव्य की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है। इसमें  कवि ने एक ऐतिहासिक प्रसंग के द्वारा धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का चित्रण किया है। राम धर्म के प्रतीक हैं और रावण अधर्म का । इस कविता में अधर्म का चित्रण एक प्रचंड शक्ति के रूप में हुआ है,जिसके सामने एक बार तो राम  का साहस भी कुंठितहोने लगता है।यह स्थिति एक ओर तो कवि के व्यक्तिगत जीवन के भयानक संघर्ष से संबद्ध हो जाती है और दूसरी ओर युगीन यथार्थ की विकरालता को भी व्यंजित करती है। अंत में राम की शक्ति की शक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं, उसकी आराधना करते हैं और अधर्म  के विनाश के लिए सक्षम होते हैं।अर्थात् यहां शक्ति की मौलिक उपासना भारतीय परम्परा में विश्वास रखते हुए सत्य की ओर आगे बढ़ने की ओर कवि संकेत करता हैं। दूसरी तरफ प्राचीन सांस्कृतिक आदर्शों का युगानुरूप संशोधन करने की ओर संकेत किया गया।
राम की शक्ति पूजाकी कथा बंगाल के कृतिवास रामायण से ली गई है, यह निराला की एक 1936 ई. में लिखित प्रबंधात्मक कविता है उनके समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शित कराती है। काव्य सौंदर्य की दृष्टि से यह  कविता आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी काव्य की प्रगति की सीमा मानी जा सकती है। इसमें राम और रावण के युद्ध के व्यक्ति के अंतद्वन्द्व का वर्णन मिलता है।
         रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
             रस गया राम-रावण का अपराजेय समर
              आज का तीक्ष्ण-शर-विधृत-शिप्र-कर,वेग-प्रखर
             शत-शेल-सम्बरण-शील,नील-नभ-गर्जित-स्वर,
            प्रति-पल –परिवर्तित व्यूह-भेद-कौशल-समूह-...लोहित-लोचन-
             रावण-मदमोचन महीयान...
निराला ने  तुलसी की भांति राम को पृथ्वी के भारों का विनाश करने के लिए अवतरित नहीं किया है,उन्होंने समस्त संघर्षों का सामना करके विजेता प्राप्त की है।निराला के राम की यही मानवीयता है कि कभी वे निराश हो जाते है अन्याय की तरफ शक्ति का झुकाव देखकर लेकिन फिर से अपने मित्र के कहने और अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए मौलिक कल्पना की दृढ आराधना करते हैं।
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान,रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण
हे पुरूषसिंह,तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधना का दृढ़ आराधना से दो उत्तर ।... राम केवल लोक नायक ही नहीं वे एक आदर्श पति भी हैं इसी कारण सीता  की मुक्ति का दायित्व अपने ऊपर समझते हुए इस दायित्व को निभाने की पूरी कोशिश करते है और पराक्रमी रावण से युद्ध जीत लेना चाहते हैं।इसके साथ यहां शक्ति आराधना का यह रूप मौलिक होने के साथ-साथ युगानुरूप भी है।  यहां राम अपने भक्त आज्ञाकारी हनुमान को इंदीवर लाने का आदेश देते हैं।
चाहिए हमें एक सौ आठ कपि इंदीवर
 कम से कम,अधिक और अधिक हो,अधिक और सुंदर
जाओ देवीदह,उष : काल होते,सत्वर
तोड़ो लाओ वे कमल,लौट कर  लड़ो समर
अवगत हो जाम्बवान से पथ,दूरत्वस्थान
 प्रभु पद रज सिर घर  चले हर्ष भर हनुमान।
राम की शक्ति की आराधना करने में लीन हो जाते है और नौ वें दिन शक्ति उनकी परीक्षा लेने के लिए अंतिम पुष्प छुपा देती है जैसे ही यह थाली में इंदीवर के लिए हाथ बढ़ाते है उन्हें पुष्प नहीं मिलता है । एक क्षण के लिए धिक्कार सा महसूस होता है। क्योंकि रावण रूपी वैष्मयों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रकार की साधना करने का प्रयास करते हैं।परंतु कोई न कोई बाधा समुपस्थित होकर समस्त साधनाओं को निष्फल करने का प्रयास करती हैं तब राम के शब्दों में कवि का अंतर्मन खिन हो जाता है-
 धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध
 धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। राम का यह धिक्कार ,वास्तव में कवि की अपनी ही नियति के प्रति धिक्कार है।परंतु राम स्वयं के नयन को आहुति देने को तत्पर हो जाते है । उन्हें माँ राजीव नयन कहकर बुलाने का स्मरण आया जिससे अपनी साधना पूरी करने की ठान लेते हैं। तब  श्रीराम की नियति तो निश्चित है  अंत में देवी आकर उन्हें साक्षात् रूप से मिलकर विजयीभव का आर्शीवचन देते  हुए लीन  हो जाती ।
संदर्भ ग्रंथ सूची- आचार्य रामचंद्र शुक्ल,हिंदी साहित्य का इतिहास
2.रामस्वरूप चतुर्वेदी ,हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास
3. डॉ नगेन्द्र,हिंदी साहित्य का इतिहास
4. सं. पुस्तक सुमन भाटी, लेख- आधुनिक रामकाव्य की प्रासंगिकता,कंचन शर्मा
5.कबीर ग्रंथावली
6. तुलसीदास की ग्रंथावली
7. सुर्यकांत त्रिपाठी निराला, राम की शक्ति पूजा
 




मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

'किन्नर कथा’ में संघर्ष और सफलता





Aayushi International Interdisciplinary Research Journal (ISSN 2349-638x) Impact Factor 5.707  Peer Reviewed Journal www.aiirjournal.com,page no. 78-81

                     किन्नर कथा में संघर्ष और सफलता
                                                                                  
       हिंदी कथा साहित्यकार महेन्द्र भीष्म द्वारा लिखित किन्नर कथाउपन्यास बेहद चर्चित और प्रासंगिक माना जाता है। इस उपन्यास ने आधुनिक समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में सफलता हासिल की इसमें कोई दोहराय नहीं हैं,लेखक ने पूरी शिद्दत के साथ किन्नर समाज के संघर्ष को कथा के अंत में मानवीयता का दर्जा दिलाने में सफलता प्राप्त की है। कथा की शुरुआत राजघराने में जन्मोंत्सव से और अंत विवाह उत्सव के साथ होता हैं,लेकिन कथा के बीच में कई ऐसे मोड़ आते है, जो पाठकों को झंकझोर देने वाली जिज्ञासा पैदा करते है। जगतराजसिंह जैतपुर के राजा रह चुके हैं उनके घर किलकारी गूंजने का वक्त करीब है, फिर भी वह चित्रकूट चले जाते हैं। जैतपुर की सिध्दहस्त दाई निरंजना को रानी की देखभाल के लिए रखा जाता हैं,जो पल-प्रतिपल रानी साहिबा का ध्यान रख रही थी। रानी आभासिंह का स्वभाव राजा जगतसिंह से बिल्कुल अलग था। रानी साहिबा रूप के अनुरूप गुणवती और दया की प्रतिमूर्ति तथा ईश्वर पर अगाध विश्वास रखने वाली रानी साहिबा लोगों में प्रशंसनीय थी। ईश्वर भक्ति और उनके सुकर्मों कारण ही दुष्ट और दम्भी स्वभाव के राजा जगतसिंह पर ईश्वर की कृपा रहती हैं । उसके सारे काम चुटकियों में बनते जाते है। शत्रु पक्ष कभी उस पर हावी नहीं हो पाता। रानी आभासिंह की ईश्वरीय आराधना और जगतराजसिंह मनौती के लिए प्रत्येक अमावस को कादमगिरि जाकर परिक्रमा  करना व निरंजना की निश्छल अंतर्मन की पुकार से वर्षों बाद रानी साहिबा की गोद भर गई । उन्होंने दो जुड़वां स्वस्थ कन्याओं को जन्म दिया।  लेकिन ईश्वर ने यह लीला कुछ अलग तरीके रची थी। यह बात निरंजना के अलावा किसी को पता नहीं था,लेकिन निरंजना के चालीस साल के अनुभव में  यह  पहली चौंक्काने वाली घटना थी। निरंजना को समझ नहीं आ रहा है कि वह रानी को किस तरह बताये। यह सब देखकर अवाक् रह गई उसके मुंह से कोई लफ्ज नहीं निकल रहे थे,कैसे कहे वह कि इन दोनों में से एक बच्चा न लड़की है और न ही लड़का है। वह हिजड़ा है,हिजड़ा... रानी जब निन्द्रा से जागती है तब निरंजना को ईनाम/भेंट लेने का आग्रह करती है तो निरंजना विन्रमता के साथ हाथ जोड़ती हुई रोने लगती है,तब निरंजना से रोने कारण पूछने पर दिल पर पत्थर रखकर कहती है, मालकिन, देखो ई...के ...मोय लगत जो हिजड़ा भओ है।... “क्या?” (किन्नर कथा 16)  एक साथ सैकड़ों बिजलियां आभा की आंखों के सामने कौंध गईं।  कभी वह अपने हिजड़े बच्चे को देखती तो कभी सामने खड़ी निरंजना का मुंह ताकती,क्या करें क्या न करे? आभा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था ...बाद भरे गले वह निरंजना से बोली, काकी अब हमाई सबकी लाज तुमाए हाथन है । तुम तो दायजू को सुभाव जानती हो,कितेक गुस्सैल हैं वे,जा खबर तो वे बरदाश्त न कर पेहें,दायजू भी...उने पतो परे तो वे ई नन्हीं-सी जान खां मरवा डारे,काकी तुमे  हमाई सौगंध...तुमे जो रुपइय्या पईसा चाऊने हो, मैं मौ मांगी करों, पर तुमें ई  बात हां एकदम गुप्त रखने ।(किन्नर कथा 16) आभा को आंगिक विकृति वाली संतान देखकर घबराहट जरूर हुई लेकिन जिस रूप में है उसे स्वीकार्य करती है,परन्तु पति के क्रुर स्वभाव के कारण डर रही है कि कहीं जगतराजसिंह को पता चलेगा कि उसकी  बेटी  हिजङा है तो वह अवश्य उसे मार देगा इसलिए निरंजना से प्रार्थना करती है कि सोना के अधूरेपन की भनक किसी को ना लगने दे । अगर यहां आभा की जगह आम स्त्री को भी जन्मदात्री के रूप देखें तो वह मां भी अपने पति से आंगिक रूप से विकलांग बच्चे को छुपाने की कोशिश करती,क्योंकि मां समाज के ताने सहन करके भी अपनी संतान को किसी भी रूप को स्वीकार कर लेती है,लेकिन पिता को समाज में इज्जत,सम्मान और संतान प्यारी लगती हैं परन्तु जिस संतान पर लोग अंगुली उठाए,खानदान को कंलकित करें, उस संतान को कभी स्वीकार करने कोशिश तक नहीं करते । इसी तरह जगतराजसिंह भी अपनी बुंदेला खानदान में सोना के हिजङापन को कभी नहीं अपनाएंगे इस बात का भय रानी आभासिंह को था,वह डर के कारण निरंजना से अनुनय-विनय कर रही थी।
          रानी आभा और निरंजना कई दिनों तक बच्ची के अधूरेपन की भनक तक जगतराजसिंह को लगने नहीं दी,परन्तु एक दिन सारा राज जगतरासिंह की आंखों के सामने खुल ही जाता हैं। जिस बात का आभा को डर रहता था,वैसा ही कुछ हुआ। क्योंकि विपरीत लिंगी संतान को स्वीकार करने की पहल राजघरानों में भी नहीं की गई इस बात को लेखक सांकेतिक भाषा में उपन्यास के माध्यम से बताने की कोशिश कर रहे है।
जगतराजसिंह रूपा और सोना को बारिश में क्रीङा करते हुए देखकर अतिप्रसन्न हो रहे थे,कुछ समय पश्चात जब जगतराजसिंह बेटियों को सीढ़ियों से नीचे ले आ रहे थे,तब सोना निरंजना को देखकर उनके पास जाने के लिए मचल रही थी और जगतराजसिंह उसे नीचे उतारने लगे उसी क्रम में सोना के अंगवस्त्र नीचे उतर गया उसी क्षण पिता की अकस्मात नजर सोना के जननांग पर पङ गयी । तब जगतराजसिंह की आंखों के सामने मानों बिजली गिर गई हो,निरंजना को क्रोधित लाल आंखों से घूरकर दहाङकर बोला, “विश्वासघातिनी! फिर दो कदम आगे बढ़ाकर निरंजना के चेहरे पर भरपुर झापङ जङ दिया। कृशकाय वृद्ध निरंजना कटे वृक्ष-सी गई। आभा की दाईं हथेली स्वत: अपने गाल पर जा पहुंची ।निरंजना को पङा तमचा उसे अपने गाल पर महसूस हुआ। उसे अपनी हृदयगति रूकती-सी महसूस हुई।तेज चक्कर आया और मूर्च्छित हो वहां गिर पङी,दोनों बच्चे एकाएक बदले दृश्य से घबरा उठे और रुदन करने लगे।पिता के रौद्र रूप उन्होंने अपने अल्प जीवन में पहली बार देखा... ”(किन्नर कथा 24) विवेच्यानुसार लेखक अपने  उपन्यास में  पात्रों के  माध्यम से समाज के राजशाही वर्ग का पर्दाफाश करने की जद्दोदहद कोशिश कर रहे हैं जैसा कि सोना के अविकसित जननांग देखकर गीदङ की तरह फङफङाकर निरंजना पर जगतराजसिंह झङप पङते हैं । निर्दोष,स्वामिभक्तिन निरंजना को अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह से गोली मरवाकर मगरमच्छ का भोजन बनवाने में देर नहीं करता। वैसे तो भारत देश भले ही लोकतांत्रिक देश है,लेकिन सत्ता में आए कुछ नाममात्र के शासकों ने सेवाभावी रक्षकों,मजदूरों का सदैव शोषण किया है। जगतराजसिंह के आदेश को पुरा करते हुए उनके स्वामिभक्त पंचमसिंह ने ना जाने निरंजना जैसे  कितने गरीब स्वामिभक्तों को मौत के घाट उतारा होगा।
दद्दा हम तुम्हें अपनों बङों भैया मानत हैं। तुमाए पुरखा जैतपुर रियासत के दीवान रहे,.....बुंदेला खानदान को नाम डुबा दें,क्षत्रियवंश में हिजङा,का ऊ हिजङा हां पाले-पोसे अरे आज नहीं तो कल,जब सबके सामने जा बात आ जेहे कि हमाई संतान हिजङा है,बुंदेला खून हिजङा पैदा करत तो का गत हुई हमाई, समझत काय नईय्या तुम इत्ती सी बात” (किन्नर कथा 27)  लेखक पात्र के माध्यम से समाज में पौरूषात्मक की अकङ,झूठी शान-इज्जत,पर्दे के पीछे छुपे क्रूर,निर्दयी जो समाज में स्वयं को रक्षक मानने वालों का कलम के माध्यम से दोगलेपन को बताना चाहते है। जैसाकि जगतराजसिंह सोना को बुंदेला खानदान का कंलक मानते हुए अपने विश्वासपात्र पंचमसिंह द्वारा अपनी हिजङा औलाद को मारने का आदेश देते हैं खैर पंचमसिंह ने राजा का आदेश शिरोधार्य मानते हुए निरंजना को मौत के घाट उतार दिया किन्तु सोना को जंगल में मारने के लिए चाकू निकालते है उसी समय उनकी अंगुली कट गई तब सोना ने अरे कक्काजू तुमाई उंगली पे खून... (किन्नर कथा 35) ऐसा कहते हुए पंचमसिंह की घायल  उंगुली पर अपने बालों के सफेद फीते से पट्टी बाँधी दी । सोना के इस प्यार ने पंचमसिंह का पत्थर जैसा दिल पिघाल दिया। उसी क्षण सोना के प्रति मन बदल लिया और सारे किए गए पापों का पाश्चताप करने लगे । वहां से कुछ ही दूरी पर आश्रम था पंचमसिंह अविचलित मन से सोना लेकर वहां पहुंच गये,जाकर महंतजी के पास कुछ समय तक बैठे ओर सोना भी चबूतरे के पास खरगोश के साथ खेलने लग गई। कुछ समय पश्चात पंचमसिंह ने मंहतजी से सारी व्यथा बताते हुए सोना के आंगिक विकृति के बारे में बताया और जगतराजसिंह द्वारा सोना की हत्या करवाने के लिए भेजा गया लेकिन अब वह हत्या न करके निर्दोष सोना को बचाने के लिए महंतजी से मार्गदर्शन चाहता हैं।
 महंतजी अपने आश्रम आई  किन्नर गुरू तारा का परिचय पंचमसिंह से करवाते हुए उसे सोना को सौंपने का आग्रह करते हैं और पंचमसिह तारा को सोना सौंपते हुए चेतावनी देते हैं कि बुंदेला राजा ने हिजङा बच्चा समाप्त करने का आदेश सुनाया था,परन्तु काम तमाम करने से पहले हाथ थम गये थे ।  पर एक बात पक्की सुन लो तारा ,महंतजी आप गवाह हैं। इस बात का  पता किसी को नहीं चलना चाहिए कि ये मोङी दायजू सरकार की या उनके वंश की है। दूसरी बात मैं कुछ देर में इतना धन दे जाता हूं कि जिंदगी भर ई बिटिया के लालन-पालन के बाद भी कमी न हुए और आखिरी बात,जैतपुर से पच्चीस मील की दूरी बनाए रखियो,नहीं तो काल को मौ देखो। (किन्नर कथा 41)पंचमसिंह तारा को सोना सौंप देते है उधर आभासिंह का रो-रोकर बेहाल हो गया है। उसे निर्दोष निरंजना और सोना के प्रति चिंता काटे जा रही है उसे लग रहा है कि पंचमसिंह और जगतसिंह ने कुछ जालसाजिश की होगी ।लेकिन रानी के कष्टों को कोई समझ नहीं सका । अब तारा सोना को अपने साथ किन्नर डेरे में ले जाने के बाद मातिन को सौंपते हुए उसका अच्छे से पालन-पोषण करने की सलाह देती हैं । लेकिन रातभर सोना के भविष्य को लेकर चिंतित और परेशान होती रही कि लोग किन्नरों को क्यों अपनी संतान के रूप नहीं अपनाते हैं।  बच्चों का क्या दोष उन्हें द्विलिंगीय समाज के लोग मौत के मुंह पहुंचाने में देर नहीं करते। या फिर मंदिर की सीढियों,कुङेदान  इत्यादि जगहों पर फेंक देते है। कुछ माता-पिता ऐसे बच्चों को अपना भी लेते हैं। परन्तु समाज के लोग हिजङे बच्चे के बङे होने के साथ-साथ स्त्रेण भावनाओं का भद्दा मजाक उङाते हैं । उन बच्चों के साथ असंवेदनशील व्यवहार करते है जैसा कि तारा के साथ हुआ/होता रहा है ।
तारा उपन्यास की सबसे अधिक संघर्षशील पात्र रही है। तारा का संघर्ष केवल द्विलिंगीय समाज साथ ही नहीं बल्कि नकली किन्नरों के साथ अपने हक के लिए संघर्ष करते हुए प्राण गवाने पङे। तारा कभी व्यसायिक परिवार तारा चन्द्र अग्रवाल के रूप में जाने जाते थे,स्त्रैण भावनाओं के कारण उसके बङे भाई को कतई पसंद नहीं था फिर 17-18 वर्ष की उम्र में भाई के कारण घर छोङ दिया । जीवनभर संघर्ष किया और किन्नरों के साथ रहते हुए तारा गुरू के रूप अपने आप को स्थापित किया। धीरे-धीरे अतीत को भुलाते चली लेकिन मां-बाप की याद हमेशा सताती थी,परन्तु कर भी क्या सकती। घर के सारे द्वार उसके लिए सदा के लिए बंद थे ।लेकिन एकदिन मां की मौत का समाचार मिलने पर वह श्मशान घाट पर जाती हैं, अंतिम संस्कार करवाने के लिए। वहां तारा को अपनी मां का मुंह तक नहीं देखने देते। वहां उसके भाई-भतीजे फटकार लगाकर भगा देते है, अगर दो-तीन हिजङे साथ नहीं होते तो मार-पिटाई भी कर देते। तारा ईश्वर को कोसते हुए रो-धोकर वापस अपने चेलों के साथ डेरे में आ गई ।  
अब सोना को किन्नर समाज में सम्मलित कर लिया और सोना को अब सभी चंदा के नाम से जानने लगे है।  तारा चंदा को  बधाई के लिए कहीं नहीं भेजती है, वह घर में मातिन के साथ रसोईघर में ही सहयोग करती ।तारा ने चंदा के लिए घर में पढ़ाई-लिखाई और गायन कलाओं को सिखाने की व्यवस्था की और चंदा भी पूरी तरह इन सब में डूब चुकी है । कथा में आधुनिक और बदलाव का मोंड आता है, जब तारा का भतीज मनीष चंदा से प्यार करने लगता है और दुसरी तरफ मनीष के घरवालों ने तारा को घर बुलाकर चंदा को मनीष से दुर रखने की हिदायत देते हैं। तारा जब मनीष को सारी बात बताती हैं, उसके घर वालों के बारे में तब मनीष तारा से कहता है। यह प्यार शारीरिक प्यार नहीं है, मैं चंदा के साथ अपना जीवन शादी करके बिताना चाहता हूं। उपन्यास में लेखक मनीष के माध्यम से पढ़े-लिखे युवाओं परिवर्तित सोच को बताना चाह रहे हैं ।
उपन्यास के अंत में नकली किन्नर लंबू और उनके मित्र तारा की हत्या कर देते है ।लेकिन प्रशासन के लोग इस हत्याकांड के आरोपियों का गिरफ्तार कर लेते हैं।मनीष तारा की अन्तिम क्रिया सामान्य विधि- विधान से संपन्न करवाता है। उधर जगतरासिंह के घर में रूपा की शादी की तैयारी धूमधाम से चलती उसी शादी में चंदा को नर्तकी के रूप में बुलाते है चंदा को सारा अपना अतीत याद आ जाता और वह अन्दर ही अंदर बहुत रोती हैं, और उसी अपने घर के आंगन पिता के चरणों में जान अर्पित करने का मन बनाती है । वहां चंदा को पहचान लिया जाता है जगतराजसिंह फिर सोना को मारने का सोच रहे हैं और पंचमसिंह को विश्वासघाती समझकर उस पर  क्रोधित हो जाते हैं लेकिन अंत में चंदा को अपना लिया जाता है।  सोना का ऑपरेशन करवाने के लिए रूपा की सास अपने साथ कनाङा ले जाती हैं । मनीष भी सोना के साथ जाता हैं अर्थात् प्रेमी बनकर निस्वार्थ प्रेम करके चंदा का जीवन सफल बनाता हैं। चंदा को पाने के लिए मनीष ने  अपने घरवालों का विरोध करके चंदा के साथ खङा रहा। उपन्यास का अंत लेखक बेहद सुखद अनुभूति के साथ करते हैं । तारा के कठिन संघर्ष ने चंदा और मातिन दोनों की जिंदगी को सफल बनाया और मानवीयता का  हक दिलाते हुए पाठकों को रूढ़िवादिता से पूरी तरह उभारा हैं। उपन्यास पढ़ने के पश्चात बदलाव के भाव अवश्य उभर रहे हैं।
   मिलन बिश्नोई
शोधार्थी/स्वतंत्र लेखन
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय तिरूवारुर 610005
milanbishnoi@gmail.com

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

‘मैं पायल’ उपन्यास की समीक्षा :लिंगभेद की कसौटी पर



Milan Bishno
PhD Scholar
Department of hindi
Central University of tamil nadu ,610005
mail- milanbishnoi@gmail.com
mob-9488246295
                                                                                                                                                      
                             मैं पायल उपन्यास की समीक्षा :लिंगभेद की कसौटी पर
 मानव समाज की सरंचना तीन प्रकार से बनी हैं- नर, नारी एवं नपुसंकलिंगी। सोचनीय बात यह है कि नर और नारी को समाज में आदर सत्कार मिलता है। लेकिन तृतीयलिंगी/ नपुसंकलिंगी को समाज में आदर सत्कार के बजाय उपेक्षित और तिरस्कृत निगाहों से देखा जाता है। लैगिंक विकलांगता के कारण उन्हें उपेक्षित, शोषित होने का दंश झेलने को मजबूर किया जाता है। लैंगिक विकृति वाले इंसान के साथ हो रहे भेदभावों को कथाकार श्री महेंद्र भीष्मजी ने मैं पायल उपन्यास के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उपन्यास की मुख्य पात्रा पायल के किन्नर जीवन में संघर्ष और उनके  परिवार से मिली कष्टदायी पीड़ा को लेखक ने समाज के सामने रखा हैं। इस उपन्यास में लेखक ने किन्नर पायल की वेदना, पीड़ा, संघर्ष के साथ-साथ किन्नर गुरु की अय्याशी का चित्रण किया है, साथ ही साथ पायल जैसे कई लोगों को किस प्रकार जबरदस्ती किन्नर बना दिया जाता है,उन सभी का पर्दाफाश किया गया है। इसमें एक ऐसे किन्नर गुरु का वर्णन किया गया है जो अपने निजी स्वार्थ के लिए पायल जैसी मासूम किशोरी को अपने कुनबे में शामिल करने हेतु जबरन किन्नर बनाने से पीछे नहीं हटते। लेखक ने पितृसत्ता की संकीर्ण मानसिकता का यथार्थ चित्रण किया है। इस बात को उपन्यास में पात्रों के माध्यम से भी बताने की कोशिश की है। दूसरी ओर लेखक ने यह भी दिखाया है कि किस प्रकार समाज अपनी उच्च वर्ण व्यवस्था के घमंड में तृतीय लिंगी औलाद के साथ असहनीय व्यवहार करता रहा ।
            सामान्य समाज के लोग नपुसंकलिंगी सन्तान का पालन-पोषण करने में स्वयं को कलंकित होना मानते है, जबकि  समाज विकलांग, मंदबुद्धि, रोगग्रसित बच्चों का पालन-पोषण प्यार से करता हैं। इस प्रकार अगर तृतीयलिंगी बच्चों की परवरिश भी सही तरीके से की जाए, तो वही बच्चे आगे चलकर समाज में सक्षम होकर समाज के लिए ही एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हो सकते हैं। इसके विपरीत समाज उन्हें अपनाने से दूर भागते हैं, फिर वे दर-दर की ठोकर खाते हैं। इस संदर्भ में शबनम मौसी किन्नर समाज के प्रति अपना मत प्रकट करती हैं-“लोग कुत्ते को पालते हैं, उनको इज्जत देते हैं, कितने प्यार से उसको खाना खिलाते हैं, अपनी गाड़ियों में बिठाते हैं, बिस्तर पर सुलाते हैं, वह एक कुत्ता है, जब आप उसे जीने का अधिकार देते हो तो किन्नर को क्यों नही?” कथन से स्पष्ट होता हैं कि समाज तृतीयलिंगी लोगों के प्रति कितना असंवेदनशील हैं। आज किन्नर भले ही कहीं लम्बी कतार में दिखाई दे रहे है, परन्तु उनका स्थान हमेशा ही आखिरी छोर रहा है।
            उपन्यास में माँ अपनी बेटी पायल के शरीर को लेकर चिंता जाहिर करती हैं, परन्तु वह हमेशा से ही पायल के प्रति समर्पित रही है, यानि पायल को माँ के प्यार में कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई “ईश्वर को पता नहीं क्या मंजूर था अच्छी खासी लड़की जैसी लड़की लगती है।” इस कथन से स्पष्ट होता कि माँ अपनी सन्तान के प्रति भेदभाव नहीं रखती फिर भी उन्हें समाज का भय सताता है। उपन्यास को पढ़ते हुए लगता है कि किस प्रकार लोग समाज में अपने आप को ऊँचा दिखाने के लिए अपनी कोख से पैदा हुए तृतीय लिंगी संतान के प्रति दोहरा व्यवहार करते हैं। यह भी किसी से नहीं छिपा है कि समाज में अधिकतर लोगों को पुत्र मोह अधिक रहा है। मैं समाज से यह प्रश्न करना चाहूंगी कि क्या छोटे बच्चे का लिंग पूर्ण रूप से विकसित होना उसके वश में होता है? कदापि, नही यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है इस समस्या का विज्ञान भी पूर्ण रूप से समाधान नहीं खोज पायी है, यह फिर समाज जानते हुए भी अनजान क्यों है?
        उपन्यास की पात्रा पायल का जब जन्म होता है तब उसके पिता उसका मुँह तक नहीं देखता हैं क्योंकि उनको एक बेटे की अपेक्षा थी, जो पैदा नहीं हुआ और पायल ने भी विकृत लिंग के साथ जन्म लिया । कुछ दिनों बाद जब पायल स्कूल जाने लायक हो जाती है तब उसे बाहर भेजने से पहले उसके कपड़ो को लेकर बहुत सावधानी बरतते हैं, कि किसी को शक ना हो कि ये हिजड़ा है, इस दौरान पिता का गुस्सा भी साथ ही साथ बढ़ता जाता है, वे पायल को अपने वंश का कलंक मानने लग जाते हैं-“ये जुगनी! हम क्षत्रिय वंश में कलंक हुई हैं, साली हिजड़ा है...आदि न जाने क्या-क्या बकते रहते हैं।” प्रस्तुत उदाहरण से स्पष्ट है कि अगर पिता ही अपनी संतान के साथ इस तरह व्यवहार करेगा तो समाज के अन्य लोग उसे किस दृष्टि से देखेंगे? भले ही पायल के लिए हिजड़ा शब्द अबोधित हैं, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ उसे यही शब्द घृणित करते हैं। पायल के पिताजी काम पर जाते समय उसकी माँ से कहते हैं कि पायल को लड़के की वेशभूषा में ही रखना, लड़की के वेशभूषा में नहीं, किन्तु जब वे शाम को लौटकर आते हैं तब पायल को लड़की की पोशाक में देख कर आग-बबूला हो जाते हैं और पायल को  बेरहमी से पीटते हैं। “मैं हिजड़ा हूँ, मैं एक हिजड़े का बच्चा हूँ ...।” अपने साथ इस तरह से अमानवीय व्यवहार होता देख वह मानसिक रूप से कुंठित होकर घर से भाग जाने की तरकीब सोचती है और अंततः भाग जाती है।
            इस उपन्यास की पात्रा पायल ने अपने पिता की असहनीय मार और तकलीफ सहन किया तो वहीं समाज के कष्टों को भी झेला। बड़े भाई राकेश को लोग भड़काते हैं, वे ताने मारते है कि तुम हिजड़े के भाई हो तब राकेश का मन उठ जाता हैं “साला मादर...छक्के का भाई, भाई बड़ा रौब दिखाता है। सब घुसेड़ दूंगा, सारी दादागिरी धरी की धरी रह जाएगी।”  ये शब्द राकेश नशे में बोलता हैं, उन्हें उनके मित्रों ने इस प्रकार ताने दिए, वाकई में समाज के लोग किस तरह की सोच रखते हैं यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है। अगर किसी के घर में किन्नर का जन्म होता है तो समाज के अन्य लोगों को लगता हैं कि जैसे उसके भाई-बहन ही अपराधी हैं, एवं उनके साथ अछूतों की भांति व्यवहार किया जाता है। एक समय के लिए राकेश ने भले पायल को भला-बुरा कहा हो, लेकिन फिर भी वह अपनी माँ से पायल को पढ़ाने के लिए कहता है तथा पायल की माँ भी अपनी बड़ी बेटियों की तरह ही उसका पालन-पोषण करती हैं, फिर भी कहीं न कहीं असामान्य शरीर को देख कर वह ईश्वर को कोसती हैं-“ईश्वर को पता नहीं क्या मंजूर था अच्छी खासी लड़की जैसे लगती है। मैं सुनती तो सोचती कि लड़की ही तो हूँ मैं , .ये लड़की जैसी क्या बला है?” यहाँ साधारण रूप से एक माँ की संवेदना दिखाई देती है जो कि एक बच्चे के प्रति होती हैं, पायल इससे बिल्कुल ना समझ है वह स्वयं के अंदर स्त्रीत्व की अनुभूति करती है परन्तु  माँ के विपरीत पिता का व्यवहार पायल के लिए नकारात्मक और कष्टदायी सिद्ध होता है। वे पायल के बाहर जाने को लेकर अति चिंतित हैं क्योंकि उन्हें इस बात का भय है कि समाज को इस सच्चाई पता ना चल जाए कि उनके घर पायल के रूप में एक बेटी नहीं हिजड़ा है। समाज को सर्वोपरि मानकर अपने बच्चों से अमानवीय व्यवहार करना यह निंदनीय है। समाज हम मनुष्यों से ही बनता है जिसमें सबका समान अधिकार है। चाहे वह किसी भी लिंग/जाति/धर्म से संबंध रखता हो। इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना आवश्यक है  कि समाज में सर्वप्रथम मनुष्य को मनुष्य के रूप में ही देखना चाहिए ना कि किसी लिंग से जोड़कर। एक दिन रामबहादुर अपनी पत्नी से कहते हैं-“शांति! जुगनी को लड़के की आदत सिखाओ, उसको लड़का बनाकर रखो... वह हिजड़े के रूप में बड़ी होने पर समाज के लोग उसकी शादी-रिश्ते कि बात करेगें, जबकि लड़के के रूप में कोई कुछ नहीं कहेगा...” इस कथन से स्पष्ट होता है कि उनके पिता की चिंता क्या है? और किसलिए? यहाँ उनके मन में समाज का भय बैठा हुआ है, समाज में पितृसत्तामक गुण कूट-कूटकर भरे हुए हैं, जिसके कारण उनकी मानसिकता भी खंडित हो चुकी है और वे  समाज के खिलाफ आवाज उठाने की सोच भी नहीं सकते । जब वे पहली बार पायल को लड़के के पहनावे में देखते हैं, तो अपनी पत्नी से कहते हैं-“देखा शांति, अब तो ये पूरा लड़का लग रहा है, काश! ये हमारा बेटा ही होता।” यहाँ रामबहादुर के कथन से पता चलता है कि एक तो वे पायल की शारीरिक विकृति कपड़ो के माध्यम से छिपाना चाहते हैं और साथ ही उन्हें पितृमोह भी है। स्कूल भेजने की सलाह राकेश देता है, वहीं उनकी माँ को अपने पति के स्वर सुनाई देते हैं-“कान खोलकर सुन ले कमलेश की अम्मा अगली बार में आऊँ और यह साला हिजड़ा लड़की के कपड़े में मिला तो इसे घर से निकाल दूँगा, अपने हाथों से इस साले हिजड़े का खून कर दूँगा।” स्पष्ट होता है कि पिता के मन में अपनी असामान्य औलाद के  प्रति कितना आक्रोश है, वे अच्छे संस्कार देने कि बजाय सिर्फ मारने को तैयार होते है। पिता की तृतीयलिंगी संतान के प्रति सहानुभूति का तो नामों निशान तक नहीं फिर बाहर के लोगों से क्या उम्मीद रखी जाए? प्रत्येक दिन की मार और पिता द्वारा बोले गये ‘हिजड़ा शब्द एक दिन पायल को घर से भागने को मजबूर कर देते हैं। वह स्वयं का विनाश करने का मन बनाती है “न रहेगी यह हिजड़ा न रहेंगे वे ताने जो मुझे और मेरे कारण मेरे परिवार को मिल रहे थे।” इस कथन से स्पष्ट होता हैं हिजड़ा जीवन कितना कष्टदायी होता है, वह अपने परिवार के लिए कुएं में गिरने का सोचती, वह सम्भव नहीं हुआ। आगे जाकर ट्रेन के सामने कूदने का विचार आता हैं वह भी सफल नहीं होता, फिर वह घर की दुनिया छोड़ असली दुनिया में पहला कदम रखती हैं तब ही एक अधेड़ उम्र के मर्द से उनका सामना होता हैं वह उनको बेटा शब्द से सम्बोधित करता है। वह आदमी पायल के पिता की उम्र का है और वह उनकी पिंडली पर हाथ फेरता है कभी जांघ पर और मौके का फायदा उठाकर ट्रेन में उसे पकड़कर चूमता है। यहाँ समाज के लोंगो की वास्तविकता का पता चलता है कि एक तरफ परिवार के लोग हिजड़ो को घर से उठाकर फेंकना चाहते हैं क्योंकि वह हिजड़ा है, वही दूसरे क्षण में दूसरे पुरुष को देखते हैं तो वे भेड़िये की तरह स्त्री देह को नोचना चाहते हैं। पैसे के बल पर शोषण करना व यौन संबंध बनाना चाहते है। “मेरी और बीस रूपये का नोट बढ़ाते हुए कहा, ले रख बाथरुम में आ जाना, पायल के नहीं जाने पर आकर फिर “क्यों री तू आई नहीं...ले पचास का पकड़ आ जल्दी।” स्पष्ट होता हैं कि एक तरफ जब घर में  किन्नर पैदा होता है तब कलंक माना जाता है और पिता और घरवाले कचरे की भांति फेंकने को तैयार होते हैं, जैसे पायल के पिता उसका खून कर रहे थे, फाँसी पर लटकाया दूसरी ओर पुरुष हिजड़े के साथ भूख मिटाना चाहता है तब कलंक, इज्जत कुछ नजर नहीं आती हैं। वहाँ से वह बच जाती हैं, ट्रेन की यात्रा करके दूसरे प्लेटफार्म पर पहुँचती, तब भी जैसे कि आसमान से गिरी और खजूर पर लटकी वाली कहावत यहाँ प्रतीत होती हैं। पायल बेंच पर बैठती तब सिपाही आता और उससे कहता  है कि भाग कर आई हैं? इस तरह की धमकी देते हुए कानून का डर बताता और अपने डंडे के बल पर शारीरिक संबंध बनाकर भूख मिटाना चाहता हैं। अगर बात करें कि देश की समाजसेवा प्रशासन और पुलिस के हाथ में होती है, तो कहना होगा कि यदि इस तरह के पुलिस बैठा दिये जाए तो महिलाओं और किन्नरों के साथ न्याय कहाँ से होगा? जिम्मेदारी को भुलाकर एक सिपाही बेरहमी से अत्याचार करता हैं “ देख थोड़ा मोटा हैं... पर तुझे तकलीफ नही होगी।” क्या यहाँ प्रतीत नहीं होता हिजड़ा किसे कहा जाना चाहिए? किसे तिरस्कृत और उपेक्षित किया जाना चाहिए? हिजड़े वे होते हैं जो गलत काम में हस्तक्षेप करते हैं।
        पायल फिर से बच जाती हैं लेकिन सिपाही के द्वारा उसके साथ अभद्र और निंदनीय व्यवहार हद से ज्यादा किया , लेकिन वह अपनी जिन्दगी की रेस शुरू करने का हौंसला रखते हुए आगे बढ़ती है। घर न जाने का निर्णय लेते हुए भूख-प्यास से पीड़ित हैं, बेघर होकर भिखारियों के साथ, तो कभी किसी के सामने हाथ फैलाकर भूख मिटाती हैं। फिर एक दिन जुगनू बनकर दाँतुन बेचने का काम शुरू करती हैं, बाद में चाय की दुकान पर रहकर तो कभी कैंटीन में रहकर। फिर संतोष सिह के अप्सरा टॉकीज में अच्छा काम शुरू होता है, वहाँ भी समाज में भक्षण भोगी पुरुषों की कमी नहीं है, एक दिन प्रमोद नाम का लड़का पायल का शोषण करता है। उसको वह काम भी छोड़ना पड़ा वहाँ से निकलकर नई राह की तलाश में जुट जाती हैं, तब तक वह एक दिन हाथ किन्नरों के लग जाती हैं। वे कहते है कि अपनी गुरुमाई बहुत खुश होगी। इस प्रकार वे पायल के बारे में कहते हैं कि तुम्हारी दुनिया हमारे साथ हैं, और उसको जबरदस्ती के साथ वहाँ  से ले जाते हैं और चेलों के साथ गुरुमाई पायल को देख स्वागत करती है, किन्नर दुनिया से अवगत कराती है। पायल को किन्नर बनाकर ढोलक की थाँप पर थिरकने की सलाह देते हुए यह पेशा ही अपनाने पर ज़ोर देती है उसके ना मानने पर पायल के प्रति रवैया बदलते हुए पेश आते हैं।
              पायल के लिए वह दुनिया बहुत ही अजीब थी क्योंकि वह किसी के सामने हाथ फैलाना नहीं चाहती थी वह स्वयं को आत्मनिर्भर लड़की के रूप बताते हुए किन्नर गुरु के समक्ष अनुनय-विनय करती हैं, परन्तु गुरुमाई सुनने को तैयार बिल्कुल नही। “मैं हिजड़ा नहीं हूँ तुम लोगों की तरह, मैं एकदम सही लड़की हूँ।” यहाँ किन्नर समाज की असलियत सामने आती हैं, कि जो चेले अपनी गुरु को खुश करने के लिए पायल जैसे कई बच्चों को जबरदस्ती  उठाते हैं, जहाँ गुरुमाताई अपनी कमाई के लिए उन पर दबाव डालती हैं। गुरु स्वयं गलत आदतों की शिकार है और एशो आराम से पैसे लूट रही हैं, उस वर्ग में कुछ हिजड़े न होकर भी किन्नर समूह के साथ वह गुरुमाता के आस-पास मंडराते हैं, जिसमें पप्पू नाम का युवक जो पायल के साथ बदसलूकी करता हैं अर्थात् एक दिन तो हद पार कर लेता है वह पायल को मारता-पीटता है, उसके वस्त्र फाड़कर नग्न  कर देता है। बाकी लोग चुप होकर देखते रहते हैं, पायल घायल होने के बाद खुद को देखती है तब पाती है कि उसके वस्त्र सब फाड़ दिए गये, तब वह कहती है-हिजड़े हम नही हिजड़े वो लोग हैं जो अन्याय को देखते रहे और अपराध करे। पायल की गुरु कई दिनों बाद अस्पताल में उसे देखने जाती तब चेलों से कहती है इसकी अच्छी देखभाल करों क्योंकि इससे अच्छी कमाई होगी। वास्तव में समाज कैसा हैं? यह प्रश्न उठता है, एक तरफ द्विलिंगीय लोग किन्नरों को अपनाते नहीं दूसरी ओर किन्नर भी अपने ही लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार कर अपने ही समुदाय में उसका शोषण करते हैं। वहाँ से पायल ठीक होकर फिर से संघर्ष को जारी रखते हुए काम की तलाश में जुट जाती हैं। उसे आकाशवाणी में काम मिलता है, तब पायल पप्पू और गुरुमाई से बदला लेने की ठान लेती है। आखिर पप्पू को वह पकड़कर मित्र की सहायता से मारती हैं।यह बात पीछे क्षत्रिय समाज के कलंक की जो उसके पिता कर रहे थे, वही पायल उनको सक्षम होकर गलत साबित करती है। वह अच्छी नौकरी करती हैं और अपने परिवार के प्रति समर्पण भाव रखते हुए माँ से चोरी-छिपे मिलती भी हैं। पैसों के द्वारा उनकी सहायता भी करती है जिससे भाई-बहनों की शादी में उनकी कुछ मदद हो जाए। पायल के लिए फिर भी घर जाना सम्भव नहीं था, खुद को तकलीफ में पाकर भी वह अपने आपको सम्भालती है। वह धीरे-धीरे किन्नर का पेशा अपनाती है और एक सफल किन्नर गुरु भी बनती हैं।
            इस उपन्यास के माध्यम से हमें ना सिर्फ पायल की समस्याएँ देखने को मिलती हैं बल्कि इसमें तृतीयलिंगी औलाद के प्रति एक माँ की ममता और पिता का पितृसत्तामक आक्रोश देखने को भी मिलता है। किन्नर को सर्वप्रथम घर से तिरस्कृत, उपेक्षित किया जाता है, अगर वहीं अच्छी शिक्षा दी जाए तो वे ताली बजाने का पेशा शायद ही अपनाएंगे। सामान्य समाज के लोगों ने अपने स्वार्थ के खातिर इन लोगों को हाशिये की परिधि पर धकेल दिया तथा कई सालों से इनके साथ अमानवीय व्यवहार करते नज़र आ रहे हैं। लेकिन पायल जैसी संघर्षशील पात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इस प्रकार कह सकते है कि आज किन्नरों को समाज में अपनाने की शुरूआत किन्नर के पैदाइशी परिवार को करनी चाहिए ।  उनको शारीरिक और मानसिक रूप से  प्रताड़ित करके विस्थापित ना करे। यदि घर में ही उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा तो फिर समाज के अन्य लोग उन्हें परेशान करेंगे ही। इसलिए हम सभी तृतीयलिंगी वर्ग को उपेक्षित और तिस्कृत करने की बजाय उन्हें समानता की दृष्टि से देखें । ताकि वें भी अपना जीवन हमारी ही तरह सामान्य जीवन जीने हौंसला और जज्बा रख सके ।  
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-
1.        मैं पायल उपन्यास, महेद्र भीष्म , अमन प्रकाशन 2017
2.        भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीयलिंगी विमर्श ,अमन प्रकाशन 2017
3.        मनमीत पत्रिका (किन्नर विशेषांक )
                                                                                                                                                                


सोमवार, 23 सितंबर 2019

माई मनीषा महंत और मिलन बिश्नोई की बातचीत - किन्नर जीवन के अनछुए पहलूओं की पड़ताल में...


माई मनीषा महंत और मिलन बिश्नोई की बातचीत -  किन्नर जीवन के अनछुए पहलूओं की पड़ताल में...
Milan Bishnoi
Research Scholar, Department of Hindi
Central University of Tamilnadu.
Gmail- milanbishnoi@gmail.com

A talk With 'Transgender welfare Board Haryana's President Mai Manish Mahnt  (10th May 2019)

1.   मिलन बिश्नोई - आपके बारें में बहुत कुछ सुना लेकिन मैं आपके जन्म स्थान, परिवार और शिक्षा के बारें में जानना  चाहती हूं ?
माई मनीषा महंत - मेरा जीवन बिल्कुल देसी देहाती है। हालांकि मेरा जन्म ओर शुरूआती पढ़ाई हरियाणा के करनाल शहर में हुई,लेकिन उसके बाद जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखते हुए मैं हरियाणा के गुहला-चीका जिला कैथल के गाँव भून्ना में आ गई ओर आज गद्दीशीन गुरू मंगलमुखी किन्नर समाज की हैसियत से यहीं पर रहती हूँ। करनाल में मेरे मम्मी-पापा के अलावा परिवार में चार बहन-भाई ओर थे ओर मैं एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हूँ।
2.   मिलन बिश्नोई - दीदी आप माँ का हमेशा जिक्र करती हो और फिर अपनी माँ से दूर क्यों रहना पड़ता है?
माई मनीषा महंत - मैं समझती हूँ कि शारीरिक दूरी जितनी पीड़ादायक होती है,वहीं आत्मिक मिलन उतनी ही संतुष्टि देता है ओर मेरा मेरे परिवार के साथ कुछ ऐसा ही अनुभव है। रही बात माँ से दूर रहने की तो ये एक घृणित सामाजिक प्रथा है,जिसका धीरे-धीरे अंत हो रहा हैं, ये परम्परा अब दम तोड़ रही है। उम्मीद करते हैं कि भविष्य में किसी को ये सब अनुभव नहीं करना पड़ेगा।
3.   मिलन बिश्नोई - आप भी एक माँ के रूप में दो बच्चियों का पालन-पोषण कर रही है तो इन्हें गोद लिया तब समाज और सरकार के साथ आपका संघर्ष कैसा रहा?      
माई मनीषा महंत -  हाँ! माता रानी की कृपा से मैं दो बेटियों की माँ हूँ ओर किन्नर रूप में माँ बनना अपने आप में जीते जी स्वर्ग की अनुभूति करने जैसा है। रही बात दो-चार घटिया मानसिकता के लोगों को छोड़कर अन्य की बात करूँ,तो मुझे तकरीबन बहुत अच्छा रिस्पांस मिला, सभी ने खुशी भी जाहिर की ओर मुझे सहयोग भी किया। हाँ! कानूनी रूप से बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा,लेकिन अब सब ठीक है। बल्कि अब किन्नरों के बच्चा गोद लेने के मामले को लेकर कोर्ट जाने की तैयारी में हूँ,ताकि जो परेशानियाँ मुझे सहन करनी पड़ी, भविष्य में किसी के साथ ऐसा न हो।
4.   मिलन बिश्नोई - आप कितने भाई-बहन हैं और क्या अब सभी आपसे मिलते रहते है?
माई मनीषा महंत - हम पांच भाई-बहन हैं ओर अब रिश्ते वैसे नहीं हैं। कभी कोई काम होता है या फिर सुख-दुख के समय ही मिल पाते हैं । छोटी बहन की शादी से पहले रिशते बहुत अच्छे थे,लेकिन शादी के बाद उससे भी कभी मिलना नहीं होता या फिर शायद वो सब अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हैं। इससे ज्यादा सोचने के सिवाय हम कर भी क्या सकते हैं।
5.   मिलन बिश्नोई - आप इतनी कम उम्र में किन्नर बोर्ड की अध्यक्ष बन गई...इस सफल संघर्ष के बारे में जानना चाहती हूँ?
माई मनीषा महंत - किन्नर बोर्ड की अध्यक्ष बनने को मैं सफलता नहीं समझती,बल्कि ये जिम्मेदारी है।जो समाज ने हमारे कंधे पर डाली है, सफलता तो तब होगी। जब हम अपने समाज को मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर देगें ओर तब मेरे समाज की पहचान ताली बजाना या घुंघरू बजाना नहीं,बल्कि उनकी शिक्षा ओर उनका वो ओहदा होगा,जिस पर वो शिक्षित हो करके बैठेगें।
6. मिलन बिश्नोई- धारा 377 के बारें में आपकी क्या राय है?
माई मनीषा महंत - मैं 377 पर   कोई चर्चा करना नहीं चाहती। क्योंकि मैं समझती हूँ कि जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया,बहुत अच्छा किया। लेकिन मैं इस विषय पर कटु टिप्पणी करके किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहती।
7.   मिलन बिश्नोई - आजकल किन्नर अखाड़े बने है और मंडलेश्वर भी बनाये जा रहे तो इससे किन्नर समाज को क्या फायदा होगा ?
माई मनीषा महंत - बिल्कुल फायदा होगा,किन्नर अखाड़ा ओर महामंडलेश्वर बनने से हमें हमारी खोई हुई वैदिक-सनातनी पहचान वापस मिलेगी ओर किन्नर समाज धार्मिकता से जुड़ कर सात्विकता की ओर बढ़ेगा । हालांकि हम तो है ही जन्मजात के संत, हमें संत होने का सर्टिफिकेट भी नहीं चाहिए । लेकिन हमारी वास्तविक पहचान ही सनातन है । तो बिल्कुल ये ही एक हमारी अच्छी शुरूआत है।
8.   मिलन बिश्नोई -   देश में किन्नर बहुत कम पढ़े-लिखें हैं फिर भी उनके रोजगार के लिए क्या प्रावधान करने चाहिए ?
माई मनीषा महंत - बिल्कुल 99.9 किन्नर समाज अनपढ़ है। सरकार को इन्हें शिक्षा से जोड़ने के लिए अनेकों योजनाएं उपलब्ध करवानी होगी, ताकि आने वाली नस्लों का भविष्य सुनिश्चित हो सके ओर साथ ही इन्हें शैक्षणिक,राजनीतिक एवं विशेष सामाजिक अधिकार भी देने होंगे । ताकि आम लोगों द्वारा विभिन्न प्रकार से की जाने वाली इनकी प्रताड़ना पर रोक लग सके।
9.   मिलन बिश्नोई -  आने वाले वर्तमान समय और भविष्य में किन्नरों की शिक्षा के बारें में आप लोग क्या सोच रहे है ...सरकार से कुछ मांग की गई है ?
माई मनीषा महंत- बेशक हम चाहते है कि आने वाली किन्नर पीढ़ी पूरी तरह शिक्षा एवं रोजगार से जुड़ी हुई होनी चाहिए। मैंने डॉ. भीमराव अंबेडकरजी को पढ़ा है ओर मैंने समझा है कि अगर किसी भी पिछड़े वर्ग को मुख्यधारा में लाना है तो उन्हें कुछ विशेषाधिकार देने ही होगें। वरना पहले की तरह विकसित जातियां उनका यूँ ही शोषण ओर तिरस्कार करते रहेगी। जब तक किन्नरों को राजनीति,शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण के रूप में विशेषाधिकार नहीं मिल जाते,ये तब तक पिछड़े ही रहेगें। वर्तमान समय में किन्नर समाज अपना जो बधाई मांगने का कार्य करता है, उससे छेड़छाड़ किए बिना,अगर हम नई पीढ़ी को शिक्षा से जोड़ने में कामयाब हो जाते हैं तो ये बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे हम ब्रिटानिया से कोहिनूर हीरा ले आए हो। लेकिन  विशेषधिकार के बिना ये संभव नहीं है, क्योंकि किन्नरों को लेकर के लोगों की मानसिकता बहुत घृणित है।
10.  मिलन बिश्नोई -  साहित्य में किन्नर विमर्श काफी उभरकर आया है आपकी इसके प्रति क्या धारणा है ?
माई मनीषा महंत - साहित्य एक ऐसा मंच है,जो मुर्दों को भी जिंदगी दे सकता है। किन्नर विमर्श होना,यह इस बात का संकेत है कि हम सही रास्ते पर हैं। लेकिन अगर किन्नर समाज साहित्य से जुड़ जाए तो सोने पे सुहागा वाली बात हो जाएगी। साहित्य के जरिए लोग किन्नरों के प्रति सकारात्मक सोच भी अपना रहे हैं और उनकी भावनाओं को भी समझ रहे हैं । कुल मिलाकर ये प्रयास भी सराहनीय है ओर किन्नर विमर्श पर कार्य करने वाले सभी लोग बधाई के पात्र हैं।
11.   मिलन बिश्नोई - आप भी कहानी और कविताएं लिखती है फिर अपनी आत्मकथा लिखने के बारें में क्यों नहीं सोचा? अगर लिखोगें तो लोगों को सीखने व समझने और पढ़ने का अवसर  का मिलेगा।
माई मनीषा महंत - कहानियाँ ओर कविताएं लिखने का शौक मुझे बचपन से है, मेरे दिल की बात जो मैं किसी से साझा नहीं करना चाहती थी।उन्हें मैं कहानी या कविता के रूप में लिख लेती थी, जिससे मेरे दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाता था। मेरी आत्मकथा के बारे में अभी सोचा नहीं है,अब आपने कहा है तो इस पर भी जरूर विचार करेंगे।
12. मिलन बिश्नोई - किन्नर शब्द का अर्थ आप से समझना चाहती हूँ क्योंकि किन्नर शब्द काफी विवादित रहा है. और हिजड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग करना मैं उचित नहीं समझती।
माई मनीषा महंत - किन्नर शब्द के साथ भी बहुत-सी भ्रातियाँ जोङ दी गई हैं और हिजड़ा आम भारतीय शब्द नहीं है,बल्कि ये उर्दू ओर अरबी के मेल से बना है। तृतीयलिंगी शब्द एक सांकेतिक शब्द है,जो स्पष्ट करता है कि जिस व्यक्ति के बारे में आप चर्चा कर रहे हैं। वो पहले दो लिंग,पुरूष लिंग या स्त्री लिंग से भिन्न है। हालांकि हमारे भारतीय ग्रंथों में किन्नरों को स्पष्ट रूप से किन्नर ही कहा ओर लिखा गया है। लेकिन फिर समय के साथ-साथ न जाने कब इस मुगलई शब्द हिजड़ा ने अपनी जगह बना ली।वैसे भी इतिहास में भी आपको किसी पात्र के पूर्ण मनुष्य न होने के संकेत मिले,तो आप समझ जाइए कि वहां चर्चा किन्नरों के विषय पर ही है।
13. मिलन बिश्नोई - संघर्षमयी समय में किन्नर बच्चों का मानसिक विकास किस तरह होता है।इन सब तकलीफों के बावजूद भी वे अपने आप को कैसे मजबूत बनाएं रखते हैं।
माई मनीषा महंत - संघर्षमय जीवन का किन्नरों की मानसिकता पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है,जिसके कारण वे कठोर दिल के हो जाते हैं और कई बार तो दूसरों की भावनाओं को भी नहीं समझ पाते। लेकिन स्थिति को बदलने के लिये आम लोगों को किन्नरों के साथ सामान्य व्यवहार करना होगा,ताकि उनमें भी इंसानियत जिंदा रहे। किन्नरों के कठोर सा कमजोर मिजाज के लिए हमें  और आपकों  मिलकर  प्रयास करना होगा. और ये सब ताने देने से नही,बल्कि इंसानियत दिखाने से होता है।
  14. मिलन बिश्नोई- बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवाओं का मानसिक संतुलन काफी हद तक हम बिगड़ता देख रहे हैं कुछ युवाओं को सुसाइड करते हुए भी देख रहें है। तो किन्नर युवाओं की क्या स्थिति हैं और वे स्वयं मानसिक संतुलन किस प्रकार बनाएं रखते हैं?
माई मनीषा महंत - बेरोजगार युवाओं की तरह किन्नर भी आत्महत्या करते हैं और इसका आकड़ा भी चौंकाने वाला है।लेकिन सामाजिक रूप से इन मामलों को दबा दिया जाता है और सामाज इन मामलों को बाहर आने ही नहीं देना चाहता। ये सब बचपन से ही मानसिक तनाव,अकेलापन ओर हर दिन परिवार एवं लोगों के तानों के कारण होता है। मैं बिल्कुल नहीं कहूंगी कि इस मामले में किन्नर समाज बहुत मजबूत है।
15. मिलन बिश्नोई- साहित्य में किन्नरों की गुरु परम्पराओं का उल्लेख किया गया है। मैं आपसे जानना चाहती हूँ कि वे शिष्य को किस आधार पर और कैसे बनाते है?
माई मनीषा महंत - मुझे यह बताते हुए बिल्कुल गर्व होता है कि किन्नर समाज में गुरू-शिष्य परम्परा आज भी जीवित है ओर आज भी इसका वैसे ही पालन भी होता है। किन्नर समाज में शिष्य बनाने के लिए शिष्य बनने वाला पात्र उस डेरे (किन्नरों का घर) के नियमों का पालन करने में सक्षम हो तो कुछ सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ उसे शिष्य मान लिया जाता है।जैसे किसी को शिष्य बनाने से पहले उसे नई दुल्हन की तरह ही सात दिन तक हल्दी यानि उबटन लगाई जाती है। फिर उसे तैयार करके अपने शहर भर के प्रमुख मंदिरों में पूजा के लिए ले जाते है। फिर सभी उसे उपहार देते हैं और गुरू भी कुछ उपहार देकर उसे शिष्य मान लेती है।
16. मिलन बिश्नोई- किन्नर समाज के रीति-रिवाज और संस्कारों के बारें में जानना चाहती हूँ।
माई मनीषा महंत - किन्नर समाज में अनेकों धर्म,संप्रदाय और विचारधाराएं है। जो हर राज्य में अलग-अलग है। जैसे कि हम हरियाणा-पंजाब के किन्नर राजाओं के दरबारी किन्नर हैं ओर हमारे पास जो पुराने दस्तावेज है,वो भी राजाओं द्वारा बनाए गए दस्तावेज है। इसलिए हमारी बहुत परम्पराएं राजसी परम्पराओं से मिलती-जुलती है। प्रत्येक राज्य की अपनी अलग परम्पराएं और मान्यताएं है,जिन्हें शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता । अकेले हरियाणा-पंजाब में सूफी विचारधारा से संबंधित है। बाकी जो जिस धर्म की आस्था रखता है, वो उसी के मुताबिक ही चलता है। हालांकि किन्नरों में इस्लामीकरण भी धड़ल्ले से हो रहा था, जिसमें किन्नर अखाड़ा बनने के बाद बहुत तेजी से कमी आई है।
17. मिलन बिश्नोई -हमें साहित्य में पढ़ने को मिलता है कि किन्नर की मृत्यु के पश्चात शव को मारते-पीटने है और शव को रात में दफनाने ले जाते है क्या ऐसा होता है?
माई मनीषा महंत - अब पता नहीं कि ऐसी अफवाह कौन फैलाता है कि किन्नर समाज रात में शव यात्रा निकालता है। उसे मारते-पीटते भी हैं, ये सुनने में ही इतना असभ्य लगता है तो कोई ऐसा कैसे कर सकता है। जब किसी किन्नर की मौत होती है तो अंतिम संस्कार में उसके घरवाले ओर उसके आस-पड़ोस वाले भी शामिल होते हैं,तो जिस इंसान,परिवार या मौहल्ले–पड़ोस वाले ने किसी मरने वाले के साथ सारी उम्र बिताई हो। तो वे उसकी देह के साथ ऐसा कैसे करने दे सकते हैं, वो भी तब जब आप भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में रहते हो,जहाँ संविधान ही सर्वोपरि है।ये सिर्फ एक अफवाह है,जिसे साहित्यकारों,कहानीकारों और फिल्म वालों ने फैलाया है।
18. सामान्य समाज की तरह किन्नर समाज में भी जातिवाद होता हैं?
माई मनीषा महंत - बिल्कुल! किन्नर समाज में भी जातिवाद होता है ओर भेदभाव भी बराबर होता है। लेकिन वो बात अलग है कि गुरू-शिष्य परंपरा के कारण कोई इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता। और अगर इसके खिलाफ उठाकर कानून का दरवाजा खटखटा भी दे तो पुलिस कोई उचित जांच नहीं करती। इसलिए मैं बिल्कुल सच से मुँह नहीं मोड़ सकती,ऐसा हमेशा से होता आया है। बेशक कोई किन्नर समुदाय समाज इससे कितना भी मुँह मोड़ने का नाटक कर ले।
19. मिलन बिश्नोई - किन्नर समाज में बधाई देना,रेल में भीख मांगना, पूजा ...इत्यादि काम को किस आधार पर बाँटा जाता है ?
माई मनीषा महंत - किन्नर समाज में काम बाँटने जैसी कोई बात नहीं होती, हाँ गुरु-शिष्य परम्परा के अधीन कार्यक्षेत्र जरूर बांटा जाता है। बिल्कुल उसी आधार पर जैसे कोई पुत्र अपने  पिता की संपत्ति के आधार पर जैसे कोई आपस में बाँटते हैं। पूजा-पाठ अपनी आस्था ओर मान्यताओं के हिसाब से करते है।
20. मिलन बिश्नोई - किन्नरों की संपति का बँटवारा किस आधार पर होता है?
माई मनीषा महंत - किन्नरों की संपत्ति का बंटवारा आम लोगों की तरह ही होता है,जितनी इंसान की संतान होती है उतनी संपत्ति उनकी संतान को बराबर हिस्सों में बाँटकर दी जाती है। वैसे ही गुरू के जितने शिष्य होगें उसी हिसाब से संपत्ति सब चेलों में बराबर बाँट दी जाती है वैसे भी संपत्ति के नाम पर किन्नरों के पास बस वो इलाका होता है, जिसमें वे सब बधाई वगैरह माँगने के लिए जाते है। तो बस उसे आपस में बराबर बांट लेते है।

21. मिलन बिश्नोई - आप अक्सर कहती रहती है कि मैं अभी बधाई लेने जा रही हूँ तो क्या आप अपनी बधाई का हिस्सा गुरु को भी देती है?
माई मनीषा महंत - हाँ! बिल्कुल,अपनी कमाई का कुछ हिस्सा गुरु को भी देते हैं,लेकिन स्वेच्छा से देते हैं। कुछ गुरु जबरदस्ती अपने चेले से कुछ हिस्सा लेते है, हालांकि कहीं-कहीं ऐसी घटना भी सामने आती है कि गुरु चेले से कुछ अधिक माँग करते है।लेकिन मैं मानती हूँ कि गुरु को कुछ हिस्सा देना, उनको सम्मान देने के बराबर होता है।क्योंकि वृद्धावस्था में गुरु चेले के द्वारा  दिए जाने वाले रूपयों पर ही निर्भर होती है,जिससे वो अपनी दवाई और बाकी जरूरतों को पूरा करती है।
22. मिलन बिश्नोई- जैसे महिला और पुरूष के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ होते हैं इस तरह अस्पताल में आपके किन्नर समाज के लिए भी कोई अलग सुविधाएं उपलब्ध है?
माई मनीषा महंत -  नही! अस्पताल में अलग से कोई सुविधा नहीं मिलती और कई बार डॉक्टर हमें गंभीरता से भी नहीं लेते और इलाज करते हुए भी कतराते हैं।

23. मिलन बिश्नोई- किन्नर समाज में किस प्रकार के अनुशासन और दण्ड का प्रावधान हैं इसके बारें में थोड़ा जानना चाहती हूँ?
माई मनीषा महंत- अनुशासन हर किन्नर डेरे में अलग-अलग तरीके से लागू किए जाते हैं और उनमें नियम एवं स्थिति अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन दण्ड का प्रावधान एक जैसा ही है। बस ये इस बात पर निर्भर करता है कि अपराधी ने अपराध कैसा किया है,कुछ अपराध में मात्र रूपयों का दण्ड देकर अपराधी को माफ कर दिया जाता है। वहीं कुछ अपराधों में सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया जाता है या उसे अपने डेरे से निकाल देते है।
24. मिलन बिश्नोई- जैसे लड़कियो के लिए कुछ स्कूल अलग होते है तो क्या आप नहीं चाहते कि इस तरह किन्नर बच्चों को भी अलग शिक्षा दी जाए।यानि आप वर्तमान में किन्नर बच्चों की शिक्षा को लेकर सरकार से क्या अपेक्षाएं रखते हैं?
माई मनीषा महंत - हम किन्नर बच्चों के भविष्य,शिक्षा एवं सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर हैं, लेकिन अलग स्कूल-कॉलेज के खिलाफ हैं। हम चाहते हैं कि किन्नर समाज मुख्यधारा से जुड़े। लेकिन आप अगर उन्हें सबसे अलग रख कर शिक्षा और सहूलतें देगें तो आप आम लोगों एवं किन्नरों के तालमेल बैठाने की बजाय उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से अलग कर देगें। जो कि पहले से ही किन्नर समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ है, इसलिए अलग स्कूल, कॉलेज बनाने के बजाय, किन्नरों को आम बच्चों के साथ ही शिक्षा दी जाए,ताकि सब एक-दूसरे को आपस में समझ पाएं और एक-दूसरे की भावनाओं को समझ सकें। बस सरकार से मांग है कि किन्नरों को शिक्षा से जोड़ने के लिए अधिक से अधिक और प्रयास किए जाए|
25. मिलन बिश्नोई- अंतिम सवाल के साथ आप साहित्यकारों और शोधार्थियों को क्या संदेश देना चाहती है?
माई मनीषा महंत- साहित्यकारों एवं शोधार्थियों से मेरा यही कहना है कि मात्र डिग्री ओर प्रोजेक्ट पूरा करने एवं किताबें लिखने तक सीमित ना रहे, बल्कि चाहे सामाजिक या कानूनी कोई भी लड़ाई हो। आप किन्नरों को उसमें सहयोग करें एवं सरकार को उनकी मानसिक,सामाजिक,शारीरिक और आर्थिक स्थिति के बारें में अवगत करवाएं, क्योंकि किन्नरों से ज्यादा किन्नर समाज को आप जानते हैं आपने उनकों शब्दों में जिया भी है और शब्दों में समाया भी है।