कबीर,तुलसी और निराला के साहित्य में राम
मिलन
बिश्नोई
पीएचडी
शोधार्थी/स्वतंत्र साहित्यकार
तमिलनाडु
केन्द्रीयविश्वविद्यालय,तिरुवारूर 610005
Mob.9488246295
भारतीय
समाज के हर घर में और मनुष्य के रग-रग में दशरथ पुत्र राम बसे हुए है । तुलसी के
राम,वाल्मीकि रामायण के रघुपति और निराला के राम से कौन अनभिज्ञ रहा हैं। इसके
अलावा हिंदी साहित्य में कई रामकाव्य लिखे गए
जिनमें प्रमुख हैं- तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’,केशवदास कृत ‘रामचन्द्रिका’,मैथिलीशरणगुप्त द्वारा लिखित ‘साकेत’ और सुर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित ‘राम की शक्ति
पूजा’ इत्यादि। साहित्यकारों ने राम को अवतारी राम की तुलना
में साधारण मानव के रूप में पेश किया है। जिसमें राम असत्य के प्रति सत्य की लड़ाई
लड़ रहे है। चाहे वे तुलसी के राम हो या फिर निराला के राम । राम का संघर्ष ही समाज का आदर्श बना है। राम की भक्ति
सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं में देखने को मिलती हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के
अनुसार-“सगुणोपासक भक्त भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों रूप
ही स्वीकार करता है,पर भक्ति के लिए सगुण रूप ही स्वीकार करता है,निर्गुण रूप
ज्ञानमार्गियों के लिए छोड़ देता है.”सगुण भक्ति में राम के
लीलावतार और आराध्य रूप को माना गया है वहीं निर्गुण भक्ति में ब्रह्मज्ञान और
योगसाधना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया। वे निर्गुण भक्ति ब्रह्मनुभूति पर
बल देते हैं। अर्थात् कबीर के राम दशरथ
पुत्र के साकार रूप में भले नहीं रहे लेकिन वे ब्रह्म के पर्याय थे-
“दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है
आना ।।” अर्थात् उन्होंने जो हिंदुओं की विचारपद्धति में
ज्ञानमार्गीय पद्धति को स्वीकार किया है। भारतीय ब्रह्मवाद के साथ कबीर ने सूफियों
के रहस्वाद,हठयोगियों की साधना का समर्थन किया है। कबीर ने निर्गुण राम के बारें
में कहा है-
“निरगुन राम जपहु रे भाई,अविगत की गति लखी न जाई।
सेसनाग जाके गरूड़
समाना चरन कमल कमला नहिं जाना।।”
कबीर
ने यहां शेषनाग,गरूड़,कमला आदि का उल्लेख सगुण प्रसंगों के रूप में किया हैं। अर्थात् स्पष्ट है कि
निर्गुण और सगुण एक –दूसरे के विरोधी नहीं हैं हमें ज्ञान और भक्ति में भी कहीं
विरोध नहीं दिखाई देता।कबीर ने यह स्वीकार करते है भवसागर से पार जाने का साधन
भक्ति है।इस भक्ति के बिना मनुष्य भव-जल में डूबता है-
भगति बिन भौजलि डूबत है रे।
कबीर
ने राम के सगुण रूप को स्वीकार अवश्य नहीं किया लेकिन एकाग्रचित होकर ईश्वर की
नामस्मरण करके जप करने की और प्रेरित करते हैं । वे मन को दसों दिशाओं में भटकाते
हुए ईश्वर का नाम स्मरण करने वालों का विरोध करते हैं।
माला तो कर मे फिरै
जीभ फिरै मुख मांहि।।
मनुवां तो दस दिसी फिरै सो तौ सुमिरन नांहि।।
कबीर
माधूर्य भाव की भक्ति में आत्मा-परमात्मा के मिलन के आंनद का वर्णन विवाह के सांगरूपक
में करते है –
दुलहिनी गावहु मंगलाचार।
मोरे घर आए हो राजा राम भरतार।।
तन रत करि मैं मन रत करिहौं पंच तत्व बाराती।
रामदेव मोरे पाहुनैं आए मैं जोवन मैमाती।। कबीर की भक्ति में आत्मा का जीवात्मा के प्रति विरह भाव
मनोयोगात्मक रूप से देखने को मिलता हैं। वे प्रियतमा की भांति परमात्मा रूपी
प्रियतम का इंतजार करते-करते उन्हें पुकारते हैं।
आँखड़ियाँ
झांई पड़ी पंथ निहारि निहारि।
जिभड़ियां
में छाला पड्या राम पुकारि पुकारि।।
दास्य भाव की भक्ति जिस प्रकार तुलसीदास में
दिखाई देती हैं उसी प्रकार कबीर की भक्ति में दास्य भक्ति के गुण देखने को मिलते
हैं । वे अपना स्वामी ईश्वर और स्वयं को दास ओर गुलाम मानते है-
मैं गुलाम मोहि बेचि गोसाईं कबीर को हिंदी के भक्तिकाल में निर्गुण धारा के प्रतिनिधि
कवि माने जाते थे उसी प्रकार सगुण धारा के रूप में गोस्वामी तुलसीदास रामभक्त कवि
माने जाते हैं। उनका अवधी में रचित महाकाव्य रामचरितमानस रामकथा आधारित हैं जिसमें
सात काण्ड हैं। रामचरितमानस को तुलसीदास ने 2 वर्ष 7 माह की अवधि में पूरा किया ।
तुलसीदास के 12 प्रमाणिक ग्रंथ है- रामचरित मानस ,विनय पत्रिका,कवितावली,गीतावली
और दोहावली इनके प्रसिद्ध ग्रंथ है।
तुलसीदास ने राम के सगुण और साकार रूप को अपनाया । वे राम को विष्णु के अवतारी
मानते हैं तथा शक्ति,शील और सौंदर्य से व्याप्त हैं। तुलसी के राम अवतारी राम हैं
धर्म की रक्षा करने एवं अन्यायी और दुराचारियों को अवतरित मिटाने के लिए अवतरित
हुए। मर्यादा पुरूषोत्तम राम को समाज के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया
हैं। राम का चरित्र ही सभी एक नयी शक्ति के रूप में जनता को ऊर्जावान बनाती हैं। वे
एक आदर्श पुत्र,आदर्श भाई,आदर्श पति,आदर्श राजा के रूप में वे लोकमानस पर अमिट छाप
छोड़ते हैं। इसलिए आज भी जनता आदर्श राम राज्य की चाहत रखती हैं।
तुलसीदास
की भक्ति दास्य भाव की भक्ति है वे राम के प्रति समर्पित भाव रखते हैं। रामचरित
मानस में वे कहते है- सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगरि। कबीरदास की तरह ही
यहां उनकी दास्य भक्ति में दिखाई देता है कि सेवक-सेव्य के बिना कोई भी इस भवसागर
को पार नहीं कर सकता ।उनकी भक्ति “गोस्वामीजी की भक्ति पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी
सर्वांगपूर्णता।जीवन के किसी पक्ष को सर्वथा छोड़कर वह नहीं चलती है।”स्पष्ट है कि तुलसी की भक्ति में शास्त्रोक्त विधियों का समावेश है तो
दुसरी तरफ लोकमंगल की भावना । उनकी कविता का मूल उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय
है।उनके संपूर्ण काव्य में समन्वय की विराट चेष्टा देखने को मिलती हैं। आचार्य
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें लोकनायक कहा है । उनके अनुसार- “ भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर
आया हो। भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृति ,साधनाएं,
जातियां,आचार,विचारऔर पद्धतियां प्रचलित है ।तुलसीदास स्वयं नाना प्रकार के
सामाजिक स्तरों में रह चुके थे। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। उसमें
केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय है नहीं अपितु गार्हस्थ और वैराग्य का भक्ति और ज्ञान का भाषा और संस्कृति का
निर्गुण और सगुण का पुराण और काव्य भाववेग और अनासक्त चिंता का समन्वय रामचरितमानस
के आदि से अंत तक दो छोरों पर जाने वाली
पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।” तुलसीदास की
कविता में लोकमंगल की भावना जो विद्यमान है वह उनकी सामाजिक,सांस्कृतिक से अदभूत
हैं।तुलसी,कबीर,सूर जैसे कवियों ने अपने काव्य के माध्यम से मानव मात्र की
मनुष्यता को जगाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया हैं। तुलसी का काव्य जनकल्याणकारी
है,अमंगल का विनाश करने वाला एवं मंगल का विधान करने वाला है।उनका प्रसिद्ध ग्रंथ
रामचरितमानस से अधिक क्या लोककल्याणकारी हो सकता । इस ग्रंथ के अखण्ड पाठ आज भी
प्रत्येक हिंदू घरों में किएजाते है।
राम
नाम के संबंध में नंददुलारे वाजपेयी का कथन है- “उनके सम्मुख कोई बने बनाए आदर्श या नये-तुले प्रतिमान न थे,इसलिए जो कुछ
भी उन्हें उदाहरणों में अच्छा उपयोगी दिखाई दिया उसी को वे नए साँचे में ढालने
लगे। राम और कृष्ण उनके सर्वाधिक समीपी और परिचित नाम थे,अतएव इन्हीं चरित्रों को
उन्होंने नए सामाजिक आदर्शों की अनुरूपता देने की ठानी। निराला के सम्मुख प्राचीन
आदर्श प्रतिमानों को छोड़कर नवीन आदर्श रूप में कोई प्रतिमान नहीं आया इसलिए
उन्होंने राम नाम का उद्धत किया है,किंतु नवीन रूप में क्योंकि ये अवतारी राम नहीं
बल्कि संशय युक्त मानव,अपने साधारण मानव है जो अपने समय की परिस्थितियों से अवसाद
हैं।” हिंदी छायावादी कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला युगीन
यथार्थ के प्रति सजग कवि माने जाते थे। उनका जीवन संघर्षों ले भरा हुआ था।
उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा के कारण कभी भी किसी प्रकार के कष्ट और पीड़ा के
सामने झुके नहीं।यथार्थ की विषम परिस्थितियों को पार करते हुए आजीवन संघर्ष करते
हुए आगे बढ़ते रहे। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ में निराला के स्वयं का चरित्र देखने को मिलता है। “ ‘राम की शक्ति पूजा निराला’ की नहीं, संपूर्ण
छायावादी काव्य की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है। इसमें
कवि ने एक ऐतिहासिक प्रसंग के द्वारा धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का
चित्रण किया है। राम धर्म के प्रतीक हैं और रावण अधर्म का । इस कविता में अधर्म का
चित्रण एक प्रचंड शक्ति के रूप में हुआ है,जिसके सामने एक बार तो राम का साहस भी कुंठितहोने लगता है।यह स्थिति एक ओर
तो कवि के व्यक्तिगत जीवन के भयानक संघर्ष से संबद्ध हो जाती है और दूसरी ओर युगीन
यथार्थ की विकरालता को भी व्यंजित करती है। अंत में राम की शक्ति की शक्ति की ‘मौलिक कल्पना’ करते हैं, उसकी आराधना करते हैं और
अधर्म के विनाश के लिए सक्षम होते हैं।”अर्थात् यहां शक्ति की मौलिक उपासना भारतीय परम्परा में विश्वास रखते हुए
सत्य की ओर आगे बढ़ने की ओर कवि संकेत करता हैं। दूसरी तरफ प्राचीन सांस्कृतिक
आदर्शों का युगानुरूप संशोधन करने की ओर संकेत किया गया।
‘राम की शक्ति पूजा’की कथा बंगाल के कृतिवास रामायण
से ली गई है, यह निराला की एक 1936 ई. में लिखित प्रबंधात्मक कविता है उनके समूचे
व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शित कराती है। काव्य सौंदर्य की दृष्टि से यह कविता आधुनिक हिंदी साहित्य के छायावादी काव्य की
प्रगति की सीमा मानी जा सकती है। इसमें राम और रावण के युद्ध के व्यक्ति के
अंतद्वन्द्व का वर्णन मिलता है।
‘रवि हुआ अस्त;
ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रस गया
राम-रावण का अपराजेय समर
आज का
तीक्ष्ण-शर-विधृत-शिप्र-कर,वेग-प्रखर
शत-शेल-सम्बरण-शील,नील-नभ-गर्जित-स्वर,
प्रति-पल –परिवर्तित व्यूह-भेद-कौशल-समूह-...लोहित-लोचन-
रावण-मदमोचन महीयान...।’
निराला
ने तुलसी की भांति राम को पृथ्वी के भारों
का विनाश करने के लिए अवतरित नहीं किया है,उन्होंने समस्त संघर्षों का सामना करके
विजेता प्राप्त की है।निराला के राम की यही मानवीयता है कि कभी वे निराश हो जाते
है अन्याय की तरफ शक्ति का झुकाव देखकर लेकिन फिर से अपने मित्र के कहने और अपने
कर्तव्यों को निभाने के लिए मौलिक कल्पना की दृढ आराधना करते हैं।
‘बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान,रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण
हे पुरूषसिंह,तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधना का दृढ़ आराधना से दो उत्तर ।...’ राम केवल लोक नायक ही नहीं वे एक आदर्श पति भी हैं इसी कारण
सीता की मुक्ति का दायित्व अपने ऊपर समझते
हुए इस दायित्व को निभाने की पूरी कोशिश करते है और पराक्रमी रावण से युद्ध जीत
लेना चाहते हैं।इसके साथ यहां शक्ति आराधना का यह रूप मौलिक होने के साथ-साथ
युगानुरूप भी है। यहां राम अपने भक्त
आज्ञाकारी हनुमान को इंदीवर लाने का आदेश देते हैं।
‘चाहिए हमें एक सौ आठ कपि इंदीवर
कम से कम,अधिक और
अधिक हो,अधिक और सुंदर
जाओ देवीदह,उष : काल होते,सत्वर
तोड़ो लाओ वे कमल,लौट कर
लड़ो समर
अवगत हो जाम्बवान से पथ,दूरत्वस्थान
प्रभु पद रज सिर
घर चले हर्ष भर हनुमान।’
राम
की शक्ति की आराधना करने में लीन हो जाते है और नौ वें दिन शक्ति उनकी परीक्षा
लेने के लिए अंतिम पुष्प छुपा देती है जैसे ही यह थाली में इंदीवर के लिए हाथ
बढ़ाते है उन्हें पुष्प नहीं मिलता है । एक क्षण के लिए धिक्कार सा महसूस होता है।
क्योंकि रावण रूपी वैष्मयों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रकार की साधना करने का
प्रयास करते हैं।परंतु कोई न कोई बाधा समुपस्थित होकर समस्त साधनाओं को निष्फल
करने का प्रयास करती हैं तब राम के शब्दों में कवि का अंतर्मन खिन हो जाता है-
‘धिक जीवन जो पाता ही आया है
विरोध
धिक साधन जिसके लिए
सदा ही किया शोध।’ राम का यह धिक्कार ,वास्तव में कवि की अपनी ही नियति के
प्रति धिक्कार है।परंतु राम स्वयं के नयन को आहुति देने को तत्पर हो जाते है ।
उन्हें माँ राजीव नयन कहकर बुलाने का स्मरण आया जिससे अपनी साधना पूरी करने की ठान
लेते हैं। तब श्रीराम की नियति तो निश्चित
है अंत में देवी आकर उन्हें साक्षात् रूप
से मिलकर विजयीभव का आर्शीवचन देते हुए
लीन हो जाती ।
संदर्भ
ग्रंथ सूची- आचार्य रामचंद्र शुक्ल,हिंदी साहित्य का इतिहास
2.रामस्वरूप
चतुर्वेदी ,हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास
3.
डॉ नगेन्द्र,हिंदी साहित्य का इतिहास
4.
सं. पुस्तक सुमन भाटी, लेख- आधुनिक रामकाव्य की प्रासंगिकता,कंचन शर्मा
5.कबीर
ग्रंथावली
6.
तुलसीदास की ग्रंथावली
7.
सुर्यकांत त्रिपाठी निराला, राम की शक्ति पूजा



